गणेश आरती और लक्ष्मी आरती

गणेश आरती

हिन्दू धर्म में आरती एक महान अनुष्ठान है जो पूजा पूरी होने के बाद की जाती है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये माना जाता है कि बिना आरती पढ़े पूजा पूरी नहीं होती। पूजा की थाली में घी का दीया और कपूर जलाकर आरती की जाती है। गणेश आरती वो जादूई गीत है जो देवी या देवता को प्रसन्न करने के लिये गाया जाता है।

गणेश आरती का अर्थ:

आरती का अर्थ है, (आ+रति), आ का अर्थ है पूरा और रति का अर्थ है प्रेम। लोग भगवान को खुश करने और भगवान के प्रति अपने प्रेम और सम्मान दिखाने के लिये आरती गाते है। प्रत्येक हिन्दू पूजा में आरती गाना परंपरागत, आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथा है।

गणेश आरती का महत्व:

लोग आरती गाते समय देवी या देवता की तरफ चेहरा करके भगवान का ध्यान करते है। आरतीकर्ता जलते हुये कपूर और घी के दीये के साथ हाथ में पूजा की थाली को देवी या देवता के चारों ओर घुमाते हुये आरती गाता है। यह हिन्दूओं की पौराणिक मान्यता है कि आरती पूजा के पूरा होने का और मानव मस्तिष्क व वातावरण से बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है। आरती बेहतर ध्यान का एक रूप है, जो शरीर और मन के कामकाज को बनाए रखने के लिए दैनिक आधार पर की जा सकती है। आरती पढ़ने से मन को आध्यात्मिक और धार्मिक शांति व शक्ति प्राप्त होती है, और तनाव से दूर रखती है। आरती एक मनुष्य के मन और आत्मा को दिव्यता और भगवान के करीब लाती है। यह मानव मन और पर्यावरण से अंधकार को दूर करती है और हमेशा मानव भाग्य के लिए भगवान के आशीर्वाद का स्वागत करती है।

यह सांस्कृतिक और धार्मिक समारोह है जो पूजा के दौरन किया जाता है। यह संस्कृति और परंपरा की प्रगति में मदद करता है। यह मानव शरीर और मन को शुद्ध करती है और अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए मन की मदद करती है। निम्नलिखित आरती भगवान गणेश को समर्पित है:

भगवान गणेश जी की आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

एकदन्त दयावन्त चार भुजाधारी,

माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी।

(माथे पर सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी)

पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा,

(हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा),

लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

अँन्धे को आँख देत कोढ़िन को काया

बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया।

'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

(दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी )

(कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी)॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

लक्ष्मी आरती

देवी लक्ष्मी की आरती का महत्व:

हिन्दू धर्म में पूजा के दौरान लक्ष्मी जी की आरती करना एक महान अनुष्ठान है जो दिवाली के त्यौहार पर अर्थात् प्रकाश के त्यौहार पर की जाती है। हिंदू परंपरा और संस्कृति के अनुसार, लोग पूजा थाली में एक तेल या घी का दीपक रखकर गोल गति में आरती करते है और इसी तरह घर के बाहर भी बुराई को दूर करने और देवी लक्ष्मी के आशीर्वाद का स्वागत करने के लिये करते है।

लोग आम तौर पर स्वास्थ्य, धन और समृद्धि पाने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। लोग अपने घरों को साफ करते है और नए कपड़े पहनते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि देवी लक्ष्मी उन्हीं घरों में जाती है जो कि बहुत साफ और स्वच्छ होते है। वे लोग जो सक्रिय होते है और अपना काम स्वंय करते है वे आलसी लोगो की तुलना में अधिक धन और समृद्धि प्राप्त करते है।

हिन्दू धर्म में, भगवान गणेश देवी लक्ष्मी के साथ हमेशा पूजे जाते है क्योंकि उन्हें स्वंय देवी ने वरदान दिया था कि वह मनुष्यों द्वारा उनके साथ हमेशा पूजे जायेंगें। हिन्दू धर्म में देवी लक्ष्मी तीन रुपों में पूजी जाती है जैसे महालक्ष्मी अर्थात् धन की देवी, महासरस्वती अर्थात् ज्ञान और बुद्धि की देवी और महाकाली अर्थात् कुबेर, खजाने के भगवान।

निम्नलिखित आरती धन की देवी को समर्पित है:

ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता,

तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

उमा, रमा, ब्रम्हाणी, तुम जग की माता,

सूर्य चद्रंमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

दुर्गारुप निरंजन, सुख संपत्ति दाता,

जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि सिद्धी धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम ही पाताल निवासनी, तुम ही शुभदाता,

कर्मप्रभाव प्रकाशनी, भवनिधि की त्राता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद् गुण आता,

सब सभंव हो जाता, मन नहीं घबराता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता,

खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

शुभ गुण मंदिर सुंदर क्षीरनिधि जाता,

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता,

उर आंनद समाता, पाप उतर जाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता,

तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता...

 

सरस्वती आरती

सरस्वती आरती का महत्व:

देवी सरस्वती वेदों की जननी है, जिन्हें हिन्दू धर्म में ज्ञान, कला और बुद्धि की देवी के रुप में पूजा जाता है। वह मनुष्यों को ज्ञान और बुद्धि देती है जो उनकी पूजा के बिना सम्भव नहीं है। वह मूर्ति में हमेशा एक पुस्तक और वीणा के साथ दिखायी देती है जो क्रमशः साहित्य और संगीत का प्रतीक है। वह अपने भक्तों को हमेंशा ज्ञान और भक्ति का आशीर्वाद देती है। उनकी सफेद पोशाक, सफेद कमल, और सफेद हंस निर्मल पवित्रता को इंगित करता है जो लोगों को दोष रहित मन के लिये प्रेरित करता है।

कोई भी बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं पा सकता। लोग पूजा के बाद देवी सरस्वती जी की आरती सम्पूर्ण ज्ञान और बुद्धि के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिये करते है।

नीचे लिखी गयी निम्नलिखित आरती देवी सरस्वती को पूरी तरह से समर्पित है:

जय सरस्वती माता , मैया जय सरस्वती माता

सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

मैया जय.......

चंद्रवदनि पदमासिनी, घुति मंगलकारी

सोहें शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥

मैया जय.........

बायेँ कर में वीणा, दायें कर में माला

शीश मुकुट मणी सोहें, गल मोतियन माला॥

मैया जय.........

देवी शरण जो आयें, उनका उद्धार किया

पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥

मैया जय.........

विद्या ज्ञान प्रदायिनी, न ज्ञान प्रकाश भरो

मोह और अज्ञान तिमिर का जग से नाश करो॥

मैया जय.........

धुप, दिप फल मेवा माँ स्वीकार करो

ज्ञानचक्षु दे माता, भव से उद्धार करो॥

मैया जय.........

माँ सरस्वती जी की आरती जो कोई नर गावें

हितकारी, सुखकारी ग्यान भक्ती पावें ॥

मैया जय.........

सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता

सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।।

 

काली माता की आरती

माता काली की आरती का महत्व:

देवी देवताओं की पूजा के बाद माता काली की आरती करना हिन्दूओं का अनुष्ठान है। लोग देवी काली की पूजा बुरी शक्तियों से छुटकारा पाने के साथ ही साथ शान्ति पाने और अपने अच्छे के लिये करते है। आरती पूजा के पूरी होने का संकेत हैं और पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करने का तरीका है। लोग देवी की आरती करने के लिये घी का दीया और कपूर जलाकर पवित्र पूजा थाली तैयार करते हैं।

आरती की थाली में कुछ अतिरिक्त आवश्यक चीजें जैसे: मिठाई, फूल, धूप और प्रसाद के रूप अन्य वस्तुऍ भी शामिल हैं। आरतीकर्ता पूजा की थाली लेकर आरती गाकर आरती करता है। आरती पूरी होने के बाद आरतीकर्ता आरती का आशीर्वाद पाने के लिये अन्य सदस्यों को पूजा की थाली देता है।

नीचे दी गयी आरती पूरी तरह देवी काली को समर्पित है:-

आरती श्री दुर्गाजी

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,

तेरे ही गुण गावें भारती,

ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती।

तेरे भक्त जनो पर माता भीर पड़ी है भारी।

दानव दल पर टूट पडो माँ करके सिंह सवारी॥

सौ-सौ सिहों से बलशाली, है अष्ट भुजाओं वाली,

दुष्टों को तू ही ललकारती।

ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥

माँ-बेटे का है इस जग मे बडा ही निर्मल नाता।

पूत-कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता॥

सब पे करूणा दर्शाने वाली, अमृत बरसाने वाली,

दुखियों के दुखडे निवारती।

ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥

नहीं मांगते धन और दौलत, न चांदी न सोना।

हम तो मांगें माँ तेरे चरणों में एक छोटा सा कोना॥

सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली,

सतियों के सत को सवांरती।

ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥

चरण शरण में खड़े तुम्हारी, ले पूजा की थाली।

वरद हस्त सर पर रख दो माँ संकट हरने वाली॥

माँ भर दो भक्ति रस प्याली, अष्ट भुजाओं वाली,

भक्तों के कारज तू ही सारती।।

ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥