जलवायु परिवर्तन का असर और प्रभाव

जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग एक वैश्विक समस्या है। जलवायु में तेजी से बदलाव दुनिया भर में चिंता का एक प्रमुख कारण बन गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्राकृतिक चक्र के माध्यम से जलवायु में बदलाव आते हैं लेकिन मनुष्यों की गतिविधियों ने पर्यावरण को व्यापक नुकसान पहुंचाया है। खैर इसे सरल शब्दों में कहें तो ग्रीनहाउस गैसें जीवन के अस्तित्व के लिए पूरे विश्व में सूर्य की गर्मी फैलाने के लिए पर्यावरण में मौजूद रहती हैं। ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव के कारण पृथ्वी का वातावरण सूरज से ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा अवशोषित करता है। हालांकि मानवीय गतिविधियां इन गैसों की मात्रा बढ़ा रही हैं विशेष रूप से पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड सुरक्षात्मक ग्रीनहाउस परत को नुकसान पहुंचा रही है जिससे ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन की समस्या हो गई है।

औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से औसत वैश्विक तापमान में 0.8 डिग्री की वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के तेजी से बदलते माहौल पर चिंता व्यक्त की है। इसलिए वे इस मुद्दे पर लगातार चेतावनी देकर खतरे की घंटी को बजा रहे हैं।

पृथ्वी ग्रह पर जलवायु परिवर्तन के कई कारण और प्रभाव हैं जिनमें से कुछ नीचे सूचीबद्ध हैं:

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, असर और परिणाम (Impacts and Effects of Climate Change in Hindi)

जलवायु परिवर्तन का असर और प्रभाव

  1. जलवायु पैटर्न में बदलाव

औद्योगिक और वाहन उत्सर्जन जैसी गतिविधियों के माध्यम से हवा में रसायनों और जहरीली गैसों को छोड़ कर मानव द्वारा जलवायु को प्रभावित किया जा रहा है।

कोयला, पेट्रोल और प्राकृतिक गैस का उपयोग ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के प्रमुख कारण हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड और ओजोन गैस जैसी ग्रीनहाउस गैसों का पर्यावरण में उत्सर्जन हुआ जिसके परिणामस्वरूप फैक्ट्रियों में बड़ी मशीन चलाने के लिए मनुष्यों द्वारा इन जीवाश्म ईंधन को बड़ी मात्रा में जलाया गया।

पशुपालन जैसे गायों, सूअरों और मुर्गियों की संख्या में बढ़ोतरी भी जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है क्योंकि इन गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों का बड़ी मात्रा में उत्सर्जन होता है। इन गैसों ने न केवल तापमान बढ़ाया है बल्कि जलवायु चक्र को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।

यह स्पष्ट है कि जलवायु दुनिया में तेजी से बदल रही है। बारिश चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। बड़े पैमाने पर वनों की कटाई के चलते बारिश चक्र में गड़बड़ी की घटनाएं बढ़ रही हैं जो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है। दुनिया की बढ़ती आबादी के साथ वाहनों की संख्या में वृद्धि हो रही है और औद्योगिकीकरण की बढ़ती गति से जलवायु चक्र अनियमित हो रहा है जिसके परिणामस्वरूप सूखा, अत्यधिक वर्षा, बाढ़, चक्रवात आदि समस्या उत्पन्न हो रही है। साथ ही दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गर्मी के मौसम में ठंडी या गर्म हवा चलती है और कुछ देशों में पूरी तरह सूखा भी पड़ रहा है।

  1. ग्रीन कवर का नुकसान

वन हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वे पर्यावरण पर ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं और इस प्रकार पृथ्वी को अपने मौसम चक्र को बनाए रखने में मदद करते हैं। मनुष्य द्वारा औद्योगिकीकरण के नाम पर जंगलों का अंधाधुंध कटाई पृथ्वी के पर्यावरण और इसकी जलवायु के लिए बड़ा ख़तरा रही है। वनों की कटाई से वृक्षों की संख्या कम होने के कारण कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित होने और बदले में हमें श्वास लेने के लिए ऑक्सीजन देने के बाद पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा काफी बढ़ रही है।

दुनिया के कुछ हिस्सों में स्लैश और जलाने वाली खेती बड़े पैमाने पर फैली हैं। इस प्रक्रिया में किसान बड़े पैमाने पर पेड़ों को काट देते हैं और खेती के लिए उपजाऊ जमीन मिलाने हेतु जला देते हैं। जंगलों में लकड़ी काटने और बेचने वाले भी सक्रिय हैं। वे लकड़ी से पेपर उद्योग की अवैध रूप से आपूर्ति करने के लिए पूरे विश्व के जंगलों में अनगिनत पेड़ों को काट देते हैं। शहरी बस्तियों के लिए भूमि की बढ़ती आवश्यकता एक और कारण है जो वनों की कटाई को बढ़ावा दे रहा है।

खेती की जमीन में वृद्धि के साथ ही साथ तेजी से बढ़ती आबादी का निपटान करने के लिए मनुष्यों द्वारा वनों के अकारण काटने या जलाए जाने से जलवायु परिवर्तन पूरी तरह बदल गया है। इन गतिविधियों से वर्षा चक्र की अनियमितता और दुनिया के कुछ स्थानों में तापमान में भारी वृद्धि या गिरावट देखने को मिली है। नतीजतन आज हम सबसे खराब जलवायु परिवर्तन की स्थिति का सामना कर रहे हैं।

 

  1. सागर जल स्तर में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप समुद्र जल स्तर में वृद्धि हुई है। ग्लेशियरों के पिघलने के कारण महासागर गर्म हो रहे हैं। महासागरों का जल स्तर खतरनाक अनुपात से बढ़ रहा है जो तटीय इलाकों के व्यापक तबाही का कारण बन सकता है। भूमि में पानी का खत्म होना, बाढ़, मिट्टी का क्षरण, खारा पानी आदि दुष्प्रभाव जमीन को तबाह कर देता है। यह तटीय जीवन को तबाह कर खेती, पीने के पानी, मत्स्य पालन और मानव आवास को हानि पहुंचाएगा। ध्रुवीय ग्लेशियर पिघलने से समुद्र के स्तर में भी वृद्धि होगी। लगातार तूफान और टॉर्नेडो पहले ही ऐसे संकेत के रूप में उभरे हैं।

  1. प्राकृतिक संसाधनों की कमी

जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक संपदा पर नुकसान पहुंचा है। यह ग्लेशियर, प्रवाल भित्तियों, वनस्पति (मैंग्रोव), आर्कटिक और अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र, बोरियल वन, उष्णकटिबंधीय वन, प्रेयरी झीलों और घास के मैदानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।

  1. संकट में खेती

जलवायु परिवर्तन का कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, अधिक देशों में जहां कृषि उत्पादन वर्षा पर निर्भर है। तापमान में वृद्धि रोगों को जन्म देती है जो मनुष्य और कृषि दोनों के लिए विनाशकारी होती है। अनुमान है कि 2100 तक फसलों की उत्पादकता 10-40 प्रतिशत कम हो जाएगी। सूखा और बाढ़ में वृद्धि से फसलों के उत्पादन में अनिश्चितता आएगी। बारिश से पीड़ित क्षेत्रों की फसलों को अधिक नुकसान होगा क्योंकि सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम हो जाएगी।

  1. जैव-विविधता को ख़तरा

तापमान में वृद्धि पशुओं के दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है। अनुमान है कि तापमान में वृद्धि के कारण 2020 तक दूध उत्पादन 16 मिलियन टन तक और 2050 तक 15 मिलियन टन तक गिर सकता है। मिश्रित नस्लों की प्रजातियां गर्मी के प्रति कम सहिष्णु हैं। इसलिए उनकी प्रजनन क्षमता दूध उत्पादन को प्रभावित करेगी जबकि स्वदेशी नस्लों में जलवायु परिवर्तन का असर कम दिखाई देगा। यदि जलवायु परिवर्तन की घटना को नियंत्रित नहीं किया गया तो कई प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं और क़यामत का कारण बन सकती हैं।

  1. दांव पर स्वास्थ्य

हवा में नकारात्मक परिवर्तन बैक्टीरिया, फंगस और हवा में पैदा कीटों के बढ़ने का कारण बनती है। उन्हें नियंत्रित करने के लिए अधिक मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है जो कि हृदय, फेफड़े और यकृत की बीमारियों, निर्जलीकरण, संक्रामक रोगों, कुपोषण आदि मनुष्यों और जानवरों में विभिन्न बीमारियों को जन्म देती है।

 

  1. बढ़ते प्राकृतिक वनों की कटाई

ग्लोबल वार्मिंग के कारण प्राकृतिक वनों की कटाई की गति बढ़ने से अक्सर जंगल की आग, सूखा, उष्णकटिबंधीय तूफान और ज्वालामुखीय गतिविधियों के रूप में इसका प्रतिबिंब दिखाई दे रहा है। ये घटनाएं प्राकृतिक वनों को तबाह कर देती हैं। विशेष रूप से तूफानों ने वर्षावन को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उनकी भरपाई सदियों में होनी संभव है।

  1. विकासशील देशों पर प्रभाव

यह संभव है कि गरीब और विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन की आशंका को सहन करना होगा। इसका कारण यह है कि इन देशों और लोगों के पास जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए क्षमता और संसाधन नहीं हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर उन गरीब देशों पर होगा जो समुद्र के बढ़ते स्तर से खुद को सुरक्षित रखने में अपेक्षाकृत कम सक्षम हैं। एशिया, अफ्रीका और प्रशांत महासागर के विकासशील देशों में विशेष रूप से बीमारियों के प्रसार का खतरा है। इससे उनके कृषि उत्पादन में कमी आ सकती है। वास्तव में विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के सभी स्तरों पर बहुत अधिक नुकसान भुगतना पड़ेगा।

  1. महासागर धाराओं में अशांति

महासागर को जलवायु तंत्र के एक प्रमुख घटक के रूप में माना जाता है। महासागर मौसम के पैटर्न में भारी परिवर्तन लाने में विशेष भूमिका निभाते हैं और विशेष रूप से वे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि करते हैं क्योंकि वे सूरज की गर्मी की मात्रा को बनाए रखते हैं। सूरज के माध्यम से जारी होने वाली भारी मात्रा में गर्मी को सोखने की क्षमता के साथ महासागरों ने पृथ्वी के पर्यावरण में वायु हलचल के दौरान गर्मी की उच्च मात्रा को बनाए रखा है। इस घटना ने किसी विशेष स्थान के प्राकृतिक मौसम चक्र को भी प्रभावित किया है जो जलवायु में अचानक परिवर्तन के सबसे खराब परिणाम का सामना करने के लिए उस क्षेत्र को मजबूर कर रहा है।

सागर धाराएं वैश्विक थर्मोहाइन परिसंचरण (THC) प्रणाली को चलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं जो सतह की हीटिंग, कूलिंग, डाउनवेलिंग और अपवेलिंग प्रणाली का निर्माण करती है। पूरी प्रणाली अपने आप दोहराती रहती है। ग्लोबल वार्मिंग इस प्राकृतिक चक्र को परेशान करने वाला सबसे बड़ा दानव के रूप में उभरा है जो जलवायु में परिवर्तन लाता है। पृथ्वी के ध्रुवों पर बर्फ की चादरों के तेजी से पिघलने से महासागरों में ताजे पानी की मात्रा बढ़ रही है। महासागरों की सतह पर ताजा पानी हल्का तैरता है और महासागरों के मौसम परिसंचरण प्रणाली में बाधा के रूप में कार्य करता है जो हवा के प्रवाह के माध्यम से निर्धारित होता है, जो समुद्र के प्रवाहों द्वारा संचालित होता है।

  1. जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभाव

ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फ की चादरें पिघल रही हैं। जब तक इसे रोका नहीं जाता है तब तक आने वाले दशकों में गर्मी का उत्सर्जन ग्रीनलैंड की बर्फ की परतों को पिघला सकता है जो अगले कुछ शताब्दियों में समुद्र के स्तर को 7 मीटर तक बढ़ा देगा। अंटार्कटिका के विभिन्न हिस्सों में बर्फ पिघलने के नए प्रमाण का मतलब है कि यह पिघलने के माध्यम से तबाही के जोखिम का सामना कर रहा है।

यूरोप में अटलांटिक खाड़ी स्ट्रीम के धीमे होने, स्थान परिवर्तन या बंद होने से नाटकीय प्रभाव पड़ा है। यह महासागरों की वैश्विक परिसंचरण प्रणाली को भी बाधित कर रहा है। मीथेन के महासागरों की खतरनाक उत्पत्ति वातावरण में तेजी से मीथेन को बढ़ाने में एक प्रमुख भूमिका निभा रही है।

निष्कर्ष

हमने देखा है कि बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, कोयला पर आधारित बिजली उत्पादन, प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव, वाहन उत्सर्जन, कोयला खनन, मनुष्य के जीवन शैली में परिवर्तन, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, कार आदि का अंधाधुंध उपयोग (आधुनिक कृषि में रासायनिक उर्वरक के उपयोग के अलावा) वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उच्च उत्सर्जन के लिए कुछ प्रमुख जिम्मेदार कारक हैं। दुनिया के तापमान में वृद्धि के कारण ध्रुवीय क्षेत्र धीरे-धीरे पिघल रहा है और महासागरों का जल स्तर बढ़ रहा है इससे तटीय देशों और बस्तियों को डूबने का ख़तरा उत्पन्न हो सकता है जिससे जान-माल का भारी नुकसान होगा।

कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग मानव समाज के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। आज तक मनुष्य इस तरह के बड़े पर्यावरण संकट का सामना करने के लिए मजबूर नहीं हुआ। अगर हम 'ग्लोबल वार्मिंग’ को रोकने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाते हैं, तो हम पृथ्वी पर जीवन को बचाने में सक्षम नहीं होंगे।