बाल विवाह

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत बाल विवाह के मामले में दूसरे स्थान पर है। एक राष्ट्र जो अगली महाशक्ति के रुप में उभरता हुआ माना जा रहा है, उसके लिये ये एक परेशान करने वाली वास्तविकता है कि बाल विवाह जैसी बुराई अभी भी जारी है। शादी को दो परिपक्व (बालिग) व्यक्तियों की आपसी सहमति से बना पवित्र मिलन माना जाता है जो पूरे जीवनभर के लिये एक-दूसरे की सभी जिम्मेदारियों को स्वीकार करने के लिये तैयार होते हैं। इस सन्दर्भ के संबंध में, बाल विवाह का होना एक अनुचित रिवाज माना जाता है। तथ्य ये स्पष्ट करते हैं कि भारत में ये अभी भी प्रचलन में है इस व्याख्यित तथ्य के साथ कि इस बुराई को पूरी तरह से जड़ से उखाड़ना बहुत ही कठिन कार्य है।

बाल विवाह क्या है, इसकी अवधारणाएं और बाल विवाह के कारण

एक अवधारणा के रुप में बाल विवाह 18 साल की आयु पूरी करने से पहले का दो व्यक्तियों के बीच औपचारिक और गैर-औपचारिक बंधन है। इस रिवाज को मानव अधिकारों के दुरपयोग के रुप में देखा जाना चाहिये क्योंकि ये जबरन शादी का ही एक रुप है। भारतीय कानून के अनुसार, बाल विवाह वो है जिसमें लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम और लड़के की आयु 20 वर्ष से कम हो।

बाल विवाह भारत में एक इतिहास रखता है। ये दिल्ली सल्तनत के समय में अस्तित्व में आया जब राजशाही प्रथा प्रचलन में थी। भारतीय बाल विवाह को लड़कियों को विदेशी शासकों से बलात्कार और अपहरण से बचाने के लिये एक हथियार के रुप में प्रयोग किया जाता था। बाल विवाह को शुरु करने का एक और कारण था कि बड़े बुजुर्गों को अपने पौतो को देखने की चाह अधिक होती थी इसलिये वो कम आयु में ही बच्चों की शादी कर देते थे जिससे कि मरने से पहले वो अपने पौत्रों के साथ कुछ समय बिता सकें।

बाल विवाह का प्रभाव

एकबार शादी हाने के बाद, बेटी को अपना घर छोड़ने के लिये और दूसरों के साथ दूसरे स्थान पर रहने के लिये मजबूर होना पड़ता था जहाँ उसे उन सभी भूमिकाओं का निर्वहन करना करना होता था जिसके लिये वो मानसिक रुप से तैयार नहीं होती थी। एस नाबालिग लड़की के लिये माँ और बहू की जिम्मेदारी निभाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। ये अंत में अलगाव और अवसाद की ओर ले जाता है। पुरुषों के लिये भी, जिम्मेदारियों का निर्वहन करना कठिन हो जाता हैं क्योंकि उसे अपनी पत्नी की सभी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना होता है और साथ ही उसके साथ अपने वित्त को साझा करना पड़ता है।

इस प्रक्रिया में बचपन खो जाता हैं साथ ही खेलने और सीखने की स्वतंत्रता छीन ली जाती है। जल्दी शादी अत्यधिक जोखिम वाले कारकों को भी अपने साथ लाती है। एचआईवी जैसे यौन रोगों से ग्रस्त होने का बहुत खतरा रहता है। इसके अलावा, जिन लड़कियो की शादी जल्दी कर दी जाती वो गर्भास्था और इससे जुड़े विषयों के बारे में बहुत कम जानकारी रखती है। ऐसी माँ से जन्मे बच्चे कुपोषण और जन्म के समय कम वजन जैसी बीमारियों से पीड़ित होते है।

भारत में, बाल विवाह केरल राज्य, जो सबसे अधिक साक्षरता वाला राज्य है, में अब भी प्रचलन में है। यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल आपात निधि) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नगरीय क्षेत्रों से अधिक बाल विवाह होते है। आँकड़ो के अनुसार, बिहार में सबसे अधिक 68% बाल विवाह की घटनाएं होती है जबकि हिमाचल प्रदेश में सबसे कम 9% बाल विवाह होते है।

भारत में बाल विवाह रोकने के लिये कानून

भारतीय संविधान में विभिन्न कानूनों और अधिनियमों के माध्यम से बाल विवाह को रोकने के प्रावधान है। सबसे पहला कानून बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 था जो जम्मू और कश्मीर को छोड़कर पूरे भारत में लागू होता है। ये अधिनियम वयस्क लड़कों और लड़कों की आयु को परिभाषित करता है। यदि 18-21 आयु वर्ग वाले लड़के की शादी 18 साल से कम आयु की लड़की के साथ करायी जाती है तो इसके लिये 15 दिन से अधिक के कारावास के साथ साथ 1000 रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया जाता है। इस अधिनियम में 1940 में फिर से लड़को और लड़कियों के वयस्क होने की आयु बढ़ाने के लिये संशोधन किया गया।

 

एक दूसरा कानून जो अस्तित्व में है वो बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 है। इस अधिनियम में बाल विवाह निरोधक अधिनियम में निहित खामियों को संबोधित किया गया है। इस प्रकार, ये अधिनियम बाल विवाह को आंशिक रुप से सीमित करने के स्थान पर इसे सख्ती से प्रतिबंधित करता है। इस कानून के अन्तर्गत, बच्चे अपनी इच्छा से वयस्क होने के दो साल के अन्दर अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकते है। किन्तु ये कानून मुस्लिमों पर लागू नहीं होता जो इस कानून का सबसे बड़ी कमी है क्योंकि ये कानून भारत के सभी नागरिकों को एक सूत्र में बांधता है। इसके अलावा, नाबालिग के साथ यौन संबंध भी भारतीय दंड धारा 376 के अन्तर्गत एक अपराध है। ये मुद्दा वैवाहिक बलात्कार पर भ्रम उत्पन्न करता है जो इस बुराई को नियंत्रित करने में बहुत बड़ी बाधा है क्योंकि वैवाहिक बलात्कार भारत में अवैध नहीं है।

ये कानून आलोचना रहित नहीं है। इस बुराई को नियंत्रित करने में एक प्रमुख बाधा है कि इन शादियों को औपचारिक रुप से किया जाता है और इस प्रकार ये गैर-पंजीकृत रहती है। ज्यादातर, बच्चों की सही आयु को समझना बहुत कठिन कार्य बन जाता है क्योंकि वो अपना जन्म प्रमाण पत्र नहीं रखते है या यदि रखते भी है तो ये फर्जी होता है जो उनकी आयु को असंगत ढंग से वयस्क साबित करता है। इस तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने आवश्यकता है तभी ये कानून बाल विवाह को रोकने में समर्थ होगा। यदि कहीं भी बाल विवाह के बारे में सूचना मिले तो तुरन्त पुलिस को सूचित करना चाहिये।

बाल विवाह के बारे में सामाजिक जागरुकता को कैसे बढ़ाये

बच्चों को अपने मानव अधिकारों के बारे में जागरुक करना चाहिये और उन्हें ऐसे अवसरों पर मना करने और अपनी आवाज उठाने की शिक्षा दी जानी चाहिये। मीडिया को भी इस जघन्य रिवाज के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिये और अधिक सक्रिय भूमिका को अपनाने की जरूरत है। “बालिका बधु” जैसा मुख्याधारा कार्यक्रम सही दिशा में एक कदम है लेकिन कहीं ना कहीं अपने धारावाहिक की लोकप्रियता को बढ़ाने के लिये, मुख्य विषय बाल विवाह को पीछे छोड़ दिया गया है। एक बड़ा परिवर्तन लाने के लिये उचित मीडिया संवेदीकरण आवश्यक है।

एक तरफ ये माना गया है कि बाल विवाह को अभी पूरी तरह से खत्म करने में 50 वर्ष लगेंगे वास्तविक प्रयासों, सख्त कानूनी प्रावधानों को लागू करके काफी हद तक परिदृश्यों को बदला जा सकता है। पिछले दो दशकों से बाल विवाह के गिरने की दर हर साल 1% है लेकिन ये स्थिति बहुत धीमी है।

यूनिसेफ ने बाल विवाह की प्रथा को बड़े पैमाने पर रोकने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिये गैर सरकारी और सरकारी संगठनों के साथ भागीदारी की है। कॉरपैड (सेंटर फॉर एक्शन रिसर्च एंड पीपल्स डेवलपमेंट) और चाइल्ड लाइन जैसे संगठनों ने बाल विवाह से पीड़ित बच्चों के लिये .सामाजिक घरों और उनके वयस्क होने तक पर्याप्त धन और शिक्षा प्रदान करने प्रस्ताव दिया है। ये समझने की आवश्यकता है कि गरीबी और शिक्षा की कमी इस खतरे को पूरी तरह से समाप्त करने के प्रयासों में बाधा के प्रमुख कारक है।