ग्लोबल वार्मिंग पर लेख

ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन पूरी दूनिया में चिंता का विषय बना हुआ है। धीरे-धीरे यह समस्या  एक अभूतपूर्व पर्यावरण संकट में विकसित हो रही है जो पिघलते ग्लेसियरों, मौसम के बदलते मिजाज, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, बाढ़, चक्रवात एवं सूखे के रूप में हमारे सामने प्रकट हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग का कारण वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना है जिनकी वजह से पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हो जाती है। अगर हम महाविपदा से दुनिया को बचाना चाहते हैं तो ग्लोबल वार्मिंग के बारे में जागरूकता बढ़ाना बेहद ज़रूरी है। यहाँ हम आपको अलग-अलग शब्द सीमा के अनुसार विभिन्न श्रेणियों के तहत ग्लोबल वार्मिंग पर कुछ उपयोगी लेख प्रदान कर रहे हैं। आप अपनी आवश्यकता के अनुसार उनमें से चुनाव कर सकते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग लेख

ग्लोबल वार्मिंग पर लेख 1 (300 शब्द)

ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन आज मानव जाति के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और इसके लिए कई कारण हैं जैसे कि कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन, जीवाशम ईधनों का दहन एवं जंगलों की कटाई इत्यादि।

ग्रीनहाउस गैसों का दुष्प्रभाव

कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) गैस के स्तर में वृद्धि की वजह से तापमान में काफी वृद्धि हो जाती है। इसकी वजह यह है कि CO2 सैंकड़ो वर्षो तक वातावरण में संकेन्द्रित रहता है। बिजली उत्पादन, परिवहन एवं गर्मी पाने के लिए जीवाश्म ईंधन के दहन जैसी गतिविधियों के द्वारा मनुष्यों ने वातावरण में CO2 के संकेन्द्रण में वृद्धि की है।

ग्लोबल वार्मिंग

ग्लोबल वार्मिंग: क्रमिक घटनाचक्र

हाल के वर्षों में असामान्य रूप से गर्मी में वृद्धि हुई है जिसकी वजह से पूरी दुनिया में चिंता की लहर दौड़ पड़ी है। कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में वृद्धि वास्तव में 1800 में ही शुरू हो गई थी जब उत्तर-पूर्वी अमेरिका सहित दुनिया के एक बड़े वनाच्छादित हिस्से में जंगलो की कटाई कर दी गई थी। उसके बाद औद्योगिक क्रांति की वजह से हालात और बदतर हो गए और 1900 तक कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में बेतहाशा वृद्धि हो गई।

चिंता का विषय

जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) के मुताबिक, वैश्विक तापमान में वर्ष 2100 तक 1-3.5 सेल्सियस तक की वृद्धि होने की संभावना है। इसने यह भी सुझाव दिया है कि अगले 100 वर्षों में वातावरण के तापमान में 10 डिग्री फारेनहाइट से भी ज्यादा की वृद्धि हो सकती है।

ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव

  • मीठे पानी के दलदलों, निचली भूमि वाले शहरों एवं द्वीपों में समुद्री जल का सैलाब आने के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है।
  • वर्षा के चक्र में परिवर्तन की वजह से कई जगहों पर सूखा पड़ा रहा है और कुछ क्षेत्रों में आग एवं कुछ अन्य क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं।
  • हिमच्छद पिघलते जा रहे हैं जिसकी वजह से ध्रुवीय भालूओं के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है क्योंकि उनके आहार का मौसम घटता जा रहा है।
  • हिमनद धीरे-धीरे पिघलते जा रहे हैं।
  • जानवरों की आबदियां विलुप्त हो रही हैं।

निष्कर्ष:

क्योटो प्रोटोकॉल के अनुसार, विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में कटौती करने की आवश्यकता हैं। कोयले पर आधारित बिजली को कम करने की जरूरत है, पवन और सौर ऊर्जा के साथ ही उच्च क्षमता वाले प्राकृतिक गैस के उत्पादन को बढ़ाने और इस्तेमाल करते हुए ऊर्जा दक्षता प्राप्त करने की आवश्यकता है।

ग्लोबल वार्मिंग पर लेख 2 (500 शब्द)

ग्लोबल वार्मिंग एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बन गया है जिसकी वजह से मानव जाति का भविष्य संकट में पड़ने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार, कार्बन डाईऑक्साइड एवं अन्य ग्रीन हाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन की वजह से निचले तटीय क्षेत्रों एवं शहरों के जलमग्न हो जाने की संभावना है और कुछ देशों के तो निकट भविष्य में पूरी तरह से लुप्त हो जाने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है। ग्लोबल वार्मिंग का एक और चिंताजनक स्वरूप मौसम के मिजाज में तीव्र उतार-चढ़ाव है जिसका परिणाम बाढ़, सूखा एवं असामान्य रूप से जलवायु परिवर्तन के तौर पर सामने आ रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण

ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार सबसे बड़ा कारण कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) है जो पर्यावरण का एक प्रमुख घटक है। यह वातावरण में वाष्पीकरण में वृद्धि कर रहा है और इस वजह से पृथ्वी के सतही क्षेत्रों में गर्मी बढ़ रही है। जल-वाष्प की गिनती भी ग्रीनहाउस गैसों में की जाती है जिनकी वजह से गर्मी बढ़ जाती है जो और भी अधिक जल-वाष्प पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। जीवश्म ईंधनों के लगातार दहन की वजह से CO2 के स्तर में कमी आने की कोई संभावना नजर नहीं आता। CO2 के अलावा, सल्फर, CFC एवं मिथेन गैसों के स्तर में वृद्धि भी ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जनसंख्या वृद्धि, तकनीकी उन्नति, औद्योगीकरण, शहरीकरण, और वनों की कटाई की वजह से भी इन गैसों के उत्पादन में वृद्धि हो रही है। यहां तक कि जब हम भोजन पकाते हैं तब भी बड़ी मात्रा में CO2 का उत्पादन करते हैं। साथ ही, हम विभिन्न प्रोद्योगिकियों का अत्यधिक इस्तेमाल कर रहे हैं और साथ ही जीवाश्म ईंधनों, कोयले एवं अन्य गैसों का अत्यधिक दहन कर रहे हैं। जब ऑटोमोबाइल के मोटर को चलाने के लिए पेट्रोल का आंतरिक दहन किया जाता है तो इससे उत्सर्जन में अत्यधिक वृद्धि होती है। इसके अलावा वातावरण में सल्फर का संघनन भी इस स्थिति को प्रतिकूल बनाने में अपना योगदान दे रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के उपाय

ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पर अंकुश लगाने के लिए कई उपाय किए जाने की आवश्यकता है। हमें ऊर्जा के लिए तेल, कोयला एवं गैसों को जलाने के बजाय अक्षय ऊर्जा के साधनों को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की आवश्यकता है तभी हम वातावरण में CO2 के उत्पादन में कमी ला सकते हैं।वृक्षारोपण भी इस स्थिति से हमारी रक्षा कर सकता है क्योंकि हम जानते हैं कि पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन का उत्पादन करता है। हमें ऊर्जा के खपत में भी कमी लानी होगी और साथ ही उत्पादों के पुनर्चक्रण की प्रवृत्ति का विकास करना होगा। साथ ही हमें बिजली पर हमारी अत्यधिक निर्भरता को कम करना होगा, क्योंकि बिजली का उत्पादन भी बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड की अत्यधिक उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार प्रमुख स्रोतों में से एक है। 

निष्कर्ष:

हम ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का उचित समाधान द्वारा ही पृथ्वी को बचा सकते हैं। हमें CO2 के उत्पादन में कमी लाने का संकल्प लेना चाहिए। इसके लिए हमें तेल, कोयला एवं गैस के इस्तेमाल को कम करना होगा। हमें बिजली पर भी हमारी अत्यधिक निर्भरता को कम करना होगा, क्योंकि बिजली के उत्पादन में भी बड़ी मात्रा में CO2 की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार ऊर्जा एवं बिजली के कम उपयोग द्वारा हम ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपट सकते हैं। हमें CO2, सल्फर, CFC, और मीथेन गैसों के उत्पादन को कम करना होगा क्योंकि ये पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं। हमें बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान को गति देनी होगी, क्योंकि पेड़ एक तरफ तो CO2 को अवशोषित कर लेते हैं और वहीं दूसरी ओर बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं। इनके अलावा हमें पौधो से उत्पादित प्लास्टिक, बायोडीजल का इस्तेमाल करने के साथ ही पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने की ज़रूरत है। व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों को ईंधन के अत्य़धिक इस्तेमाल से बचना होगा। उन्हें आवागमन के लिए कम से कम ईंधन पर चलने वाली कारों का प्रयोग करना चाहिए।

ग्लोबल वार्मिंग पर लेख 3 (600 शब्द)

विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की वजह से  पृथ्वी साल दर साल गर्म होती जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, वर्ष 1900 के बाद से, पूरा पृथ्वि ग्रह मात्र लगभग 0.8 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हुआ है। हालांकि 21 वीं सदी के अंत तक,  ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पृथ्वी के तापमान में 2-5 डिग्री सेल्सियस के आसपास वृद्धि होने की संभावना है। तापमान में हो रही वृद्धि की वजह से मौसम पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है जिससे धरती पर जलवायु परिवर्तन हो रहा है और पृथ्वी के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार कारक

पृथ्वी के वायुमंडल के औसत तापमान में हो रही वृद्धि के फलस्वरूप वातावरण में मौजूद विभिन्न गैसें गर्म हो रही हैं जिसकी वजह से धरती का तापमान बढ़ रहा है। बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की वजह से धरती पर कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य गैसों की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ गई है जो तापमान को अवशोषित कर रहे हैं और गर्मी को वातावरण से बाहर निकलने में प्रतिरोध पैदा कर रहे हैं।

ग्लोबल वार्मिंग पर मानवीय गतिविधियों का प्रभाव

हम रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ ऐसी गतिविधियां में जुटे हैं जिनसे बहुत अधिक मात्रा में गैस पृथ्वी के वायुमंडल में उत्सर्जित होती है। उदाहरण के तौर पर हमारी कारों, घरों एवं उद्योगों में ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें तेल, गैस एवं कोयले का दहन करना पड़ता है जिससे हमारे वातावरण में बहुत अधिक ग्रीन हाउस गैसों की उत्पत्ति हो जाती है। जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्म एवं ठंडे दौनों ही मौसम चरम पर हैं। यह स्थिति पौधों एवं पृथ्वी के जीव-जंतुओं को नुकसान पहुँचा सकता है और साथ ही इनकी वजह से तेज तूफान एवं भीषण सूखे के हालात भी पैदा हो सकते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग की गति को धीमा करने के उपाय

हम अपने घर, स्कूल या चर्च में कम ऊर्जा का उपयोग करके ग्लोबल वार्मिंग की गति को कम करने की दिशा में प्रयास शुरू कर सकते हैं। सबसे पहले हमें रोशनी का किफाईती इस्तेमाल करना होगा और साथ ही हमे कार पूल की आदत डालते हुए निजि वाहनों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। इसके अलावा, हमें अपनी ऊर्जा संबंधित आवश्यकता को पूरा करने के लिए अक्षय ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोतों जैसे कि सौर ऊर्जा एवं पवन ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा। रौशनी के लिए ऊर्जा कुशल एलईडी बल्बों का इस्तेमाल भी एक अच्छा विकल्प है क्योंकि वे साधारण बल्बों की तुलना में ऊर्जा के खपत को 75% तक कम करते हैं। साथ ही, हमें ज्यादा से ज्यादा वनों का विकास करना चाहिए क्योंकि वे ग्रीन हाउस गैसों में से ज्यादातर का अवशोषण करके पृथ्वी को गर्म होने से बचाते हैं।

जलवायु परिवर्तन पर भारत की प्रतिक्रियाएं

दिसंबर 2016 में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में से ठीक पहले भारत ने ठीक ही कहा था कि विकसित देशों को केवल उत्सर्जन में कटौती की बात नहीं करनी चाहिए बल्कि उन्हें चाहिए कि वे गरीब देशों को पर्याप्त वित्त और प्रौद्योगिकी द्वारा सहायता करें ताकि वे इस दिशा में प्रयास कर सकें व जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने के लिए खुद को तैयार कर सकें। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन, क्षमता निर्माण एवं और ग्रामीण समुदायों को मजबूत बनाने कि दिशा में किए जाने वाले प्रयासों को सरकार द्वारा सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी ताकि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का उचित समाधान हो सके।

निष्कर्ष:

हमे जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के बीच संबंध के बारे में हमारी अपनी समझ का विस्तार करना होगा। हमें ग्लोबल वार्मिंग के परिणामों से निपटने के लिए सभी आवश्यक विकल्पों, जो कि तकनीकि एवं सामाजिक रूपांतरों के बेहतर सामंजस्य द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं, की तलाश करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। विज्ञान के अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान एकेडमी द्वारा 1991 में कांग्रेस को सौंपे गए रिपोर्ट, “ग्रीनहाउस वार्मिंग के निहितार्थ नीति” के अनुसार, अमेरिका वर्तमान उत्सर्जन में 50 प्रतिशत कटौती, बिना किसी लागत के सिर्फ अपनी प्रभावी क्षमता में सुधार लाकर कर सकता है। हमें जीवाश्म ईंधन का उपयोग पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए अन्यथा, उत्सर्जित कार्बन की मात्रा जैव मंडल में मौजूद कार्बन की मात्रा से अधिक हो जाएगी। हमें अक्षय ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि करनी होगी ताकि हम ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से निपट सकें। जाहिर तौर पर, सरकार एवं स्वयंसेवी संगठनों द्वारा की जा रही पहल के अलावा सभी लोगों की भागीदारी और प्रयासों द्वारा ही ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से बचाव संभव है।


 

ग्लोबल वार्मिंग पर लेख 4 (800 शब्द)

ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन एक गंभीर समस्या है। यह मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा है जो मुख्य रूप से तेजी से हो रहे औद्योगिकीकरण, शहरीकरण एवं अन्य वायु प्रदूषण स्रोतों की वजह से हो रहे कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन के द्वारा बढ़ रहा है। इन गैसों का लगातार उत्सर्जन तापमान में भारी वृद्धि का प्रमुख कारण है। पूरी दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते स्तर की वजह से पृथ्वी का वातावरण गर्म होता जा रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण एवं परिणाम

ग्लोबल वार्मिंग समुद्र के जल स्तर में वृद्धि करने के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि यह धीरे-धीरे हिमनद को पिघला देता है। दुनिया भर की नदियों एवं अन्य जल के निकायों में पानी की लगातार आपूर्ति हिमनदों के द्वारा ही होती है। समुद्र के स्तर में लगातार वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग का ही दुष्परिणाम है और इस समस्या से पूरी दुनिया को जूझना पड़ रहा है। पहले से ही दुनिया के कई निचले भू-भाग वाले देश, जो समुद्र तटों से घिरे हुए हैं, में बड़े पैमाने पर बाढ़ की आशंका बनी हुई है। और कई ऐसे देशों पर तो इस वजह से निकट भविष्य में विलुप्त होने का खतरा भी मंडरा रहा है।

लगातार तूफान और असामान्य मौसम जलवायु परिवर्तन के कुछ अन्य दुष्परिणाम हैं। इनके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में हो रही भारी वृद्धि की वजह से जलीय जीवन भी खतरे में पड़ गया है और साथ ही ग्लोबल वार्मिंग जिवाणुओं की वजह से फैलने वाले खतरनाक रोगों के प्रसार के लिए भी जिम्मेदार है।

कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) गैस का निरंतर उत्पादन जो पृथ्वी के तापमान के स्तर में निरंतर वृद्धि कर रहा है, ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार सबसे बड़ा कारण है।

वास्तव में, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), सल्फर, CFC, और मीथेन जैसी गैस ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं। जीवाश्म ईंधन के दहन से निरंतर कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में वृद्धि होती है। CO2, जो अपने आप में एक ग्रीन हाउस गैस है, गर्मी को बढ़ाकर पानी के वाष्पीकरण को बढ़ाता है। जनसंख्या वृद्धि, तकनीकी उन्नति, औद्योगीकरण, शहरीकरण, और वनों की बेतहाशा कटाई ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन में वृद्धि के लिए जिम्मेदार अन्य कारकों में शामिल हैं।

ग्रीनहाउस गैसों की वजह से वातावरण में गर्मी बढ़ती है, जो मानव जीवन के लिए बेहद प्रतिकूल है। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की वजह से निचले तटीय क्षेत्रों एवं शहरों के बाढ़ में डूब जाने का खतरा है। ऐसी आशंका है कि इस वजह से दुनिया के कुछ देश विलुप्त भी हो सकते हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से मौसम के चक्र में भी परिवर्तन हो जाता है जिसके कारण पृथ्वी के कई क्षेत्रों में बाढ़, सूखा, तथा अन्य कई असामान्य स्थितियों का सामना करना पड़ता है।

जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि भी ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है। हम प्रोद्योगिकियों का अत्यधिक इस्तेमाल कर रहे हैं जिसकी वजह से जीवाश्म ईंधन, कोयला और गैसों का दहन निरंतर जारी है, जो CO2 के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। ऑटोमोबाइलों के इंजनों में भी पेट्रोल के दहन से बड़ी मात्रा में CO2 का उत्सर्जन होता है। इनके अलावा  खाना पकाने के दौरान भी CO2 की बड़ी मात्रा वातावरण में उत्सर्जित होती है।

ग्लोबल वार्मिंग के दीर्घकालिक प्रभावों के रूप में समुद्र तल के भीतर भूस्खलन, भूकंप एवं ज्वालामुखी गतिविधियां इत्यादि सम्मलित हैं। इनकी वजह से सुनामी भी आ सकती है और फ्रेंच आल्प्स जैसे दुनिया के कई क्षेत्रों में भूस्खलन की आवृत्ति में वृद्धि पहले से ही देखी जा रही है। बर्फ एवं हिमनदों के पिघलने की वजह से धरती के आंतरिक सतहों पर भी बुरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के उपाय

हमें ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के संबंध में पर्याप्त जागरूकता फैलाने की जरूरत है और यह पूरे विश्व समुदाय के सामूहिक प्रयासों द्वारा ही संभव है।

हमें ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए यथोचित कदम उठाना चाहिए और हमें सर्वप्रथम CO2 के अत्यधिक उत्पादन को रोकना होगा। इसके लिए हमें तेल, कोयला और गैस जैसे इंधनों की खपत को कम करना होगा और इनकी जगह पर हमे अक्षय ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा। इनके अतिरिक्त, हमें ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण करना होगा क्योंकि पेड़-पौधे CO2 का अवशोषण करके हमें जीवन रक्षक ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। बिजली उत्पन्न करने के दौरान भी CO2 की बड़ा मात्रा का उत्पादन होता है और इसलिए हमें ऊर्जा और बिजली का भी किफाईती इस्तेमाल करना चाहिए। हमे CO2, सल्फर, CFC, और मीथेन गैसों की बड़ी मात्रा में उत्पादन से बचना होगा क्योंकि ये पर्यावरण के लिए हानिकारक होने के साथ ही ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी जिम्मेदार है।

हमें बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करने के साथ ही CO2 के उत्सर्जन पर अंकुश लगाने की भी आवश्यकता है। हमें ऊर्जा के इस्तेमाल को कम करने के साथ ही और उत्पादों की रीसाइक्लिंग को भी बढ़ावा देना होगा। हमें आधुनिक उपभोक्तावादी जीवन शैली में बदलाव लाना होगा एवं दुनिया के संसाधनों के अति प्रयोग करने की आदत से बचना होगा। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निबटने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों, सरकारों एवं हरेक व्यक्ति को सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा। अगर दुनिया के सभी देश एक साथ मिलकर ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने का प्रयास न करें तो निकट भविष्य में पूरी दुनिया में मानव जाति के अस्तित्व को खतरा पैदा हो सकता है।