पर्यावरणीय समस्याएं जिनका पूरा विश्व सामना कर रहा है (Environmental Problems that Our World is Facing Today)

हम ऐसे वातावरण में रहते है जो चारो ओर से कई प्रकार के जीवों, प्राकृतिक वस्तुओं, प्रजातियों तथा भूमि, आकाश और समुद्र से घिरा हुआ है। इन्हीं से मिलकर पर्यावरण का निर्माण होता है।

हमारे आस-पास का पर्यावरण हमेशा बदलता रहता है और जैसे-जैसे यह बदलता जा रहा है हमें इस विषय को लेकर और भी संजीदा होने की आवश्यकता है। वायु, जल और भूमि प्रदूषण से जुड़ी हुई ऐसी कई सारी पर्यावरणीय समस्याएं है, जिनपर हमें ध्यान देने की आवश्यकता है। यह समस्याएं प्राकृतिक संसाधनों में मानव द्वारा किये जाने वाले हस्तक्षेप के कारण बढ़ती ही जा रही है।

औद्योगिकरण और शहरीकरण जैसी बढ़ती हुई मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण पर इसके काफी नकरात्मक प्रभाव उत्पन्न हो रहे है। जिससे पृथ्वी के पर्यावरण की स्थिति दिन-प्रतिदिन काफी ज्यादे खराब होते जा रही है। यहीं कारण है कि पृथ्वी पर होने वाली प्राकृतिक आपदाओं जैसी की तूफान,बाढ़ और सूखे आदि में तेजी से वृद्धि हुई है। इन समस्याओं के कारण लोगो के लिए खाद्य संकट की समस्याएं भी उत्पन्न हो गई है।

आज कल के समय में लोगों को कई तरह की पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जिसमें से कईयों ने हमारे लिए भी समस्याएं पैदा कर दी है। इनमें से कुछ समस्याएं हमारे पर्यावरण को प्रभावित करती है और कुछ भूभाग को बदलने का भी कार्य करती है अगर समय रहते हमने इन समस्याओं का हल नही किया गया तो आने वाले समय में हमारे लिए कई सारी समस्याएं खड़ी जायेंगी।

मुख्य पर्यावरणीय मुद्दे जिनका आज विश्व सामना कर रहा है (Main Environmental Issues – The World is Facing Today)

तो आइये उन मुख्य पर्यावरणीय मुद्दों पर नजर डालते है, जिनका विश्व आज के समय में सामना कर रहा है।

1.ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन (Global Warming and Climate Change)

ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ पृथ्वी के तापमान में हो रहे लगातार वृद्धि से है। हमारे पृथ्वी पर सौर किरणें आती है जो हमारे पृथ्वी के सतह पर आने से इसे गर्म बनाती है क्योंकि पृथ्वी का वायुमंडल कई सारे गैसों से मिलकर बना है, जिसमें की ग्रीन हाउस गैसे भी शामिल है। ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी की उर्जा का अवशोषण करके पृथ्वी के तापमान में वृद्धि करने का कार्य करती है। जिसके कारण अक्षांशीय विकरण में वृद्धि होती है और इसी प्रक्रिया को ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ कहते है। ग्रीनहाउस गैसों में मुख्यतः कार्बन डाइ अक्साइड, मेथेन, ओजोन आदि जैसी गैसें पायी जाती है।

औद्योगिकरण से पहले जब जीवाश्म ईंधनों का उपयोग नही किया जाता था, तब सामान्य मानवीय गतिविधियों के द्वारा ग्रीन हाउस गैसों में कोई खास वृद्धि नही होती थी, परन्तु सन् 1880 से लेकर 2012 तक पृथ्वी के औसत तापमान में 0.85 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो गई है। जिसमें सबसे अधिक वृद्धि 1906 से लेकर 2005 तक के बीच में हुई है।

जलवायु परिवर्तन एक बहुत ही महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौती है, जिसके कारण ग्लोबल वार्मिंग में भी तेजी से वृद्धि होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण कई सारे हानिकारक प्रभाव उत्पन्न होते है, जैसी की नयी बीमारियां, लगातार आने वाली बाढ़ समस्याएं, मौसम चक्र में परिवर्तन आदि इसमें प्रमुख है। इस भयावह समस्या के कारण ना सिर्फ पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है बल्कि की समुद्र स्तर में भी तेजी से वृद्धि होती जा रही है।

यही कारण है कि पृथ्वी और महासागर दोनों ही दिन प्रतिदिन गर्म होते जा रहे है। वास्तव में ग्रीन हाउस गैसों के कारण ही जलवायु परिवर्तन में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, खासतौर से मानव द्वारा उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों का इसमें प्रमुख योगदान है। निवास, कृषि और समुद्र पर इसके नकरात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं, जिसके कारण कई प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं भी उत्पन्न हो रही है, जैसे कि तेजी से आने वाले बाढ़, बर्फबारी, सूखा, भूमि का बंजर होना आदि इनमें प्रमुख है।

 

जलवायु परिवर्तन को कम करने का सबसे अच्छा तरीका सतत विकास के लिए काम करना है। जिसके द्वारा हम कई प्रकार के नकरात्मक प्रभावों से बच सकते है। हम नवकरणीय उर्जा जैसे कि पवन और वायु उर्जा का उपयोग करके जलवायु परिवर्तन को रोकने में अपना अहम योगदान दे सकते है। इसके साथ ही कचरे और प्रदूषण को कम करके भी पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है।

2. पारिस्थितिक तंत्र और लुप्तप्राय प्रजातियां (Ecosystems and Endangered Species)

हमारे पृथ्वी पर पर्यावरणीय समस्याओं के कारण कई सारे बदलाव देखने को मिल रहे है, जिसके कारण परिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण दोनो ही प्रभावित हो रहे हैं। इस बात का भय बना हुआ है कि 2050 तक हर दस में से एक प्रजाति विलुप्त हो जायेगी और यदि पारिस्थितिकी तंत्र का स्तर ऐसे ही घटता रहा तो हम इसमें रहने वाले प्रजातियों को भी खो देंगे।

उदाहरण के लिए लगभग एक सदी बितने के बाद, बाघों की संख्या एक बार फिर बढ़ रही है लेकिन फिर भी यह विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। इसका एक दूसरा उदाहरण पोलर बेयर है, जिनका आर्कटिक क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते तापमान के कारण आवास खतरे में पढ़ गया है।

कई सारी संस्थाएं प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने के लिए कार्य कर रही है। और उनकी सहायता करके हम पर्यावरण में हो रही गिरावट को रोक सकते है। हालांकि यह काफी अच्छी बात है कि सरकार ने इस विषय को लेकर कई सारे नियम कानून बनाये है और खतरे में पड़ी प्रजातियों को बचाने के लिए कार्य शुरु कर दिये है।

3. वनोन्मूलन (Deforestation)

पृथ्वी के लगभग 30 प्रतिशत भाग पर वन फैले हुए है। वह कार्बन डाइऑक्साइड सोखते है और आक्सीजन उत्पन्न करते है। दुर्भाग्य से प्रत्येक वर्ष वनों का काफी सारा भाग बढ़ती जनसंख्या के भोजन, निवास और परिधान की व्यवस्था करने में खत्म होता जा रहा है।

वनोन्मूलन का अर्थ हरियाली और जगंलो को खत्म करके खेती, आवास, उद्योगो और व्यावसायिक कार्यों के लिए धन इकठ्ठा करने से है। इसके लिए जंगलो को खेती के मैदान में बदल दिया जाता है ताकि हमें अपनी बढ़ती आवश्यकता अनुसार खाद्य पदार्थों की प्राप्ति हो सके। इसके अलावा लकड़ी को टिम्बर, जलावन और अन्य दूसरें चीजों के लिए भी काटा जाता है। इसी तरह पूर्वोत्तर भारत में झूम खेती के अंतर्गत किसान पेड़ो को जलाकर खेती के लिए जमीन की व्यवस्था करते है।

70 प्रतिशत से ज्यादे पेड़-पौधे और जीव-जन्तु जंगलों में पाये जाते है। पूरे विश्व भर में लगातार बदल रहे जलवायु के कारण कई सारी प्रजातियों का आवास और पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ गया है। अब काफी कम ही पेड़ बचे हैं जो आक्सीजन का उत्पादन करते है और कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करते है। ऐसा अनुमान है कि लगभग 15 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन सिर्फ जीवाश्म ईंधनों के दहन से होता है।

 

वनोन्मूलन का पृथ्वी पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है और वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि आने वाले समय में मात्र 10 प्रतिशत वर्षा-वन ही पृथ्वी पर शेष बचेंगे। बाकी को कृषि कार्य या लकड़ी के लिए काट दिया जायेगा।

हमें अपने बचे हुए वर्षा-वनों को बचाने के लिए आगे आना चाहिए और पेड़ो के काटने को प्रतिबंधित करना चाहिए और यदि पेड़ को काटना बहुत ही आवश्यक हो तो उसके जगह हमें दूसरा पेड़ अवश्य लगाना चाहिए।

4. जैव विविधता में हो रहा पतन (Loss of Biodiversity)

पिछले कुछ वर्षों में हुए अध्ययनों से पता चला है कि जैव विविधता में पतन के कारण पर्यावरण पर इसका काफी नकरात्मक प्रभाव उत्पन्न हो गया। कई तरह की मानवीय गतिविधियों के कारण कई सारी प्रजातियां विलुप्त हो गई है, जिसके कारण जैव विवधता में कमी आई है। यदि जंगली जानवरों का उनके दांतों, खाल और दूसरी चीजों के लिए ऐसे ही शिकार किया जाता रहेगा तो वह विलुप्तता के कगार पर पहुंच जायेंगे। पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक पेड़-पौधे और जीव-जन्तु एक-दूसरे से जुड़े हुए है और यदि यह क्रम टूट गया तो मानव जाति के लिए भी यह एक गंभीर समस्या उत्पन्न कर देगा।

वर्तमान में मौजूद पारिस्थितिकी तंत्र को भी पूर्ण रुप से विकसित होने में करोड़ो वर्ष का समय लगा है। जैव विविधता में उत्पन्न हुए इसी खतरे के कारण भविष्य के पीढ़ियों को भी कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ेगा। इस स्थिति को अभी भी रोका जा सकता है, जिसके लिए हमें स्थानीय पेड़-पौधों और भूभाग से किसी प्रकार की भी छेड़खानी नही करनी चाहिए।

स्थानीय पेड़-पौधे स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होते है और इन्हें कम देखभाल की जरुरत होती है, इसके साथ ही यह बाढ़ और सूखे से भी लोगों को बचाते है। जोकि प्राकृतिक संसाधनो और प्रदूषण में संतुलन बनाये रखने के लिए काफी आवश्यक होते है।

जैव विविधता में हो रही कमी के कारण खाद्य श्रृंखला, जल स्त्रोतों और दूसरे संसाधन पर दबाव काफी बढ़ गया है। बिना पर्याप्त जैव विविधता के पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ हो जाता है और कुछ समय बाद खत्म हो जाता है। मानव जाति अब और ज्यादे पर्यावरण क्षरण को बर्दास्त नही कर सकती है, इसलिए यह काफी जरुरी है कि हम इसे बचाने के लिए जरुरी कदम उठाये।

5. प्रदूषण (Pollution)

प्रदूषण आज के समय में वह सबसे बड़ी समस्या है, जिसका विश्व सामना कर रहा है, इसी के कारण हमें तमाम तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है। प्रदूषण के कारण प्राकृतिक और मानव जगत दोनो पर ही प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न होते है। प्रदूषण वह अनचाहा परिवर्तन है, जिसके कारण वायु, जल और भूमि के गुणों में परिवर्तन आ जाता है। इसी तरह वह तत्व जो यह अनचाहे परिवर्तन लाते हैं, उन्हें प्रदूषक कहते है।

दूसरें शब्दों में कहे तो प्रदूषण के कारण कई सारे हानिकारक तत्व वातावरण में मिल जाते है। जिससे यह जहरीले प्रदूषक पेड़-पौधो, जानवरों और मनुष्यों पर कई तरह के नकरात्मक प्रभाव उत्पन्न करते है।

प्रदूषक हमारे श्वांस लेने वाली वायु, हमारे खाने और उस भूमि में भी मिले हो सकते है जिसपर हम अपनी खाद्य सामग्री उगाते है। जो बढ़ी हुई आवाजें और शोर-शराबा आज हम प्रतिदिन सुनते है वह भी इसी प्रदूषण का हिस्सा है। जिसके कारण कई तरह की शारीरिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती है और वन्यजीवन और पर्यावरण तंत्र पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न होता है।

सांस लेने के लिए हमें हवा की आवश्यकता होती है, परन्तु वायु प्रदूषण के कारण इसमें भी कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो जाती है। खराब वायु गुणवत्ता का श्वसन तंत्र, जानवरों और इंसानो पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा कई सारे उद्योग, कारखाने और वाहन जीवाश्म ईंधन पर चलते है, जोकि वायु प्रदूषण को बढ़ाने का काम करते है। भारी धातु, नाइट्रेट और प्लास्टिक तथा अन्य दूसरे प्रदूषकों के वातावरण में मिलने के कारण प्रदूषण बढ़ता है। इलेक्ट्रानिक कचरा भी प्रदूषण का एक मुख्य कारण है, इसके साथ ही न्यूक्लियर कचरा निस्तारण भी प्रदूषण को भयावह रुप से बढ़ा देता है।

वायु, जल और भूमि की गुणवत्ता को सुधारने के लिए यह काफी जरुरी है कि हम मिलकर प्रदूषण का सामना करें। इसके साथ ही पर्यावरण का देखभाल भी करें और सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग करें, जिससे की पर्यावरण का संतुलन ऐसे ही बना रहे।

6. प्राकृतिक संसाधनो का दोहन (Natural Resources Depletion)

मानव जाति ने काफी तरक्की कर ली है और कई प्रकार के आविष्कारों द्वारा अपने जीवन को काफी आसान बना लिया है। लेकिन इन्हीं कारणों से मनुष्य अपने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी काफी तेजी से कर रहा है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनो का दोहन पर्यावरण के लिए भी एक महत्वपूर्ण समस्या बन गया है। इसे रोकने के लिए हम कई सारे कार्य कर सकते है, इसके लिए हम सौर, वायु, बायो गैस जैसे नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों का उपयोग कर सकते है।

जल, कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस तथा फास्फोरस आदि जैसे तत्व दिन-प्रतिदिन कम होते जा रहे है। हमें हर जगह बताया जाता है कि हमारे पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत भूभाग जल से ढका हुआ है लेकिन हमें यह नही बताया जाता कि इसमें से मात्र 2.5 प्रतिशत ही ताजे पानी के रुप में मौजूद है। जिसे हम पीने के लिए इस्तेमाल कर सकते है, बाकी का सारा खारा पानी है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी नही है। इसके अलावा कुछ मात्रा में ताजा पानी बर्फ और ग्लेशियरों के रुप में भी मौजूद है। इसलिए यह काफी जरूरी है कि हम पानी को बहुत ही सीमित मात्रा में इस्तेमाल करें और इसे तमाम तरह के प्रदूषणों से बचाये।

कोयला सबसे ज्यादे इस्तेमाल किये जाने वाले जीवाश्म ईंधनों में से एक है। कुछ वर्षों पहले ऐसा अनुमान लगाया गया था कि अब मात्र दो दशकों तक के इस्तेमाल का ही कोयला बचा हुआ है, लेकिन इसके मांग के तेजी को देखते हुए लगता है यह अनुमानित समय से पहले ही खत्म हो जायेगा।

ऐसा माना जाता है कि तेल के बिना वैश्विक परिवहन बिल्कुल ही ठप पड़ जायेगा और यदि हमारी वर्तमान के हिसाब से मांग जारी रही तो यह उपलब्ध तेल अगले 46 वर्षों में समाप्त हो जायेगा। एक दूसरे अनुमान के अनुसार प्राकृतिक गैस के ज्ञात भंडार भी अगले 58 वर्षों में समाप्त हो जायेंगे।

फास्फोरस गुआनो की फास्फोरस चट्टानों से प्राप्त किया जाता है। यह एक काफी महत्वपूर्ण वस्तु है क्योंकि इसका इस्तेमाल उर्वरक बनाने में किया जाता है, जोकि फसलों के वृद्धि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जैसा कि वर्तमान के शोधकर्ताओं द्वारा अनुमान लगाया है कि एक-दो दशक में फास्फोरस भी घटने लगेगा।

7. ओजोन परत का ह्रास (Ozone Layer Depletion)

ओजोन परत एक रक्षा परत है जो समताप मंडल के उपर मौजूद है, जोकि सूर्य की पैराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकता है। क्लोरिन से जनित परमाणु धीरे-धीरे टूटते और ओजोने के संपर्क में आने पर एक रासायनित चक्र की शुरुआत करते है, जोकि ओजोन परत को हानि पहुचाने का काम करता है। इन्हीं सब कारणों से पिछले कुछ समय में ओजोन परत को भीषण क्षति हुई है।

8. मृदा अपरदन (Soil Erosion)

अधिक मात्रा में खाद के इस्तेमाल करने से और एकतरफा खेती तथा अधिक मात्रा में पड़ों को काटने के कारण दिन-प्रतिदिन मिट्टी के गुणवत्ता में गिरावट आती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रत्येक वर्ष लगभग 12 मिलीयन हेक्टेयर भूमि बेकार हो जाती है।

9. घटता भूजल स्तर (Decline in Groundwater Level)

घटता भूजल स्तर आज के समय में विश्न भर में खाद्य सुरक्षा और जीवनयापन के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार अधिक मात्रा में भूजल दोहन के कारण इसका स्तर काफी तेजी से घटता जा रहा है। जिसके कारण पानी के कमी की समस्या खड़ी हो गयी है। कम वर्षा और सूखे के कारण भूजल स्तर तेजी से घटता जा रहा है।

10. जनसंख्या वृद्धि (Overpopulation)

विश्व की जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, जिसके कारण दिन-प्रतिदिन संसाधनों में कमी होती जा रही है, इसी कारण मनुष्य के जीवन-यापन के लिए कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। ऐसा अनुमान है कि हमारी पृथ्वी दस अरब से ज्यादे लोगों के भरण-पोषण का भार नही उठा सकती है और इस संख्या से हम मात्र एक शताब्दी दूर है। इसलिए आज के समय में जनसंख्या वृद्धि भी एक गंभीर चिंता का विषय है।

मनुष्यों के बढ़ते आबादी, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण की हालत बद से बदतर होती जा रही है क्योंकि पृथ्वी पर आबादी बढ़ने के साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी बढ़ेगा। हालांकि यह एक सुकून की बात है कि नवकरणीय उर्जा इस समस्या से लड़ने का एक बेहतरीन साधन है, जोकि दिन-प्रतिदिन लोगों में लोकप्रिय होते जा रहे है।

बढ़ते आबादी के कारण हमें अधिक संसाधनों की भी आवश्यकता होगी, जोकि सतत ऊर्जा के स्त्रोतों द्वारा आसानी से प्राप्त की जा सकती है, इसके साथ ही ऐसा करके हम वायु में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा को भी कम कर सकते है।

11. जीवन गुणवत्ता का घटता स्तर (Declining Quality of Life)

आज विश्व भर में चल रही प्रदूषण समस्या का एक ही निष्कर्ष निकलता है, वह है मानव स्वास्थ्य में गिरावट, लगभग सभी तरह के प्रदूषण, पानी की कमी और बढ़ती जनसंख्या प्रत्यक्ष रुप से बड़े स्तर पर मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते है। एक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संस्थान (डब्लूएचओ) के अनुसार निकट भविष्य में प्रति चार व्यक्तियों में से एक व्यक्ति की मृत्यु खराब वातावरण में जीवनयापन करने के कारण होगी।

इसमें कोई शक नही है कि आज के समय में मानव स्वास्थ्य एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है। इसलिए इस बात का ध्यान रखना काफी आवश्यक है कि हम क्या खाते है, क्या पीते हैं क्योंकि हमारे स्वास्थ्य पर इनका भी बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

आज के समय में अशुद्ध पानी एक बड़ी समस्या बन गया जो परोक्ष रुप से स्वास्थ्य गुणवत्ता और सामाजिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रदूषण के कारण नदियों में विषैले तत्व, रसायन और बीमारी फैलाने वाले जीव मिल गये है। यह प्रदूषक अस्थमा और दूसरी ह्रदय संबंधी समस्याएं उत्पन्न करते है। इसके अलावा साफ-सफाई के कमीं के कारण संक्रामक रोगों का फैलाव भी पहले के अपेक्षा काफी बढ़ गया है।

निष्कर्ष

मानवीय गतिविधियों के प्रभाव से हमारे आस-पास का वातावरण काफी खराब हो गया है। जिसमें जलवायु परिवर्तन और दूसरे ऐसी कई सारी समस्याएं है, जो कार्बन उत्सर्जन के कारण उत्पन्न होती है। प्रदूषित वायु और जल ऐसी गंभीर समस्याएं है, जिनके लिये वैश्विक स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

इसके साथ ही हमें ऐसे तरीकों को खोजने की आवश्यकता है, जिनके द्वारा पृथ्वी पर से प्राकृतिक संसाधनों को खत्म होने से रोका जा सके। इसके लिए हमें नवकरणीय उर्जा स्त्रोतों जैसे कि सौर, जल और हाइड्रो ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा क्योंकि इनके द्वारा ही हम अपने सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।

इसके साथ ही हमें आर्थिक तरक्की और पर्यावरण सुरक्षा का एकीकरण करना होगा ताकि हम अपने सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर सके। इसके लिए किये गये कार्य काफी मात्रा में पर्यावरण गुणवत्ता में सुधार करने में सहायता करेंगे। इसलिए विश्व के लोगों के लिए यह काफी जरुरी है कि वह समाजिक और पारंपरिक तरीको का पालन करें, जिससे की विश्व भर के पर्यावरण को सुधारा जा सके।

विश्व भर में पर्यावरण में हो रही क्षति को रोकने के लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता है जिसके लिए हमें पुरानी परंपराओं को ध्यान में रखते हुए नव विकास का कार्य करने की आवश्यकता है। इस विषय की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें से कई सारे मुद्दों पर विश्व भर के देशों ने एकजुटता दिखाई है, जिससे वैश्विक पर्यावरण पर काफी अच्छा प्रभाव पड़ा है। इसी को लेकर एक पुरानी कहावत है कि “किसी वस्तु का पूर्ण रुप उसके हिस्सों से काफी अधिक होता है ” और यह कहावत पर्यावरण संरक्षण के विषय पर बिल्कुल ठीक बैठती है।