भारत में लिंग असमानता

हम 21वीं शताब्दी के भारतीय होने पर गर्व करते हैं जो एक बेटा पैदा होने पर खुशी का जश्न मनाते हैं और यदि एक बेटी का जन्म हो जाये तो शान्त हो जाते हैं यहाँ तक कि कोई भी जश्न नहीं मनाने का नियम बनाया गया हैं। लड़के के लिये इतना ज्यादा प्यार कि लड़कों के जन्म की चाह में हम प्राचीन काल से ही लड़कियों को जन्म के समय या जन्म से पहले ही मारते आ रहे हैं, यदि सौभाग्य से वो नहीं मारी जाती तो हम जीवनभर उनके साथ भेदभाव के अनेक तरीके ढूँढ लेते हैं।

हांलाकि, हमारे धार्मिक विचार औरत को देवी का स्वरुप मानते हैं लेकिन हम उसे एक इंसान के रुप में पहचानने से ही मना कर देते हैं। हम देवी की पूजा करते हैं, पर लड़कियों का शोषण करते हैं। जहाँ तक कि महिलाओं के संबंध में हमारे दृष्टिकोण का सवाल हैं तो हम दोहरे-मानकों का एक ऐसा समाज हैं जहाँ हमारे विचार और उपदेश हमारे कार्यों से अलग हैं। चलों लिंग असमानता की घटना को समझने का प्रयास करते हैं और कुछ समाधानों खोजते हैं।

लैंगिक असमानता की परिभाषा और संकल्पना

‘लिंग’ सामाजिक-सांस्कृतिक शब्द हैं, सामाजिक परिभाषा से संबंधित करते हुये समाज में ‘पुरुषों’ और ‘महिलाओं’ के कार्यों और व्यवहारों को परिभाषित करता हैं, जबकि, 'सेक्स' शब्द ‘आदमी’ और ‘औरत’ को परिभाषित करता है जो एक जैविक और शारीरिक घटना है। अपने सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं में, लिंग पुरुष और महिलाओं के बीच शक्ति के कार्य के संबंध हैं जहाँ पुरुष को महिला से श्रेंष्ठ माना जाता हैं। इस तरह, ‘लिंग’ को मानव निर्मित सिद्धान्त समझना चाहिये, जबकि ‘सेक्स’ मानव की प्राकृतिक या जैविक विशेषता हैं।

लिंग असमानता को सामान्य शब्दों में इस तरह परिभाषित किया जा सकता हैं कि, लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव। समाज में परम्परागत रुप से महिलाओं को कमजोर जाति-वर्ग के रुप में माना जाता हैं। वह पुरुषों की एक अधीनस्थ स्थिति में होती है। वो घर और समाज दोनों में शोषित, अपमानित, अक्रमित और भेद-भाव से पीड़ित होती हैं। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव का ये अजीब प्रकार दुनिया में हर जगह प्रचलित है और भारतीय समाज में तो बहुत अधिक है।

भारत में लैंगिक असमानता के कारण और प्रकार

भारतीय समाज में लिंग असमानता का मूल कारण इसकी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार, “पितृसत्तात्मकता सामाजिक संरचना की ऐसी प्रक्रिया और व्यवस्था हैं, जिसमें आदमी औरत पर अपना प्रभुत्व जमाता हैं, उसका दमन करता हैं और उसका शोषण करता हैं।” महिलाओं का शोषण भारतीय समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक घटना है। पितृसत्तात्मकता व्यवस्था ने अपनी वैधता और स्वीकृति हमारे धार्मिक विश्वासों, चाहे वो हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से ही क्यों न हों, से प्राप्त की हैं।

उदाहरण के लिये, प्राचीन भारतीय हिन्दू कानून के निर्माता मनु के अनुसार, “ऐसा माना जाता हैं कि औरत को अपने बाल्यकाल में पिता के अधीन, शादी के बाद पति के अधीन और अपनी वृद्धावस्था या विधवा होने के बाद अपने पुत्र के अधीन रहना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में उसे खुद को स्वतंत्र रहने की अनुमति नहीं हैं।”

मनु द्वारा महिलाओं के लिये ऊपर वर्णित स्थिति आज के आधुनिक समाज की संरचना में भी मान्य हैं। यदि यहाँ-वहाँ के कुछ अपवादों को छोड़ दे तो महिलाओं को घर में या घर के बाहर समाज या दुनिया में स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेने की कोई शक्ति नहीं मिली हैं।

मुस्लिमों में भी समान स्थिति हैं और वहाँ भी भेदभाव या परतंत्रता के लिए मंजूरी धार्मिक ग्रंथों और इस्लामी परंपराओं द्वारा प्रदान की जाती है। इसीस तरह अन्य धार्मिक मान्याताओं में भी महिलाओं के साथ एक ही प्रकार से या अलग तरीके से भेदभाव हो रहा हैं।

हमारे समाज में लैंगिक असमानता की दुर्भाग्यपूर्ण बात भी महिलाएँ है, प्रचलित सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों के कारण उन्होंने पुरुषों के अधीन अपनी स्थिति को स्वीकार कर लिया हैं और वो भी इस समान पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अंग हैं।

महिलाओं के समाज में निचला स्तर होने के कुछ कारणों में से अत्यधिक गरीबी और शिक्षा की कमी भी हैं। गरीबी और शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी महिलाएं कम वेतन पर घरेलू कार्य करने, संगठित वैश्यावृति का कार्य करने या प्रवासी मजदूरों के रुप में कार्य करने के लिये मजबूर होती हैं। महिलाओं को न केवल असमान वेतन या अधिक कार्य कराया जाता हैं बल्कि उनके लिये कम कौशल की नौकरियाँ पेश की जाती हैं जिनका वेतनमान बहुत कम होता हैं। यह लिंग के आधार पर असमानता का एक प्रमुख रूप बन गया है।

लड़की को बचपन से शिक्षित करना अभी भी एक बुरा निवेश माना जाता हैं क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोड़कर दूसरे घर जाना पड़ेगा। इसलिये, अच्छी शिक्षा के अभाव में वर्तमान में नौकरियों कौशल माँग की शर्तों को पूरा करने में असक्षम हो जाती हैं, वहीं प्रत्येक साल हाई स्कूल और इंटर मीडिएट में लड़कियों का परिणाम लड़कों से अच्छा होता हैं। ये प्रदर्शित करता हैं कि 12वीं कक्षा के बाद माता-पिता लड़कियों की शिक्षा पर ज्यादा खर्च नहीं करते जिससे कि वो नौकरी प्राप्त करने के क्षेत्र में पिछड़ रही हैं।

सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, परिवार, खाना की आदतों के मामले में भी, वो केवल लड़का ही होता जिसे सभी प्रकार का पोष्टिक और स्वादिष्ट पसंदिदा भोजन प्राप्त होता हैं जबकि लड़की को वो सभी चीजें खाने को मिलती हैं जो परिवार के पुरुष खाना खाने के बाद बचा देते हैं जो दोनों ही रुपों गुणवत्ता और पोष्टिकता में बहुत ही घटिया किस्म का होता हैं और यही बाद के वर्षों में उसकी खराब सेहत का प्रमुख कारण बनता हैं। महिलाओं में रक्त की कमी के कारण होने वाली बीमारी एनिमीया (अरक्त्ता) और बच्चों को जन्म देने के समय होने वाली परेशानियों का प्रमुख कारण घटिया किस्म का खाना होता हैं जो इन्हें अपने पिता के घर और ससुराल दोनों जगह मिलता हैं इसके साथ ही असह्याय काम का बोझ जिसे वो बचपन से ढोती आ रही हैं।

अतः उपर्युक्त विवेचन के आझार पर कहा जा सकता हैं कि महिलाओं के साथ असमानता और भेदभाव का व्यवहार समाज में, घर में, और घर के बाहर विभिन्न स्तरों पर किया जाता हैं।

 

भारत में लैंगिक असमानता का महत्वपूर्ण डेटा:

वैश्विक सूचकांक:

लैंगिक असमानता भारत की विभिन्न वैश्विक लिंग सूचकांकों में खराब रैंकिंग को प्रदर्शित करती हैं।

  • यूएनडीपी के लिंग असमानता सूचकांक - 2014: 152 देशों की सूची में भारत की स्थिति 127वें स्थान पर हैं। सार्क देशों से संबंधित देशों में केवल अफगानिस्तान हि इन देशों की सूची में ऊपर हैं।
  • विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक लिंग अंतराल सूचकांक - 2014: विश्व के 142 देशों की सूची में भारत 114वें स्थान पर हैं। ये सूचकांक में चार प्रमुख क्षेत्रों में लैंगिक अंतर की जाँच करता हैं:
  • आर्थिक भागीदारी और अवसर।
  • शैक्षिक उपलब्धियाँ।
  • स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा।
  • राजनीतिक सशक्तिकरण।

इन सभी सूचकाकों के अन्तर्गत भारत की स्थिति इस प्रकार हैं:

  • आर्थिक भागीदारी और अवसर – 134।
  • शैक्षिक उपलब्धियाँ – 126।
  • स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा – 141।
  • राजनीतिक सशक्तिकरण – 15।

ये दोनों वैश्विक सूचकांक लिंग समानता के क्षेत्र में भारतकी खेद जनक स्थिति को प्रदर्शित करते हैं। बस केवल राजनीतिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में भारत की कार्य सराहनीय हैं लेकिन अन्य सूचकाकों में इसकी स्थिति बहुत खेदजनक हैं और इस स्थिति में सुधार करने के लिये बहुत अधिक प्रयास करने की जरुरत हैं।

लैंगिक असमानता सांख्यिकी

लिंग असमानता विभिन्न तरीकों में प्रकट होता है और भारत में जो सूचकांक सबसे अधिक चिन्ता का विषय हैं वो निम्न हैं:

  • कन्या भ्रूण हत्या
  • कन्या बाल-हत्या
  • बच्चों का लिंग अनुपात (0 से 6 वर्ग): 919
  • लिंग अनुपात: 943
  • महिला साक्षरता: 46%
  • मातृ मृत्यु दर: 1,00,000 जीवित जन्मों प्रति 178 लोगों की मृत्यु।

ये ऊपर वर्णित सभी महत्वपूर्ण सूचकांक में से कुछ सूचकांक हैं जो देश में महिलाओं की स्थिति को प्रदर्शित करते हैं।

कन्याभ्रूण हत्या और बाल-कन्या हत्या सबसे अमानवीय कार्य हैं और ये बहुत शर्मनाक हैं कि ये सभी प्रथाएं भारत में बड़े पैमाने पर प्रचलित हैं।

ये आँकड़े प्रदर्शित करते हैं कि कानूनों अथार्त् प्रसव-पूर्व निदान की तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) अधिनियम 1994, के बावजूद आज भी लिंग परीक्षण के बाद गर्भपात अपने उच्च स्तर पर हैं। मैकफर्सन द्वारा किये गये एक शोध के आँकड़े प्रदर्शित करते हैं कि भारत में लगभग 1,00,000 अवैध गर्भपात हर साल केवल इसलिये कराये जाते हैं क्योंकि गर्भ में पल रहा भ्रूण लड़की का भ्रूण होता हैं।

इसके कारण, 2011 की जनगणना के दौरान एक खतरनाक प्रवृत्ति की सूचना सामने आयी कि बाल-लिंग अनुपात (0 से 6 साल की आयु वर्ग वाले बच्चों का लिंग-अनुपात) 919 हैं जो पिछली जनगणना 2001 से 8 अंक कम था। ये आँकड़े प्रदर्शित करते हैं कि लिंग परीक्षण के बाद गर्भपातों की संख्या में वृद्धि हुई हैं।

 

जहाँ तक पूरे लिंग-अनुपात की बात हैं, 2011 की जनगणना के दौरान ये 943 था जो 2001 की 933 की तुलना में 10 अंक आगे बढ़ा हैं। यद्यपि ये एक अच्छा संकेत हैं कि पूरे लिंग-अनुपात में वृद्धि हुई हैं लेकिन ये अभी भी पूरी तरह से महिलाओं के पक्ष में नहीं हैं।

2011 के अनुसार पुरुषों की 82.14% साक्षरता की तुलना में महिला साक्षरता 65.46% हैं। ये अन्तराल भारत में महिलाओं के साथ व्यापक असमानता को प्रदर्शित करता हैं साथ ही ये भी इंगित करता हैं कि भारतीय महिलाओं की शिक्षा की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं।

ये सभी संकेतक लिंग समानता और महिलाओं के मूलभूत अधिकारों की ओर से भारत की निराजनक स्थिति को प्रदर्शित करते हैं। इसलिये प्रत्येक साल भारतीय सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करती हैं ताकि इनका लाभ महिलाओं को प्राप्त हो लेकिन जमीनी हकीकत ये कि इतने कार्यक्रमों के लागू किये जाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कोई खास परिवर्तन नजर नहीं आता। ये परिवर्तन तभी दिखायी देंगें जब समाज में लोगों के मन में पहले से बैठे हुये विचार और रुढ़िवादिता को बदला जायेगा, जब समाज खुद लड़के और लड़कियों में कोई फर्क नहीं करेगा और लड़कियों को कोई बोझ नहीं समझेगा।

लैंगिक असमानता के खिलाफ कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा उपाय

लिंग असमानता को दूर करने के लिये भारतीय संविधान ने अनेक सकारात्मक कदम उठाये हैं; संविधान की प्रस्तावना हर किसी के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने के लक्ष्यों के साथ ही अपने सभी नागरिकों के लिए स्तर की समानता और अवसर प्रदान करने के बारे में बात करती है। इसी क्रम में महिलाओं को भी वोट डालने का अधिकार प्राप्त हैं।

संविधान का अनुच्छेद 15 भी लिंग, धर्म, जाति और जन्म स्थान पर अलग होने के आधार पर किये जाने वाले सभी भेदभावों को निषेध करता हैं। अनुच्छेद 15(3) किसी भी राज्य को बच्चों और महिलाओं के लिये विशेष प्रावधान बनाने के लिये अधिकारित करता हैं। इसके अलावा, राज्य के नीति निदेशक तत्व भी ऐसे बहुत से प्रावधानों को प्रदान करता हैं जो महिलाओं की सुरक्षा और भेदभाव से रक्षा करने में मदद करता हैं।

इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों के अलावा, विभिन्न सुरक्षात्मक विधान भी महिलाओं के शोषण को खत्म करने और समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा देने के लिए संसद द्वारा पारित किये गये है। उदाहरण के लिये, सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम 1987 के अन्तर्गत सती प्रथा को समाप्त करने के साथ ही इस अमानवीयकृत कार्य को दंड़नीय अपराध बनाया गया। दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, दहेज की प्रथा को खत्म करने के लिए; विशेष विवाह अधिनियम, 1954 अंतर्जातीय या अंतर-धर्म से शादी करने वाले विवाहित जोड़ों के विवाह को सही दर्जा देने के लिए; प्रसव पूर्व निदान तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) विधेयक (कन्या भ्रूण हत्या और कई और इस तरह के कृत्यों को रोकने के लिए 1991 में संसद में पेश किया गया, 1994 में पारित किया है) इलके अलावा संसद समय-समय पर समाज की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार लागू नियमों में महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुये बहुत से सुधार करती रहती हैं, उदाहरण के लिये, भारतीय दंड संहिता 1860 में धारा 304- बी. को दहेज-केस दुल्हन की मृत्यु या दुल्हन को जलाकर मार देने के कुकृत्य को विशेष अपराध बनाकर आजीवन कारावास का दंड़ देने का प्रावधान किया गया हैं।

भारत में महिलाओं के लिये बहुत से संवैधानिक सुरक्षात्मक उपाय बनाये हैं पर जमीनी हकीकत इससे बहुत अलग हैं। इन सभी प्रावधानों के बावजूद देश में महिलाएं के साथ आज भी द्वितीय श्रेणी के नागरिक के रुप में व्यवहार किया जाता हैं, पुरुष उन्हें अपनी कामुक इच्छाओं की पूर्ति करने का माध्यम मानते हैं, महिलाओं के साथ अत्याचार अपने खतरनाक स्तर पर हैं, दहेज प्रथा आज भी प्रचलन में हैं, कन्या भ्रूण हत्या हमारे घरों में एक आदर्श है।

हम लैंगिक असमानता कैसे समाप्त कर सकते हैं

संवैधानिक सूची के साथ-साथ सभी प्रकार के भेदभाव या असमानताएं चलती रहेंगी लेकिन वास्तिविक बदलाव तो तभी संभव हैं जब पुरुषों की सोच को बदला जाये। ये सोच जब बदलेगी तब मानवता का एक प्रकार पुरुष महिला के साथ समानता का व्यवहार करना शुरु कर दे न कि उन्हें अपना अधीनस्थ समझे। यहाँ तक कि सिर्फ आदमियों को ही नहीं बल्कि महिलाओं को भी औज की संस्कृति के अनुसार अपनी पुरानी रुढ़िवादी सोच बदलनी होगी और जानना होगा कि वो भी इस शोषणकारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक अंग बन गयी हैं और पुरुषों को खुद पर हावी होने में सहायता कर रहीं हैं।

इसलिए, महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता हैं, जहाँ महिलाएं आर्थिक रुप से स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बन सकती हैं, जहाँ वो अपने डर से लड़कर दुनिया में भयमुक्त होकर जा सकती हैं, जहाँ वो अपने अधिकारों को पुरुषों की जेब में से निकाल सकती हैं और इसके लिये उन्हें किसी से पूछने की भी आवश्यकता नहीं हैं, जहाँ वो अच्छी शिक्षा प्राप्त करके अच्छा भविष्य व अपनी सम्पति की स्वंय मालिक बन सकती हैं और इन सबसे से भी ऊपर उन्हें मनु के समय से लगाई गयी सीमाओं से बाहर निकलकर चुनाव करने व अपने निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता मिलती हैं।

हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हमारा सहभागी लोकतंत्र, आने वाले समय में और पुरुषों और महिलाओं के सामूहिक प्रयासों से लिंग असमानता की समस्या का समाधान ढूँढने में सक्षम हो जायेंगा और हम सभी को सोच व कार्यों की वास्तविकता के साथ में सपने में पोषित आधुनिक समाज की और ले जायेगा।

 

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