जलवायु परिवर्तन से जुड़े तथ्य

जीवन और पर्यावरण एक दूसरे के पूरक हैं। शुद्ध पानी, पृथ्वी, हवा हमारे स्वस्थ जीवन की प्राथमिकता है। दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग चिंता का एक प्रमुख कारण बन गया है। दुनिया के वैज्ञानिकों ने धरती के तेज़ी से बदलते मौसम को ख़तरे की घंटी बताया है। जलवायु परिवर्तन की घटना मानव जाति के लिए एक प्रमुख खतरे के रूप में उभरी है। यह न केवल विकसित देशों को बल्कि दुनिया के सभी देशों को प्रभावित करती है। दुनिया के कई हिस्सों में बर्फ लगातार पिघल रही हैं और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। अगर हम पृथ्वी पर जीवन को बचाना चाहते हैं तो जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने आवश्यक हैं। यह ज़रूरी है कि हमें वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी दोनों के लिए हमारे पर्यावरण और प्रकृति का संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं:

जलवायु परिवर्तन से जुड़े तथ्य (Facts about Climate Change)

-> जलवायु परिवर्तन की गंभीरता के पीछे के कारणों में से एक है दुनिया की निरंतर बढ़ती आबादी जिसकी 2040 तक लगभग 9 बिलियन तक पहुंचने की संभावना है अर्थात 900 करोड़। अब आबादी करीब 7.5 बिलियन है और इसमें चीन तथा भारत का कुल "योगदान" 2.50 अरब से अधिक है – तक़रीबन एक तिहाई से अधिक!

-> पिछले 50 सालों में वैश्विक जनसंख्या दोगुनी हो गई है लेकिन प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग चार गुना बढ़ गया है।

-> विश्व के सबसे समृद्ध लोगों की संख्या करीब 50 करोड़ के आस-पास है जो कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग 50% फैलाव के लिए जिम्मेवार हैं जबकि 300 करोड़ गरीब लोग दुनिया के 6% प्रदूषण के जिम्मेवार हैं।

-> यह गणना की गई है कि दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 40000 से अधिक प्रतिभागियों के कारण सिर्फ दो हफ्तों के भीतर उत्सर्जित 'ग्रीनहाउस गैस' की मात्रा पूरे वर्ष 600,000 इथियोपियाई नागरिकों द्वारा उत्पन्न कुल उत्सर्जन से अधिक थी।

-> 2005 की संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का शोषण इतना व्यापक है कि भविष्य की पीढ़ियां बच पाएंगी या नहीं यह कहना मुश्किल है।

-> वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट, जो वैश्विक स्तर पर केंद्रित पर्यावरण अनुसंधान संगठन है, के अध्यक्ष क्रिस्टोफर फ्लेविन के अनुसार आधुनिक संस्कृति के उपभोग ने पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

-> दुनिया के संसाधनों का शोषण अधिक बढ़ गया है क्योंकि अब लोग मात्र दिखावे के लिए साधनों की खपत और उनको एकत्रित करते हैं।

-> वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के प्रमुख लेखक एरिक असदौरीयन के बयान के अनुसार हमें पिछले दो शताब्दियों में विकसित भौतिकवाद की संस्कृति को बदलना होगा लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि यह केवल विकसित देशों तक ही सीमित नहीं है बल्कि विकासशील देशों में भी अपनी पकड़ बहुत तेजी से बना रहा है।

-> अमेरिका प्रदूषण की सबसे बड़ी मात्रा का उत्सर्जन करता था लेकिन अब चीन भी पीछे नहीं है। चीन अब कारों की खपत के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन गया है।

-> दूसरी तरफ हमारे पास इक्वाडोर जैसे देश का उदाहरण हैं जहां के निवासियों ने धरती माँ की पूजा की शपथ ली है और वे प्रार्थना कर रहे हैं कि वे अपने आनंद के लिए संसाधनों की खपत को बढ़ावा नहीं देंगे जो कि पृथ्वी बार बार प्रदान नहीं कर सकती।

-> ग्रीनहाउस गैस सूर्य की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा अवशोषित करती हैं और इसे दुनिया भर में फैलाती है जिससे इसे जीवन के अस्तित्व के लिए पृथ्वी की चारों दिशाओं में फ़ैल जाती हैं - इसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहा जाता है।

-> ये गैस पृथ्वी पर प्राकृतिक कवर या परत बनाते हैं और इसे अधिक गर्मी से बचाते हैं। सूर्य की गर्मी पृथ्वी के कई हिस्सों में घूमती है और फिर अंतरिक्ष में वापस चली जाती है।

-> हालांकि मानव गतिविधियों से इन गैसों की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ रही है जिससे जलवायु परिवर्तन हो सकता है।

-> संयुक्त राष्ट्र जलवायु एजेंसी की विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक 2016 में औसत वैश्विक तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था।

-> ग्रीनहाउस गैसों के बड़े पैमाने पर उत्सर्जन के लिए कोयले, पेट्रोल और प्राकृतिक गैस के उपयोग के रूप में मानव गतिविधियां जिम्मेदार हैं।

-> बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण के मद्देनजर जीवाश्म ईंधन मनुष्यों द्वारा बड़ी मात्रा में जला दिया जाता है जिससे पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों की उपस्थिति अत्यधिक हो जाती है।

-> ग्रीनहाउस गैसों की परत जो सूर्य की ऊर्जा का हिस्सा अवशोषित करती है, उसकी मोटाई दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। यह सूर्य की अतिरिक्त किरणों को अवशोषित कर रहा है जो अंतरिक्ष में वापस नहीं जा पा रही।

-> जैसे ही यह परत अधिक गर्मी को अवशोषित करते हैं इससे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो जाती है।

-> पिछले 100 वर्षों में दुनिया का तापमान कम से कम 0.85 डिग्री सेल्सियस (53 डिग्री फ़ारेनहाइट) बढ़ गया है। इतना ही नहीं इस दौरान समुद्र के स्तर में भी 20 सेंटिमीटर (8 इंच) की वृद्धि हुई है।

-> पिछली शताब्दी में अंटार्कटिका का औसत तापमान पृथ्वी के औसत तापमान की तुलना में दो गुना तेजी से बढ़ा है। अंटार्कटिका में बर्फ से ढंके क्षेत्र में 7 प्रतिशत की कमी आई है।

-> उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों, उत्तरी यूरोप और उत्तरी एशिया के कुछ हिस्सों में भारी बारिश हो रही है जबकि भूमध्य और दक्षिण अफ्रीका तेजी से सूख रहे हैं।

-> एक अनुमान के मुताबिक अगर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह से जारी रहा तो 21वीं सदी में वैश्विक तापमान 3 से 8 डिग्री तक बढ़ सकता है।

-> कोयला पर आधारित बिजली उत्पादन, प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव, वाहन उत्सर्जन, कोयला खनन, मानव जीवन शैली में बदलाव (रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, कार आदि) में परिवर्तन इसके अलावा आधुनिक कृषि में रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण है।

-> ये सभी गतिविधियां ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि कर रही हैं विशेष रूप से पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड जो कि जलवायु परिवर्तन के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है क्योंकि इससे ग्लोबल वार्मिंग की गति बढ़ जाती है।

-> अन्य कारणों में इंसानों द्वारा औद्योगिकीकरण के नाम पर जंगलों को अंधाधुंध काटने से पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।

-> मानव द्वारा औद्योगिकीकरण के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटौती पृथ्वी, इसके पर्यावरण और इसकी जलवायु के लिए एक बड़ा खतरा बन रही है।

-> कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके पेड़ों ने पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को कम करने में हमारी सहायता की है और इस तरह पृथ्वी को अपने मौसम चक्र को बनाए रखने में मदद की है।

-> वनों की कटाई की वजह से वृक्षों की संख्या कम होने के कारण पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा काफी बढ़ रही है।

-> जमीन पर खेती करने और उनकी तेजी से बढ़ती आबादी का निपटान करने के लिए मनुष्यों द्वारा जंगलों को अंधाधुंध काटा या जलाया जा रहा है।

-> स्लेश और जलाकर खेती करना, जिसके तहत किसानों ने बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटा या जला दिया, भी पृथ्वी पर हरियाली को कम करने के लिए भी जिम्मेदार है।

-> लकड़ी का व्यापार करने वाले माफिया लकड़ी से पेपर उद्योग की अवैध रूप से आपूर्ति करने के लिए दुनिया भर के जंगलों में पेड़ों को काट रहे है।

-> शहरी बस्तियों के लिए भूमि की आवश्यकता बढ़ रही है वनों की कटाई का यह एक और कारण है।

-> इससे बारिश के चक्र में गड़बड़ी या अनियमितता हो गई है जो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है।

-> बारिश चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव के कारण दुनिया के कुछ स्थानों के तापमान में भारी वृद्धि या गिरावट दिखाई दे रही है।

-> अगर उत्तरी गोलार्ध में बर्फबारी होगी, आर्कटिक महासागर में बर्फ और ग्लेशियर पिघलेंगे तो सभी महाद्वीपों में बेमौसमी बारिश और ज्वालामुखी में विस्फोट होगा।

-> वास्तव में पूरी जलवायु का चक्र अनियमित हो रहा है जिसके परिणामस्वरूप सूखा, अत्यधिक वर्षा, बाढ़, चक्रवात आदि समस्याएं होती हैं।

-> इसके अलावा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गर्मियां ठंडी या गर्म हो रही है और कुछ देशों में मौसम पूरी तरह सूखा हो रहा है।

-> वनों की कटाई के अलावा पशुपालन की गतिविधियां जैसे गायों, सूअरों और मुर्गियों को पालने की वजह से ग्रीनहाउस गैसों का बड़ी मात्रा में उत्सर्जन होता है।

-> इन गतिविधियों ने जलवायु चक्र में अनियमितताओं में योगदान दिया है नतीजतन आज हम सबसे खराब जलवायु परिवर्तन की स्थिति का सामना कर रहे हैं।

-> प्राकृतिक कारण जलवायु परिवर्तन के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं जिनमें समुद्र के प्रवाह, महाद्वीपों का स्थानांतरण, ज्वालामुखी विस्फोट, पृथ्वी के अक्ष में झुकाव, प्राकृतिक वनों की कटाई, उल्काओं और धूमकेतु की टक्कर आदि शामिल है।

-> ग्लेशियरों के पिघलने के कारण महासागर गरम हो रहे हैं। अनुमान लगाया गया है कि आधी शताब्दी के भीतर महासागर का पानी का स्तर लगभग आधा मीटर तक बढ़ जाएगा।

-> महासागरों को जलवायु तंत्र के एक प्रमुख घटक के रूप में माना जाता है। महासागर पृथ्वी के तापमान को बहुत बढ़ा देंगे क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण सूरज की गर्मी की वजह से उनका एक्सपोजर बढ़ता है।

-> ग्लोबल वार्मिंग, ग्लोबल थर्मोहाइन परिसंचरण प्रणाली (THC) के प्राकृतिक चक्र को परेशान करने के लिए जिम्मेदार है जो महासागरों के पानी के ताप को ठंडा और गर्म करता है। इस प्रणाली को हवा के प्रवाह के माध्यम से निर्धारित किया जाता है जो समुद्र की धाराओं द्वारा संचालित होता है।

-> समुद्री के स्तर बढ़ने के कई प्रतिकूल परिणाम हैं जैसे तटीय इलाकों में तबाही, जमीन का जल में समा जाना, बाढ़, मिट्टी का क्षरण, खारा पानी आदि के दुष्प्रभाव।

-> महाद्वीपों जिनमें हम आज जी रहे है उनका जन्म  लाखों साल पहले भूमि के खिसकने के कारण हुआ था। वायुमंडल में बदलाव जलवायु परिवर्तन की तरफ इशारा करता है क्योंकि यह दुनिया भर में जल निकायों की स्थिति को बदलता है।

- ज्वालामुखी विस्फोट के कारण वातावरण में खतरनाक सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) गैस, धूल, राख और वाष्प उत्सर्जित होते हैं। ये सभी घटक पृथ्वी के जलवायु चक्र में भारी परिवर्तन लाने के लिए जिम्मेदार हैं।

-> बड़े पैमाने पर प्राकृतिक वनों की कटाई जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े कारणों में से एक है। वनों की आग, सूखा, उष्णकटिबंधीय तूफान और ज्वालामुखीय गतिविधियां प्राकृतिक जंगलों को नष्ट कर गई हैं। तूफान हर साल वर्षावन को इतना नुकसान पहुंचाता है कि उनकी वसूली सदियों में ही संभव है।

-> जब उल्का और क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराते हैं तो वे विनाश का कारण बनते हैं जिसके फ़लस्वरूप हजारों मील तक उच्च मात्रा में गैस और अग्निवेश फ़ैल जाते हैं। इसके अलावा एसिड बारिश भी पैदा होती है।

-> बढ़ती हुई आबादी के कारण भोजन की बढ़ती मांग ने कृषि पर भारी दबाव बना दिया है जिसके कारण अनाज का अधिक उत्पादन करना मज़बूरी बन गया है भले ही उसके लिए रासायनिक उर्वरक या कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग करना पड़े जिससे जलवायु पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता हो।

-> जलवायु परिवर्तन से जैव विविधता को ख़तरा है क्योंकि प्राकृतिक वातावरण में पशु, पक्षी और पौधें रहते हैं और ये किसी भी प्रतिकूल बदलाव के प्रति बहुत संवेदनशील हैं।

-> गरीब और विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के कारण सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि उनके पास जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त क्षमता और संसाधन नहीं हैं।

-> 22 अप्रैल, 2016 को भारत सहित 130 से अधिक देशों ने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे का सामना करने के लिए ऐतिहासिक 'पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते' पर हस्ताक्षर किए।

-> पेरिस समझौता 2020 से लागू होगा।

-> इस समझौते के तहत विकसित देश 2020 से सालाना कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे।

-> पेरिस समझौते से पृथ्वी पर बढ़ते तापमान को रोकने और ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में कमी के लिए देशों पर दबाव बढ़ेगा।

-> 55 देश हैं जो ग्रीनहाउस गैस का 55 प्रतिशत से अधिक उत्सर्जन करते हैं।

-> विकसित देशों को 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जन के स्तर में 40 प्रतिशत कटौती करना चाहिए।

-> इसी प्रकार विकासशील देशों को 2020 तक 15 से 30 प्रतिशत तक अपने उत्सर्जन को कम करना चाहिए।

-> अब सभी देशों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने और वैश्विक तापमान को कम करने के दबाव ने इस समझौते को लागू करने के दबाव में वृद्धि की है।

-> इससे यह साबित होता है कि सभी देश बढ़ते वैश्विक तापमान को कम करने के लिए अधिक जागरूक हैं।

-> समझौते में शामिल देशों को ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री से नीचे सीमा में रखना चाहिए।