जैविक खेती – अर्थ, प्रकार, विधि, महत्व, फायदे और नुकसान

Organic Farming – Meaning, Types, Methods, Importance, Advantages And Disadvantages of Organic Farming

जैविक खेती प्राकृतिक तरीके से खेती का एक उदाहरण है, जिसमें उर्वरकों या कीटनाशको के रूप में किसी भी रासायनिक पदार्थों का उपयोग नहीं किया जाता। जैविक खेती केवल जैविक अपशिष्ट, खेतों के अपशिष्ट, पशु अपशिष्ट, खाद आदि जैसे प्राकृतिक खादों का उपयोग करके किया जाता है। यह मूल रूप से मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के साथ उसे अच्छा और उपजाऊ बनाने में भी मदद करती है। जैविक खेती में फसल परिक्रमण, मिश्रित फसल और जैविक कीट नियंत्रण आदि जैसे कुछ प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।

जैविक खेती क्या है (Meaning)

जैविक खेती प्रदूषण मुक्त पर्यावरणीय में फसलों को विकास और पोषक तत्व प्रदान करने के लिए केवल जैविक सामग्री और जैव-उर्वरकों का उपयोग करने पर जोर देती है। हालांकि भारत में, अच्छे एवं स्वस्थ फसल उत्पादन प्राप्त करने के लिए प्राचीन समय से ही जैविक खेती का पालन किया जाता रहा है।

फसल परिक्रमण इस तरह की खेती के मुख्य घटको में से एक है। जैविक खेती के फसल परिक्रमण द्वारा मिट्टी को स्वस्थ एवं उर्वरक बनाए रखने का अत्यधिक प्रयास किया जाता है। प्रत्येक फसल के बाद, किसान वायुमंडलीय नाइट्रोज (फसल उत्पादन के लिए आवश्यक एक महत्वपूर्ण खनिज) के साथ मिट्टी को पुनर्भरण करने के लिए फसलों के साथ अन्य फलदार पौधों को भी उगाते हैं। ये फलदार पौधे अपनी जड़ों की ग्रंथि के माध्यम से मिट्टी में नाइट्रोजन का पुनर्भरण कर उन्हें एक बार फिर उपजाऊ बना देते हैं।

जैविक खेती के प्रकार (Types of Organic Farming)

भारत एक विशाल देश है और जैविक खेती का देश भर में विभिन्न तरीको से उपयोग किया जाता हैं और यह काफी हद तक देश की लंबाई और चौड़ाई में प्रचलित मिट्टी और मौसम की स्थिति पर निर्भर करता है। जैविक खेती के प्रमुख दो निम्नलिखित प्रकार हैं:

1.जैविक खेती का एकीकृत तरीका

देश भर में एकीकृत जैविक खेती का पालन किया जाता है। पोषक तत्व प्रबंधन और कीट प्रबंधन का एकीकृत तरीका इस तरह के जैविक खेती के दो प्रमुख आधार हैं। प्रचीन समय से ही भारतीय गांवों में जैविक खेती के एकीकृत तरीको का पालन किया जाता रहा है। इस विधि के अनुसार, किसान प्राकृतिक संसाधनों से सभी आवश्यक पोषक तत्वों को एकीकृत कर फसलों के पूर्ण पौष्टिक मूल्य को बनाये रखने में मदद करते हैं। इसके अलाव, वो पौधों को कीटों से क्षतिग्रस्त होने से रोकने के लिए प्राकृतिक तरीके का इस्तेमाल करते हैं।

जैविक खेती के एकीकृत तरीकों से फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने नए वैज्ञानिक विकास के माध्यम से किसानों को शिक्षित और प्रशिक्षित कराने के लिए किसान जागरूकता अभियान की शुरूआत की है। नतीजतन, एकीकृत जैविक खेती अत्यधिक लोकप्रिय हो गई है जिसके परिणामस्वरूप उत्तर-पूर्वी राज्यों जैसे पहाड़ी क्षेत्रों के फसल पैदावार में सुधार हो गया है। एकीकृत जैविक खेती के माध्यम से कृषि में सुधार लाने के लिए मेघालय को एक शानदार उदाहरण के रुप में पेश किया जा रहा है।

इसके अलावा, भारत में विभिन्न कृषि संस्थानों में एकीकृत खेती में सुधार के लिए प्रगतिशील शोध के माध्यम से सम्मलित प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप फसल परिक्रमण, डबल और ट्रिपल फसल प्रणालियां जैसे एकीकृत कृषि पद्धतियों का व्यापक रुप से उपयोग हुआ है, हालांकि जैविक खेती के एकीकृत तरीकों के माध्यम से किसान वर्षों बाद अपनी आय बढ़ाने में सक्षम हो पाया है।

2. जैविक खेती का शुद्ध रूप जैविक खेती एक ऐसी कृषि विधि है, जिसमें किसान खेती के लिए केवल जैविक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करता हैं। विशेष रूप से इस तरह की खेती में उपयोग किये जाने वाले कीटनाशक रासायन मुक्त होते हैं। ये कीटनाशक नीम जैसे प्राकृतिक पदार्थों के माध्यम से बने होते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि रासायनिक कीटनाशकों को किसी भी तरह के अजैविक रसायनों से पूर्ण बचाव के लिए जैविक खेती के शुद्ध रूप का उपयोंग किया जाता है।

3. विभिन्न कृषि प्रणालियों का एकीकरण विभिन्न कृषि प्रणालियों के एकीकरण में नियमित फसल घटकों के साथ-साथ मुर्गी पालन, मशरूम उत्पादन, बकरी तथा मछली पालन आदि जैसे कई अन्य घटक भी शामिल किये जाते हैं।

 

जैविक खेती की विधि (Methods of Organic Farming)

जैविक खेती के विभिन्न तरीके निम्नलिखित हैं, हालांकि इस तरह की खेती की प्रक्रिया के दौरान सभी विधियों को एक साथ पालन करने की आवश्यकता होती है:

1. मृदा प्रबंधन: मृदा प्रबंधन जैविक खेती के लिए अति आवश्यक है। यह एक प्रसिद्ध तथ्य है कि एक बार फसल के उपजाऊ होने के बाद, खेतों की मिट्टी अपने अधिकांश पोषक तत्वों को खो देती है और इसकी प्रजनन क्षमता कम हो जाती है। सभी जरूरी पोषक तत्वों के साथ मिट्टी को रीचार्ज करने की प्रक्रिया को मिट्टी प्रबंधन कहा जाता है। जैविक खेती में मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने के लिए प्राकृतिक पोषक तत्वों के माध्यम से मिट्टी का रीचार्जीकरण किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए, आवश्यक पोषक तत्वों के साथ मिट्टी को रीचार्ज करने के लिए पशु अपशिष्टों का उपयोग किया जाता है। पशु अपशिष्ट में मौजूद बैक्टीरिया एक बार फिर मिट्टी को उपजाऊ बना देते हैं।

2. खरपतवारों का प्रबंधन: फसल उत्पादन के दौरान मिट्टी से जंगली पौधों को साफ करने के लिए जैविक खेती का उपयोग किया जाता है। खरपतवार वह अवांछित पौधे होते हैं जो कृषि क्षेत्रों में फसलों के साथ बढ़ते हैं और वे मिट्टी में मौजूद अधिकांश पोषक तत्वों को नष्ट कर देते हैं, नतीजतन फसल उत्पादन इससे प्रभावित हो जाता है। खरपतवारों के प्रभाव को कम करने के लिए किसान नीचे दिये गये कुछ तकनीकों का पालन करता हैं गीली घास और कटाई या खेतों की लवाई: गीली घास की प्रक्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसान खरपतवार के विकास को रोकने के लिए मिट्टी की सतह पर पौधों के अवशेषों या प्लास्टिक की परत लगा देता हैं जबकि काटई या खेतों की लवाई प्रक्रिया में खरपतवारों के विकास को कम करने के लिए उन्हें काट दिया जाता है।

3. फसल विविधता: फसल विविधता जैविक खेती के सबसे महत्वपूर्ण तरीकों में से एक है और इसके लिए मोनोकल्चर एंड पॉलीकल्चर जैसे दो अभ्यास किए जाते हैं। जैविक खेती के मोनोकल्चर विधी में, किसान एक समय में केवल एक ही फसल का उत्पादन कर सकता हैं, जबकि पॉलीकल्चर विधि में, वो एक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की फसलों को उत्पादित करने का लाभ उठा सकता हैं। जैविक खेती के पॉलीकल्चर विधी द्वार मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को और अधिक उपजाऊ बनाने में सहायता मिलती है।

4. हानिकारक जीवों को नियंत्रित करना: जैविक खेती फसल उत्पादन क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाली कृषि खेतीं में मौजूद हानिकारक जीवों को नियंत्रित करने पर अधिक जोर देती है। किसान इसके लिए कीटनाशकों और जड़ी-बूटियों का उपयोग करते हैं, हालांकि यह सत्य है कि जैविक खेती में केवल प्राकृतिक कीटनाशकों का ही उपयोग किया जाता है।

5. हरित खाद का उपयोग: जैविक खेती में, किसान मृत पौधों का उपयोग हरित खाद के रूप में करते हैं। मिट्टी की प्रजनन क्षमता तथा पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए इन पौधों को खाद के रुप में मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए उपयोग किया जाता है।

6. मिश्रित खाद का उपयोग: इस प्रक्रिया में किसान एक गड्ढा खोदकर उसमें हरे अपशिष्ट और पानी के क्षय को मिलाकर खाद तैयार करता हैं और बाद में इस समृद्ध खाद और पोषक तत्वों को मिट्टी की प्रजनन क्षमता बढ़ाने के लिए खेतों में उर्वरक के रूप में प्रयोग करता है।

 

जैविक खेती का महत्व (Importance of Organic Farming)

जैविक खेती प्राकृतिक आवास को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। जैविक खेती के माध्यम से पर्यावरण शुद्ध रहता है और कम प्रदूषित होता है तथा यह ग्रह पर जीवन को बनाए रखने में भी मदद करता हैं। इसके अलावा, जैविक खेती को लोगों को स्वस्थ भोजन प्रदान करने के लिए भी आयात किया जाता है। जब लोग जैविक प्रक्रिया से उत्पादित शुद्धतम एवं स्वस्थ भोजन को ग्रहण करते है तो वे अनेक प्रकार के घातक बीमारियों से दुर रहते है। इसके अलावा जैविक खेती में उपयोग किए जाने वाले प्राकृतिक खादों की वजह से मिट्टी और अधिक बेहतर स्थिति में उपजाऊ हो जाती है।

जैविक खेती के फायदे (Advantages of Organic Farming)

1.मृत मिट्टी को पुनर्जीवित करना: जैविक खेती पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ मिट्टी के अवक्रमण को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है। दुनिया भर के कुछ क्षेत्रों में जहां रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी के उपजाऊ दर में गिरावट आ गयी है, वही जैविक खेती आवश्यक पोषक तत्वों के साथ इसे रिचार्ज करने तथा पुन: स्वस्थ करने में अपना योगदान दे रही है।

2.मिट्टी की सर्वोत्तम स्थिति को बनाए रखना: चूंकि जैविक खेती में जैविक खपत का उपयोग किया जाता है, इसलिए ये फसलों की अच्छी गुणवत्ता के उच्च उत्पादन के लिए मिट्टी की इष्टतम स्थिति को बनाए रखने में मदद करती है।

3.रासायनिक खाद की आवश्यकता नहीं: किसान जैविक खेती में केवल प्राकृतिक और जैविक खाद का ही उपयोग करता हैं इससे उन्हें किसी भी रासायनिक खाद को खरीदने की आवश्यकता भी नही होती और उनके खर्चें भी काफी कम हो जाते हैं।

4.मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार: जैविक खेती मिट्टी को अपनी उर्वरता शक्ति हासिल करने में मदद करती है, क्योंकि इस तरह की खेती मिट्टी में विभिन्न आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति करती है और इसके अलावा यह मिट्टी को अपने पोषक तत्वों को बनाए रखने में भी सहायता करती है।

जैविक खेती के नुकसान (Disadvantages of Organic Farming)

1.उच्च उत्पादन लागत: जैविक खेती के लिए किसानों को इसके साथ जुड़े विभिन्न कार्यों को बनाए रखने के लिए और अधिक जनशक्ति की आवश्यकता होती है जो फसल उत्पादन लागत को बढ़ाती है।

2.उत्पादित फसलो की अत्यधिक कीमत : चूंकि पारंपरिक खेती की तुलना में जैविक खेती के माध्यम से किसानों को अत्यधिक उपज नही मिलती है। जिसके कारण, इसकी पैदावार की कीमत पारंपरिक खेती के पैदावार से काफी अधिक मंहगी होती है।

निष्कर्ष

यदि हम दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य लेते हैं, तो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए जैविक खेती आवश्यक हो जाती है। मिट्टी की उर्वरता को प्राकृतिक तरीके से रिचार्ज करने और स्वस्थ भोजन का उत्पादन करने के लिए जैविक खेती आवश्यक होती है। हालांकि किसान कम फसल उपज से प्रभावित हो जाते है, परन्तु फिर भी भविष्य की पीढ़ियों के लिए पारिस्थितिक और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के साथ प्राकृतिक रूप से जीवन का नेतृत्व करने के लिए जैविक खेती की आवश्यक हो जाती है। वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए हमें यह पता चलता है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण हमारे कृषि क्षेत्रों की मिट्टी बरबाद हो गई है। हालांकि जैविक खेती सभी प्राकृतिक पोषक तत्वों के साथ पृथ्वी को रिचार्ज करने तथा मानव आबादी को अधिक स्वस्थ जीवन प्रदान करने में सहायक हो सकती है।