भूमि प्रदूषण के कारण होने वाले रोग

पृथ्वी की सतह का सबसे उपरी हिस्सा मिट्टी कहलाता है। धरती की सतह पर पानी और गर्मी के रूप में अकार्बनिक कारकों से तथा जैविक घटकों जैसे पौधों और सूक्ष्म जीवों से मिट्टी बनती है। पृथ्वी की सतह का लगभग 1/4 हिस्सा भूमि है लेकिन वर्तमान में आबादी का आधी जनसंख्या के लिए, ध्रुवीय क्षेत्रों, रेगिस्तान साइटों और पहाड़ों के कारण, रहने के लिए भूमि उपयुक्त नहीं है। यद्यपि मनुष्य ने भूमि की संरचना को बदलने की क्षमता प्राप्त की है लेकिन यह केवल एक छोटे पैमाने पर ही संभव है। सूखे इलाकों जैसे कि सहारा और गोबी के मरुस्थल तथा उत्तरी अफ्रीका को रहने योग्य या उपजाऊ भूमि में परिवर्तित करना अब भी मानव शक्ति से परे है।

मिट्टी में असंख्य सूक्ष्म जीवों का निवास है जो अपनी क्षमता के अनुसार भूमि प्रदूषण को कम करता है और मिट्टी में शामिल सभी कचरे के अपघटन को सक्रिय करके मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि करता है लेकिन जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण के बढ़ते प्रभाव के कारण भूमि प्रदूषण भी तेजी से फैल रहा है। भूमि प्रदूषण के कारण मिट्टी की उर्वरता बहुत कमजोर हो जाती है। कभी कभी मिट्टी मर जाती है जिसे बंजर भूमि भी कहा जा सकता है।

भूमि प्रदूषण के कारण होने वाले रोग

रोग फैलने के लिए जिम्मेदार कारक

  • रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की अत्यधिक मात्रा से कृषि उत्पादन बढ़ाने और विभिन्न प्रकार के कचरे के संचय ने भूमि प्रदूषण को जन्म दिया है।
  • फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए खेतों में विभिन्न प्रकार के उर्वरक मिला दिए जाते हैं।
  • ये यौगिक विभिन्न रासायनिक पदार्थों से बने होते हैं जो मिट्टी को दूषित करते हैं।
  • ये उर्वरक फसलों के उत्पादन को बढ़ाते हैं पर इनमें भी जहरीले पदार्थ होते हैं जो मानव शरीर में फलों और सब्जियों के माध्यम से प्रवेश करते हैं और मानव स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
  • भूजल प्रदूषित होने के कारण मिट्टी की जैविक संपत्ति भी समाप्त हो गई है।
  • इसके अलावा ऐसी मिट्टी से उत्पादित भोजन स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद नहीं है।
  • इसके अलावा, औद्योगिक कचरे द्वारा प्रदूषित जल और औद्योगिक क्षेत्रों में सिंथेटिक जैविक रसायन मिट्टी के रासायनिक प्रदूषण का कारण बनता है।
  • मामले को बदतर बनाते हुए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई के चलते मिट्टी का क्षरण एक अतिरिक्त समस्या है।

मानव/पशु स्वास्थ्य पर भूमि प्रदूषण का प्रभाव

ठोस अपशिष्टों के प्रसार और रासायनिक पदार्थों के रिसाव के कारण प्रदूषण मिट्टी में फैल गया है। मिट्टी में अवांछित मानव निर्मित सामग्रियों की उपस्थिति मुख्य रूप से कीटनाशकों, पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन, पॉलीसाइक्लिक एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन (PAH) और भारी धातुएं शामिल हैं जो मानव स्वास्थ्य और अन्य जीवित प्राणियों के लिए गंभीर रूप से हानिकारक हैं। प्रदूषित भोजन और पॉलीथीन आदि खाने से सैकड़ों पशु और पक्षी हर साल मर जाते है।

रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अवैज्ञानिक उपयोग पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाते है। इससे जानवरों में बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है और पुरुषों में कैंसर का खतरा छह गुना ज्यादा बढ़ जाता है।

सिंथेटिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के परिणामस्वरूप पर्यावरण और प्रभावित मानव जीवन को बहुत नुकसान हुआ है। रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट के कारण फसलों के उत्पादन में भी कमी आई है। इससे मनुष्यों के स्वास्थ्य के साथ ही पशुओं के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

मृदा प्रदूषण (भूमि प्रदूषण) के कारण होने वाली बीमारियाँ

मिट्टी में मौजूद रसायनों के घातक प्रभाव मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते है। पॉलीथीन अपशिष्ट जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और डाइऑक्साइन जैसी विषाक्त गैसें निकलती हैं। इस प्रकार श्वसन, त्वचा, पेट रोग आदि का खतरा बढ़ जाता है।

सामान्य तौर पर निर्माण स्थलों पर रखे गए रसायन मिट्टी को प्रदूषित कर सकते हैं। PAHs जैसे रसायनों को खुले में रखने से जोखिम का स्तर बढ़ जाता है क्योंकि यह आसानी से हवा (सूक्ष्मजीवों के रूप में) में फ़ैल जाते है। इसके अलावा निर्माण स्थल की धूल आसानी से हवा में घुल-मिल जाती है जोकि सूक्ष्म कण (10 माइक्रोन से कम) की मौजूदगी के कारण और भी खतरनाक हो जाती है। निर्माण स्थल पर मौजूद इस प्रकार की धूल से सूअर से संबंधित बीमारियां, अस्थमा, ब्रोन्काइटिस और यहां तक ​​कि कैंसर भी हो सकता हैं।

रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग ने मिट्टी को प्रदूषित किया है और इसके भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। उदाहरण के लिए अमोनियम सल्फेट का सतत उपयोग होने के कारण, जबकि अमोनिया का उपयोग फसल द्वारा किया जाता है, सल्फेट आयन धीरे-धीरे मिट्टी में बढ़ जाते है जिससे मिट्टी अम्लीय हो जाती है। इसी तरह सोडियम नाइट्रेट और पोटेशियम नाइट्रेट के लगातार उपयोग का भी यही नतीजा है। नाइट्रेट तत्व को फसल अवशोषित कर लेती है तथा सोडियम और पोटेशियम की मात्रा मिट्टी में बढ़ती रहती है।

नतीजतन मिट्टी की संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं पौधें उर्वरकों के नाइट्रेट तत्वों का केवल एक अंश का उपयोग करने में सक्षम हैं और बाकी का हिस्सा मिट्टी में एकत्रित होता रहता है जिससे बारिश के पानी के साथ पृथ्वी में नाइट्रेट आयनों की एकाग्रता बढ़ जाती है। इस पानी के उपयोग से नवजात शिशुओं में ' मेथेमोग्लोबिनेमिया' और 'ब्लू-बेबी रोग' नाम की बीमारी की संभावना बढ़ जाती है (मेथेमोग्लोबिनेमिया में मेथेमोग्लोबिन की एक असामान्य मात्रा (हीमोग्लोबिन का एक रूप) उत्पन्न होती है जिसके परिणामस्वरूप वह ऑक्सीजन ले सकता है लेकिन शरीर के ऊतकों को प्रभावी ढंग से इसे रिलीज करने में असमर्थ होती है)। शोध के अनुसार ये नाइट्रेट आयन कैंसर जैसी बीमारी का कारण हो सकते हैं।

स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उर्वरक चांदी, निक्कल, सेलेनियम, थेल्लियम, वैनेडियम, पारा, सीसा, कैडमियम और यूरेनियम सहित भारी धातुओं में शामिल हैं जो सीधे मानव स्वास्थ्य के लिए खतरे पैदा करते हैं। वे गुर्दे, फेफड़े और यकृत के कई प्रकार के रोगों का नेतृत्व करते हैं। उर्वरकों के कारण मस्तिष्क कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, कोलन कैंसर, लिम्फोमा और सफेद रक्त कोशिका की कमी का खतरा छह गुना से ज्यादा बढ़ जाता है।

पिछले दशक में दुनिया भर में कृत्रिम जैविक रसायनों का उत्पादन चौगुना हो गया है। हाल के अनुमान के अनुसार प्राकृतिक सामग्री से 40 लाख से अधिक रसायनों को पृथक या संश्लेषित किया गया है। हमारे दैनिक जीवन में इस तरह के 60,000 से अधिक रसायनों का उपयोग किया जाता है - लगभग 1500 रसायनों का उपयोग कीटनाशकों में, 4000 दवाओं और अर्ध-दवाओं में और 5,500 खाद्य पदार्थों में सक्रिय सामग्री के रूप में किया जाता है।

 

शेष 49,000 का वर्गीकरण, औद्योगिक और कृषि रसायन, ईंधन और लाख, सीमेंट, सौंदर्य प्रसाधन, प्लास्टिक और फाइबर जैसे उपभोक्ता उत्पादों के रूप में मोटे तौर पर किया जा सकता है। इनमें से कुछ या सभी रसायन हमारे काम और आवासीय परिवेश में हवा, पानी और मिट्टी के प्रदूषक के रूप लेते हैं। उत्पादन और उपयोग के दौरान छोड़े गये रसायनों के लिए, पूरा वातावरण 'कचरे की टोकरी' बन जाता है अगर रासायनिक प्रदूषण की प्रक्रिया निरंतर बनी रहती है तो जीवन का अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाएगा।

नाइट्रस ऑक्साइड गैस का निर्माण रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से होता है। यह एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो तापमान बढ़ाती है। उर्वरक कृषि मिट्टी के कुल नाइट्रस ऑक्साइड का 77 प्रतिशत हिस्सा हैं। नाइट्रोजन उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण भूजल में भी प्रदूषण की समस्या बढ़ गई है।

यूरोपीय संघ द्वारा कीटनाशक पर प्रतिबंध

मधुमक्खियों को बचाने के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) ने हाल ही में दो साल तक नीयनकोटिनोइड नामक रसायनों से बने कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगा दिया। जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे कुछ देशों ने पहले से ही नीयनकोटिनोइड पर प्रतिबंध लगा दिया है। यूरोपीय संघ का कहना है कि जब मधुमक्खियां इन कीटनाशकों के छिड़काव से प्रभावित फूलों से रस लेती हैं तो वे उनके साथ संपर्क में आ जाती हैं जिससे उनमें कई तरह के रोग फ़ैल जाते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है।

भारत में भूमि प्रदूषण की वजह से रोग

पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि राज्यों में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नवीनतम उदाहरण है। वर्ष 2013-14 के आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के उपयोग का क्रम क्रमश: 56.8, 13.5 और 1 था जबकि हरियाणा में 64, 12.8 और 1 तथा वैज्ञानिक अनुपात 4:2 था। देश के विभिन्न भागों की मिट्टी में 89% नाइट्रोजन, 80% फास्फोरस, 50% पोटेशियम, 41% सल्फर, 49% जस्ता और 33% बोरान की कमी है।

पंजाब में अनाज उत्पादन और उर्वरक खपत का अनुपात, जोकि देश में सबसे अधिक रासायनिक खपत वाला राज्य है, बहुत ही बढ़िया है। 1992 और 2003 के बीच पंजाब में अनाज के उत्पादन में गिरावट आई थी। पंजाब की उपजाऊ मिट्टी की गुणवत्ता बड़े पैमाने पर कम हो रही है जिससे पंजाब की कृषि में स्थिरता गिरती दिख रही है। 2010 में पंजाब में आयोजित 'लाइव मिट्टी अभियान' में ग्रीनपीस द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पता चला कि पंजाब में रसायनों के उपयोग अत्यधिक मात्रा में बढ़ गया है। पिछले चालीस वर्षों में भटिंडा में अकेले यूरिया का उपयोग 750% बढ़ गया है। सर्वेक्षण में यह भी पता चला कि किसान रसायनों के कारण होने वाले नुकसान की जानकारी रखते हैं लेकिन उनके पास इसके इस्तेमाल न करने के कोई विकल्प नहीं है।

कैंसर की बढ़ती घटनाएँ

पंजाब के भटिंडा, फरीदकोट, मोगा, मुक्तसर, फिरोजपुर, संगरूर और मनसा आदि जिलों में किसान बड़ी संख्या में कैंसर से पीड़ित हैं। पंजाब विश्वविद्यालय में स्थित विज्ञान और पर्यावरण केंद्र तथा पीजीआई चंडीगढ़ द्वारा किए गए अध्ययन ने यह खुलासा किया है कि कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण इन जिलों में कैंसर का प्रसार खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। पंजाब सरकार ने अब उन कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगा दिया है जिनका असर एक निश्चित प्रांत के भीतर खतरनाक साबित हुआ हैं।

जहरीला भूजल

रोगों से फसलों को बचाने के लिए कीटनाशक का बहुत छोटा हिस्सा प्रयोग किया जाता है जो इसका वास्तविक उद्देश्य पूरा करता है। इसका एक बड़ा हिस्सा हमारे विभिन्न जल स्रोतों तक पहुंचता है और भूजल को प्रदूषित करता है। जमीन में इन रसायनों की रिहाई के कारण कई स्थानों का भूजल बेहद जहरीला हो गया है। इतना ही नहीं ये रसायन बाद में नदियों, तालाबों में भी घुल-मिल जाते हैं जिससे जलीय जीव, जानवर और पक्षियों पर बुरा असर पड़ता है।

आज कीटनाशकों के प्रभाव से कोई भी खाद्य पदार्थ अछूता नहीं हैं। खाद्य, सब्जियां, दूध, डिब्बाबंद सामग्री, शीतल पेय हर सामग्री में कीटनाशक होते हैं। अनुसंधान की रिपोर्ट के अनुसार जो लोग इस तरह के सामानों का उपयोग करते हैं वे आज कैंसर के रोग से ग्रस्त हैं। कीटनाशकों के प्रभाव से मांस और मछली भी अछूते नहीं रहे हैं।

जो चारा हम पशुओं को खिलाते हैं उसमे भी रसायन पाए जाते हैं। इसलिए जो भी उन जानवरों के मांस को खाएंगे वे भी बीमारियों से पीड़ित होंगे। गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि जैसे पशु जहरीले होते जा रहे हैं। शोध में यह पाया गया है कि शरीर में कीटनाशकों की मौजूदगी से मां का दूध भी प्रभावित हुआ है। रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के कारण मिट्टी तेजी से बिगड़ती जा रही है। भूमि प्रदूषण के कारण हानिकारक घटक फसलों तक पहुंच रही है। नतीजतन मिट्टी की गुणवत्ता तेजी से घट रही है।