लॉस ऑफ़ बायोडायवर्सिटी: अर्थ, कारण, प्रभाव और समाधान

जैव विविधता के प्रभावों और हानि की गहराई को देखने से पहले, आइए पहले हम जैव विविधता के अर्थ को समझते है।

जैव विविधता का अर्थ (Meaning of Biodiversity in Hindi)

(जैव विविधता क्या है?)

जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन की विविधता और परिवर्तनशीलता को संदर्भित करती है। इसमें पृथ्वी के अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र जैसे पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव और अन्य जैसे कोरल रीफ, घास के मैदान, टुंड्रा, ध्रुवीय बर्फ कैप्स, रेगिस्तान और वर्षावन आदि की अनगिनत संख्याओं का समावेश है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, जैव विविधता में भिन्नता को आमतौर पर आनुवांशिक, प्रजातीय और पारिस्थितिकी तंत्र जैसे तीन स्तरों पर मापा जाता है। जैव विविधता पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं है, और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रो में सबसे अधिक संपन्न है। उष्णकटिबंधीय वन पारिस्थितिकी तंत्र दुनिया भर के प्रजातियों का लगभग 90 प्रतिशत और पृथ्वी की सतह का लगभग 10 प्रतिशत भाग नियंत्रित करती हैं।

समुद्र की जैव विविधता उच्च समुद्र सतह के तापमान वाले क्षेत्रों में सबसे अधिक है। जैसे की महासागरों के मध्य-अक्षांश बैंड और पश्चिमी प्रशांत तटों के क्षेत्र आदि। जैव विविधता आमतौर पर गर्म स्थानों में समुह बनाती है और समय के साथ लगातार बढ़ती रहती है, लेकिन संभवतः आगे चल कर ये धीमी हो जाती है।

जैव विविधता का महत्व (Importance of Biodiversity)

जैव विविधता वास्तव में पृथ्वी की सुरक्षा के लिए अति आवश्यक है। एक अच्छे पारिस्थितिक तंत्र और समृद्ध जैव विविधता का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है। पारिस्थितिकी तंत्र उत्पादकता में वृद्धि- पारिस्थितिक तंत्र में प्रत्येक प्रजाति एक विशेष भूमिका निभाती है। इनमें से अधिकतर अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर करते हैं।

  • पौधों की प्रजातियों की अत्यधिक संख्या - इसके परिणामस्वरूप फसलों की कई प्रजातिया उतपन्न होती है।
  • ताजे पानी के संसाधनों की रक्षा - जैव विविधता ताजे पानी के संसाधनों की रक्षा करती है और उन्हें स्वच्छ रखती है।
  • मिट्टी के गठन और संरक्षण को बढ़ावा देना - पौधों की विविधता मिट्टी के निर्माण में मदद करती है और इसे पोषक तत्वों को समृद्ध बनाती है।
  • पोषक तत्व भंडारण और पुनरावृत्ति के लिए - पौधे पोषक तत्वों का संग्रह करते हैं और फिर इन तत्वों को जानवरों द्वारा ग्रहण किया जाता है और अंत में पर्यावरण को वापस कर दिया जाता है।
  • प्रदूषक को कम करने में सहायक - पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं। किसी भी क्षेत्र में अधिक हरियाली, हवा में प्रदूषण के स्तर को कम करती है।
  • जलवायु स्थिरता में योगदान- पौधों और पशु प्रजातियों की उपस्थिति जलवायु को स्थिरता प्रदान करती है जिससे ग्लोबल वार्मिंग कम हो जाती है।
  • अत्यधिक खाद्य संसाधन प्रदान करते है - पौधें और मुर्गी पालन की बड़ी विविधता के परिणामस्वरूप अधिक खाद्य संसाधन प्राप्त होते हैं।
  • अनेक प्रकार की दवाइयां - पौधों की औषधीय गुण दवा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण होती है।
  • मनोरंजन और पर्यटन के लिए वातावरण प्रदान करते हैं - हरियाली और नदियां, पहाड़, समुद्र तट वाले स्थान मनुष्यों को मनोरंजक वातावरण प्रदान करते हैं।

जैव विविधता की बढ़ती क्षति (Increasing Loss of Biodiversity)

जैव विविधता की क्षति दुनिया भर में मानव, पौधे या पशु प्रजातियों के विलुप्त होने की स्थिति को दर्शाती है। इसके कारण प्रजातियों की एक निश्चित संख्या में कमी आ जाती है, जो पर्यावरण के स्तर में गिरावट का कारण बनती है। ये प्रभावी रूप से तत्कालिक या स्थायी हो सकती है। हालांकि, यह देखा गया है कि वैश्विक विलोपन अब तक अपरिवर्तनीय ही रही है।

इस समस्या की गहराई को समझने के लिए, आइए हम सभी जैव विविधता हानि की दर पर नज़र डालते हैं। अनुमान लगाया गया है कि जैव विविधता हानि की वर्तमान दर प्राकृतिक रूप से होने वाली विलुप्तता की दर से 100 से लेकर 1000 गुना अधिक है, और भविष्य में अभी इसके और अधिक बढ़ने की संभावना है। जैव विविधता के इस क्षति का प्रभाव मानव और जीव-जन्तुओं दोनों के जीवन पर हानिकारक रूप से पड़ता है।

जैव विविधता की क्षति के कारण (Causes of Loss of Biodiversity)

दुर्भाग्यवश, कई मानव गतिविधियों ने जैव विविधता की क्षति में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया हैं। हमारे द्वारा भूमि और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध रुप से दोहन किया जा रहा है। जैविक विविधता के सम्मेलन के अनुसार, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मानव गतिविधियों से जैव विविधता पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। प्रत्यक्ष मानव हस्तक्षेप में स्थानीय भूमि उपयोग, प्रजातियों का समावेशन या निष्कासन, कटाई, वायु और जल प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन आदि परिवर्तन शामिल हैं। अप्रत्यक्ष रुप से मानव हस्तक्षेप में जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक उन्नति, तकनीकी और सांस्कृतिक एवं धार्मिक कारक आदि शामिल हैं।

 

प्राकृतिक संसाधनों की मांग को बढ़ावा देने में जनसंख्या वृद्धि का बहुत बड़ा योगदान है। इससे अत्यधिक अपशिष्ट उत्पादन होता है, जो प्रदूषण का एक प्रमुख कारक है। मानव जरूरतों और प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग जलवायु परिवर्तन में मुख्य भूमिका निभाते है, जो जैव विविधता के लिए एक बड़े खतरे का कारण बनते है।

कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ता वायुमंडलीय घनत्व जलवायु परिवर्तन का कारण बनता है। प्रत्येक वर्ष वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटाई होने के कारण, कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण नहीं हो पा रहा है। जिससे वायु में कार्बन डाइऑक्साइड का घनत्व बढ़ता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप भूमि और समुद्र के तापमान और स्तर में वृद्धि हुई है तथा वर्षा चक्र में भी बदलाव देखने के मिला है। जलवायु में परिवर्तन प्रजातियों पर कई आकस्मिक प्रभाव डालती है।

जैव विविधता के नुकसान में योगदान देने वाले प्रमुख कारक (Major factors that contribute to the loss of biodiversity)

जैव विविधता के नुकसान में योगदान देने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं:

  • प्राकृतिक निवास का विलुप्तीकरण:

जीव-जन्तुओं के प्राकृतिक आवास मनुष्यों द्वारा कृषि, खनन, उद्योग, राजमार्गों के निर्माण आदि के उद्देश्य के लिए नष्ट कर दिया जाते है।

इसके परिणामस्वरूप, प्रजातियों को या तो पर्यावरण में बदलावों के अनुकूल होना पड़ता है या अन्य स्थानों पर चले जाना पड़ता है। क्योंकि यदि वो ऐसा नहीं करते है तो भविष्य में उन्हें भुखमरी, अनेक प्रकार की बीमारीयों तथा स्वास्थ्य विकारों का सामना करना पड़ता हैं।

  • शिकार:

जंगली जानवरों का शिकार उनके उत्पादों के व्यापारिक उपयोग के लिए किया जाता है। इनमें उनके चमड़े और त्वचा, फर, मांस, दांत को सौंदर्य प्रसाधन, इत्र, औषधीय और सजावट के उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता हैं। हाल ही के वर्षों में, अफ्रीका में 95% काले गैंडो की आबादी को उनके सींग के लिए शिकारियों द्वारा मार दिया गया था।

इसके अलावा, पिछले दशक में 3,000 टन हाथीदांत इकट्ठा करने के लिए अफ्रीका के हाथियों के एक-तिहाई से ज्यादा हाथियों को शिकारियों द्वारा मारा गया। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और भारतीय नियमों के लागू होने से बड़ी मात्रा में इस प्रकार के अवैध शिकारो में कमी आई है, लेकिन फिर भी जैव विविधता पर इसका खतरा बना ही हुआ है।

  • कुछ प्रजातियों का शोषण:

महत्वपूर्ण औषधीय पौधों के अत्यधिक उपयोग के कारण वे अपने प्राकृतिक स्थानो से विलुप्त होते जा रहे हैं। प्रयोगशालाओं और अन्य कार्यों के लिए भारी मात्रा में बेरोकटोंक एकत्र किए जाने वाले पौधे उदाहरण के लिये पिचर प्लांट, नेपेंथेस खसियाना, ड्रोसेरा एसपी, साइलोटम एसपी, आदि हैं। जिन्हें प्रयोगकर्ताओं द्वारा नष्ट किया जा रहा हैं।

 

  • प्राकृतिक आवास विखंडन:

"अप्राकृतिक रुप से विशाल ईलाको से अपने प्राकृतिक आवास को छोड़ने के वजह से भी कई सारे प्रजातियो के भविष्य पे खतरा मंडरा रहा है" जोकि आवास विखंडन को एक बहुत भयावह रूप में प्रदर्शित करता है। जिसमे कई प्रजातियों का भूभाग कई छोटी इकाइयों में टूट गया है, जिसके कारण कई सारे प्रजातियों के भविष्य पें संकट मंडरा रहा है।

  • चिड़ियाघर और अनुसंधान के लिए संग्रह:

चिड़ियाघर और जैविक प्रयोगशालाओं में प्रयोग के लिए जीव-जन्तु और पौधे एकत्रित किए जाते हैं। यह मुख्य रूप से विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान के लिए किया जाता है। बंदर और चिम्पांजी जैसे जीव जोकि अनुवांशिक, रचनात्मक और शारीरिक रुप से मानव के समान है। वह कई प्रयोग और अनुसंधानो की बलि चढ़ जाते है।

  • गैर-स्थानिय प्रजातियों का आगमन:

एक प्रजाति को जान बूझकर या दुर्घटनावश ऐसे स्थान पर ला दिया जाये जोकि उस स्थान का प्रकृतिक निवासी ना हो तो उसे गैर स्थानीय प्रजाति कहते है, और ऐसे प्रजातियो के आ जाने से मूल प्रजातियो के जीवन पर संकट बढ़ जाता है। क्योकि उन्हे अपने रहने और खाने के लिये गैर स्थानीय प्रजातियो से संर्घष करना पड़ता है।

  • प्रदूषण:

प्रदूषण, प्रजातियों के जीवन में कई प्रकार की समस्याए पैदा करता है, क्योंकि यह उनके प्राकृतिक निवास को परिवर्तित कर देता है। तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक अवयवो के लिए जल प्रदूषण हानिकारक है। जल निकायों में प्रवेश करने वाला जहरीला कचरा खाद्य श्रृंखला को नष्ट कर देता हैं। इसके अलावा कीटनाशक, सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड और अम्ल वर्षा जैसे अप्राकृतिक घटक पौधे और पशु प्रजातियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है।

  • कीट और शिकार नियंत्रण:

आम तौर पर, गैर-लक्षित समान्य प्रजातियां जो संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का एक हिस्सा हैं, शिकार और कीट नियंत्रण उपायों के दौरान मारे जाते हैं।

  • प्राकृतिक आपदाएं:

बाढ़, सूखा, जंगल की आग, पृथ्वी के भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाएं कभी-कभी पौधे और पशु जीवन पर अत्यधिक प्रभाव डालती हैं। जिसमें की काफी संख्या में जीव-जन्तु फंस जाते है और मिट्टी के पोषक तत्व भी बह जाते है।

अन्य कारण:

जैव विविधता की क्षति में योगदान देने वाले अन्य पारिस्थितिकी कारक:

  • वितरण सीमा - वितरण सीमा घट जाने के कारण जैव विविधता के विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाता है।
  • विशेष जीवो पर संकट – सामान्य जीवो की तुलना में विशेष जीवो के विलुप्त होने का संकट अधिक होता हैं।
  • खाद्य श्रृंखला में जीवों की स्थिति - खाद्य श्रृंखला में जिस जीव का स्थान जितना उपर होगा, वह उतना ही अधिक संवेदनशील होगा और उसके विलुप्त होने का खतरा भी उतना ज्यादे होगा।

जैव विविधता के क्षति का प्रभाव (Effects of Loss of Biodiversity)

जैव विविधता के क्षति के कारण सामान्य और स्थिर खाद्य श्रृखंला में इसके भीषण नकरात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे है। सिर्फ एक प्रजाति के विलुप्त होना भी पुरे खाद्य श्रृखंला को प्रभावित कर सकता है, जिसके वजह से जैव विविधता में कई प्रकार की कमी आ सकती है। जिसके कारणवश खाद्य श्रृंखला मे कमी के कारण, परिस्थितिकी तंत्र के साथ-साथ मानव जीवन के लिये भी कई प्रकार के संकट उत्पन्न हो सकते है।

जीव-जन्तुओ और पौधों की प्रजातियों के विलुप्त होने के प्रभाव काफी व्यापक हैं। जैव विविधता के क्षति के कारण होने वाले कुछ समस्याओं का विवरण यहां दिया गया हैं:

  • जैव विविधता के क्षति का आर्थिक प्रभाव

दुनिया भर में जैव विविधता की आर्थिक कीमत सूची में सबसे ऊपर है। अगर प्रकृति परागण, सिंचाई, भूमि सुधार जैसे कार्यो को करने में सक्षम नही रहेगी तो हमे इन कार्यों के लिये आर्थिक रुप से मूल्य अदा करना होगा। वैश्विक जैव विविधता का अनुमानित मूल्य खरबो में है। दुनिया भर में वनों की कटाई का सालाना मूल्य करीब 2-5 ट्रिलियन डॉलर का है।

  • मौजूदा प्रजातियों के लिए खतरा

फार्मो में भी नई प्रजातियों का आगमन हो रहा है और विदेशी नस्लों के आ जाने के कारण देशी नस्ल के मवेशियों को फार्मो से हटाया जा रहा हैं। जिसके वजह से दुनिया भर में मवेशियों की आबादी घटती जा रही है। जिससे वह बिमारीयो, सूखा और जलवायु परिवर्तन जैसे समस्याओ के प्रति संवेदनशील होते जा रहे है।

  • बिमारीयो बढ़ता दायरा

जैव विविधता के क्षति के कारण मानव स्वास्थ पे प्रतिकूल प्रभाव और बिमारीयो के फैलने जैसे दो बड़े प्रभाव सामने आये है। जिसके अंर्तगत पहले तो मूल आबादी के बीच उन जीव-जन्तुओ के आबादी में इजाफा होता है, जो बिमारीयो को फैलाते है। जिसके वजह से निवासियो के आबादी में कमी आने लगती है और अंत में ये उन प्रजातियो को समाप्त कर देते है, जोकि बिमारीयो को नही फैलाते है।

  • अप्रत्याशित मौसम में वृद्धि

वास्तव में खराब और खतरनाक मौसम एक बड़ी समस्या है। शोध से पता चला है कि, अवांछित और अप्रत्याशित मौसम प्रजातियों के विनाश और विस्थापन का कारण बनती है।

  • आजीविका की क्षति

आजीविका बनाए रखने के लिए जैव विविधता आवश्यक है। एक उदाहरण लेते हुए, जब महासागर पारिस्थितिक तंत्र मे गिरावट आती है तो लोगों को मछली पकड़ने जैसे रोजगार के साधन को खो देना पड़ता हैं। हालाकिं यह सच है कि मनुष्य को सदैव अपने आसपास के पारिस्थितिक तंत्र के क्षति के प्रभाव का सामना करना पड़ता हैं।

  • प्रकृतिक दृष्य का खोना

मानवता के लिए प्रकृति का मूल्य इसकी उपयोगिता से कई अधिक आवश्यक है। प्रकृति का भौतिक खण्डन निश्चित रूप से मनुष्यों को प्रभावित करता है। लोग हमेशा प्रकृति में शान्ति का अनुभव करते हैं। यह हमारे व्यस्त जीवन से आराम लेने के लिए एक मनोरंजन स्थल भी प्रदान करता है, लेकिन जैव विविधता का विघटन मनुष्य को प्रकृति का आनंद लेने में बाधा उत्पन्न करता है।

जैव विविधता के नुकसान को रोकने के लिए समाधान (Solutions to Stop Loss of Biodiversity)

(जैव विविधता के नुकसान को कैसे रोकें/जैव विविधता को कैसे संरक्षित करें)

भूमि में आ रही कमी और मिट्टी के गुणवत्ता मे आ रही गिरावट के जैसी समस्याओ के वजह से राष्ट्रीय पार्क जैसे क्षेत्रो का निर्माण हुआ। जोकि जैव विविधता के संकट के लिये एक कारगर उपाय साबित हुआ, हालांकि जैव विविधता की समस्या पूर्ण रुप से निपटने के लिये इसकी कुछ सीमाये है।

जैव विविधता हानि को कम करने के लिए कृषि के स्थायी प्रथाओं पर ज्यादा जोर देने की आवश्यक्ता है। हमें हजारों पारंपरिक फसलों की प्रजातियो का अस्तित्व संकट में पड़ गया है क्योकि उन्हे कुछ खास खाद्य पदार्थो के उत्पादन के लिये बंद कर दिया गया, इस सिद्धांत को मोनो उत्पादन के नाम से जाना जाता है।

इसका एक दूसरा रास्ता है "कृषि-पारिस्थितिकी" या "जैविक-खेती" को अपनाकर भी जैव विविधता के संकट को कम किया जा सकता है। इसके द्वारा कम भूमि पर तीव्र खेती के माध्यम से उच्च पैदावार प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मिट्टी के गुणवत्ता को सुधारने, नाइट्रोजन निर्धारण और प्राकृतिक कीट नियंत्रण जैसी प्रक्रियाओं में कौशल और जानकारी की आवश्यकता होती है। यह बदलाव खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता दोनो के सामंजस्य के लिये बहुत आवश्यक है।

कृषि में प्रस्तावित परिवर्तनों के साथ-साथ जैव विविधता के हानि को कम करने के अन्य समाधान भी हैं। उनमें कुछ सरल बदलाव हैं ऐसे भी है जिन्हें हमें अपने दैनिक जीवन में लाने की आवश्यकता है।

  • चूंकि संसाधनों की अधिक उपयोग जैव विविधता की क्षति का मूल कारण है, इसलिए हमे उसका कम उपयोग करना चाहिए।
  • अपने घरों में कम ऊर्जा का उपयोग करने वाले उपकरणों का उपयोग करके ऊर्जा को नष्ट होने से बचाना चाहिए।
  • पानी को संरक्षित करके भूमि की आद्रता बनाए रखनी चाहिए।
  • मवेशियो के चारागाह का प्रबंधन करना चाहिए।
  • भू संपत्ति को संस्थाओ को दान करने पर विचार करना चाहिए।
  • वैश्विक पर्यावरणीय पहल को बढ़ावा देना चाहिए और उसका समर्थन करना चाहिए।

निष्कर्ष

पर्यावरण पौधों और जानवरों की जैव विविधता या पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैव विविधता का नुकसान कई तरह की समस्याओं को जन्म देता है जैसे खाद्य सुरक्षा में कमी, खाद्य श्रृंखला में व्यवधान, जलवायु परिवर्तन, आजीविका की क्षति इत्यादि। जैव विविधता के क्षति के कारण मनुष्यों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है, उन्हें भोजन की कमी तथा वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि आदि जैसे समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं।

इसके कारण, पर्यावरण तंत्र का संतुलन भी अस्त-व्यस्त हो जाता है। यह समस्या वास्तव में बहुत गंभीर है। और मानव समाज को यह विचार करना चाहिये की उसके इन कार्यो से जैव विविधता पर किस प्रकार से नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे है। इसमे कुछ समाधान जैसे कृषि क्षेत्र में वैकल्पिक तरीकों का तथा कम खपत और कम अपशिष्ट पैदा करने वाली नीतियां अपनानी चाहिए, जिससे जैव विविधता के क्षति को कम किया जा सके और मनुष्य सुकून से पृथ्वी पर रह सके।