भारत में समलैंगिकता

भारत सभी प्रकार के विश्वासों, मान्यताओं, आस्थाओं, दर्शन, नीतियों और रहने के तरीकों की लम्बी सहिष्णुता की परम्पराओं को रखता हैं। हांलाकि भारत पूरी तरह से धार्मिक देश हैं लेकिन इसके साथ ही ये एक ऐसा देश हैं, जिसने गैर-धार्मिक समुदायों को भी स्वीकार किया हैं। प्राचीन भारतीय समाज सभी प्रकार की विविध संस्कृतियों, कलाओं और साहित्यों को अपने में समाहित किये हुये था। एक स्थान पर हम शुद्धता व वास्तविकता की प्रतीक धार्मिक कलाकृतियों या मूर्तियों जैसे कौणार्क या जगन्ननाथ पुरी के मन्दिर और वहीं दूसरी ओर खुजरोहो के स्मारकों जो पूरी दुनिया में अपनी कामुक कला और मूर्तियों के लिये प्रसिद्ध हैं, को रखते हैं; जिसमें कुछ समलैंगिक गतिविधियों की भी मूर्तियाँ शामिल हैं। ये प्रदर्शित करता हैं कि प्राचीन काल में न केवल सभी तरह के यौन झुकाव थे बल्कि लोग इतने सहिष्णु और खुले विचारों के थे कि समलैंगिक-प्रेम की मूर्तियों को स्वतंत्रता के साथ बनाकर प्रदर्शित भी किया।

आधुनिक समाज कहीं ना कहीं उन सब चीजों के लिये कम सहिष्णु हैं जो उनके बनायी गयी परम्पराओं के अनुसार व्यवहारिक और सामान्य नहीं हैं। जब हम सामाजिक व्यवहार का अध्ययन धार्मिक अल्पसंख्यकों जैसे इस्लाम या ईसाई या यौन अल्पसंख्यकों जैसे समलैंगिकों (एक समान लिंग वाले व्यक्तियों का आपस में प्रेम संबंध) के परिपेक्ष्य में करते हैं, तो इन सभी मामलों पाते हैं कि बहुसंख्यक लोग अल्पसंख्यकों को लक्ष्य बनाकर व्यापक स्तर पर उनका शोषण और विरोध करते हैं।

प्राचीन भारत की तरह न होकर, वर्तमान भारत में लोग समलैंगिक लोगों के साथ समानता का व्यवहार नहीं कर पा रपहे हैं और जिसके कारण वर्तमान समाज में मानव अधिकारों का लगातार उल्लंघन हो रहा हैं।

भोजन, आवास और पानी की तरह ही यौन आवश्यकता भी मानव की आधारभूत आवश्यकताओं में से एक हैं जिसके बिना न तो जीवन का पूरी तरह से अहसास हो सकता हैं न ही उसका आनंद लिया जा सकता हैं। यौन झुकाव प्रत्येक व्यक्ति के लिये अलग हो सकता हैं। अनियमित यौन व्यवहार के लोग अल्पमत हैं, लेकिन वे वास्तविकता में हैं। अनियमित यौन व्यवहार को इस तरह समझा जा सकता हैं कि इस प्रकार के व्यक्तियों के लिये विपरित लिंग के प्रति कोई आकर्षण न होकर समान लिंग के प्रति आकर्षण होता हैं।

Homosexuality

समलैंगिकता क्या हैं?

ये प्राकृतिक नियम हैं कि एक व्यक्ति दूसरे विपरीत लिंग के प्रति लैंगिक दृष्टि से या भावनात्मक रुप से जुड़ा होता हैं जैसे: आदमी औरतों की ओर आकर्षित होते हैं और इसके विपरीत भी। लेकिन कुछ समय और कुछ मामलों में ये लैंगिक और भावनात्मक आकर्षण विपरीत लिंग के प्रति न होकर समान लिंग के व्यक्ति की तरफ होता हैं। समान लिंग के प्रति आकर्षण और झुकाव ही समलैंगिकता हैं और ऐसे झुकाव वाले व्यक्ति समलैंगिक कहे जाते हैं। समलैंगिक व्यक्ति दोनों लिंग के हो सकते हैं जैसे: गे (आदमी का आदमी से शारीरिक संबंध), लेसबियन (औरत का औरत से शारीरिक संबंध)। समलैंगिक झुकाव के लिये एक और शब्द प्रयोग किया जाता हैं एल.जी.बी.टी.। लेसबियन, गे, बाइसेक्सुयल और ट्रांसजेंडर का संक्षिप्त नाम हैं।

समलैंगिकता के कारण

इस प्रकार के लैंगिक व्यवहार या चुनाव के पूरी तरह से ज्ञात नहीं है लेकिन विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा किये गये बहुत से शोधों से अलग-अलग परिणाम और व्याख्याएं पायी गयी हैं। इसके पीछे का कारण जैविक, मानसिक या दोनों का मिश्रण हो सकता हैं।

जैविक कारण

बहुत से वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला हैं कि कोई भी व्यक्ति एक विशेष लैंगिक झुकाव के साथ पैदा होता हैं और ये उसके जीन में होता हैं। अतः ये एक प्राकृतिक घटना हैं। लेकिन इस निष्कर्ष का कोई सबूत नहीं हैं कि समलैंगिक व्यवाहर एक साधारण जैविक घटना हैं। लैंगिक चुनाव में आनुवांशिकता एक कारक हो सकती हैं लेकिन इसके साथ ही और कारकों की भी उपस्थिति होती हैं।

सामाजिक व मानसिक कारण

ये वास्तविकता हैं कि सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण एक बच्चें के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। किसी का परिवार, मित्र, समाज और अनुभव ही उसके जीवन के प्रति दृष्टिकोण, भावनाओं और उसका/उसकी गतिविधियों को निर्धारित करता हैं। किसी की लैंगिक झुकाव के लिये मनौवैज्ञानिक कारक बहुत महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन ये सत्य हैं कि केवल एक ही कारक नहीं बल्कि बहुत से कारकों का मिश्रण किसी की लैंगिक झुकाव का कारण बनता हैं। और ये प्राकृतिक हैं कि किसी भी व्यक्ति अपनी पसंद के अनुसार क्या खाना हैं. क्या पहनना हैं और किस तरह रहना हैं; चुनने का पूरा अधिकार हैं इसी तरह ये भी प्राकृतिक हैं कि वो ये निर्णय भी खुद ले कि उसे किसके साथ अपने यौन संबंध बनाने हैं, समान लिंग के साथ या विपरीत लिंग के साथ।

 

समलैंगिकों के खिलाफ भेदभाव

हमारे समाज में समलैंगिकों के साथ बहुत अधिक तथा सभी स्तरों पर भेदभाव किया जाता हैं; जिसकी शुरुआत उनके घर से, उसके बाद बाहर, समाज, देश और पूरे विश्व में होनी शुरु हो जाती हैं। उनका पूरा जीवन संघर्ष से भर जाता सिर्फ इसलिये कि वो एक विशेष लैंगिक झुकाव के साथ पैदा हुये हैं जो दूसरों से अलग हैं। जबकि ये बहुत से मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक शोधों से स्पष्ट हो गया हैं कि इस प्रकार का व्यवहार प्राकृतिक हैं।

हमारा समाज बहुत ही जटिल हैं; एक तरफ तो हम विश्व के अत्याधुनिक वैज्ञानिक, जो सभी प्रकार के उदारवादी विचारों और विश्वासों को मानते हैं, दूसरी तरफ बहुत ही रुढ़िवादी मान्यताओं और विचारों को धारण करने वाले समाज को रखते हैं। हम विशेष रुप से तथाकथित निषेध सामाजिक मुद्दों का सामना करने से बचते हैं जैसे: विवाह से पहले शारीरिक-यौन संबंध, लिव-इन-रिलेशनशिप (बिना शादी किये एक-साथ रहना), धर्म या जाति से बाहर किसी से शादी, लव-मेरिज आदि। हमारे समाज में समलैंगिकता सबसे ज्यादा घृणास्पद और बचने वाला मुद्दा हैं। यहाँ तक कि गे और लेसबियन शब्दों के उल्लेख को भी सख्ती से मना किया गया हैं। अतः पूरा समाज अपने से अलग या तथाकथित अप्राकृतिक लैंगिक व्यवहार वाले व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता।

एल.जी.बी.टी. समुदाय के व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव काफी आम है और इसकी शुरुआत हमारे अपने घरों से होती हैं, उनके परिवार के अपने सदस्य इसे खुद एक बीमारी तरह व्यवहार करते हैं या इसे दूर करने के लिये उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं। यहाँ तक कि परिवार के सदस्य समाज में शर्मिदगी महसूस करते हैं. यदि उनेक घर से में कोई सदस्य इस तरह का लैंगिक झुकाव रखता हैं।

घर के बाहर, जैसे: कार्यस्थल पर, स्कूल और कॉलेज में या किसी भी सार्वजनिक जगह पर वो लोगों के बहुत ही घृणापूर्ण व्यवहार का अनुभव करते हैं। लोग उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते हैं। उनको सभी जगह लक्षित करके घृणित टिप्पणी और गन्दे, भद्दे जोक (चुटकुले) सुनाये जाते हैं। उनका भद्दा मजाक बनाया जाता हैं। समस्या ये हैं कि उनके बात करने के तरीके और चलने के तरीके से उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता हैं और इस तरह वो आसानी से अप्रिय टिप्पणियों, भद्दें मजाकों का विषय बन जाते हैं। हम स्वंय अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी, एक दूसरे को मैसेज भेजकर या मजाकों में एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोगों की जिंदगी के बारे में खिल्ली उड़ाते हैं। यहाँ तक कि हमारे सिनेमा में भी इस समुदाय के लोग दर्शकों के सामने एक मजाकिया पात्र के रुप में प्रदर्शित किये जाते हैं।

कुल मिलाकर समाज की आम धारणा ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ हैं और हम उन्हें अपने में से एक मानने को तैयार नहीं हैं।

भारत में कानून और समलैंगिकता

भारत बहुत ही प्रगतिशील और गतिशील संविधान रखता हैं जो एक तरह से विशाल और जटिल राज्य की रीढ़ की हड्डी हैं। भारतीय संविधान ने अधिकार दिये हैं और देश के सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करता हैं, चाहे वो बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक। संविधान सभी से बिना किसी भेदभाव के एक समान व्यवहार करता हैं। ये सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य हैं कि किसी के भी साथ भेदभाव न हो।

एल.जी.बी.टी. समुदाय एक अल्पसंख्यक समुदाय हैं और संविधान के अनुसार वो भी समान हैं। लेकिन उनका समानता का अधिकार और समाज में समान व्यवहार के अधिकार का नियमित रुप से उल्लंघन हो रहा हैं। न केवल समाज या सभी लेकिन राज्य तंत्र भी उनके साथ अलग ढंग से व्यवहार करता हैं विशेषतः पुलिस. वो अधिकारों के उल्लंघन के लिए नियमित रूप से शिकार बन रहे हैं। वो अपने बुनियादी मानव अधिकार और जीवन का अधिकार जिसमें जीवन का पूरा आनंद लेकर जीने का अधिकार शामिल है, से वंचित हैं।

 

एल.जी.बी.टी. समुदाय के लिये आई.पी.सी. की धारा 377

हमारे कानूनों में प्रमुख कमी या विवादास्पद कानूनी प्रावधान में से एक भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 377 है।

आई.पी.सी. की धारा 377 कहती है:

अप्राकृतिक अपराध: "जो कोई भी स्वेच्छा से किसी भी आदमी, औरत या जानवर के साथ प्रकृति के आदेश के खिलाफ शारीरिक संभोग करेगा, आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा, या उल्लेख की अवधि तक कारावास में रखा जायेगा जिसे 10 साल तक बढाया जा सकता हैं और जो जुर्माना भरने के लिये भी उत्तरदायी होगा।"

व्याख्या: इस धारा में प्रवेश को शारीरिक समागम बनाने के लिये आवश्यक अपराध मानते हुये व्याख्या की गयी हैं।

इस प्रकार ये धारा किसी भी यौन गतिविधि को जो प्रकृति के खिलाफ हो आपराधिक अपराध का बनाती हैं। इस तरह के स्वैच्छिक कार्य भी दंडनीय है। इस प्रकार इस तरह की गतिविधि के लिए एक ही लिंग के दो व्यक्तियों के बीच सहमति सारहीन है।

इसलिए, धारा 377 समलैंगिक गतिविधि का अपराधीकरण करती हैं और इसे उच्च दंड जैसे आजीवन कारावास, के लिये दंडनीय बनाती है।

भारतीय दंड संहिता का ये प्रावधान हाल के दिनों में एक प्रमुख विवादास्पद बिंदु और बहस का विषय बन गया है। एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोग धारा 377 से इसे अपराधमुक्त बनाने के लिए हमारे सांसदों को समझाने और कभी कभी दबाव डालकर प्रयास कर रहे हैं। दूसरे शव्दों में, एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोग इस बात की माँग कर रहे हैं कि यदि दो समान लिंग वाले व्यक्ति एक दूसरे के साथ आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं तो इसे अपराध की श्रेणी में न रखा जाये।

लेकिन जब उनकी याचिका पर हमारी विधायिकाओं द्वारा प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गई तो वो एक जनहित याचिका (पीआईएल) के माध्यम से अपनी शिकायतों के लिए सिर्फ उपयुक्त समाधान के लिए अदालत में गये। ये जनहित याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय में एक गैर सरकारी संगठन अर्थात् नाज फाउंडेशन की ओर से दायर कि गयी थी।

दिल्ली सरकार बनाम नाज फाउंडेशन (दिल्ली हाईकोर्ट,2009) में इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुये धारा 377 को गैर-कानूनी घोषित कर दिया क्योंकि ये अकेले में एक ही लिंग के दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से यौन गतिविधि को अपराधीकृत करती हैं। इस तरह, दिल्ली सरकार ने अपने ऐतिहासिक फैसले को सुनाते हुये एल.जी.बी.टी. समुदाय के यौन संबंध को सही ठहराया।

सुप्रीम कोर्ट और एल.जी.बी.टी. अधिकार

दिल्ली हाई कोर्ट के नाज़ फाउडेंशन के पक्ष में सुनाये गये फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गयी।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक दूरगामी निर्णय को खारिज कर दिया और स्थिति को पहले की तरह कर दिया, दुबारा समलैंगिक रिश्ता एक अपराध हैं। इस निर्णय से एल.जी.बी.टी. समुदाय के साथ ही समाज के उदारवादी विचारधारा के लोगों को भी आश्चर्यचकित कर दिया। इस पर सुप्रीम कोर्ट नें कारण दिया हैं कि भारतीय समाज समान लिंग संबंधों को स्वीकार करने के लिये अभी भी पूरी तरह से परिपक्व नहीं हैं और यदि धारा 377 में बदलाव करके समलैंगिकता को वैध बनाना हैं तो इसमें बदलाव संसद द्वारा किया जायेगा न कि सुप्रीम कार्ट द्वारा।

बहुत से कानूनी और संवेधानिक विशेषज्ञों ने इस निर्णय की आलोचना की कि ये एक अप्रगतिशील और निराशाजनक निर्णय हैं। विशेषज्ञों का ये मानाना हैं कि सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुरक्षित रखते हुये संसद को धारा 377 में बदलाव के आदेश देने चाहिये थे। लेकिन दुर्भाग्यवश सुप्रीम कोर्ट इस तरह की उम्मीदों को पूरा करने और यौन अल्पसंख्यकों के बुनियादी मानव अधिकार की सुरक्षा करने में फेल हो गया।

इस तरह वर्तमान परिदृश्य के अनुसार, एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोगों को फिर से खुद को असुरक्षित और सामाजिक भेदभाव महसूस कर रहे हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर कोई आधिकारिक फैसलै दे दिया होता तो ये मुद्दा सदैव के लिये सुलझ जाता हैं। देश का सर्वोच्च न्यायालय होने के नाते सुप्रीम कार्ट से एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोगों के अधिकारों के ज्ञात होने की अपेक्षा की जा रही थी, लेकिन विशेषज्ञों का मानाना हैं कि एस.सी. ने एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोगों को समानता के मानव अधिकार न देकर अपने हाथों से एक ऐतिहासिक अवसर को खो दिया।

अब फिर से गेंद हमारे कानून निर्माताओं के हाथों में हैं कि समान लिंग वाले व्यक्तियों के बीच अकेले में अपसी सहमति से बने यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से हटा दिया जाये। एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोगों के लिये बस देश की संसद से उम्मीद बंधी हैं।

सुझाव:

21वीं शताब्दी में भारत सर्वशक्ति और विश्व का नेता बनने के लिये कोशिश कर रहा हैं, वास्तव में इसमें विश्व की सर्वोच्च शक्ति बनने की पूरी क्षमता हैं। लेकिम इस क्षमता पर पूरी तरह से विश्वास तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि हम एक समाज के रुप में तथाकथित निषेध मुद्दों जैसे समलैंगिकता को न केवल स्वतंत्रता से स्वीकार करे बल्कि उन पर स्वतंत्र रुप से बहस भी करें।

और इसके लिये भारत के लोगों की सोच बदलनी होगी। इसके लिये सबसे पहला कदम स्कूल और घरों में यौन शिक्षा देना हैं। एक बच्चे के लिये ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिसमें वो न केवल अपने माता-पिता से यौन मुद्दों से संबंधित समस्याओं और विषयों पर आराम से बात कर सके बल्कि अपनी लैंगिक पसंद के बारे में अपने अध्यापकों और परिवार वालों को भी बता सके; ये भी महत्वपूर्ण हैं कि माता-पिता और शिक्षक उसकी बातों को सुनकर सराहना करें, उसका मार्ग दर्शन भी करें। इसलिये केवल बच्चों के लिये ही नहीं बल्कि बढ़ते हुये बच्चों और वयस्कों को भी यौन से संबंधित विषयों पर संवेदनशीलता के साथ शिक्षित करना चाहिये।

पुलिस के रूप में कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी संवेदनशील बनाने की जरूरत है, ताकि वो एल.जी.बी.टी. लोगों की वास्तविक चिंताओं को समझने और उनके प्रयासों की सराहना करने में सक्षम हो जायेंगें।

इसी तरह, हमारे मीडिया और फिल्म बिरादरी को क्रमशः उनके शो और फिल्मों में इस तरह के लोगों का चित्रण करते हुए अधिक विचारशील होने की आवश्यकता हैं। वास्तव में वो एल.जी.बी.टी. लोगों और उनके यौन पसंद के बारे में सही जानकारी के प्रसार में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और समाज में उनकी स्थिति और परिस्थितियों की एक वास्तविक तस्वीर सामने रख सकती है।

इस सब के अतिरिक्त, एल.जी.बी.टी. लोगों के ऊपर कलंक को दूर करने में सबसे महत्वपूर्ण भी कदम भारतीय दंड संहिता की धारा 377 से अपराधमुक्त करना है ताकि वो भी सभी ती तरह एक नियमित सामन्य जीवन जी सकें और उत्पीड़न या भेदभाव के बिना उनके बुनियादी मानव अधिकारों का लाभ उठा सकें। उम्मीद हैं कि हमारे सांसद जल्द ही उनकी अधिकारपूर्ण याचिका सुनेंगें और कानून में आवश्यक बदलावों को संभव करेंगें।