जल प्रदूषण

आजकल  हम कई प्रकार के प्रदूषणों जैसे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि का सामना करना पड़ता है, लेकिन लोगों की सबसे बड़ी संख्या को प्रभावित करने वाला प्रदूषण जल प्रदूषण है। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय प्रगति ने निश्चित रूप से पिछले दो सौ साल में इन्सान का जीवन बहुत सहज बना दिया है और साथ ही वैज्ञानिक क्रांति ने बड़े पैमाने पर रोजगार भी उत्पन्न किए हैं जिससे लाखों लोगों का जीवन खुशियों से भर गया है। साथ ही व्यापक अनुसंधान और नई दवाओं के खोज एवं निर्माण के कारण लोग अब लंबी उम्र तक जीवन जी रहे हैं और मृत्यु दर का आंकड़ा काफी नीचे चला गया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि मशीन युग ने हमें बहुत कुछ दिया है, लेकिन अगर हम अपने आसपास के माहौल पर नजर डालें तो यह भी साफ दिखता है कि इस प्रगति ने हमारे जीवन में प्रदूषण रूपी जहर घोल दिया है। इस जहर का ही रूप जल प्रदूषण है जो आज हमारे चारों तरफ फैला हुआ है।

हमारा देश विकट जल प्रदूषण का सामना कर रहे देशों में से एक है। जल प्रदूषण के सबसे बड़े कारण कीटनाशक-छिड़काव वाले खेतों से बह कर आया हुआ पानी  और छोटे एवं बड़े उद्योगों द्वारा उत्पन्न रासायनिक कचरा युक्त पानी है। भारत में जल प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ चुका है कि शायद ही कोई ऐसी नदी या जल संसाधन बचा है जो किसी ना किसी हद तक प्रदूषित ना हो। देश में 80 प्रतिशत प्रदूषित जल निकायों के चारो ओर बड़ी संख्या में आबादी रहती है। गंगा और यमुना जैसी नदियां भी भारत की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों में शामिल हैं। वास्तव में, देश के अपशिष्ट जल का एक बड़ा हिस्सा शहरों में ही उत्पादित है क्योंकि ज्यादातक शहर नदियों के किनारों पर ही बसे हैं।

जल प्रदूषण क्या है?

जल प्रदूषण से तात्पर्य यह है कि नदियों, झीलों, तालाबों, भूमिगत और समुद्री जलों में ऐसे पदार्थों का मिल जाना जिससे जल मनुष्यों, वनस्पतियों और जीव द्वारा उपयोग के लिए बेकार हो जाता है। प्रदूषित जल सभी के जीवन के लिए खतरनाक है।

जल प्रदूषण

जल प्रदूषण के बारे में जानकारी

तेजी एवं स्वच्छंद गति से हो रहा शहरीकरण भारत में जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। देश में पिछले एक दशक के दौरान शहरीकरण इतनी तीव्रता से हुआ है कि इसका दुष्प्रभाव प्रदूषित जल संसाधनों के रूप में सामना आया है जिसने पर्यावरण से संबंधित कई नई समस्याओं को जन्म दिया है। जल प्रदूषण की समस्या में स्वचछ जल की नगण्य आपूर्ति, जल का बढ़ता प्रदूषण और इसके भंडारण की कुशल व्यवस्था का अभाव शामिल हैं।

वास्तव में, प्रदूषित जल का निपटान एवं उपचार दोनो ही बड़ी चुनौतियों के रूप में उभरी है। नदियों के पास बसे ज्यादातर शहर एवं कस्बे जल प्रदूषण से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में सीवेज के पानी का निपटान सबसे बड़ी समस्या है। नदियों, तालाबों, नहरों, कुओं और झीलों के जल का उपयोग घरेलू एवं औद्योगिक दोनो ही तरह से किया जाता है। अधिकांश स्थानों पर तो भूमि की सतह पर मौजूद मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत तक प्रदूषित हो चका है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में एक लाख की आबादी वाले शहर रोजाना 16,662 लीटर करोड़ लीटर दूषित पानी का उत्पादन कर रहे हैं।

भारत में जल प्रदूषण का स्तर बढ़ने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:

  • औद्योगिक कचरे उत्पादन एवं उसके उचित निपटान का अभाव।
  • कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों के उपयोग सहित खेती के अनुचित विधियों का प्रयोग।
  • मैदानी इलाकों से गुजर रही नदियों के पानी की गुणवत्ता में गिरावट।
  • स्नान, सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठान एवं नदियों में शवों को बहा देना।
  • जहाजों से तेल का बड़ी मात्रा में रिसाव।
  • अम्ल वर्षा।
  • ग्लोबल वार्मिंग।
  • सुपोषण (युट्रोफिकेशन) अर्थात पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाना जिससे जलीय जीव मर जाते हैं।
  • सीवेज के पानी का अपर्याप्त उपचार।

जल कैसे प्रदूषित हो जाता है? जल प्रदूषण के कारण

रासायनिक अपशिष्ट: औद्योगिक संस्थानों से निकल रहा रासायनिक अपशिष्ट जल प्रदूषण का मुख्य कारण है। हमारे उद्योगों और कारखानों से रासायनिक अपशिष्ट ज्यादातर सीधे नदियों और तालाबों में बहा दिया जाता है जिससे पानी जहरीला हो जाता है। यह जहरीला पानी जलीय एवं अन्य जीव-जंतुओं के मृत्यु का कारण बनता है। इस पानी को पीने से पशु तो मरते ही हैं और साथ ही इन्सान भी बीमार हो जाते हैं।

कचरा: हमारे शहरों और गांवों से हजारों टन कचरा बहते हुए नदियों में मिल जाता है। रासायनिक उर्वरकों एवं अन्य कई प्रकार की दवाईयों का इस्तेमाल खेती में हो रहा है जो अंततः जल निकायों में मिलकर उन्हें प्रदूषित कर देता है।

 

समुद्र के जल का प्रदूषण: प्रदूषित नदियों का समुद्र में विलय होने से समुद्री जल भी प्रदूषित हो जाता है और यह समस्या तब और बढ़ जाती है जब प्लास्टिक के कचरे के ढ़ेर भी बहते हुए समुद्र में मिल जाते है। साथ ही कई बार दुर्घटनाओं के कारण समुद्र में जहाजों का ईंधन फैल जाता है। यह तेल समुद्र के पानी पर एक परत बना देता है जिसकी वजह से जलीय जीवों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाता और वे मर जाते हैं।

भारत में जल प्रदूषण के दुष्प्रभाव

जल प्रदूषण सभी जीवों पर पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। प्रदूषित पानी फसलों के लिए भी हानिकारक होता है। यह भूमि की उर्वरता को खत्म कर देता है एवं प्रदूषित पानी के उपयोग द्वारा ली गई फसल भी जानलेवा साबित होता है और ऐसे क्षेत्रों में उत्पन्न हरी सब्जियां एवं अन्य खाद्य पदार्थ इन्सानों में कई बीमारियों का कारण बन जाते हैं।

वास्तव में, जल प्रदूषण की वजह से भारत में, शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में लोगों के स्वास्थ्य में गिरावट दर्ज की गई है और कई खतरनाक रोगों जैसे हैजा, तपेदिक, पीलिया, उल्टी, दस्त के प्रमुख कारणों में प्रदूषित पानी का सेवन भी शामिल है।

जल प्रदूषण की समस्या का समाधान

जल को प्रदूषित होने से बचाना ही जल प्रदूषण का सबसे अच्छा समाधान है और जल प्रदूषण को रोकने के लिए मृदा संरक्षण भी जरूरी है। मिट्टी का कटाव की वजह से भी जल प्रदूषित होता है और अगर हम मृदा संरक्षण में कामयाब हो जाएं तो कुछ हद जल प्रदूषण को रोक सकेंगे। मिट्टी का कटाव को रोकने के लिए अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाना या बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण आवश्यक है। हमें कृषि के लिए ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए जिससे मिट्टी विषाक्त ना हो। साथ ही हमें विषाक्त अपशिष्टों के उचित निपटान के लही सही तरीकों को अपनाने की आवश्यकता है। सबसे पहले हमें ऐसे उत्पादों के उपयोग से बचना होगा जिनके निर्माण में हानिकारक कार्बनिक यौगिकों का इस्तेमाल किया जाता है। जहां भी पेंट, सफाई और दाग हटाने के लिए रसायनों का उपयोग किया जाता है अर्थात इन कार्यों के लिए लगाई गई फैक्ट्रियों एवं लघु उद्योगों से उत्पन्न कचरों एवं विषाक्त जल का सुरक्षित निपटान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि कारों एवं अन्य मशीनों से तेल के रिसाव को रोका जाए। तेल का रिसाव जल प्रदूषण के प्रमुख कारकों में से एक है। इसे रोकने का एकमात्र तरीका यह है कि हम अपनी कारों एवं अन्य मशीनों का उचित देखभाल करें और नियमित तौर पर यह सुनिश्चित करें कि उनसे तेल का रिसाव ना हो। सभी कारखानों, विशेषकर ऐसी फैक्ट्रियों जहां तेल का उपयोग सफाई कार्य के लिए किया जाता है, में दूषित तेल के  सुरक्षित निपटान की व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिए और किसी भी माध्यम से यह दूषित तेल पानी में नहीं मिलना चाहिए।

 

जल प्रदूषण की समस्या पर काबू पाने के लिए निम्नलिखित कुछ तरीके अपनाए जा सकते हैं:

  1. जलमार्गों एवं समुद्र तटों की नियमित सफाई।
  2. ऐसे पदार्थ जो वातावरण में स्वतः नष्ट नहीं हो सकते जैसे प्लास्टिक, का इस्तेमाल बंद करना।
  3. हमारे सभी गतिविधियों में जल प्रदूषण को कम करने की विधियों का समावेश।

निष्कर्ष:

जल प्रदूषण आज एक भयानक समस्या बन चुका है। नदियों और तालाबों का पानी लोगों के लिए जीवन-दाता माना जाता रहा है लेकिन आज ये उपयोग के लायक नहीं रह गए है। हमारी सरकारों को जल प्रदूषण की समस्या के त्वरित समाधान की दिशा में कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है। सबसे पहले हमें औद्योगिक कचरों को नदियों और तालाबों में बहाए जाने से रोकना होगा। उचित उपचार के बिना घरेलू कचरे को भी जल निकायों में नहीं मिलने देना चाहिए। कृषि में भी रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बंद कर देना चाहिए और जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

जल प्रदूषण अब आपात स्थिति में पहुंच चुका है और इसलिए हमें तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। यदि हम चाहते हैं कि हमारे नागरिक सुरक्षित जल का उपयोग करें तो मीठे जल को स्रोतों को लंबी अवधि तक सुरक्षित रखने का उपाय करना होगा और इस कार्य में किसी भी प्रकार की देरी घातक सिद्ध हो सकती है।

हमें पीने, स्नान, सिंचाई इत्यादि कार्यों में पानी का इस्तेमाल इस प्रकार करना होगा कि जल विषाक्त होने से बचे। नालियों में बहते प्लास्टिक, सड़े हुए एलं विसंक्रामक पदार्थों एवं अन्य गंदगियों के नदियों में मिलने की वजह से जल निकायों में पानी की गुणवत्ता में काफी हद गिरावट आ चुकी है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि गंदा पानी हानिकारक बैक्टीरिया का वाहक होता है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। इसलिए हमें नदियों एवं अन्य जल निकायों की सफाई की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए। जल प्रदूषण के विरुद्ध एक व्यापक सामाजिक जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है। जल जीवन के लिए अमृत तुल्य है इसलिए जल को स्वच्छ बनाए रखना हमारा कर्तव्य है।