राष्ट्रीय अखंडता की आवश्यकताएं, समस्याएँ और चुनौतियां

राष्ट्रीय अखंडता का तात्पर्य विभिन्न जातियों, संप्रदायों, धर्मों, भाषाओं और क्षेत्रों की विविधता के बावजूद एक राष्ट्र की भावना से है। किसी भी देश की ताकत और प्रगति के लिए सभी समाज और समुदायों के बीच एकता और सामंजस्य की भावना होना जरूरी है। यह एक देश में रहने वाले सभी लोगों के बीच आपसी संबंधों को मजबूत करती है। असल में, राष्ट्रीय अखंडता एक राष्ट्र की पहचान को मजबूत करता है।

भारत में राष्ट्रीय अखंडता की आवश्यकता

भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए राष्ट्रीय अखंडता बहुत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक बनाने के लिए राष्ट्रीय एकता सप्ताह या कौमी एकता सप्ताह का आयोजन हर वर्ष 19 नवंबर से 25 नवंबर तक किया जाता है। इसके अलावा 19 नवंबर, जो कि भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जन्मदिन भी है, राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, परंपराओं और संप्रदायों के लोग एक साथ रहते हैं। इसलिए इन विविधताओं के कारण कुछ मुद्दों पर लोगों के बीच मतभेद होने की संभावना बनी रहती है। राष्ट्रीय अखंडता एक धागे के रूप में काम करती है जो सभी मतभेदों के बावजूद लोगों में एकता बनाये रखता है।

यह इस देश की सुंदरता है कि किसी भी धर्म से संबंधित त्योहार को सभी समुदायों के साथ मनाया जाता है। लोग धार्मिक अवसरों पर मिलने, अभिवादन करने और बधाई देने के लिए एक-दूसरे की जगहों पर मुलाकात करने जाते हैं। यही कारण है कि विविधता में एकता के साथ भारत एक देश के रूप में जाना जाता है।

भारत में राष्ट्रीय एकता के लिए समस्याएँ और चुनौतियां

भारत विभिन्न भाषाओं, धर्मों और जातियों आदि की विशाल विविधता का देश है। इन सभी विशेषताओं के कारण ही भारत में अलग-अलग समूह के लोग बसते हैं। भारत में सभी जातियां आगे उप-जातियों में विभाजित की गई हैं और भाषाओं को बोलियों में विभाजित किया गया है। इसके अलावा यहाँ जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है धर्म जिसे उप-धर्मों में विभाजित किया गया हैं।

इन तथ्यों के आधार पर हम यह कह सकते है की भारत एक अनंत विविध सांस्कृतिक परिभाषा को प्रस्तुत करता है क्योंकि यह एक बड़ी आबादी वाला विशाल देश है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि भारत में विविधता के बीच एकता भी दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय अखंडता को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं:

जातीय विविधता

भारत कई विभिन्न समूहों के लोगों से बना है इसलिए इसकी विविधता देश की एकता के लिए एक अव्यक्त खतरा बन गई है। भारतीय समाज हमेशा जाति, पंथ और धर्मों और भाषाओं के संदर्भ में विभाजित किया गया है। इसी कारण अंग्रेज भारत को विभाजित करने के अपने इरादे में सफल रहे थे। स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान इन विभाजनकारी प्रवृत्तियों में तेजी देखी गई अंततः भारत से ब्रिटिशों को बाहर करने का काम  केवल राष्ट्रीय एकीकरण की सोच रखने वाले व्यक्तियों, जैसे महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, लाला लाजपत राय, वल्लभ भाई पटेल, आदि के कारण ही संभव हो सका।

सांप्रदायिकता

विभिन्न धार्मिक समुदायों में संकीर्ण सोच का व्यवहार राष्ट्रीय एकीकरण के लिए प्रमुख खतरों में से एक हैं। लोगों के विभिन्न क्षेत्रीय पहचान के कैदी बनने के पीछे मुख्य कारण हमारी देश की राजनीति ही है। यहां तक ​​कि हमारे देश में कुछ विशेष धर्मों से जुड़ी विभिन्न भाषाओं के आधार पर कुछ राज्य भी बनाए गए हैं। सांप्रदायिकता ने धर्मों के आधार पर लोगों के बीच मतभेद पैदा करने में अहम् भूमिका निभाई है।

हालांकि हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है, फिर भी कभी-कभी सांप्रदायिक मतभेद सामने आ रहे हैं जिससे जीवन और संपत्तियों को काफी नुकसान पहुँच रहा हैं।

सांस्कृतिक मतभेद

सांस्कृतिक मतभेद कभी-कभी राष्ट्रीय अखंडता की राह में एक प्रमुख बाधा बन जाते हैं। इसे हम उत्तरी राज्यों और दक्षिणी राज्यों के बीच मतभेद के रूप में साफ़ देख सकते है जो अक्सर लोगों के बीच पारस्परिक विरोधाभास और शत्रुता पैदा करते हैं।

क्षेत्रीयवाद

राष्ट्रीय अखंडता के मार्ग में क्षेत्रीयवाद या प्रांतीयवाद भी एक बड़ी अड़चन है। हमारे देश को स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद राज्यों के पुनर्गठन आयोग ने प्रशासन और जनता के विभिन्न सुविधाओं के लिए देश को चौदह राज्यों में बांट दिया था। उन विभाजनों के दुष्परिणाम हमें आज भी दिखाई दे रहें हैं। प्रांतीय आधार पर बनाए गए नए राज्यों के साथ ऐसी और अधिक राज्यों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इससे देश के विभिन्न राज्यों में प्रांतीयवाद की संकीर्ण भावना बढ़ रही है जिससे लोगों के बीच सामाजिक असंतोष पनप रहा है।

भाषा का अंतर

भारत एक विशाल देश है जहां विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं। हालांकि अपनी-अपनी भाषाओं की विविधता को लेकर कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन अपनी भाषा के प्रति जुनून और अन्य भाषाओं के प्रति असहिष्णुता राष्ट्रीय एकता के रास्ते में बाधा पैदा करती है। यह भी एक तथ्य है कि लोग केवल भाषा के माध्यम से ही एक-दूसरे के करीब आते हैं, जिसके लिए एक राष्ट्रीय भाषा की आवश्यकता होती है जो पूरे देश को एक साथ जोड़ सकती हैं। दुर्भाग्य से, अब तक हमारे पास एक भी भाषा नहीं है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे देश में संचार के माध्यम के रूप में सेवा कर सकती है।

जातिवाद

जातिवाद को पहले से ही एक सामाजिक बुराई माना जाता है। अभी भी लोग अपनी जाति की पहचान पर विभाजित हैं। खासकर राजनीति में जाति एक निर्णायक भूमिका निभा रहीं है। हालांकि सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण मुख्यधारा से वंचित लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए दिया गया है, लेकिन कभी-कभी इससे अलग-अलग जातियों के बीच संघर्ष और आंदोलन देखने को मिले है जिससे राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा पैदा हो गया है।

अक्सर ऐसा देखे गया हैं कि चुनावों के दौरान लोग आम तौर पर उम्मीदवार के धर्म और जाति के मद्देनजर वोट देते हैं, व्यक्ति की योग्यता के आधार पर नहीं। चुनाव के बाद जब राजनीतिक सत्ता किसी व्यक्ति या विशेष वर्ग के हाथों में होती है तो वह सबके लिए कार्य करने की बजाए अपने वर्ग या अपने धर्म के लोगों को लाभ देने की कोशिश करता है।

आर्थिक असमानता

सामाजिक विविधता के साथ-साथ हमारे देश में आर्थिक असमानता भी देखने को मिलती है। अमीर, जिनकी संख्या ज्यादा नहीं हैं, वे और अमीर हो रहे हैं जबकि अधिकांश गरीब लोग अपने दो वक़्त की रोटी का प्रबंध भी नहीं कर पा रहे है। अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ता हुआ यह अंतर उनके बीच परस्पर दुश्मनी पैदा कर रहा है। भाईचारे और सामाजिक सद्भाव की यह कमी राष्ट्रीय एकीकरण की भावनाओं को लोगों के दिलों में बसने नहीं दे रही है।

नेतृत्व का अभाव

समाज के सभी वर्गों में राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देने के लिए सही तरह का नेतृत्व का होना आवश्यक है। लेकिन कई बार ऐसा देखने में आया है की अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए सामाजिक और राजनीतिक नेताओं द्वारा जातीय, प्रांतीयवाद और सांप्रदायिकता भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया जाता है। उदाहरणस्वरुप महाराष्ट्र में शिवसेना सिर्फ स्थानीय मराठी लोगों का साथ देकर तथा बाहरी प्रदेशों से आकर बसे लोगों का विरोध कर हमेशा अपने राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देने की कोशिश करती है। इसके अलावा हमारे पास बहुत कम नेता हैं जो पूरे देश के लोगों को एकजुट करने की क्षमता रखते है तथा पूरा भारत उन्हें सम्मान के नज़रों से देखता है।

Yogesh Singh

Yogesh Singh, is a Graduate in Computer Science, Who has passion for Hindi blogs and articles writing. He is writing passionately for Hindikiduniya.com for many years on various topics. He always tries to do things differently and share his knowledge among people through his writings.

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