जल प्रदूषण को कैसे नियंत्रित करें

जल सभी जीवित प्राणियों के जीवन का आधार है। आधुनिक मानव सभ्यता के विकास के साथ, जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। औद्योगीकरण एवं शहरीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। गांवों के अंदर एवं आसपास तेजी से विभिन्न उद्योगों की स्थापना के साथ ही वे तेजी से कस्बों एवं शहरों में तब्दील होते जा रहे हैं जिससे जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन एवं प्रदूषण हो रहा है। शुरू में  जब विभिन्न प्रौद्योगिकियों का विकास नहीं हुआ था तो लोग प्रकृति की गोद में रहते हुए जीवन का आनंद लेते थे, लेकिन तेजी से हुए विकास एवं औद्योगीकरण के उद्भव के साथ ही जल प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।

शहरों में अत्यधिक आबादी होने के कारण बड़ी संख्या में फ्लैटों के निर्माण की प्रवृत्ति बढ़ रही है, ताकि ज्यादा से ज्यादा जनसंख्या को आवास उपलब्ध कराया जा सके क्योंकि एक फ्लैट में तीन से छह लोगों का परिवार आसानी से रह सकता है। हालांकि, इन फ्लैटों में पानी की आवश्यकता बहुत अधिक होती है और इस वजह से वहां भूमिगत जल भंडार पर दवाब बढ़ रहा है। वहां डीप बोरिंग निर्माण किया जा रहा है और भूमिगत जल का दोहन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। अनियंत्रित बोरिंग और तटीय क्षेत्रों में भूजल की अत्यधिक निकासी के फलस्वरूप खारा पानी बाहर निकल कर जमीन पर फैल सकता है जिससे जल की आपूर्ति भी प्रदूषित हो सकती है।

जल प्रदूषण को कम करने के तरीके / जल प्रदूषण को रोकने के लिए उठाए जा सकने वाले कदम

उद्योगों के अत्यधिक निर्माण से उनसे निकलने वाले दूषित जल, बचे हुए रसायनिक कचरे आदि को नालियों के रास्ते नदियों में बहा दिया जाता है। घरों में रहने वाले लोगों के दैनिक गतिविधियों द्वारा उत्पन्न अपशिष्टों को भी नदियों में प्रवाहित किया जा रहा है जिससे नदियों का जल अत्यधिक प्रदूषित होता जा रहा है। यदि हमें जल प्रदूषण को नियंत्रित करना है तो हमें इस समस्या का कोई-ना-कोई समाधान निकालना होगा और इसके लिए हमें कानून भी बनाने होंगे एवं साथ ही रणनीतिक चिंतन भी करना होगा।

जल प्रदूषण को कैसे नियंत्रित करें

जल प्रदूषण रोकने के लिए कानून

हमें जल प्रदूषण रोकने के सभी कानूनों का कड़ाई से पालन करना चाहिए

वैधानिक व्यवस्थाएँ, जैसे– जल अधनियम 1974; प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 जैसे कानून तो हैं लेकिन उन्हें प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं किया जा रहा है इसलिए हमें जल प्रदूषण के प्रभावी रोकथाम के लिए इन कानूनों को कड़ाई से लागू कराना होगा। जल उपकर अधिनियम 1977 एक अन्य महत्वपूर्ण कानून है जिसका उद्देश्य प्रदूषण कम करना एवं उसका प्रभावी रोकथाम करना है। हालांकि इस कानून का प्रभाव सीमित ही रहा है। कानूनों के अलावा जल प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों से जनता को परिचित कराना एवं उन्हें जागरूक किया जाना आवश्यक है ताकि जल प्रदूषण की समस्या का प्रभावी समाधान निकाला जा सके।

उद्योगों एवं औद्योगिक संस्थाओं को अधिक जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना होगा

कई उद्योग अपने अपशिष्टों को बिना शोधित किए हुए इधर-उधर फेंक देते हैं जो बारिश के पानी के माध्यम से बहते हुए नदियों में पहुंच जाते हैं। औद्योगिक कचरे द्वारा जल प्रदूषण न फैले इसके लिए इन अपशिष्टों का उचित निपटान आवश्यक है। कुछ उद्योग कचरे के निपटान संबंधी सभी नियमों का पालन करते हैं और वे औद्योगिक अपशिष्टों को या तो पूरी तरह नष्ट से नष्ट कर देते हैं या इसे सुरक्षित रूप से दुबारा उपयोग करते हैं।

इन नियमों के साथ-साथ उद्योगों के लिए यह भी आवश्यक है कि वे विनिर्माण कार्य द्वारा हो रहे जल प्रदूषण को रोकने के लिए अपने कार्य के तरीकों में परिवर्तन लाएं एवं सभी संबंधित मानदंडों का पालन करें। सभी उद्योग इन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं और उनमें से ज्यादातर कचरों को सीधा नदियों में प्रवाहित कर रहे हैं जो जल प्रदूषण से संबंधित एक खतरनाक परिदृष्य है। ये सभी अपशिष्ट अंततः मनुष्यों एवं जानवरों को प्रभावित करते हैं।

 

जहरीले कचरे का उचित निपटान

जहरीले कचरे के निपटान के सही तरीकों को अपनाना भी बेहद महत्वपूर्ण है। जिन फैक्ट्रियों में पेंट्स, साफ-सफाई और दाग मिटाने वाले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, वहां से निकलने वाले अपशिष्टों एवं पानी का सुरक्षित निपटान बेहद जरूरी है। कार या अन्य मशीनों से होने वाले तेल के रिसाव को भी पूरी तरह से रोकना होगा। कारों या मशीनों से हो रहा तेल का रिसाव भी जल प्रदूषण के प्रमुख कारकों में से एक है। इस वजह से कारों और मशीनों की देखभाल बेहद जरूरी है। काम पूरा होने के बाद, खासकर जिन फैक्टरियों और कारखानों में तेल का इस्तेमाल होता है, खराब तेल को साफ करना या सुरक्षित निपटान आवश्यक है।

नालियों की सफाई

जल प्रदूषण रोकने के लिए नालियों को नियमित रूप से साफ किया जाना आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की नालियों का निर्माण आवश्यक है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में पानी मनमाने ढ़ंग से इधर-उधर बहते हुए अंत में टनों के हिसाब से कचरा एवं प्रदूषक पदार्थ अपने साथ बहाकर नदियों एवं नहरों में ले जाते हैं। हमें नालियों को जल के स्रोतों से दूर रखने के लिए एक प्रौद्योगिकी विकसित करनी चाहिए।

जल का पुनर्चक्रण एवं पुनः उपयोग

जल प्रदूषण को रोकने के कुछ अन्य तरीकों में जल का पुनर्चक्रण एवं पुनः उपयोग भी सम्मिलित हैं और इनसे स्वच्छ एवं मीठे जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिलती है। कम गुणवत्ता वाले जल जैसे कि गंदे पानी को शोधित करने के पश्चात प्राप्त जल को हम उद्योगों मे, बर्तन धोने या बागवानी आदि कार्यों में इस्तेमाल कर सकते हैं और इस प्रकार हम स्वच्छ जल को इन कार्यों द्वारा दूषित होने से बचा लेते हैं। शोधित जल को हम वाहनों की धुलाई के कार्य में भी इसतेमाल कर सकते हैं। हमें स्वच्छ एवं मीठे जल का इस्तेमाल सिर्फ पीने के लिए करना चाहिए। वर्तमान में जल का पुनर्चक्रण सीमित परिमाण में ही किया जा रहा है। इसलिए हमें जल प्रदूषण को रोकने के लिए जल के उचित पुनर्चक्रण एवं पुनः प्रयोग पर अधिक जोर देना होगा।

मिट्टी के कटाव की रोकथाम

जल को प्रदूषित होने से बचाने के लिए मिट्टी का कटाव रोकना भी आवश्यक है। अगर हम मृदा संरक्षण करें तो कुछ हद तक जल प्रदूषण को रोक सकते हैं। हमें मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए और अधिक पेड़ पौधे लगाने होंगे। हमें इस तरह के तरीके अपनाने होंगे जिनसे मिट्टी का कटाव रुके एवं पर्यावरण के स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सके।

स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाएं

स्वच्छ भारत अभियान को पूरी समग्रता से लागू करने के लिए भारत को पूरी तरह से खुले में शौच से मुक्त बनाना आवश्यक है। वर्तमान में, सार्वजनिक स्थानों में कचरे को जहां-तहां फेंकना एवं खुले में शौच की समस्या बदस्तूर जारी है। जब बारिश होती है तो ये सभी अपशिष्ट एवं मलमूत्र नदियों या तालाबों में जा मिलते हैं और इस प्रकार जल के स्रोतों को प्रदूषित कर देते हैं। लोग खुद भी उचित जल निकासी की व्यवस्था के अभाव में नदियों एवं तालाबों में अपशिष्ट पदार्थों को प्रवाहित कर देते हैं।

तालाबों और नदियों का इस्तेमाल स्नान एवं कपड़े धोने के उद्देश्य से भी बड़े पैमाने पर होता है जिनकी वजह से गंदगी और प्रदूषण की बड़ी मात्रा जल के स्रोतो में जमा हो जाता है। ऐसी ही अन्य गतिविधियों की वजह से कचरा, मल-मूत्र, मृत शरीर, पुराने कपड़े और अन्य गंदी सामग्रियां तथा राख आदि नदियों में प्रवाहित हो जाते हैं। शहर में रिहाईशी क्षेत्रों के आस-पास स्थित झुग्गी-झोपड़ियों एवं बस्तियों में शौचालयों की कोई उचित व्यवस्था नहीं होती है और यह स्थिति हमें स्वच्छ भारत के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सच्ची भावना से प्रयास करने की आवश्यकता को दर्शाता है।

 

जलमार्गों एवं समुंद्र तटों की सफाई

नदियों एवं तालाबों की नियमित अंतराल से सफाई आवश्यक है क्योंकि मनुष्यों ने इन्हें बुरी तरह से गंदा कर दिया है। यहां तक कि भूजल को भी प्रदूषित कर दिया गया है और समुद्र के पानी में भी इंसान प्रदूषण फैला रहे हैं। समुद्री मार्गों से यात्राएं एवं समुद्र तट के पास रहने के लिए होड़ मची हुई है और इसी वजह से समुद्र तटों के पास कई छोटी एवं बड़ी बस्तियां बस चुकी हैं और ये बस्तियां समुद्र के पानी को प्रदूषित करने में अपना योगदान दे रही हैं जो गंभीर चिंता का विषय है। अपनी आजीविका के लिए भी कई लोग पर्यटकों को समुद्र तटों पर विभिन्न सामग्रियां बेच रहे हैं और पर्यटक अवशेषों को समुद्र तटों पर फेंक देते हैं और इस प्रकार समुद्र का पानी प्रदूषित हो गया है।

समुद्र के पास अस्थायी बस्तियों में सामान्य रूप से शौचालय मौजूद नहीं होता और ये लोग सीधा समुद्र तटों पर ही शौच करते हैं और साथ ही घरों का कचरा भी समुद्र में फेंक देते हैं। समुद्री जहाज भी समुद्र के पानी में अपना कचरा फेंक देते हैं। कभी कभी तो समुद्र में जहाजों की दुर्घटनाएं भी होती हैं जिसकी वजह से विभिन्न रासायनिक पदार्थ एवं तेल समुद्र के पानी में बह जाता है जो समुद्री जीवों के उपर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ते हैं।

समुद्र के जल में इस प्रकार फैले प्रदूषण की वजह से कुछ जीव-जंतु तो तुरंत मर जाते हैं और उनसे समुद्र का पानी और अधिक प्रदूषित हो जाता है। समुद्र के पानी में रहने वाले जीवों के साथ ही यह जल मनुष्यों को भी बीमार करता है। विकसित देश अपना ई-कचरा एवं अन्य जहरीला कचरा भी समुद्र में प्रवाहित कर देते हैं जिससे समुद्री जल बुरी तरह प्रदूषित हो जाता है।

प्रकृति के साथ सद्भाव से रहना आवश्यक

मनुष्य यह भूल गए हैं कि इस धरती पर उनका अस्तित्व प्रकृति और पर्यावरण की वजह से है। मानवीय लापरवाही पर्यावरण प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है। विभिन्न जलीय जीवों की प्रजातियां सिर्फ मनुष्यों द्वारा जल में स्नान किए जाने और उसे प्रदूषित करने की वजह से मर जाते हैं। घरेलू कचरे और औद्योगिक अपशिष्ट इस समस्या को और भी बढ़ा देते हैं। समय आ गया है कि हम जीवन की निरंतरता बनाए रखने वाले तरीकों के साथ जिएं।

जैविक खेती को अपनाने की आवश्यकता

किसानों को अपने खेतों में जबरदस्त फसल उपजाने के उद्देश्य से किए जा रहे विभिन्न रासायनिक उर्वरकों का उपयोग एवं फसलों पर कीटनाशकों के छिड़काव को रोकना होगा। ये सभी रासायनिक पदार्थ बारिश के पानी के माध्यम से तालाबों और नदियों में चले जाते हैं एवं जल निकायों को बुरी तरह से प्रदूषित कर देते हैं। किसानों को जैविक खेती के तरीकों को अपनाने की आवश्यकता है।

जल प्रदूषण को कैसे रोकें / हम जल प्रदूषण कैसे रोक सकते है?

जल प्रदूषण नियंत्रण के तरीकों पर एक नजर:

  • हमें जहरीले एवं अपशिष्ट पदार्थों को और नदियों एवं तालाबों में प्रवाहित करने से पहले उनका उपचार कर लेना चाहिए।
  • हमें पानी में पेट्रोलियम पदार्थों को मिलने से रोकना चाहिए।
  • कुछ शैवाल एवं पानी में उपजने वाले पौधे, जो पानी को साफ रखने में सहायक होते हैं, हमें पूरे भारत में इन पौधों को ज्यादा-से-ज्यादा उपजाना चाहिए।
  • शहरों एवं कस्बों में कचरा वर्गीकृत कूड़ेदानों के अनुसार ही फेंकना चाहिए ताकि जल को प्रदूषित होने से बचाया जा सके। प्राकृतिक तरीके से सड़ने वाले कूड़े का इस्तेमाल खेतों में खाद के रूप किया जा सकता है और इस तरह से ये फसलों के उत्पादन में मदद कर सकते हैं।
  • मृत शरीरों को नदियों में फेंका नहीं जाना चाहिए।
  • सभी शहरों और कस्बों मे सीवर की सुविधा होनी चाहिए।
  • पानी का न तो दुरुपयोग किया जाना चाहिए और न ही इसे बर्बाद किया जाना चाहिए।
  • हमें मलमूत्र और सीवेज के पानी को शहरों और कस्बों में बहने से रोकना चाहिए और उन्हें गड्ढों में प्रवाहित करना चाहिए। ऐसा करने से वे खाद में बदल जाते हैं जिनका इस्तेमाल खेती के कार्य मे किया जा सकता है।
  • हमें प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि जैविक रूप से इसे नष्ट नहीं किया जा सकता।
  • हमें वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा प्रदूषकों को उपयोगी वस्तुओं में बदलना चाहिए। अभी हाल ही में रुड़की स्थित सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने इस कार्य से संबंधित तकनीक का विकास करके एक अच्छा उदाहरण पेश किया है। इस संस्थान ने थर्मल विद्युत संयत्रों से निकलने वाले राख को सफलतापूर्वक ईंटों में बदलना शुरू किया है।
  • घरों में पानी रोगाणु मुक्त बनाने के लिए क्लोरीन की गोलियां, आयोडीन, आदि का इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही बाजार में कुछ अच्छी गुणवत्ता वाले जल शोधक मौजद हैं जो जल को छान कर जल की सफाई करते हैं, हमें इनका इस्तेमाल करना चाहिए।
  • नदियों एवं अन्य जल के स्रोतों में कचरे की डंपिंग पर रोक लगाया जाना चाहिए और इसके लिए उचित कदम उठाए जाने चाहिए।
  • कार्बनिक पदार्थों के निपटान से पहले उनका ऑक्सीकरण किया जाना चाहिए।
  • पानी में बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए इसमे ब्लीचिंग पाउडर या अन्य रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
  • हमें सार्वजनिक जल वितरण प्रणाली के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।
  • धार्मिक समारोह के दौरान मूर्तियों का विसर्जन केवल नियत जगह पर किया जाना है।
  • पानी की एक बूंद भी बर्बाद करने से हमें बचना चाहिए।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, समुद्रों में परमाणु परीक्षण पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
  • जल प्रदूषण के खतरे के बारे में समाज को जागरूक बनाया जाना चाहिए।
  • प्रदूषकों को उपचार के द्वारा गैर विषैले पदार्थों में परिवर्तित किया जा सकता है।
  • तालाबों में रेडियोधर्मी कचरों को ऑक्सीकरण की पद्धति द्वारा हटाया जा सकता है।
  • हमें बड़े तालाबों से बचना चाहिए क्योंकि वहां जैविक पोषक तत्वों के साथ सूरज की रोशनी संयुक्त रूप से बैक्टीरिया का निर्माण करती है जो अपशिष्ट पदार्थों को बढ़ाते हैं।
  • प्रदूषित पानी को उर्वरक बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि उनमें फास्फोरस, पोटेशियम और नाइट्रोजन अधिक मात्रा में होता है।
  • हमें अधिक से अधिक मल उपचार संयंत्र (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) लगाने चाहिए क्योकि ये प्रदूषित जल को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • हमें ऐसे कानूनों को सुनिश्चित एवं लागू करना चाहिए जो उद्योगों के कचरे को बिना उपचार किए हुए नदियों और समुद्रों में बहाने से प्रतिबंधित करें।
  • हमें पानी में जलकुंभी लगाना चाहिए जो प्रदूषित जल के उपचार के लिए जाने जाते हैं। ये जैविक एवं रासायनिक कचरों को साफ करने के साथ ही भारी धातुओं को भी पानी से बाहर निकाल देते हैं।