वायु प्रदूषण का प्रभाव (Effects of Air Pollution)

आज के समय में वायु प्रदूषण एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। जोकि पिछले कुछ दशकों में कई गुना बढ़ गई है। वायु प्रदूषण के कई सारे भयावह प्रभाव हैं क्योंकि वायु पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है। इसलिए इसके प्रदूषित होने से लोग कई तरह के बीमारियों से ग्रस्त होते जा रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरे विश्व में 2-4 लाख लोग प्रतिवर्ष परोक्ष रुप से वायु प्रदूषण के कारण अपनी जान गवा रहे हैं, इसके अलावा इसके द्वारा उत्पन्न होने वाले विभिन्न रोगो के कारण भी प्रतिवर्ष 1 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो रही है। बर्मिंघम विश्वविद्यालय के एक शोध के अनुसार न्यूमोनिया और वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मृत्यु में कोई निश्चित तौर से कोई संबंध अवश्य है।

वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण वायु प्रदूषण द्वारा होने वाले मृत्यु दर में तेजी से वृद्धि हुई है। 2005 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 310000 यूरोपियनों की मृत्यु हो जाती है। वायु प्रदूषण के द्वारा होने वाली गंभीर बीमारियों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, इंफेसेमा, फेफेड़े तथा हृदय संबंधित अन्य रोग शामिल हैं।

वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution)

वायु प्रदूषण ने पूरे वैश्विक जीवन पर संकट उत्पन्न कर दिया है और इसके परिणाम दिन-प्रतिदिन गंभीर होते जा रहे हैं।

मानव मस्तिष्क पर वायु प्रदूषण का प्रभाव (Effects of Air Pollution on Human Brain)

वायु प्रदूषण के कई सारे विषैले कण मानव मस्तिष्क में पाये गये हैं। इसलिए वायु प्रदूषण सिर्फ श्वसन संबंधित समस्याएं ही नही पैदा करता है बल्कि कि हमारे सोचने-समझने की शक्ति को भी काफी बुरे तरीके से प्रभावित करता है। पहली बार वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगया कि वायु प्रदूषण के दौरान उत्पन्न होने वाले चुबंकीय कण भी हमारे दिमाग में भी इकठ्ठा हो सकते हैं।

Effect of Air Pollution

यह अध्ययन मैक्सिको सीटी तथा यूके के मंचेस्टर शहर में किया गया था। वायु प्रदूषण द्वारा हमारे मस्तिष्क में पहुचने वाले यह चुंबकीय कण काफी जहरीले होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन चुंबकीय कणों के कारण लोगो में अल्जाइमर जैसे दिमागी विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं। वैज्ञानिकों को अध्ययन में पता चला कि यह चुबंकीय कण विश्व के लाखों लोगों के मस्तिष्क में मौजूद हैं। यह कण बिल्कुल गाड़ियो से निकलने वाले धुएं, बिजली घर से निकलने वाले धुएं तथा खुले जगहों पर आग के दहन से उत्पन्न होने वाले धुएं के कणों के समान होते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह कण मस्तिष्क के प्राकृतिक बनावट तथा मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। यह शोध यूके के एक विश्वविद्यालय द्वारा किया गया, जिसमें वैज्ञानिकों को इस बात का पता चला कि कुछ चुंबकीय कण मस्तिष्क में प्राकृतिक रुप से पैदा होते हैं लेकिन जो चुंबकीय कण वायु प्रदूषण के द्वारा मस्तिष्क में आते हैं।

वह मस्तिष्क के कार्य प्रणाली को प्रभावित करने का कार्य करते हैं। सामान्य शब्दों में कहे तो, प्रदूषण के यह कण मनुष्य के मस्तिष्क को नष्ट करने का कार्य कर रहे हैं। बेशक इस तरह की समस्या भारत जैसे देशों में अधिक देखने को मिलती है क्योंकि यहां विकसित देशों के अपेक्षा प्रदूषण का स्तर काफी ज्यादे है।

वैज्ञानिकों द्वारा किये गये अध्ययन में पता चला है कि पावर प्लांटस तथा वाहनों से निकलने वाले धुएं के कण भी वायु प्रदूषण के द्वारा मानव मस्तिष्क में पहुंच रहे हैं और भारत में यह दोनो चीजें वायु प्रदूषण का मुख्य स्त्रोत हैं। इसे आप दिल्ली के उदहारण द्वारा समझ सकते हैः

  • दिल्ली में 63 प्रतिशत वायु प्रदूषण वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण होता है।
  • ठीक इसी तरह 29 प्रतिशत वायु प्रदूषण उद्योगो के कारण उत्पन्न होता है।

जनवरी 2015 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि दिल्ली में 45 प्रतिशत प्रदूषण ट्रक जैसे भारी वाहनों के कारण उत्पन्न होता है। इसके साथ ही उद्योगों से निकलने वाली सल्फर डाईआक्साइड जैसी गैसें भी दिल्ली में प्रदूषण स्तर को बढ़ाने का कार्य करती हैं।

 

वायु प्रदूषण का वैश्विक प्रभाव (Global Impact of Air Pollution)

अमेरिका, चीन, यूरोपियन यूनियन और भारत जैसी विश्व की चार आर्थिक महाशक्तियों की तुलना काफी दिलचस्प है और वैश्विक संसाधन संस्थान के द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण से पता चला है कि चीन द्वारा पूरे विश्व में सबसे अधिक कार्बन का उत्सर्जन किया जाता है। चीन में कार्बन उत्सर्जन का सबसे मुख्य कारण है कोयले का अत्यधिक इस्तेमाल करना।

कार्बन उत्सर्जन का के मामले में अमेरिका पूरे विश्व में दूसरे नंबर पर है तथा इसके बाद तीसरे नबंर पर यूरोपियन यूनियन है और चौथे नंबर पर भारत है। हालही में पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भारत ने कार्बन उत्सर्जन को वर्ष 2030 तक 33 से 35 प्रतिशत तक घटाने का वादा किया है। वहीं सयुंक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपने कार्बन उत्सर्जन में वर्ष 2025 तक 25-28 प्रतिशत कमी लाने का वादा किया गया है।

इसके साथ ही चीन ने भी वर्ष 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को 40 से 45 प्रतिशत कम करने का वादा किया है और वहीं यूरोपियन यूनियन ने भी अपने कार्बन उत्सर्जन को 40 प्रतिशत तक कम करने का वादा किया है।

आकड़ो के अनुसार, वर्ष 2010 से 2016 के बीच चीन ने अपने प्रदूषण में 17 प्रतिशत की कमी लायी है। इन जानकारियों को अंतरिक्ष में उपग्रह के माध्यम से इकठ्ठा किया गया है। ठीक इसी तरह यूरोप में भी प्रदूषण के स्तर में 20 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है।

प्रदूषण से लड़ने के क्रम में भारत दूसरे आर्थिक महाशक्तियों से अभी काफी पीछे है और यह भारत के लिए एक चिंता का विषय भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, पीएम 10 कणों की वार्षिक औसत संख्या 20 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नही होनी चाहिए, लेकिन भारत का कोई भी प्रदेश विश्व स्वास्थ्य संगठने के इस मानक पर खरा नही उतरता है।

इसके साथ ही इन आकड़ों से पता चलता है कि भारत में पीएम 2.5 कणों की संख्या में 13 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है। वहीं दूसरे तरफ अमेरिका जैसे देशों में पीएम 2.5 कणों के प्रदूषण में 15 प्रतिशत कमी देखने को मिली है।

बच्चों पर वायु प्रदूषण का प्रभाव (Effects of Air Pollution on Children)

यूनिसेफ के द्वारा किये गये एक नये अध्ययन से पता चला है कि पूरे विश्व भर में 30 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं, जहां वायु प्रदूषम का स्तर काफी ज्यादे है। इसके कारण कई सारे बच्चों की कम उम्र में ही मृत्यु हो जाती है। इस रिपोर्ट में पता चला है कि वायु प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष 5 साल से कम उम्र के लगभग 6 लाख बच्चों की मृत्यु हो जाती है।

वैसे तो वायु प्रदूषण पूरे विश्व के लिए बड़ी समस्या बन चुका है, लेकिन भारत में यह समस्या काफी भयावह स्तर पर पहुंच चुकी है। भारत में जिन शहरों को हम सबसे अच्छा मानते हैं और जहां कई मशहूर तथा खुशनसीब लोग भी रहते हैं। वह भी विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हैं।

 

 

इन शहरों में आप अच्छा पैसा तो कमा सकते हो लेकिन प्रदूषण के कारण बाद में वह पैसा आपको अपने इलाज में भी खर्च करना पड़ेगा। तो आप सोचिये की जो शहर आपको सांस लेने के लिए अच्छी हवा नही प्रदान कर सकता, वह भला कभी आपकी किस्मत को कैसे बदल सकता है।

वायु प्रदूषण के कारण बढ़ती बीमारियां (Increase in Diseases Due to Air Pollution)

दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में प्रतिवर्ष आठ लाख लोगों की वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु हो जाती है। जिसमें से वायु प्रदूषण के कारण होने वाली हृदय संबंधित बीमारियों तथा फेफड़ों के कैंसर से लगभग 75 प्रतिशत मौतें अकेले भारत में होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिपोर्ट अनुसार विश्व भर में 10 में से 9 लोग खराब वायु में सांस लेते हैं और इसके साथ ही विश्व भर में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मृत्यु में से 90 प्रतिशत मृत्यु कम तथा मध्यम आय वाले देशों में होती है। इसके साथ ही दक्षिण-पूर्वी एशिया में इनमें तीन में से दो मौतें भारत तथा दूसरे पूर्वी प्रशांत क्षेत्रों में होती है।

इस विषय में विश्व स्वास्थ्य संगठन के पर्यावरण एवं स्वास्थ्य विभाग की अध्यक्ष कहती हैं कि “वायु प्रदूषण का यह बढ़ता स्तर लोगो के स्वास्थ्य के लिए आपातकालीन समय है।” इसके साथ इस रिपोर्ट में यातायत, घर से निकलने वाले ईंधन और कचरें, कोयला चलित पावर प्लांट्स तथा अन्य औद्योगिक गतिविधियों के कारण बढ़ते वायु प्रदूषण के स्तर को रोकने का प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

ऐसा कहा जाता है कि वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मौंतो में 94 प्रतिशत मौते हृदय संबंधी रोगो, फेफड़े का कैंसर, श्वसन संबंधी बीमारियों जैसी गैर संचारी बीमारियों के कारण होती है।

कोयले तथा गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से सबसे अधिक मात्रा में वायु प्रदूषण उत्पन्न होता है। हालांकि, विश्व भर में वायु प्रदूषण के सबसे बड़े कारक के रुप में कार्बन उत्सर्जन को देखा जाता है।

दक्षिण-पूर्वी एशिया के विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2016 की रिपोर्ट अनुसार नीचले हिस्से में होनी वाली श्वसन संक्रमण, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसऑर्डर, इस्केमिक हार्ट डिजिज, फेफड़ों का कैंसर आदि जैसे बीमारियों के कारण भारत में प्रतिवर्ष 621138 लोगो की मृत्यु होती है।

वायु प्रदूषण का भारत में स्वास्थ्य तथा अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (Effects of Air Pollution on Health and Economy of India)

पीएम 2.5 या जिसे पार्टिकुलेट मैटर 2.5 के नाम से भी जाना जाता है, इस प्रदूषण स्तर के मामले में भारत ने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। यह छोटे-छोटे प्रदूषक कण होते हैं जो वायु के द्वारा हमारे श्वसन तंत्र में काफी गहराई तक पहुंच जाते हैं। सिर्फ इतना ही नही चीन के अपेक्षा भारत में वायु प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष होने वाली मृत्य में भी बढ़ोत्तरी देखने को मिली है।

भारत में प्रतिवर्ष लगभग 12 लाख लोगों की वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु हो जाती है। हालांकि इसे रोकने के लिए देशभर में जरुरी कदम उठाये जा रहे हैं लेकिन इनके द्वारा वायु गुणवत्ता में कोई विशेष परिवर्तन नही हुआ है। ग्रीनपीस इंडिया के एक रिपोर्ट अनुसार दिल्ली भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है और यह हालत मात्र देश के राजधानी में ही नही बल्कि की दूसरे शहरों में भी है, जहां की वायु सांस लेने के लिए काफी हानिकारक है।

भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में दिल्ली के अलावा गाजियाबद, इलहाबाद (प्रयागराज), बरेली, फरीदाबाद, झरिया, अलवर, रांची, कुसुंडा, कानपुर और पटना आदि जैसे शहर शामिल हैं। इस सूची में 24 राज्यों के कुल 168 शहर शामिल है और इस रिपोर्ट को ‘वायु प्रदूषण का विष’ नाम दिया गया है। यह रिपोर्ट विभिन्न राज्यों के प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड से मिलने वाली जानकारी के आधार पर तैयार की गयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश भर में मात्र दक्षिण भारत के कुछ शहरों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण के अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाता है।

भारत में प्रतिवर्ष लगभग 12 लाख लोगों की वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु हो रही है। यह एक तरह एक अदृश्य नरसंहार की तरह है। जिसे रोका जाना काफी आवश्यक है क्योंकि यदि ऐसा नही किया गया तो एक दिन भारत के लोगों को वायु प्रदूषण से बचने के लिए दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ेगी।

ऐसा अनुमान है कि वायु प्रदूषण के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में प्रतिवर्ष 5.5 मिलियन करोड़ रुपये की कमी आयेगी, जोकि भारत के कुल घरेलू उत्पाद का लगभग 3 प्रतिशत है। इस बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण भारत के खजाने से मात्र एक वर्ष में 470000 करोड़ रुपये गायब हो जायेंगे।

त्योहारों का प्रदूषण पर प्रभाव (Effects of Festivals on Pollution)

दिवाली के बाद भारत के कई शहरों में प्रदूषण का स्तर हमेशा के अपेक्षा काफी बढ़ जाता है। वर्ष 2016 में दिवाली के दिन दिल्ली में पीएम 2.5 का सामान्य स्तर 500 माईक्रोग्राम था। वहीं वर्ष 2015 में यह स्तर 369 माइक्रोग्राम था। इसका मतलब दिवाली के दौरान दिल्ली में प्रदूषण का स्तर पिछले वर्ष की अपेक्षा 35 प्रतिशत अधिक जहरीला था।

केंद्रीय प्रदूषक नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिवाली के दौरान दिल्ली स्थित अमेरीकी दूतावास में पीएम 2.5 का स्तर 999 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया था। वहीं समान्य दिनों में यह स्तर 153 माइक्रोग्राम रहता है। हालांकि दिल्ली के सामान्य दिनों का स्तर भी पीएम 2.5 के साधरण स्तर से 3 गुना ज्यादे हैं, वास्तव में यह स्तर 0 से लेकर 50 तक होना चाहिए।

2.5 पीएम प्रदूषण के हिसाब से ग्वालियर, इलहाबाद, पटना और रायपुर जैसे भारत के चार शहर विश्व के 10 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में शामिल हैं।

वायु प्रदूषण का बढ़ता खतरा (Increasing Threat of Air Pollution)

अमेरिका, कानाडा, चीन और भारत के वैज्ञानिकों ने मिलकर अमेरिकन एसोशिएसन फार द अडवांस्डमेंट आफ साइंसेज (आस) में अपने शोध को प्रस्तुत किया, जिसमें इस बात का पता चला कि वर्ष 2013 में भारत और चीन जैसे देशों में वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों के कारण लाखों लोगो की मृत्यु हुई है।

ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता माइकल ब्राउन कहते हैं कि “वायु प्रदूषण विश्व में मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण है और इसके साथ ही यह पर्यावरण के लिए भी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।”  वायु प्रदूषण के कारण मरने वालों के संख्या रक्तदाब, खान-पान तथा सिगरेट पीने के कारण मरने वालों की संख्या से भी अधिक हैं और विश्व के 85 प्रतिशत लोगों द्वारा इस खतरनाक प्रदूषण का सामना किया जा रहा है।

इस विषय में वह आगे कहते हैं कि “विश्व की 85 प्रतिशत आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है, जहां वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बताये गये सामान्य स्तर से काफी ज्यादे हैं।” इस अध्ययन में वायु प्रदूषण के कारण वर्ष 1990 से 2013 तक उत्पन्न हुए, कई गंभीर खतरों के विषय में भी पता चला है।

निष्कर्ष (Conclusion)

वायु प्रदूषण की समस्या से लड़ने के लिए हमें वैश्विक स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है क्योंकि इसके कारण विश्व भर में प्रतिवर्ष लाखों लोगो की मृत्यु हो रही है। इनमें से आधे से ज्यादे मृत्यु भारत तथा चीन जैसे तेजी से आर्थिक तरक्की कर रहे देशों में होती है और दुर्भाग्य से अधिक आबादी वाले देशों में वायु भी काफी ज्यादे प्रदूषित है।

हालांकि खुशी की बात यह है कि भारत ने 2030 तक अपने 40 प्रतिशत बिजली उत्पादन नवकरणीय तथा स्वच्छ उर्जा स्त्रोतों से करने का फैसला किया है। इसके साथ ही भारत द्वारा कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए अलगे पंद्रह वर्षो में 170 लाख करोड़ रुपये खर्च किये जायेंगे।

भारत अपनी बिजली उत्पादन का अधिक से अधिक हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा स्त्रोतों से करना चाहता है और इस विषय में सराहनीय कार्य करते हुए तमिलनाडु के कैमुथी में विश्व के सबसे बड़े सौर बिजली उत्पादन प्लांट का निर्माण किया गया है, जिसकी कुल उत्पादन क्षमता 648 मेगावाट है।

इसके पहले विश्व का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थित था। जिसकी कुल क्षमता 550 मेगावाट है। कुल मिलाकर देखा जाये तो भारत वायु प्रदूषण से लड़ने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है और पेरिस जलवायु सम्मेलन में भारत द्वारा जो वादा किया है। वो अन्य देशों के मुकाबले कोई छोटा-मोटा वादा नही है बल्कि इसके विपरीत इतने ज्यादे आबादी वाले देश के लिए, यह एक काफी बड़ी चुनौती के समान है।