जल प्रदूषण का प्रभाव

आज जल प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है और व्यापक रूप से जीवन को प्रभावित कर रहा है। घरेलू तथा औद्योगिक दोनो ही कारणों से लगातार जल प्रदूषित होता जा रहा है। घरों में साबुन, सोडा, ब्लीचिंग पाउडर एवं डिटर्जेंट का अत्यधिक प्रयोग या उद्योगों में धात्विक, अम्ल, क्षार या लवण के प्रयोग से जल प्रदूषित हो रहा है। भारत में जल प्रदूषण सबसे गंभीर पर्यावरण संबंधी खतरों मे से एक बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े स्रोत शहरी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट हैं जो बिना शोधित किए हुए नदियों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद शहरों में उत्पन्न कुल अपशिष्ट जल का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही शोधित किया जा रहा है और बाकी ऐसे ही नदियों, तालाबों एवं महासागरों में प्रवाहित किया जा रहा है।

तीव्र औद्योगीकरण ने भी जल प्रदूषण की समस्या को निश्चित रूप से खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। साथ ही, कृषि में प्रयुक्त कीटनाशकों एवं रासायनिक उर्वरकों ने भी जल प्रदूषण की समस्या को बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। जल प्रदूषण की समस्या से मानव तो बुरी तरह प्रभावित होते ही हैं, जलीय जीव जन्तु, जलीय पादप तथा पशु पक्षी भी प्रभावित होते हैं। खास तौर पर कुछ समुंद्री हिस्सों एवं नदियों में तो जल प्रदूषण की वजह से जलीय जीवन समाप्तप्राय हो चुका है।

पौधों और जानवरों पर जल प्रदूषण का प्रभाव

विषाक्त पदार्थों में वृद्धि

जल प्रदूषण की वजह से गंगा नदी, जिसे हिन्दूओं की पतित पावनी कहा जाता है, अत्यधिक प्रदूषित हो चुकी है। वैसी ही हालात यमुना, गोमती, चम्बल तथा झेलम नदियों के भी हैं। आज अगर भारत की हुगली नदी संसार की सबसे प्रदूषित जल स्रोतों में से एक मानी जाती है तो इसकी वजह भी जल प्रदूषण ही है। लखनऊ की गोमती नदी में कारखानों द्वारा छोड़े गए प्रदूषित जल से नदी का जल एक समय इतना विषाक्त हो गया था कि जल के ऊपर मरी हुई मछलियाँ उतराती दिखाई देती थीं।

जल प्रदूषण का प्रभाव

जलीय पौधों के वृद्धि पर प्रभाव

जलीय पौधे गंभीर रूप से जल प्रदूषण की वजह से प्रभावित हो जाते हैं। प्रदूषित जल में काई की अधिकता होने से सूर्य का प्रकाश गहराई तक नहीं पहुंच पाता जिससे जलीय पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्रिया और उनकी वृद्धि प्रभावित होती है। प्रदूषित जल में प्रदूषकों के कारण कुछ जलीय खरपतवार जैसे - जलीय फर्न एवं जलीय हाईसिंथ की वृद्धि हो जाती है मल-युक्त जल में कवक, शैवाल, बैक्टीरिया आदि तेजी से बढ़ना शुरू हो जाते हैं।

जलीय जन्तुओं पर जल प्रदूषण के दुष्प्रभाव

समुद्री क्षेत्रों में बढ़ता जल प्रदूषण खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है। जलीय जीव-जन्तुओं पर प्रदूषित जल का बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। जल प्रदूषण से जल में काई की अधिकता हो जाती है तथा ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार ज्यादातर नदियों के जल के एक लीटर में ऑक्सीजन की मात्रा इस समय 0.1 घन सेमी रह गई है जबकि 1940 में औसतन यह 2.5 घन सेमी थी। जल प्रदूषण से प्रभावित होने वाले जीव जन्तुओं में मछलियों की कई प्रजातियां सम्मिलित हैं। महासागरों में तैलीय पदार्थों, हाइडोकार्बन के सागरीय सतह पर फैल जाने की वजह से जलीय जीवों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाता और वे मर जाते हैं। हालात इतने चिंताजनक हो चुके हैं कि कई जलीय जीवों की प्रजातियां समाप्ति के कगार पर हैं।

प्रदूषित जल, जलीय जीवों की प्रजनन शक्ति पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। यह मछलियों एव पौधों में प्रजनन की क्षमता में कमी ला रहा है। इसके अलावा, जानवर प्रदूषित जल पीने की वजह से कई प्रकार के रोगों से ग्रसित हो रहे हैं।

खत्म हो रही है प्रकृति की सुंदरता

दूषित जल न केवल पीने के लिए बल्कि कृषि प्रयोजनों के लिए अनुपयुक्त है। साथ ही, प्रदूषित जल की वजह से नदियों एवं झीलों की सुंदरता भी खत्म हो रही है।

 

जल प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

प्रदूषित जल का सबसे भयंकर प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार-सम्पूर्ण विश्व मे प्रतिवर्ष एक करोड़ पचास लाख व्यक्ति प्रदूषित जल के कारण मृत्यु के शिकार हो जाते हैं तथा पांच लाख बच्चे मर जाते हैं। भारत में प्रति लाख लगभग 360 व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है और अस्पतालों में भर्ती होने वाले रागियों में से 50 फीसदी रोगी ऐसे होते है जिनका कारण प्रदूषित जल होता है। अविकसित देशों की स्थिति और भी बुरी है और यहां 80 प्रतिशत रोगों की जड़ प्रदूषित जल है।

विभिन्न रोगों के प्रसार के लिए जिम्मेदार

रोगाणु, विषाक्त पदार्थ एवं पानी में लवण की अनावश्यक मात्रा कई बीमारियों को जन्म दे रही है। विश्व भर में 80 प्रतिशत से भी अधिक बीमारियों का कारण सीधे या परोक्ष रूप से प्रदूषित जल ही है। एक अनुमान के अनुसार भारत के 34000 गांवों के लगभग 2.5 करोड़ व्यक्ति हैजे से पीडि़त हैं। राजस्थान के आदिवासी गांवों के एक लाख नब्बे हजार लोग गंदे तालाबों का पानी पीने के कारण विभिन्न बीमारियों से पीडि़त है। प्रदूषित जल में अनेक प्रकार के रोगकारक जीवाणु होते हैं जिनसे अनेक प्रकार की बीमारियां फैलती हैं वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में सर्वाधिक रोग मल द्वारा प्रदूषित पेय जल से होता है। प्रदूषित जल से पोलियो, हैजा, पेचिस, पीलिया, मियादी बुखार, वायरल फीवर आदि बीमारियां फैलती हैं। प्रदूषित जल में शीसा भी पाया जाता है जिसे पीने से मनुष्यों को जोडों के दर्द, गुर्दा तथा ह्रदय रोग सहित तमाम बीमारियां हो जाती हैं।

जलजनित रोग संक्रामक रोग होते हैं जो मुख्यतः प्रदूषित जल से फैलते हैं। हेपेटाईटिस, हैजा, पेचिश तथा टाइफाईड आम जलजनित रोग है, जिनसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के बहुसंख्यक लोग प्रभावित होते हैं। प्रदूषित जल के संपर्क से अतिसार, त्वचा संबंधी रोग, श्वास समस्यांए तथा अन्य रोग हो सकते है जो जल निकायों में मौजूद प्रदूषकों के कारण होते है। जल के स्थिर तथा अनुपचारित होने से मच्छर तथा अन्य कई परजीवी कीट आदि उत्पन्न होते है जो विशेषतः उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कई बिमारियाँ फैलाते हैं।

बच्चे अक्सर प्रदूषित पानी पीने की वजह से बीमार हो जाते हैं और कई बार वे रोगों की तीव्रता के कारण मर भी जाते है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में दूषित पानी की वजह प्रति घंटे 13 बच्चों से प्रदूषित जल की वजह से होने वाला बिमारी डायरिया के कारण मर जाते हैं।

प्रदूषित जल मनुष्य के लिए जहर के समान ही है। पीने के पानी में क्लोराइड की अधिक मात्रा होने की वजह से रीढ़ की हड्डी जो टेढ़ी हो जाती है दांत पीले होकर गिरने शुरू हो जाते हैं। इसके अलावा लोगों की हाथ और पैर की हड्डियों अपना लचीलापन खो देते हैं और उनका शरीर विकृत हो जाता है।

प्रदूषित जल की वजह से गुर्दे की बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। प्रदूषित जल में मौजूद सल्फाइड की एक बड़ी मात्रा विभिन्न सांस की बीमारियों का कारण है। पीने के जल में यूरिया का मात्रा बढ़ जाने की वजह से पेट के विकार भी हो जाते हैं। दूषित पेयजल की निरंतर सेवन से विभिन्न पेट संबंधी विकारों के साथ ही गले में गांठ, दंत क्षय, आदि कई अन्य रोग हो जाते हैं।

 

नाइट्रेट उर्वरक एवं कृषि भूमि में प्रयुक्त कई रसायन, अपशिष्टों का जहां-तहां बिखराव एवं गड्ढे वाले शौचालयों से भूजल प्रदूषित हो जाता है। इस तरह के दूषित पेयजल के सेवन करने वाले बच्चों में ब्लू बेबी नामक रोग फैलता है जिसकी वजह से बच्चों की त्वचा का रंग बदल जाता है। इस रोग में, भूजल में नाइट्रेट के प्रदूषण के फलस्वरूप इन बच्चों के हीमोग्लोबिन में ऑक्सीजन वहन करने की क्षमता में कमी आती है जिसकी वजह से उनकी मृत्यु हो जाती है।

परमाणु विस्फोटों से उत्पन्न रेडियोधर्मी पदार्थ भी जल प्रवाह द्वारा जलाशायों में पहुच जाते हैं और पेय जल को प्रदूषित कर देते है। मनुष्य जब इस जल का उपयोग करता है तो उसे ल्यूकोमिया तथा कैंसर जैसे भयानक रोग हो जाते हैं। इस जल के प्रयोग से अपंग संतान होने का भी खतरा बढ जाता है।

प्रदूषण की वजह से पेय जल असुरक्षित

जल प्रदूषण की वजह से पीने का पानी बदबूदार एवं अरुचिकर हो जाता है। पानी में मौजूद सूक्ष्म जीव पानी के स्वाद को खराब कर देते हैं। जब प्रदूषित पानी में मौजूद जैविक पदार्थ मरने लगते हैं तो ये हाइड्रोजन सल्फाइड एवं अमोनिया गैस बनाते हैं जो पानी में बहुत बुरी गंध पैदा कर देते हैं।

औद्योगिक इकाईयां भी हो रही हैं प्रभावित

औद्योगिक इकाइयों की क्षमता भी जल प्रदूषण की वजह से कम हो जाती है। उदाहरण के तौर पर कानपुर का चमड़ा उद्योग गंगा के प्रदूषित पानी के उपयोग की वजह से प्रभावित हो गया है।

जल निकायों का संदूषण

जल प्रदूषण से नदियां, झीलें, समुंद्र और भूमिगत जल आदि जल के सभी निकाय दूषित हो जाते हैं और इसके लिए निश्चित रूप से मानवीय गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं। मानव अपने स्वार्थ के कारण नियम कानून को ताक पर रखते हुए विभिन्न फैक्टरियों से उत्पन्न विभिन्न हानिकारक तत्वों को भी जल के स्रोतों में प्रवाहित कर देते हैं। औद्योगिक अपशिष्ट में पाए जाने वाले हानिकारक तत्वों में नमक, विभिन्न रसायन, ग्रीज़, तेल, पेंट, लोहा, कैडमीयम, सीसा, आर्सेनिक, जस्ता, टिन, इत्यादि शामिल हैं। यह भी देखा गया है कि कुछ औद्योगिक संगठन रेडियो-एक्टिव पदार्थों को भी जल के स्रोतों में प्रवाहित करने से परहेज नहीं करते जो जीव और पौधों के लिए बेहद हानिकारक हैं।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने कुछ उद्योगों को मुख्य प्रदूषक उद्योगों के रूप में चिन्हित किया है- जैसे कि मद्य उद्योग, पेट्रोरसायन उद्योग, चर्म शोधक उद्योग, कागज उद्योग, उर्वरक उद्योग, औषधि उद्योग एवं चीनी उद्योग इत्यादि।

दिन-प्रतिदिन के जीवन पर प्रभाव

प्रदूषित अम्लीय जल धातुओं से निर्मित जल संग्रह पात्रों को घोल देता है जिससे जल संग्रहण में बाधा आती है। प्रदूषित जल में मिश्रित क्षारीय पदार्थ बर्तनों तथा नलों में एकत्रित होकर उन्हें कमजोर बनाते है।

दूषित जल में रोगजनक जीवाणुओं की वजह से होने वाली बीमारी

दूषित जल रोगजनक रोगाणुओं के वाहक होते हैं और इसलिए मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे नुकसानदायक हैं। दूषित जल द्वारा उत्पन्न रोगों को निम्नलिखित मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया हैं:

वायरस द्वारा - पीलिया (पीत ज्वर), पोलियो, आंत्रशोथ, जुकाम, संक्रामक यकृत शोथ, चेचक।

जीवाणुओं द्वारा - डायरिया, दस्त, मियादी बुखार, तेज बुखार, हैजा, काली खांसी, सूजाक, उपदंश, आंत्रशोथ, पेचिश, तपेदिक।

प्रोटोजोआ द्वारा - मसूढ़ों में पायरिया, पेचिश, नार्कोलेप्सी (महामारी इन्सेफेलाइटिस), मलेरिया, अमाबाईसिस, जिआरडाईसिस।

कीड़ों द्वारा - फाइलेरिया, हाईडेटिडसिस्ट एवं कृमि रोग की एक किस्म (विभिन्न प्रकार के पेट के कीड़े होना)।

लेप्टोस्पाइरोसिस बीमारी - हमारे शरीर में रोग पैदा करने वाले विभिन्न जीवाणुओं के अलावा, विभिन्न प्रकार के विषाक्त पदार्थ जल के माध्यम से हमारे शरीर में पहुंच कर नुकसान पहुंचाते हैं। इन विषाक्त पदार्थों में मुख्य रूप से कैडमियम, सीसा, निकल, चांदी, आर्सेनिक, आदि सम्मिलित हैं:

  • प्रदूषित जल में लोहा, मैंगनीज, कैल्शियम, बेरियम, क्रोमियम, तांबा, बरौनी, बोरान, नाइट्रेट, सल्फेट, बोरेट, कार्बोनेट, आदि लवणों की अधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
  • जल में मैग्नीशियम सल्फेट की अधिकता से आंतों में जलन होती है।
  • बच्चों के शरीर में प्रदूषित जल के सेवन के फलस्वरूप, नाइट्रेट की अधिकता से रोग मेथेमोग्लोबिनेमिया नामक बिमारी हो जाती है जो आंतों में पहुंचकर पेट का कैंसर उत्पन्न करता है।
  • प्रदूषित जल में फ्लोरीन की अधिकता होती है जिसके सेवन से फ्लोरोसिस नाम की बीमारी हो जाती है।

निष्कर्ष:

जल प्रदूषण इस ब्रह्मांड में सभी प्रकार के जीवन के लिए खतरनाक है। प्रदुषित जल द्वारा कई बीमारियां फैलती हैं। मनुष्य, पौधों और अन्य प्रकार के जीवों की रक्षा के लिए जल प्रदूषण का समाधान निकालना आवश्यक है और इसके लिए सभी लोगों, समाज एवं सरकार द्वारा सामूहिक रूप से प्रयास किया जाना आवश्यक है।