ग्राउंड वाटर डिप्लीशन: अर्थ, कारण, प्रभाव, रोकथाम और समाधान

Groundwater Depletion in Hindi

भूजल वह जल है जो बारिश और अन्य स्रोतों के कारण भूमि में अवशोषित होता है और जमा हो जाता है। यह देश में खाद्य सुरक्षा और कृषि स्थिरता को सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 1970 के दशक में हरित क्रांति के शुरुआत से भूजल के उपयोग में काफी वृद्धि देखी गयी, जो अब तक जारी है तथा बढ़ती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप लंबी अवधि में जल स्तर, कुओं और अन्य सिंचाई स्रोतों में कमी और गिरावट आयी है। इसके अलावा, जल स्रोतों के प्रदूषण के कारण भूजल अब पीने योग्य नहीं रह गया है।

आंकड़े बताते हैं कि औसतन, भूजल स्तर हर साल एक मीटर से घट रहा है। इससे पहले, पानी जमीन के 30 मीटर के भीतर पाया गया था, लेकिन अब स्थिति ऐसी है कि कई क्षेत्रों में पानी जमीन के 60 से 70 मीटर नीचे उपलब्ध है।

भूजल स्तर में निरंतर गिरावट के बावजूद, देश में जल के संरक्षण के लिए  कोई उचित व्यवस्था विकसित नहीं हुई है। हर साल अरबों घन मीटर वर्षा का जल बर्बाद हो जाता है। भूजल विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में पानी का तेजी से उपयोग किया जा रहा है, जिसके कारण आने वाले सालों में भूजल का स्तर और नीचे चला जाएगा।

भारत में पानी की उपलब्धता (Availability of Water in India)

बिना पानी के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। जल के दूषित हो जाने के कारण भारत में स्वच्छ और पर्याप्त पानी अभी भी उपलब्ध नहीं है। भारत को प्रमुख या मध्य नदियों से 90 प्रतिशत पानी मिलता है। इसमें 14 प्रमुख नदियां हैं जिनमें 20,000 वर्ग किलोमीटर या उससे अधिक जलग्रह क्षेत्र है; जबकि 2000-20,000 वर्ग किमी के बीच समुद्र तट के साथ 44 मध्य नदियां हैं, फिर 2000 वर्ग किलोमीटर के जलग्रह क्षेत्र के साथ 53 छोटी-छोटी नदियां हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, 2001 में देश के प्रति व्यक्ति पर पानी की उपलब्धता 1816 घन मीटर से घटकर 1545 घन मीटर रह गई है, वर्तमान में, यह स्थिति और भी चिंताजनक है। वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि 2050 तक प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में 30 प्रतिशत की कमी आ जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) शहरी क्षेत्रों में प्रति दिन प्रति व्यक्ति 200 लीटर पानी की उपलब्धता की सिफारिश की है, इसके विपरीत, देश में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति को 140 लीटर पानी उपलब्ध कराया जाता है।

भारत में जल संसाधन मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर करता हैं तथा प्रतिवर्ष ये बारिश से 4000 बीसीएम (अरब घन मीटर) की औसत वर्षा प्राप्ती होती है, लेकिन इसमें से अधिकांश जल वाष्पीकृत हो जाता हैं और कुछ नालियों में चले जाते है। आंकड़े बताते हैं कि संग्रहण प्रक्रिया की कमी, पर्याप्त आधारभूत संरचना की कमी आदि के प्रबंधन ने ऐसी स्थिति बनाई है। जिससे पानी का केवल 18-20% ही उपयोग हो पाता है तथा शेष केवल भूजल की कमी की समस्या को बढ़ाते हुए बेकार हो जाता है।

भूजल की कमी के कारण (Causes of Groundwater Depletion)

  • सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि

हमारी देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। कृषि, देश के सकल घरेलू उत्पाद में 40 प्रतिशत योगदान देता है और यह कुल निर्यात आय का 60 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलावा, देश की 60 प्रतिशत आबादी कृषि और उससे संबंधित काम से जुड़े हुये है। जल संकट के प्रमुख कारणों में से एक कारण यह भी है, कि देश में संचित भूमि क्षेत्रों में वृद्धि हुई है तथा भूजल का स्तर घट गया है। वर्तमान में, सकल सिंचाई फसल के लिए भारत में 82.6 मिलियन हेक्टेयर (215.6 मिलियन एकड़) के क्षेत्र है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती जाती है, तालाबों की जल संग्रहण क्षमता कम होती जाती है वहीं, जमीन के स्तर पर पानी की कमी होने के कारण कुएं और तालाब सूख जाते हैं।

  • पानी का अत्यधिक उपयोग

भूजल के अनियंत्रित उपयोग ने स्थिति को और भी खतरनाक बना दिया है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए गहरे कुएं और ट्यूबवेल द्वारा भूजल का निरंतर शोषण किया जा रहा है, जिससे भूजल का स्तर लगातार घटता चला जा रहा है। वास्तव में, जमीन में जो भी मात्रा में पानी संग्रहण होता है, उससे भी अधिक उपयोग को लिए निकाल लिया जाता है।

जमीन से पानी निकालने के वजह से , भूजल स्तर का स्तर कम होता जा रहा है। ट्यूबवेल और बोरवेल के लिए अंधाधुंध खोदाई करना, भूजल के स्तर को और कम कर देता है, जिससे छोटे कुएं जो ज्यादा गहरे नहीं होते, वो  सूख जाते हैं।

  • घटते जंगल

पेड़, बारिश के बुदों को एकत्रित किये रहते हैं, जिससे यह धीरे-धीरे जमीन पर गिरता है और भूजल के स्तर को तेजी से बढ़ाने मे सहायता प्रदान करता है। जिस तरह से जंगलों को पृथ्वी पर से नष्ट किया जा रहा है, उसके कारण भूजल की कमी की समस्या और भी गंभीरता से बढ़ती जा रही है। ऐसा माना जाता है कि पिछले 150 वर्षों से, ग्रीस के क्षेत्र के बराबर वन हर साल पृथ्वी से गायब होते जा रहे है, वहीं इस नुकसान की भरपाई करने के लिए लगाए गए ढ़ेर सारे पेड़ अपर्याप्त हैं। अनुमान लगाया गया है कि दुनिया भर में हर साल 13 मिलियन हेक्टेयर वन नष्ट होते जा रहे हैं।

 

  • पिघलते हिमनद

हिमनदों के पिघलने के कारण भारत में वर्षा चक्र बढ़ गया है। 1817 के बाद से गंगोत्री ग्लेशियर पिघलकर अपने मूल स्थान से 3 किलोमीटर से अधिक खिसक गई है; 21 वीं शताब्दी के अंत तक इसके औऱ ज्यादे पिघलने की आशंका है। केदारनाथ धाम के लगभग 7 किमी पीछे स्थित चोरवाडी ग्लेशियर भी पिघल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर प्रति वर्ष 131.4 वर्ग किलोमीटर (50 वर्ग मील) की औसत दर से पिघल रहे हैं, जिससे ये नेपाल, भारत और चीन की कई नदियों के अस्तित्व को संकट में ड़ाल सकती है। ग्लेशियर के पिघलने पर शुरुआत में यह अपने नदियों में ज्यादे मात्रा में जल प्रवाहित करते हैं परन्तु इसके बाद वह सामान्य रुप से जल प्रवाह नही कर पाते है और बहुत कम मात्रा में जल नदियो में मिलाते है, मौसम चक्र में गिरावट के कारण जल संसाधनों पर दबाव बढ़ाता जा रहा है औऱ पानी का स्तर घटता जा रहा हैं।

  • ग्लोबल वॉर्मिंग

पर्यावरण तंत्र को सामान्य बनाए रखने में भूजल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण, क्षितिज पर जलवायु परिवर्तन का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिससे 2050 तक भूख, पानी और बीमारी के कारण दुनिया की आधी आबादी नष्ट हो जाने का संकट भी संसार पे मंडरा रहा है। जलवायु परिवर्तन जल को लेकर चिता को और बढ़ा देता है, क्योकि इससे वैश्विक स्तर पर कृषि के लिए उपयोग होने वाले भूजल में कमी होती जा रही है।

  • सब्सिडी की राजनीति

सब्सिडी की राजनीति ने भूजल के दोहन को बहुत तेजी से बढ़ावा दिया है को कम किया है जिसके कारण भूजल के स्तर में काफी कमी आई है। सस्ती और सब्सिडी प्राप्त बिजली के कारण किसानो को सिचाई के लिये बेरोक भूजल के उपयोग की आदत पड़ गई, जिसमें लोकलुभावनवाद की राजनीति का बड़ा योगदान है।

  • कृषि की गलत पद्धतियां

ग्रामीण भारत में खेती के लिये अपनाये जाने वाली गलत कृषि पद्धतिया भी पानी के कमी कारण है। जैसे की कम पानी के कमी वाले क्षेत्रो में अधिक पानी के खपत वाले धान, कपास, गन्ना आदि फसल लगाना भी भूजल की समस्या को बढ़ाते है।

भूजल दोहन के परिणाम और प्रभाव (Consequences and Effects of Groundwater Depletion)

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आधे से ज्यादा भूजल दूषित हो चुका हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि कम से कम 276 जिलों में फ्लोराइड, 387 जिलों में नाइट्रेट, 86 जिलों में आर्सेनिक की मात्रा उच्च स्तर पर पहुँच चुकी है। खराब पर्यावरणीय प्रबंधन व्यवस्था की वजह से विषाक्त पानी के सतह और भूजल स्थित पानी में मिल जाने के कारण हमारे घरेलू और कृषि में उपयोग होने वाले कई जल स्त्रोत दूषित हो चुके है।

 

भूजल के अत्यधिक के उपयोग के कारण, पृथ्वी के गर्भ में मौजूद रसायन सतह पर आ जाते हैं। भूमिगत तालाबों के निचले हिस्से में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे विषाक्त पदार्थ निष्क्रिय रुप से फैले होते हैं। गहरे ट्यूबवेल्स खोदने पर पर ये रसायन ऊपर आ जाते हैं और हमारे पीने के पानी में मिल जाते है औऱ कई प्रकार की बीमारिया पैदा करते हैं। मिसाल के तौर पर, गुजरात के समुद्र तटीय स्थानो पर गहरे कुए खोदने से उनमें समुद्र का पानी में मिल गया, जिससे वह पानी पीने के साथ-साथ सिचाई के योग्य भी नही रह गया।

  • नदियों का सूखना

पानी का अत्यधिक उपयोग करने से धीरे-धीरे प्रमुख नदियाँ सूख रही हैं। इससे पहले, यमुना का पानी हर साल बढ़ कर दिल्ली तक पहुंच जाता था, पर अब हरियाणा और उत्तर प्रदेश की नदियों के पास गहरी ट्यूब बेल के खुदाई कर देने के कारण, अब यह पानी दिल्ली तक नही पहुच पाता है। हैथिनिकुंड बैराज से पानी छोड़ने के बाद, पानी 20-25 किमी तक मिट्टी द्वारा पूरी तरह से सोख लिया जाता है, जोकि इसके प्रवाह को काफी प्रभावित करता है।

  • जीवित जीवो पर प्रभाव

प्रदुषण के कारण यमुना का जल दुषित हो गया है, जिससे जल में रहने वाले जीव जैसे मछलियां, कछुए आदि खत्म होते जा रहे हैं, इसके अलावा तीर्थयात्रीयों को स्नान के लिए स्वच्छ जल नहीं मिल पा रहा तथा नदी के किनारे लगे पेड़ सुखते जा रहे हैं।

  • भूजल के स्तर में लगातार गिरावट

देश के प्रमुख राज्यों में भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है। वहीं पहाड़ो को भी तीव्र जल बहाव का सामना करना पड़ रहा है। जल निकाय सूखने तथा पानी का स्तर गिरने के कारण केंद्रीय जल बोर्ड का कहना है कि वह दिन अब दूर नहीं जब हमें पानी आयात करना पड़ेगा।

पहाड़ी इलाकों में, उत्तराखंड के उधम सिंह नगर में 40% तथा रुद्रपुर, हरिद्वार और देहरादून जैसे कई राज्यों में जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई हैं। मैदानी और निचले इलाकों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। ये सब प्रवास के प्रमुख कारण बन जाते है, जिन लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश में मीलों दूर जाना पड़ता है, वे लोग अपने गांव छोड़ने या भूजल संसाधनों पर और दबाव बढ़ाने के लिए मजबूर हो जाते है।

भूमिगत जल की कमी के रोकथाम और समाधान (Prevention and Solutions of Groundwater Depletion)

  • पानी उपयोग करने की सीमा का निर्धारण

भूजल के अत्यधिक उपयोग को कम करने के लिए, प्रत्येक क्षेत्र में पानी के लिये खुदाई की अधिकतम गहराई निर्धारित की जानी चाहिए, जिसमे 400 फीट तक खुदाई की अनुमति हो। इससे पहले, गहरे ट्यूबवेल्स को भरना चाहिए, ताकि पानी को केवल 400 फीट तक ही निकाला जा सके और पानी का स्तर इससे नीचे ना गिर सकें।

  • फसल उत्पादन के तरीके में बदलाव के द्वारा

भूजल फसल चक्र के निर्धारण के द्वारा संरक्षित किया जा सकता है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में, कम पानी के खपत वाली फसलों को उगाया जाना चाहिए वहीं अधिक पानी वाले क्षेत्रों में, ज्यादा पानी की खपत वाली फसलों की खेती की जानी चाहिए। प्रत्येक क्षेत्र में पानी की उपलब्धता के अनुसार फसल उगाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

  • जल संसाधनों का संरक्षण और संवर्धन

इसके अलावा, प्रत्येक राज्य में भूजल केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए। भूजल के अवैध उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। किसी भी जानकारी के बिना व्यक्तिगत उपयोग के लिए जमीन के भीतरी पानी का उपयोग करने से भविष्य में समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पानी की आवश्यकता पीने के साथ-साथ सिंचाई, उद्योग, बिजली उत्पादन आदि कार्यो के लिए किया जाता है, इसलिए उपलब्ध जल संसाधनों के उचित उपयोग, उनकी सुरक्षा और संवर्धन अति महत्वपूर्ण है।

  • नदी के धारा में बदलाव

दुनिया के कई देशों में, नदीयों की धाराओं में बदलाव करके पानी की समस्या को हल किया गया है, भारत में इस दिशा में अनेक कार्य किये गये है। तमिलनाडु के पूर्वी हिस्सों में, पानी के धाराओं को पेरियार की ओर तथा यमुना के जल को पश्चिम दिशा और सिंधु नदी के जल को राजस्थान की  ओर मोड़ दिया गया है, राष्ट्रीय स्तर पर हमें इस दिशा की ओर ठोस कदम उठाने की आवश्यक्ता है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय नदी परियोजना की स्थापना की है, जिसका लक्ष्य सभी प्रमुख नदियों को एक साथ जोड़ना है ताकि सभी क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके परन्तु इस योजना के लागू होने से पहले इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है।

  • जलाशयों का निर्माण

नए जलाशयों के निर्माण के साथ पुराने जलाशयों को गहरा बनाने की जरूरत है तथा नए ट्यूबवेल्स के बोरिंग तथा जगह के चयन करने से पहले, हमें भूगर्भिकों और इंजीनियरों के साथ समन्वय करने की आवश्यकता है।

  • वृक्षारोपण करना

जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने के लिये कुछ महात्वपूर्ण कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। जिसके लिये व्यापक तौर से वृक्षारोपण की आवश्यकता है।

  • जागरूकता अभियान के द्वारा

जल संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर कई योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन लोगों के बीच जागरूकता की कमी और सरकारो द्वारा लापरवाही के कारण, योजनाएं अब तक वांछित लक्ष्य हासिल करने में असफल रही हैं।

  • भूजल का संग्रहण कैसे किया जा सकता है?

बरसात के दिनों में अत्यधिक वर्षा होती हैं, इन्हें छोटे जलाशयों और बांधों में एकत्रित किया जा सकता है, भविष्य में इस पानी का उपयोग सिंचाई और बिजली के उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। बारिश के पानी का संरक्षण और संग्रहण न केवल लगातार गिरने वाले भूजल के स्तर के मामले में महत्वपूर्ण है बल्कि यह पानी की कमी को भी दूर कर सकता है, घरों और सार्वजनिक स्थानों से लेकर तालाबों और कुओं जैसे प्राकृतिक स्रोतों के माध्यम से वर्षा जल संरक्षण की प्रक्रिया को अपनाया जाता है। इसके लिए, सबसे पहले, उन क्षेत्रों की सूची तैयार की जानी चाहिए जहां गर्मियों के मौसम में भूजल का स्तर कम हो जाता है जिसके कारण कुएं तथा तलाब सूख जाते है। ऐसे क्षेत्रों में, बड़े जलाशयों का निर्माण करके, भूजल की कमी की समस्या को कम किया जा सकता है और सिंचाई के लिए पानी के रुप में उपयोग किया जा सकता है।

निष्कर्ष

हमारे भविष्य के लिये पानी सबसे ज्यादे आवश्यक है और यदि हम भूजल के स्रोतों की  उपलब्धता को सुनिश्चित नहीं कर पाये, तो हम कभी भी निश्चित रुप से यह नहीं कह पायेगें कि भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्याप्त पानी बचाया जा सकेगा या नहीं। उपर दिये गये कुछ उपायो द्वारा हम समाज की भागेदारी से हम लोगो में जागरुकता लाकर जल प्रदूषण को कम कर सकते है। इसके साथ ही भू जल की सुरक्षा के लिये झरनो को पहाड़ी इलाको में सुरक्षित करने के अलावा अंधाधुंध रुप से बन रहे बोरवेलो पे भी लगाम लगाये जाने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में हमे अपनी कृषि जरूरतों के साथ ही जलवायु परिवर्तन के समस्या को ध्यान में रखते हुए, भूजल प्रबंधन के उपयों को अपनाना होगा।