महिला सशक्तिकरण पर लेख

महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य है महिलाओं को उनके जीवन एवं कार्य क्षेत्र के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार होना एवं उन्हें व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं  कानूनी सभी क्षेत्रों में समान अधिकार प्रदान करना। महिला सशक्तिकरण आजकल एक बहुचर्चित मुद्दा है और महिलाएं अपनी पूरी क्षमता का एहसास करने की दिशा में अग्रसर हैं। वे तेजी से अपने जीवन और व्यवसाय की दिशा तय करने करने के मामले में सशक्त हो रही हैं। हम यहां महिला सशक्तिकरण विषय पर साधारण भाषा में 300, 500, 600 एवं 800 शब्दों में लिखे गए लेख प्रस्तुत कर रहे हैं जो विद्यार्थियों के साथ-साथ अन्य लोगों के लिए भी उपयोगी हैं।

Article on Women Empowerment in Hindi

महिला सशक्तिकरण पर लेख (300 शब्द)

महिला सशक्तिकरण: बदलाव की बयार

जीवन के सभी क्षेत्रों में आज महिलाएं पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलकर कार्य कर रही है और महिला सशक्तिकरण एक बहुचर्चित मुद्दा बन चुका है। घर के अंदर या बाहर सभी जगहों पर महिलाएं अपना एक स्वतंत्र दृष्टिकोण रखती हैं और वे अपनी शिक्षा, व्यवसाय या जीवन शैली से संबंधित सभी निर्णय स्वयं लेते हुए अपने जीवन पर तेजी से अपना नियंत्रण कायम करने में कामयाब हो रही हैं। कामकाजी महिलाओं की संख्या में लगातार वृद्धि होने की वजह से महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त हुई है और इस वजह से उन्हें अपने जीवन का नेतृत्व खुद करने एवं अपनी पहचान बनाने का अत्मविश्वास भी प्राप्त हुआ है। वे सफलतापूर्वक विविध व्यवसायों को अपनाकर यह साबित करने का प्रयास कर रही हैं कि वे किसी भी मामले में पुरूषों से पीछे नहीं हैं। लेकिन ऐसा करते हुए भी महिलाएं अपने व्यवसाय के साथ-साथ अच्छी तरह से अपने घर एवं परिवार के लिए प्रतिबद्धता के बीच संतुलन कायम रखने पर भी ध्यान देती हैं। वे उल्लेखनीय सद्भाव के साथ आसानी से माँ, बेटी, बहन, पत्नी एवं एक सक्रिय पेशेवर जैसी कई भूमिकाएं एक साथ निभाने में कामयाब हो रही हैं। काम करने के समान अवसरों के साथ वे टीम वर्क की भावना के साथ तय समय सीमा के भीतर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने-अपने व्यवसायों में पुरुष समकक्षों को हर संभव सहयोग दे रही हैं।

महिला सशक्तिकरण

महिला सशक्तिकरण सिर्फ शहरी कामकाजी महिलाओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि दूरदराज के कस्बों एवं गांवों में भी महिलाएं अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। वे पढ़ी-लिखी हों या ना हों, अब किसी भी मायने में अपने पुरुष समकक्षों से पीछे नहीं रहना चाहती। अपनी सामजिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना वे अपने सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं और साथ ही अपनी उपस्थिति भी महसूस करा रही हैं।

हालांकि यह भी सच है कि ज्यादातर महिलाओं को अब समाज में बड़े भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता, लेकिन दुर्भाग्यवश अभी भी उनमें से कई को विभिन्न प्रकार के भावनात्मक, शारीरिक, मानसिक और यौन उत्प्रीरणों से दो-चार होना पड़ता है और वे अक्सर बलात्कार, शोषण और अन्य प्रकार के शारीरिक और बौद्धिक हिंसा का शिकार हो जाती हैं।

सही मायनों में महिला सशक्तिकरण तभी हो सकता है जब समाज में महिलाओं के प्रति सोच में परिवर्तन लाया जा सके और उनके साथ उचित सम्मान, गरिमा, निष्पक्षता और समानता का व्यहार किया जाए। देश के ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सामंती और मध्ययुगीन दृष्टिकोण का वर्चस्व है और वहां महिलाओं को उनकी शिक्षा, विवाह, ड्रेस कोड, व्यवसाय एवं सामाजिक संबंधों इत्यादि में समानता का दर्जा नही दिया जाता हैं। हमें उम्मीद करना चाहिए कि जल्दी ही महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रयास हमारे विशाल देश के प्रगतिशील एवं पिछड़े क्षेत्रों में भी किया जाएगा।

महिला सशक्तिकरण पर लेख 2 (500 शब्द)

महिला सशक्तिकरण- दुनिया को बेहतर बनाने का प्रयास

हम महिला सशक्तिकरण के युग में जी रहे हैं। पूरी दुनिया में आज महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। वे अब हर तरह से अपने जीवन एवं व्यवसाय से संबंधित निर्णय स्वयं लेने के लिए सशक्त हो चुकी हैं।

महिला सशक्तिकरण के लाभ:

महिलाओं को एक सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का आत्मविश्वास दिलाने को ही सही मायनों में महिला सशक्तिकरण कहते हैं। यह दूसरों पर उनकी निर्भरता समाप्त करते हुए उन्हें अपने आप में ही सबल बनाने का प्रयास है।

  • महिला सशक्तिकरण महिलाओं को गरिमा और स्वतंत्रता के साथ अपने जीवन का नेतृत्व करने में सक्षम बनाता हैं।
  • यह उनका आत्म सम्मान बढ़ाता है।
  • इसकी वजह से उन्हें एक अलग पहचान मिलती है।
  • वे समाज में सम्मानित पदों को प्राप्त करने में कामयाब होती हैं।
  • वे वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर होती हैं और इस वजह से अपनी इच्छाओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप खर्च कर पाती हैं।
  • वे समाज के कल्याण के लिए सार्थक योगदान दे सकती हैं।
  • वे सक्षम नागरिक बनती हैं और देश के सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ाने में सहयोग कर पाती हैं।
  • वे देश के संसाधनों में उचित एवं न्यायसंगत हिस्सा प्राप्त करने में कामयाब होती हैं।

महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता:

  • बिना महिला सशक्तिकरण के हम अन्याय, लिंग-भेद और असमानताओं को दूर नहीं कर सकते।
  • अगर महिलाएं सशक्त नहीं हैं तो उन्हें जीवन में सुरक्षा और संरक्षण का आनंद प्राप्त नहीं हो सकता।
  • इससे उन्हें कार्य करने के लिए सुरक्षित वातावरण प्राप्त होता है।
  • महिलाओं के शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ सशक्तिकरण एक शक्तिशाली औजार के रूप में कार्य करता है।
  • यह महिलाओं के लिए पर्याप्त कानूनी संरक्षण प्रदान करने का एक बड़ा साधन है।
  • अगर सामाजिक और आर्थिक रूप से महिलाएं सशक्त नहीं की गईं तो वे अपनी खुद की पहचान का विकास नहीं कर पाएंगी।
  • अगर महिलाओं को रोजगार प्रदान नहीं किया गया तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा क्योंकि महिलाएं दुनिया की आबादी का एक विशाल हिस्सा हैं।
  • महिलाएं बेहद रचनात्मक और बुद्धिमान होती हैं और इस वजह से सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों में उनका योगदान प्राप्त करना जरूरी है।
  • एक न्यायसंगत एवं प्रगतिशील समाज के लिए महिलाओं को कार्य के समान अवसर प्रदान किए जाने की आवश्यकता है।

महिला सशक्तिकरण के साधन:

शिक्षा: उचित और पर्याप्त शिक्षा के बिना, महिलाओं को सशक्त व्यक्तित्वों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि वे एक ज्ञानवान समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।

संचार कौशाल: प्रभावी संचार कौशल के विकास के  बिना, महिलाएं अपनी आवाज बुलंद नहीं कर सकतीं। सफल होने के लिए उनका प्रभावी ढंग से संवाद कर पाना उनके लिए जरूरी है। एक परिवार, टीम या कंपनी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए, नेताओं के रूप में, उन्हें लोगों को अपनी बात समझाने की आवश्यकता है।

प्रयोज्य आय: महिलाओं के जीवन में महत्वपूर्ण वित्तीय फैसलों में उनकी भी सुनी जाए इसके लिए उन्हें अच्छा कमाने की आवश्यता है। वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर महिला हमारे जीवन एवं हमारे कारोबार के विकास में भी अपना यागदान देती है।

इंटरनेट की शक्ति: इंटरनेट की उपलब्धता ने महिलाओं के सामाजिक संपर्क के दायरे में वृद्धि करने के साथ ही उनके ज्ञान एवं जागरूकता का भी विकास किया है। दुनिया भर में फैले इटरनेट ने महिलाओं से संबंधित सभी वर्ज्य, मिथकों और उनके बारे में प्रचलित गलत धारणाओं को समाप्त कर दिया है।

निष्कर्ष: महिला सशक्तिकरण द्वारा समाज और दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने में मदद मिलती है और साथ ही यह समावेशी भागीदारी के रास्ते पर आगे चलने में सहायता करता है। इसका मतलब यह है कि ऐसे परिवार एवं संगठन की खुशियों में वृद्धि होती है जहां महिलाओं का प्रभाव होता है।

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महिला सशक्तिकरण पर लेख 3 (600 शब्द)

महिला सशक्तिकरण- सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण महिला सशक्तिकरण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके द्वारा समाज में वित्तीय, मानवीय एवं बौद्धिक संसाधनों पर महिलाओं का नियंत्रण बढ़ाया जा सके। किसी भी देश में महिलाओं के सशक्तिकरण को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उनकी भागीदारी के पैमाने से मापा जा सकता है। महिलाओं को सही मायनों में सशक्त तभी कहा जा सकता है जब महिलाओं का अपना महत्व, उनका अपने जीवन को नियंत्रित करने का अधिकार एवं उनकी समाज में बदलाव लाने की क्षमता से संबंधित सभी उद्देश्य एक साथ पूरे हो रहे हों।

महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण की आवश्यकता: आरक्षण के माध्यम से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी वर्तमान समय में निस्संदेह एक सकारात्मक विकास है। लेकिन यह सिर्फ चुनाव तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया, योजना बनानें एवं विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

महिलाओं के जीवन को प्रभावी ढंग से संतुलित करना होगा एवं इस दिशा में किए गए सभी प्रयासों का लक्ष्य एक ऐसा सामाजिक बदलाव लाने वाला होना चाहिए जिसके द्वारा समाज में पुरुष और महिला शक्तियों के बीच संतुलन का एहसास हो सके।

महिला सशक्तिकरण की जमीनी हकीकत: हालांकि महिलाएं दुनिया की आबादी के कुल प्रतिशत का लगभग आधा हिस्सा हैं, लेकिन फिर भी दुनिया भर के अधिकांश विकासशील देशों में वे अपने अधिकारों से वंचित हैं। खास तौर पर उत्तरी एवं पूर्वी एशियाई तथा अफ्रीकी देशों में महिलाएं प्रचलित लैंगिक भेदभाव की वजह से अभावग्रस्त जीवन जीने को मजबूर हैं।

ग्रामीण-शहरी विभाजन: ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति शहरी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं की तुलना में ज्यादा दयनीय है। यह सर्वविदित है कि महिलाएं पुरुषों के समकक्ष समान अधिकार से वंचित हैं और विकास के लिए महत्वपूर्ण संसाधनों के उत्पादन में भी उनका योगदान एवं भागीदारी कम होने की वजह से वे शक्तिहीन बने रहने को मजबूर हैं। इसलिए यदि हमें महिला सशक्तिकरण के लक्ष्य को समग्रता से प्राप्त करना है तो महिलाओं को पुरुषों के साथ सक्रिय भागीदार बनाना होगा। किसी भी समाज में आधुनिकीकरण के प्रयासों को सफल बनाने के लिए महिलाओं को विकास की मुख्य धारा में शामिल करना जरूरी है। खासकर, हमें ग्रामीण समाज में पुरुषों के प्रति पक्षपाती हुए बिना महिलाओं एवं पुरुषों को समान अवसर उपलब्ध कराना होगा।

ऐसा संभव हो सके इसके लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और साथ ही धार्मिक, सभी मोर्चों पर महिलाओं को इस प्रकार सशक्त बनाने की आवश्यकता है कि वे समाज का विकास करने के सभी प्रयासों में सक्रिय रूप से भाग ले सकें। अगर उन्हें जीवन में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में समान अवसर प्रदान किए जाएं तो महिलाओं को  सार्वजनिक रूप से सक्रिय जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता प्राप्त होगी और इससे समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन भी लाया जा सकेगा। हमें समाज में अनुकूल वातावरण बनाने की जरूरत है ताकि महिलाएं अपने विचारों को स्पष्ट करने में सक्षम हो सके एवं अपने कार्यक्षेत्र में भी अधिक उत्पादक बन सके। उन्हें उनके परिवार, समाज एवं देश के लिए किए जा रहे निर्णयों में समान रूप से शामिल किए जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: दुनिया भर में समकालीन समाजों में सामाजिक एवं और आर्थिक विकास के मोर्चों पर परिवर्तन की प्रमुख प्रक्रियाएं चल रही हैं। हालांकि इन प्रक्रियाओं को संतुलित तरीके से लागू नहीं किया जा सका है और इस वजह से पूरी दुनिया में लैंगिक असामनता बढ़ रही है और इस वजह से महिलाएं सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। इस स्थिति ने महिला सशक्तिकरण की गति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। इसलिए, हमें एक पूरी तरह से बदले हुए समाज की आवश्यकता है जिसमें महिलाओं को विकास के समान अवसर प्रदान किए जा सकें ताकि वे पुरुष समकक्षों के साथ व्यापक रूप से समाज के विकास के लिए जरूरी सभी कारकों में समान रूप से अपना योगदान दे सकें।

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महिला सशक्तिकरण पर लेख 4 (800 शब्द)

परिवारों में एक साथ कई भूमिकाएं निभाते हुए महिलाएं अपनी श्रेष्ठता साबित करने में कामयाब रही हैं लेकिन फिर भी उनकी स्थिति सामाजिक एवं आर्थिक सभी मोर्चों पर चिंताजनक है एवं दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में वे दयनीय जीवन जीने को मजबूर हैं। ऐसे परिदृश्य में उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

महिला सशक्तिकरण समन्वित विकास के लिए जरूरी है: महिलाओं का सशक्तिकरण किसी भी देश के भविष्य की बेहतरी के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि वे अपने परिवारों के प्रबंधन के साथ-साथ अपने परिवारों की आर्थिक जरूरतों की पूर्ति में भी योगदान देने के लिए कठिन परिश्रम करती हैं और इस प्रकार दोहरी जिम्मेदारी निभाती हैं। कभी भी कोई अपने परिवार मे माँ, बहन या बेटी की भूमिका के महत्व को नजरअंदाज नहीं कर सकता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ महिलाएं सफलतापूर्वक अपना उल्लेखनीय स्थान बनाने में कामयाब हुई हैं, लेकिन ऐसी महिलाएं अपने समकक्षों की तुलना में केवल मुट्ठी भर ही हैं।

खेलों में असाधारण प्रदर्शन: विभिन्न अतर्राष्ट्रीय मंचों पर, महिलाओं ने सफलतापूर्वक यह साबित कर दिया है कि यदि उन्हें मौका दिया जाए तो वे अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में किसी भी मायने में कम नहीं हैं। अभी हाल ही में आयोजित रियो ओलंपिक में यह बात साबित हो चुकी है। कोई भी रियो के सितारों—साक्षी मल्लिक, पीवी सिंधु या दीपा कर्माकर को नहीं भुला सकता जिन्होंने कदम-कदम पर लैंगिक बाधाओं को सफलतापूर्वक तोड़ते हुए पूरी दुनिया के सामने भारत के राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान बढ़ाया। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारत जैसे पुरुषों के वर्चस्व वाले देश में, इन महिलाओं के लिए विभिन्न बाधाओं का सामना करते हुए दुनिया भर में अपना नाम  कमाना एवं ऐसे उच्च स्थानों तक पहुंच कर ख्याति अर्जित करना कितना मुश्किलों से भरा सफर रहा होगा।

भेदभाव के शिकार: भारतीय समाज में लंबे समय से प्रचलित भेदभाव एवं पुरुषों के वर्चस्व की वजह से महिलाओं का उनके परिवारों एवं यहां तक कि पूरे समाज में दमन का सामना करना पड़ा है। समय-समय पर उन्हें हिंसा एवं परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा विभिन्न प्रकार के भेदभावों का भी सामना करना पड़ता रहा है। दुनिया के कई अन्य देशों में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। कुछ यूरोपीय देशों को छोड़कर दुनिया के ज्यादातर देशों में भारत के समान ही महिलाऐं गंभीर लैंगिक भेदभाव की शिकार हैं।

बहुत दूर है मंजिल: ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाओं की स्थिति और भी बुरी है और साथ ही अर्थव्यस्था में उनका योगदान भी नगण्य है। हालांकि वे देश की आबादी का लगभग 50% है लेकिन उन्हें उनके सपनों को साकार करने के लिए पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए हैं और इस वजह से उन्हें उनकी क्षमताओं का पूरा प्रदर्शन करने का मौका भी नहीं मिल पाता। इन हालातों में, हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि हमारा देश एक विकसित राष्ट्र तब तक नहीं बन सकता जबतक हम महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में सही मायनों में प्रयास ना करें। महिलाओं को सभी क्षेत्रों में विकास के समान अवसर उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है।

परिवर्तन की ओर: महिलाओं को हर धर्म में एक विशेष दर्जा दिया गया है उसके बावजूद सदियों से समाज में महिलाओं के खिलाफ कई बुरी प्रथाएं प्रचलन में रही हैं। लेकिन अब सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होना प्रारंभ हो चुका है और पितृसत्तात्मक प्रणाली धीरे-धीरे समाप्ति की ओर अग्रसर है। महिलाएं अब खुद के लिए सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों, जैसे कि काम करने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, निर्णय करने का अधिकार, आदि की मांग कर रही हैं। विभिन्न सरकारों ने महिलाओं की मदद के लिए कई संवैधानिक और कानूनी अधिकार भी लागू किए हैं, ताकि महिलाएं एक सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकें।

अब महिलाओं की अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और इस दिशा में प्रयासरत विभिन्न गैर सरकारी संगठनों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं का अभिर्भाव इसका प्रमाण है। व्यक्तिगत स्तर पर भी महिलाएं अब दमन के बंधनों को तोड़ते हुए अपने अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं।

भारत की संसद ने भी महिलाओं को विभिन्न प्रकार के अन्यायों एवं भेदभाव से बचाने के लिए कई कानून पारित किए हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए पारित इन कानूनों में कुछ इस प्रकार हैं-- समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, चिकित्सीय गर्भ समापन कानून 1971, मातृत्व लाभ अधिनियम 1961, सती निवारण आयोग अधिनियम-1987, बाल विवाह निषेध अधिनियम -2006, गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग की रोकथाम) अधिनियम 1994 एवं कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2013।

अभी हाल ही में, दिल्ली में पैरामेडिकल छात्रा के बलात्कार एवं नृशंस हत्या से जुड़े निर्भया केस के मद्देनजर, सरकार ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) विधेयक-2015 पारित किया है। यह अधिनियम पुराने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) विधेयक 2000 में परिवर्तन करके बनाया गया है जिसके अंतर्गत अब अपराध के लिए सजा दिए जाने के लिए निर्धारित किशोर की उम्र 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष कर दी गई है।

निष्कर्ष- यदि हम सही अर्थों में महिला सशक्तिकरण करना चाहते हैं तो, पुरुष श्रेष्ठता और पितृसत्तात्मक मानसिकता का उन्मूलन किया जाना बेहद जरूरी है। इसके लिए बिना किसी भेदभाव के शिक्षा एवं रोजगार के क्षेत्रों में महिलाओं को समान अवसर प्रदान किए जाने की आवश्यकता है। महिलाओं के प्रति सामाज में व्यावहारिक परिवर्तन लाए बिना केवल उन्हें कानूनी और संवैधानिक अधिकार प्रदान करना अपर्याप्त ही साबित होगा।