बाल मजदूरी

बच्चों को हमेशा भगवान (सर्वशक्तिमान) के बाद सबसे पवित्र रुप माना जाता है जो हमेशा खुशी, मस्ती, मासूमियत और आशा जगाने का प्रयास करने वाले समझे जाते हैं। एक देश के भविष्य का निर्धारण इस आधार पर होता है कि किस तरह से उस देश में बच्चों और महिलाओं के साथ व्यवहार होता है, आखिरकार, बच्चें आशा की किरण होते हैं, एक मजबूती की आशा, न केवल देश की अर्थव्यवस्था के लिए, बल्कि देश के कुशल मानव संसाधनों के साथ जिनकी पहुंच भारत में शिक्षा के सिद्धांतों के साथ युग्मित अस्तित्व के लिए आवश्यक आधारभूत सुख-सुविधाओं पर हो, के लिये भी बहुत जरुरी है।

ये प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है कि वो देश के लिये सुनिश्चित करे कि हमारे बच्चों का बचपन सुरक्षित है और दूषित नहीं हो रहा है, उदाहरण के लिये जैसे बाल श्रम जो गरीबी और लाचारी के कारण पैदा होता है।

बाल श्रम या बाल मजदूरी क्या है

बाल श्रम आमतौर पर मजदूरी के भुगतान के बिना या भुगतान के साथ बच्चों से शारीरिक कार्य कराना है। बाल श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, ये एक वैश्विक घटना है।

जहां तक भारत का संबंध है, ये मुद्दा बहुत ही पेचीदा है क्योंकि भारत में बच्चे पुराने समय से ही अपना माता-पिता के साथ खेतों में और अन्य प्रारम्भिक कार्यों में मदद कराते हैं। एक इससे ही संबंधित अन्य अवधारणा जिसकी इस समय व्याख्या करने की जरुरत है, वो है बंधुआ मजदूरी, जो शोषण का सबसे सामान्य रुप है। बंधुआ मजदूरी का अर्थ, माता-पिता द्वारा अत्यधिक ब्याज की दरों की अदायेगी के कारण, कर्ज के भुगतान के लिये बच्चों को मजदूरों के रुप में कार्य करने के लिये मजबूर करना है।

बंधुआ मजदूर की अवधारणा से जुड़ी अवधारणा शहरी बाल मजदूर अवधारणा है जहां मजदूर गली के बच्चे होते हैं जो अपना लगभग पूरा बचपन गलियों में मजदूरी करते हुये व्यतीत कर देते हैं।

बाल मजदूरी

यूनीसेफ ने बाल मजदूरी को 3 श्रेणी में विभाजित किया है:

  1. परिवार के साथ – बच्चे घर के कार्यों में बिना किसी वेतन के लगे होते हैं।
  2. परिवार के साथ पर घर के बाहर – उदाहरण के लिए, कृषि मजदूर, घरेलू मजदूर, सीमान्त मजदूर आदि।
  3. परिवार से बाहर – उदाहरण के रुप में, व्यवसायिक दुकानों जैसे: होटलों में बच्चों से कार्य कराना, चाय बेचने का कार्य कराना, वैश्यावृति आदि।

बाल मजदूरी के बढ़ने के कारण

अत्यधिक जनसंख्या, अशिक्षा, गरीबी, ऋण जाल आदि सामान्य कारण हैं जो इस मुद्दे के प्रमुख यंत्र है।

अत्यधिक ऋण जाल से ग्रस्त माता-पिता, सामान्य बचपन के महत्व को अपनी परेशानियों के दबाव के कारण समझने में असफल होते हैं और इस प्रकार ये बच्चों के मस्तिष्क का घटिया भावनात्मक और मानसिक संतुलन को नेतृत्व करता है जो कठिन क्षेत्रों या घरेलू कार्यों को करने के लिये तैयार नहीं होते।

राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी कपड़ों के उद्योग में अधिक काम और कम वेतन के भुगतान के लिये बच्चों को भर्ती करती है जो बिल्कुल अनैतिक है।

 

भारत में बाल श्रम कानून

भारत में बाल मजदूरी की समस्या सभी के लिये स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही एक चिन्ता का विषय बन गयी है। भारत के संविधान की प्रारुप समिति इस संबंध में बिना किसी अन्य देश की सिफारिशों के आधार पर, अपने दम पर कानून तैयार करना चाहती थी। जिस समय भारत ब्रिटिश साम्राज्य के शोषण के अधीन था, उसने केवल यही बोध कराया कि प्रावधान शोषणकारी मजदूरी के रुप को ध्यान में रखकर बनाये गये है और भारत शोषणकारी नृशंस शासन व्यवस्था के बीच है।

भारत में बाल मजदूरी को रोकने के लिये बनाये गये प्रारम्भिक कानून जब बना तब बाल रोजगार अधिनियम 1938 पारित हुआ। ये अधिनियम बड़े दुखान्त अंत के साथ असफल हुआ। इसके असफल होने का सबसे बड़ा कारण गरीबी का होना था क्योंकि निर्धनता बच्चों को मजदूरी करने के लिये मजबूर करती है।

भारतीय संसद ने बाल श्रम या मजदूरी से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये समय-समय पर कानून और अधिनियम पारित किये हैं। 14 साल की आयु से कम के बच्चों को किसी फैक्ट्री या खदानों में या खतरनाक रोजगारों (जहाँ जान जाने का ज्यादा जोखिम हो) में बाल मजदूरी को निषेध करने के लिये हमारे संविधान में अनुच्छेद 24 के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों को स्थापित किया गया है। इसके अलावा, अनुच्छेद 21 को अन्तर्गत, ये भी प्रावधान किया गया है कि, एक राज्य 6 से 14 साल तक के बच्चे के लिए मुफ्त शिक्षा के लिये सभी आधारिक संरचना और संसाधन उपलब्ध करायेगा।

संविधान के तहत बच्चों की बाल श्रम से सुरक्षा का नियमन करने के वाले कानूनों का एक समूह मौजूद है। कारखाना अधिनियम 1948, 14 साल तक की आयु वाले बच्चों को कारखाने में काम करने से रोकता है। खदान अधिनियम 1986, 18 साल से कम आयु वाले बच्चों का खदानों में काम करना निषेध करता है। बाल श्रम अधिनियम (निषेध एवं नियमन) 1986, 14 साल से कम आयु वाले बच्चों को जीवन को जोखिम में डालने वाले व्यवसायों में, जिन्हें कानून द्वारा निर्धारित की गयी सूची में शामिल किया गया है, में काम करना निषेध करता है। इसके अलावा, बच्चों का किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2000 ने बच्चों के रोजगार को एक दंडनीय अपराध बना दिया है।

आलोचनात्मक दृष्टि से, कानूनों की विशाल सारणी के बावजूद, बाल मजदूरों और नियोक्ताओं की कार्यकारी स्थितियों में कोई सुधार नहीं दिखायी देता है साथ ही बाल श्रम को निषेध करने वाले अधिनियम के प्रावधानों का स्वतंत्र रुप से उल्लंघन किया जा रहा है।

 

इस पर प्रकाश डालने की आवश्यकता है कि, इन प्रवाधनों का अतिक्रमण का अर्थ बुनियादी मानव अधिकारों का अभाव और बच्चों के बचपन को अर्थरहित करना है। बच्चे कहाँ और किस प्रकार के रोजगार के अन्तर्गत कार्य कर सकते हैं, के रुप में ये कानून अधिक स्पष्ट नहीं है। ये अधिनियम केवल 10% कार्यशील बच्चों को सुरक्षित करता है और इस प्रकार गैर-संगठित क्षेत्रों में लागू नहीं होता।

ये अधिनियम बाल मजदूर के परिवार को इस आधार पर भी छूट देता है यदि वो सभी बच्चों के रूप में एक ही कर्मचारी के साथ काम कर रहे हैं। यद्यपि, ये अधिनियम कुछ निश्चित जोखिम वाले उद्योगो और कारखानों में बच्चों के काम करने को निषेध करता है, लेकिन साथ ही ये खतरनाक कार्यों की व्याख्या नहीं करता। ये केवल खतरनाक रोजगारों की एक सूची प्रदान करता है।

बाल मजदूरी से लड़ने में अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की भूमिका

बाल मजदूरा के उन्मूलन पर अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम (आई.पी.ई.सी.एल.), अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन के अन्तर्गत 1991 में, बाल मजदूरी के बारे में जागरुकता का निर्माण एक वैश्विक मुद्दे के रुप में राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग करके, बाल मजदूरी के उन्मूलन के लिये शुरु किया गया था। भारत बाल श्रम का मुकाबला करने में मदद करने के लिए आई.पी.ई.सी.एल. के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाला पहला राष्ट्र था।

राष्ट्रीय स्तर कार्यक्रम (एन.सी.एल.पी.), उन मुख्य कार्यक्रमों में से एक है जो पूरे देश में शुरु किया गया था जिसमें वर्ष 1988 में, सात बाल श्रम कार्यक्रम शुरु किये गये थे। पुर्नवास, भारत सरकार द्वारा, भारत में बाल श्रम की घटनाओं को कम करने के लिये अपनायी गयी प्रमुख नीतियों में से एक है।

दुर्भाग्य से, संबंधित प्राधिकरण बाल श्रम के बढते हुये मामलों को नियंत्रित करने में बहुत से कारणों से असक्षम है। वो बच्चों के जन्म प्रमाण पत्रों के अभाव और जाली प्रमाण पत्रों के कारण बच्चों की सही आयु का अनुमान लगाने में असफल होते हैं। लोगों के बीच में जागरुकता लाने के लिये अधिक प्रयास नहीं किये गये हैं। यहाँ तक कि, यदि प्रयास बनाये भी गये हैं तो, वो सीमित जनसंख्या की जरुरत को पूरा करते हैं और अधिकारियों के बीच सहनशीलता दिखायी नहीं देती। जागरुकता कार्यक्रमों के संचालन के दौरान बहुत अधिक शिथिलता को देखा जा सकता है। इस मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर संबोधित करने के लिये समय समय पर कड़े नीतिगत ढाँचे की आवश्यकता अभी भी है।

बाल मजदूरी का कैसे उन्मूलन करें

बच्चों के अवैध व्यापार का अंत, गरीबी का उन्मूलन, मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा, और जीने का सामान्य स्तर, बड़े स्तर पर समस्या को कम कर सकता है। विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, गरीबी के उन्मूलन के लिये विकासशील देशों को ऋण प्रदान करके मदद करते हैं।

दलों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा शोषण को रोकने के लिये श्रम कानूनों का कड़ाई से पालन करना बहुत आवश्यक है। वर्तमान बाल श्रम निषेध कानूनों को कड़ाई से लागू करके स्थिति को नियंत्रित करने के लिये बहुत से संशोधनों की आवश्यकता है। निम्नतन सीमा 14 साल को कम से कम 18 साल तक बढ़ाने की आवश्यकता है। जोखिम वाले कार्यों की सूची जो वर्तमान में कानून के अन्तर्गत है, उसमें और अधिक व्यवसायों को शामिल करने की आवश्यकता है जिन्हे खतरनाक गतिविधियों के दायरे से बाहर रखा गया है।