ध्वनि प्रदूषण के द्वारा उत्पन्न होने वाली बीमारियां (Diseases Caused by Noise Pollution in Hindi)

ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करने के साथ ही हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक है। मशीनों की तेज आवाज, तेज ध्वनि वाले संगीत तथा वाहनों द्वारा उत्पन्न होने वाला तेज शोर-शराबा किसी व्यक्ति की श्रवण शक्ति पर काफी प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न कर सकता है।

सिर्फ इतना ही नही जो व्यक्ति ध्वनि प्रदूषण की चपेट में आते हैं। वह कई तरह के गंभीर रोगो से ग्रस्त हो जाते हैं। ध्वनि प्रदूषण के कारण ध्यान भंग होना, चिड़चिड़ाहट, अवसाद, नपुंसकता तथा कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां उत्पन्न हो सकती हैं।

ध्वनि प्रदूषण – शहरी जीवन का श्राप (Noise Pollution – The Bane of Urban Life)

ध्वनि प्रदूषण के चलते बड़े शहरों में कई सारी गंभीर बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं। जो शहरों में रहने वाले हर व्यक्ति को समान रुप से प्रभावित करती हैं फिर चाहे वह अमीर हो, गरीब हो या फिर शिक्षित हो अशिक्षित हो महिला हो या फिर पुरुष हो इसका प्रभाव सबके ऊपर एक समान होता है।

वाहनों, लाउडस्पीकरों तथा उद्योगों में तेज आवाज उत्पन्न करने वाली मशीनों की बढ़ती संख्या के कारण लोगों में तनाव तथा कानों के संक्रमण में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। वाहनों की बढ़ती संख्या, शादी समरोहों में डीजे का बढ़ता प्रचलन तथा तेज आवाज वाले लाउडस्पीकरों के उपयोग से लोगों में कई प्रकार की बीमारियों के चपेट में आते जा रहे हैं।

चिकित्सीय दृष्टि से ध्वनि प्रदूषण के द्वारा होने वाली बीमारियां (Diseases caused by Noise Pollution – Medical view)

ध्वनि प्रदूषण एक व्यक्ति के जीवन को कई तरीके से प्रभावित कर सकता है। तेज आवाज वाली तंरग गति किसी व्यक्ति के हृदय गति को भी प्रभावित करने का कार्य करती है। इसके कारण हृदय गति धीमी पड़ जाती है और हृदयघात (हार्ट अटैक) की संभावना बढ़ जाती है। इसके साथ ही ध्वनि प्रदूषण लोगो का रक्तदाब (ब्लड प्रेशर) बढ़ाने के साथ ही अन्य कई तरह की बीमारियां भी उत्पन्न करता है।

विशेषज्ञों के अनुसार काफी लंबे समय तक 85 डेसीबल से अधिक ध्वनि के चपेट में आने से स्थायी बहरेपन की समस्या उत्पन्न हो सकती है। कर्णावर्त (कॉक्लिया) नामक कान का हिस्सा श्रवण शक्ति का मुख्य केंद्र होता है। यह काफी छोटे तथा नाजुक हेयर सेल्स होते हैं, जो ध्वनि तंरगों को पकड़ने का कार्य करते हैं। तेज आवाज के चपेट में आने से हमारी श्रवण शक्ति को काफी नुकसान पड़ता है और यदि कोई व्यक्ति 85 डेसीबल से लेकर 125 डेसीबल तक शोर में ज्यादे समय तक रहता है।  तो उसके भीतर बहरेपन की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है।

इस तरह के कानफाड़ू आवाज के मुख्य स्त्रोत तेज आवाज वाली मशीनरी, तेज संगीत और काफी आवाज करने वाले हवाई जहाज, मिसाइल तथा बंदूर द्वारा उत्पन्न होने वाली आवाज है।

यदि इस शोर-शराबे की समस्या को नियंत्रित नही किया गया तो लोगो में श्रवण शक्ति ह्रास की समस्या काफी तेजी से बढ़ जायेगी और इसके साथ ही लगातार कान बजने की समस्या (टिनिटस), सरदर्द, चिड़चिड़ाहट, नींद की कमी, तनाव और दैनिक कार्य करने में तमाम तरह की समस्याएं उत्पन्न हो जायेंगी।

इन दिनों श्रवण शक्ति से जुड़ी बीमारियों से बचने के लिए तमाम तरह के यंत्र मौजूद हैं। जो लोगो की सुनने की क्षमता बढ़ाने का कार्य करते हैं, हालांकि इन यंत्रों को लोगों में लगाने के लिए आपरेशन की भी आवश्यकता होती है।

 

ध्वनि प्रदूषण – बच्चों में बीमारियों का कारण (Noise Pollution – Cause of Diseases in Children)

साधरण सीमा से अधिक तेज आवाज के कारण कान के पर्दे भी खराब हो सकते हैं। आज के समय में 10 वर्ष की आयु के हर चार में से एक बच्चे में कान से जुड़ी समस्याएं देखने को मिल रही हैं और इसके द्वारा लोगों की सुनने की क्षमता प्रभावित होते जा रही है तथा कई बार तो इसके कारण लोगों में बहरापन जैसी समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार शहरों के लगभग 6 प्रतिशत बच्चे ‘ओटाइटिस मीडिया’ नामक कानों की बीमारी से पीड़ीत होते हैं।

हालांकि ओटाइटिस मीडिया नामक यह बीमारी हर आयु वर्ग के लोगो में हो सकती है लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों में देखने को मिलता है। ऐसा अनुमान है कि लगभग हर चार में से एक बच्चा दस वर्ष की आयु का होते होते कानों के संक्रमण या बीमारी से पीड़ीत होता है।

विकसित देशों में हुए अध्ययन से यह पता चला है कि 3 वर्ष या उससे अधिक के 80 प्रतिशत बच्चे एओएम की बीमारी से पीड़ीत होते हैं और सात वर्ष की आयु तक इनमें से 40 प्रतिशत इस बीमारी से छः या इससे अधिक बार पीड़ीत हो चुके होते हैं।

कम उम्र में श्रवण क्षमता से जुड़ी बीमारियां होने पर बच्चें के पढ़ने-लिखने तथा संचार कौशल पर प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही, इसके चलते उसका अकादमिक प्रदर्शन, शिक्षा और रोजगार का अवसर भी प्रभावित होता है।

ध्वनि प्रदूषण – निर्माण श्रमिकों में बीमारी का कारण (Noise Pollution – Cause of Diseases in Construction Workers)

एक अध्ययन के अनुसार, निर्माण श्रमिक उद्योगों तथा कारखानों में उत्पन्न होने वाले तेज आवाजों से श्रवण क्षमता की बीमारियों से सबसे अधिक प्रभावित होते है। वास्तव में यह निर्माण क्षेत्र में होने वाली सबसे प्रमुख बीमारीयों में से एक है।

लगातार शोर-शराबे वाले माहौल में रहने से श्रमिकों की सेहत पर कई तरह के नकरात्मक प्रभाव उत्पन्न होते हैं। इसके कारण उनमें सुनने की समस्या, टिनिटस, कान बहना, श्रवण संबंधी विकार खासतौर से एनआईएचएल, जिसे शोर से होने वाले बहरेपन के नाम से भी जाना जाता है जैसी बीमारियां उत्पन्न हो जाती है।

निर्माण स्थलों पर कई तरह की तेज आवाज उत्पन्न करने वाली मशीनें जैसी की मैकेनिकल सा, कम्प्रेसर, ग्राइडिंग मशीन, ड्रिल और अन्य दूसरे कटिंग टूल्स के कारण निर्माण श्रमिकों में नींद संबंधित समस्या, चिढ़चिढ़ापन, तनाव, टेंशन, ध्यान भटकना और हृदय संबंधित समस्याएं जैसी गंभीर बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं।

इन सभी कारणों से इस तरह का कार्य करने वाले लोगों के जीवन गुणवत्ता, कार्य प्रदर्शन, संचार शक्ति, सामान्य स्वास्थ्य और जीवन में कमी आती है। जिससे वह दिमागी तथा शारीरिक रुप से भी प्रभावित होते हैं।

इसलिए, ध्वनि प्रदूषण का पर्यावण के साथ ही हमारे स्वास्थ्य पर भी काफी नकरात्मक प्रभाव उत्पन्न होता है। इस समस्या से निपटने के लिए हमें लोगों में पर्याप्त जागरुकता लाने की आवश्यकता है ताकि हम ध्वनि प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए जरुरी कदम उठा सकें।