किशोर अपराध

भारत में किशोर अपराध और कानून

बच्चों को भगवान का रुप माना जाता है और महान व्यक्ति के साथ ही राष्ट्रीय सम्पत्ति भी माना जाता है। वैयक्तिक रुप से, माता-पिता, अभिभावक और पूरे समाज के रुप में हमारा एक नैतिक कर्तव्य है कि हम बच्चों के लिये स्वस्थ्य सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में बड़ा होने की अनुमति और अवसर प्रदान करें ताकि वो जिम्मेदार नागरिक, शारीरिक रुप से तंदरुस्त, मानसिक सतर्क और नैतिक रुप से स्वस्थ्य बन सकें। ये राज्य का कर्त्तव्य है कि वो सभी बच्चों को उनकी बढ़ती हुई आयु की समयावधि पर विकास के लिये समान अवसर प्रदान करे जो असमानता को कम करके और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित कर सके। बच्चों से आज्ञाकारी, बड़ों का आदर करने वाला और अपने अंदर अच्छे गुणों को धारण करने वाले होने की अपेक्षा की जाती है। हालांकि, बहुत से कारणों के कारण बच्चों का एक निश्चित प्रतिशत पहले से कही हुई सामाजिक और वैध उक्तियों को नहीं मानते। इस तरह के बच्चे अधिकतर अपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं जिसे बाल अपराध या किशोर अपराध के रुप में जाना जाता है।

भारत में किशोरों द्वारा अपराध एक कड़वी वास्तविकता है। वर्तमान समय में किशोर बहुत से खतरनाक अपराधों में शामिल पाये जाते हैं जैसे: हत्या, सामूहिक दुष्कर्म आदि। ये एक चिन्ता का विषय है और पूरा समाज बच्चों द्वारा किये जाने वाले इस तरह के अपराधिक कृत्यों से दुखी है। बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान कानून स्थिति को नियंत्रित करने के लिये अपर्याप्त है और हमें इसमें बदलाव लाने की जरुरत है ताकि खतरनाक अपराधों के लिये किशोरों को भी वयस्कों की तरह दंडित किया जाये। लेकिन इसके साथ ही बहुत से लोग इसके विरोध में भी हैं जो इस विचार को नहीं मानते हैं।

प्रस्तुत लेख में, हम ये जानने की कोशिश करेगें कि किशोर कौन है; किशोरों द्वारा किये जाने वाले अपराध; इनके कारण; सरकार द्वारा इसके लिए कानून और बदलाव के सुझाव।

किशोर कौन हैं?

किशोर का अर्थ एक व्यक्ति से है जो बहुत युवा, बालक, कुमार या वयस्क होने वाली आयु से कम हो। दूसरे शब्दों मे, किशोर का अर्थ है कि जो बच्चा अभी वयस्कों की आयु तक न पहुँचा हो जिसका तात्पर्य उसके अभी भी बालपन और अपरिपक्व होने से है। कभी-कभी “बच्चा” शब्द “किशोर” के स्थान पर भी प्रयोग होता है।

कानूनीरुप में कहा जाये तो, एक किशोर को उस बच्चे के रुप में परिभाषित किया जा सकता है जिसने अभी निश्चित आयु प्राप्त न की हो और देश के कानून के तहत उसे अपने किये हुये अपराधों के लिये वयस्क की तरह जिम्मेदार न ठहराया जा सके। किशोर, एक बच्चा है जो निश्चित कार्य या चूक से संबंधित हो जो उस किसी भी कानून का उल्लंघन करता हो और जिसे अपराध घोषित किया गया हो।

कानून के शब्दों में, एक किशोर वो व्यक्ति होता है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम हो। ये एक कानूनी महत्व रखता है। किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम, 2000 के अनुसार एक किशोर यदि वो किसी भी अपराधिक गतिविधि में शामिल है तो कानूनी सुनवाई और सजा के लिये उसके साथ एक वयस्क की तरह व्यवहार नहीं किया जायेगा।

किशोर और नाबालिग के बीच अन्तर

हालांकि, हम आम भाषा में दोनों शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के स्थान पर देते हे लेकिन ‘किशोर’ और ‘नाबालिग’ कानूनी भाषा में विभिन्न संदर्भों में प्रयोग किये जाते हैं। किशोर शब्द आपराधिक अपराधी के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है और नाबालिग शब्द कानूनी क्षमता या व्यक्ति की वयस्कता से संबंधित होता है।

भारत में किशोर अपराध

भारत में सामान्य रुप में छोटे अपराध और विशेषरुप में जघन्य अपराध बच्चों द्वारा नियमित रुप से किये जा रहे हैं। चोरी, सेंधमारी, झटके से छीनने जैसे अपराध जिनकी प्रकृति बहुत गंभीर नहीं है या डकैती, लूटमार, हत्या और दुष्कर्म आदि जैसे अपराध जो गंभीर प्रकृति से संबंधित है पूरे देश में उत्थान पर हैं। और सबसे दुर्भाग्य की बात ये है कि इस तरह के सभी अपराध 18 साल की आयु से कम के बच्चों द्वारा किये जा रहे हैं।

किशोरों के बीच ये विशेष प्रचलन में है कि 16 से 18 वर्ष की आयु समूह वाले किशोर इन जघन्य अपराधों में अधिक शामिल पाये जाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिपार्ट ब्यूरो के अनुसार, 2013 के आंकड़े दिखाते है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत नाबालिगों के खिलाफ 43,506 और विशेष स्थानीय कानून के तहत किशोरो द्वारा जिनकी आयु 16 से 18 वर्ष के बीच है के खिलाफ 28,830 अपराधिक मामले दर्ज हैं। आंकड़े दिखाते हैं कि 2013 में, 2012 की तुलना में, किशोर मामलो में आई.पी.सी. और एस.एल.एल. में क्रमशः 13.6% और 2.5% की वृद्धि हुई है।

हाल ही में, 16 दिसम्बर 2013, को किशोरी के साथ हुये अमानवीय सामूहिक दुष्कर्म ने पूरे राष्ट्र की सामूहिक चेतना को गहरा आघात दिया। जिस क्रूरता के साथ ये जघन्य अपराध किया गया था वो बहुत चौकानें वाला था, इसका पता बाद में चला कि 5 अपराधियों में एक नाबालिग था और वो ही सबसे क्रूर था।

इसके अलावा, एक अन्य क्रूर सामूहिक बलात्कार के मामले में, जिसे शक्ति मिल बलात्कार के नाम से जाना जाता है, में भी एक नाबालिग शामिल था। इसी तरह की अन्य बहुत सी हाल की घटनाओं ने वर्तमान किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम, 2000, जिसमें 18 साल से कम की आयु के व्यक्तियों को नाबालिग या किशोर माने जाते हैं, में संशोधन के लिये सार्वजनिक बहस शुरु हो गयी है।

 

किशोर अपराधों के कारण

कोई भी जन्मजात अपराधी नहीं होता। परिस्थितियाँ उसे ऐसा बना देती है। किसी के भी जीवन और पूरे व्यक्तित्व को नया रुप देने में, घर के अन्दर और बाहर का सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कुछ बहुत आम मामलें जो किशोर अपराध से जुड़े हुये हैं: गरीबी, नशीली दवाईयों का सेवन, असामाजिक साथियों का समूह, आग्नेयास्त्रों की आसान उपलब्धता, अपराधिक प्रवृति के माता पिता, एकल अभिभावकीय बच्चे, एकल परिवार, पारिवारिक हिंसा, बाल यौन शोषण और मीडिया की भूमिका आदि।

हालांकि, जहां तक भारत का संबंध है, ये गरीबी और मीडिया का प्रभाव है, विशेषरुप से सामाजिक-मीडिया जिसने किशोरो को अधिक आपराधिक गतिविधियों की ओर झुका दिया है।

गरीबी सबसे बड़ा कारण है जो बच्चे को अपराधिक गतिविधयों में शामिल होने के लिये मजबूर करती है। इसके अलावा, आजकल सामाजिक मीडिया की भूमिका जो किशोरो के मस्तिष्क में सकारात्मक प्रभाव के स्थान पर नकारात्मक प्रभाव अधिक डालती है।

इसके अलावा भी अन्य तथ्य हैं जिनका बाद के समय में गहन अध्ययन और विश्लेषण करने की आवश्यकता है।

भारत में किशोर अपराध और कानून

  1. इतिहास:

भारत में, कानून के साथ संघर्ष में बच्चों के मामले में पहला विधान या बच्चों का अपराध करना प्रशिक्षु अधिनियम, 1850 था। इसमें प्रावधान था कि 15 से कम आयु का बच्चा यदि छोटे अपराधों को करते हुये पाया गया तो एक प्रशिक्षु के रुप में बंधक बनाया जायेगा।

इसके बाद, सुधार विद्यालय अधिनियम, 1897, प्रभाव में आया, जिसने ये प्रावधान किया कि 15 साल से अधिक आयु वाले बच्चों को दंड देकर जेल के सुधार घर में भेजा जायेगा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, देखभाल, सुरक्षा, विकास और उपेक्षित या अपराधी किशोरों के पुनर्वास प्रदान करने के लिये, हमारी संसद ने किशोर न्याय अधिनियम, 1986 को लागू किया गया। ये वो अधिनियम था जो देश में समान प्रणाली व्यवस्था को लाया था।

अधिनियम का भाग 2 (A) “किशोर” शब्द को “लड़का जो जिसकी आयु 16 साल नहीं है और लड़की जिसकी आयु 18 साल नहीं है” के रुप में परिभाषित करता है।

इसके बाद, संसद ने किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम, 2000, को लागू किया जिसमें लड़की और लड़को दोनों की आयु 18 साल कर दी।

  1. वर्तमान विधान:

किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम 2000, किशोर कानून के नीचे संघर्ष में हैं या किशोर अपराधियों को ‘अवलोकन-गृह’ में रखा जाये जबकि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान बच्चे को देखभाल या सुरक्षा की आवश्यकता हो तो उसे ‘बाल गृह’ में रखा जाये।

एख किशोर को उसके द्वारा किये गये अपराध की गंभीरता को देखते हुये अधिकतम 3 साल की अवधि के लिये हिरासत में लेकर सुधार घर में भेजा जा सकता है। किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 उस बच्चे के लिये प्रतिरक्षा प्रदान करता है जिसकी आयु अपराधिक न्यायालय या अन्य धारा 17 के मद्देनजर आपराधिक कानून के तहत अपराध के लिये नियुक्त किये गये कमीशन के सजा सुनाने के समय 18 साल से कम हो।

इस नये अधिनियम का उद्देश्य पुनर्वास और मुख्यधारा के समाज में उसे आत्मसात करना था। इसका तर्क ये था कि बच्चें को उसकी कच्ची आयु में ही थोड़े से प्रयासों के माध्यम से सुधारा जा सकता है और ये राज्य की जिम्मेदारी है कि वो बच्चों का संरक्षण और सुधार करे।

 

  1. किशोर न्याय अधिनियम, 2000 में संशोधन के प्रस्ताव:

हाल में, जनता में किशोरों द्वारा किये जाने वाले अपराधों के बढ़ने के खिलाफ बहुत हौ-हल्ला है, सरकार ने भी वर्तमान कानून में चालू सत्र में अपने प्रस्तावित संशोधनों को पेश करने का निर्णय लिया है। इस संशोधन का हमारी आपराधिक न्यायिक प्रणाली पर दूरगामी प्रभाव होगा।

इसमें कुछ मुख्य बदलाव इस तरह हैं:

  • वर्तमान किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 को प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है।
  • ये स्पष्ट रुप से बहुत गंभीर और जघन्य अपराधों के रुप में परिभाषित और वर्गीकृत किया जाये।
  • ये देखा गया है कि गंभीर जघन्य अपराधों में 16 से 18 साल की आयु वाले किशोरो की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। इस प्रकार, किशोरों के अधिकारों के साथ-साथ पीड़ितों के अधिकारों की मान्यता में, ये प्रस्तावित किया गया कि इस प्रकार के जघन्य अपराधों के मामले को विशेष रुप से तय किया जायेगा।
  • इसके अलावा, ये भी प्रस्ताव रखा गया है कि यदि एक जघन्य अपराध ऐसे किशोर द्वारा किया जाता है जिसकी आय़ु 16 से 18 साल के बीच है तो तथाकथित अपराध एक ‘बच्चे’ के रुप में या एक ‘किशोर’ के रुप में है इसका किशोर न्याय बोर्ड पहले आकलन करेंगा।
  • किशोर न्याय बोर्ड इसमें मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विशेषज्ञों को रखेगा जो ये सुनिश्चित करेंगे कि किशोर के अधिकार विधिवत् रुप से संरक्षित किये जाये यदि अपराध एक बच्चे के रुप में हुआ है।
  • मामले की सुनवाई बोर्ड की मूल्याकंन रिपोर्ट के अनुसार आगे बढ़ाई जायेगी कि संबंधित किशोर ने एक बच्चे के रुप में अपराध किया है या एक वयस्क के रुप में।

प्रस्तावित संसोधन के खिलाफ और पक्ष में विचार:

भारत की सरकार पहले ही किशोर न्याय अधिनियम में इन सुधारों के प्रस्ताव को स्वीकृति दे चुकी है। इस बारे में विशेषज्ञों और जनता दोनों के ही मजबूत विचार है। विचारों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

पक्ष में विचार:

वर्तमान में लोगों की बहुत बड़ी संख्या इस बात की मांग कर रही है कि किशोर और विशेष रुप से वो किशोर जिनकी आयु 16 से 18 साल के बीच है, उनके साथ जघन्य अपराधों के मामलों जैसे: बलात्कार, सामूहिक दुष्कर्म, हत्या, डकैती आदि, में वयस्कों की तरह व्यवहार किया जाये। इसका कारण है कि अभी हाल के ही कई अपराधों में जिनमें से कुछ का वर्णन ऊपर भी किया गया है, पाया गया है कि 16 से 18 साल की आयु वाले किशोर जो गंभीर जघन्य अपराधों में शामिल थे और वो इस तरह के अपराध पूरी जानकारी और परिपक्वता के साथ करते हैं।

अब बच्चों का परिपक्वता स्तर 10-20 साल पहले की तरह नहीं रह गया है। बच्चे वर्तमान में इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्रभाव से बहुत जल्दी मानसिक रुप से परिपक्व हो जाते हैं।

इसलिये, अलग प्रभाव डालने के लिये ये आवश्यक है कि 16 से 18 साल की आयु वाले इस तरह के अपारधियों को वयस्कों की तरह दंडित किया जाये ताकि पीड़ित या पीड़िता को न्याय मिल सके।

विपक्ष में विचार:

वो लोग और विशेषज्ञ जो इस विचार के पक्ष में नहीं है कि 16 से 18 साल के किशोरो के साथ जघन्य अपराधों के संदर्भ में वयस्कों की तरह व्यवहार किया जाये, का विचार है कि किसी भी कानून या सुधार को कुछ घटनाओं के प्रभाव में आकर नहीं करना चाहिये क्योंकि एक कानून सभी के लिये और सभी समयों के लिये होता है।

इसलिये इसका निर्माण बहुत सावधानी से सभी आयामों को देखकर किया जाना चाहिये। उदाहरण के लिये, किशोर अपराधों के मामलों में, इस पर विचार अवश्य करना चाहिये कि हम 16 और 17 साल के किशोरों को दंडित करके दंडात्मक न्याय प्रणाली अपनाना चाहते हैं या एक सुधारत्मक व्यवस्था; जबकि इस बात की कोई संभावना न हो कि बच्चा सुधर जायेगा, और जबकि ये भी सच है कि लगातार 10 साल वयस्को की जेल में हजारों अपराधियों के साथ सजा काटने के बाद, बच्चा एक बड़े अपराधी के रुप में बाहर आयेगा।

इसके अलावा, ये विचार कहता है कि ये केवल बच्चे की जिम्मेदारी नहीं है कि वो जघन्य अपराधों को करे लेकिन ये समाज की भी जिम्मेदारी है कि क्यों समाज एक बच्चे को स्वस्थ्य और उचित बचपन प्रदान नहीं कर पा रहा है और क्यों सामाजिक और आर्थिक दोनों प्रकार के भेदभाव और अभाव है, साथ ही राज्य बच्चों को सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करने में क्यों असफल हो रहा है कि वो बच्चों को अपराधिक गतिविधियों की खाई में जाने दे रहा है।

इस प्रकार, ये देखा जा सकता है कि किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन को लेकर इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में ही लोगों और विचारकों के मजबूत विचार है।

निष्कर्ष

निष्कर्ष में, ये कहा जा सकता है कि हम अधिनियम में जो भी बदलाव करें, वो न्याय के ज्यादा करीब हो जो प्रबल हो। एक कानून को क्रूरता के एक कार्य के कारण बदलना और संशोधित करना नहीं चाहिये, क्योंकि ये एक कानून सभी के लिये और आने वाले सभी समयों के लिये होता है। यद्यपि ये सच है कि 16 से 18 साल की आयु समूह वाले बच्चों की संख्या जघन्य अपराधों में बढ़ रही है लेकिन ये भारत में हरेक साल होने वाले अपराधों का एक छोटा सा प्रतिशत है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो, 2013 में, भारत में सभी बलात्कार मामलों में केवल 34% किशोरों पर ही मुकदमा दायर किया गया था। इसके अलावा, इससे कुछ साबित नहीं होता कि कठोर कानूनों के द्वारा कम अपराधों को प्रोत्साहन मिलेगा।

इसलिये, संसद में संशोधन की बहस के समय इस पर चर्चा अवश्य होनी चाहिये कि हम समाज के रुप में एक न्याय पर आधारित व्यवस्था चाहते हैं या प्रतिकार और सजा या एक ऐसी व्यवस्था जो किशोर अपराधियों के सुधार और समावेश के योग्य हो। राज्य के साथ ही समाज अपने बच्चों के लिये कुछ जिम्मेदारियाँ रखता है कि वो राह से न भटके और समाज का मुख्य पक्ष बने रहें। इस तरह, किशोर न्याय में संशोधन करते समय देखभाल और सुरक्षा मुख्य उद्देश्य होना चाहिये।