वैवाहिक बलात्कार

महिलाओं के साथ किया जाने वाला सबसे जघन्य अपराध बलात्कार है। ये पीड़ित को न केवल शारीरिक रुप से बल्कि मानसिक रुप से भी नष्ट कर देता है। ये शरीर के साथ साथ आत्मा को भी प्रभावित करता है; एक महिला के शरीर के साथ बिना उसकी मर्जी के यौन सुख के लिये दुराचार करना या लगातार ये घिनौना कार्य करना न केवल वैयक्तिक गरिमा का बल्कि पूरे समाज की गरिमा का उल्लंघन है। ये किसी एक के लिये सोच को विद्रोही बनाता है कि आपका शरीर जबरदस्ती किसी के यौन सुख के लिये इस्तेमाल किया जायेगा।

हम बलात्कार के अपराधों से महिलाओं को बचाने के लिये कड़े नियम रखते हैं और इसे करने वाले अपराधी के लिये गंभीर दंड प्रदान किया जाता है। लेकिन इस तरह के अपराधों की दर बहुत ऊंची है और वास्तविकता में ये हमारे समाज उत्थान पर है।

सामान्य बलात्कार के अलावा, एक आदमी के द्वारा अपनी ही पत्नी के साथ वैवाहिक बलात्कार या जबरदस्ती यौन संभोग भी हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है। यद्यपि समाज की सामान्य चेतना, वैवाहिक बलात्कार को नैतिक रुप से और नीति के अनुसार गलत कार्य मानती है लेकिन ये इसे गंभीर अपराध के रुप में नहीं मानती; और वास्तव में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से इसे वैवाहिक अनिवार्यता के नाम पर सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। सबसे बुरा हिस्सा ये कि देश के कानून भी, आज तक, वैवाहिक बलात्कार को एक अपराध के रुप में मान्यता देने में असफल रहा है और एक अर्थ में इसे वैधानिक स्वीकृति प्रदान करता है।

वैवाहिक बलात्कार क्या है

यदि बलात्कार एक वंश है, तो वैवाहिक बलात्कार इसकी प्रजातियों में से एक है। इसे एक पुरुष द्वारा अपनी ही पत्नी के साथ पत्नी की इच्छा के विरुद्ध अनैच्छिक यौन संभोग या तो जबरदस्ती या फिर धमकी या शारीरिक हानि पहुंचाकर किया जाता है।

वैवाहिक बलात्कार के आवश्यक तथ्य, पुरुष और महिला के बीच पति और पत्नी के संबंध हैं; इस मुद्दे को और अधिक सामाजिक रूप से प्रासंगिक बना देती है। बलात्कार की तरह, वैवाहिक बलात्कार में भी औरत की कोई सहमति नहीं होती और आदमी के द्वारा बल प्रयोग करके संभोग किया जाता है।

यद्यपि, पूरा समाज बलात्कार को एक गंभीर अपराध मानता है और कानून बलात्कारी को दंडित करने में बहुत महत्ता प्रदान करते हैं, लेकिन बलात्कार का कानून विवाहित महिलाओं को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता यदि औरत का पति ही उसे संभोग करने के लिये मजबूर या जबरदस्ती करे। पूरा समाज वैवाहिक बलात्कार को, महत्व देने वाला मुद्दा नहीं मानता और पति को पूरी आजादी प्रदान करता है।

अपने ही पति के द्वारा इस प्रकार की यौन हिंसा से पीड़ित विवाहित महिलाओं के पास कहीं भी जाने का स्थान नहीं होता, वो समाज के दबाव के कारण इसकी शिकायत अपने परिवार में भी नहीं कर सकती और साथ ही वो पुलिस में भी नहीं जा सकती क्योंकि वैवाहिक बलात्कार एक अपराध के रुप में नहीं माना जाता है। इस प्रकार, पीड़ित को सारा दर्द चुपचाप सहना पड़ता है और इसका कोई उपाय दृष्टिगोचर नहीं होता।

वैवाहिक बलात्कार के कारण

वैवाहिक बलात्कार के कई कारण हो सकते हैं जैसे पति की यौन विकृति, महिलाओं के ऊपर पुरुष द्वारा अपनी श्रेष्ठा दिखाने की इच्छा, दयनीय घरेलू मुद्दे, महिला द्वारा अपने वैवाहिक संबंधों की सही माँग करना आदि।

इस प्रकार, संक्षेप में, इस वैवाहिक बुराई का मुख्य कारण हमारे समाज में फैली हुई लिंग असमानता है। ये हमारी पितृसत्तात्मक और पुरुष प्रधान व्यवस्था का दूसरा पहलू है जहां विवाहित या अविवाहित दोनों ही प्रकार की महिलाएं समान अधिकार नहीं रखती। ये महिलाओं का लाभ उठाने और महिलाओं को अधीन करने के लिए आदमी के हाथ में एक और हथियार है।

इसके अलावा, अन्य कारणों में से एक हमारे समाज में विवाहित महिलाओं को पारंपरिक रुप में सौंपी गयी भूमिकाएं भी हैं। ये भूमिका समाज द्वारा विवाहित महिलाओं के लिये इस प्रकार परिभाषित है, पतिव्रता-स्त्री अर्थात् शुद्ध, वफादार और आज्ञाकारी महिला। इस प्रकार, एक विवाहित महिला अपने पति के निर्देशों को पूरी तरह से अनुसरण करने और उसकी सभी मांगों को बिना किसी सवाल जबाव के पूरा करने वाली मानी जाती है। इसलिये, “अच्छी पत्नी” की अवधारणा महिलाओं के लिये अच्छी नहीं है, पर केवल पुरुषों के लिये अच्छी है। यौन संबंध महिलाओं का अपने पति के लिये सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है और वो इसके लिये उससे मना नहीं कर सकती। उसकी भूमिका केवल खुद को प्रस्तुत करने और समर्पण करने की होती है।

अपने पति और ससुराल वालों पर आर्थिक निर्भरता, बहुत से कारणों में से एक कारण है कि विवाहित महिला बार-बार किये जाने वाले वैवाहिक बलात्कार से खुद को बचाने में असमर्थ होती है और हिंसा को सहन करने के लिये बाध्य होती है।

एक अन्य कारण, वैधानिक प्रावधानों में वैवाहिक बलात्कार को एक अपराध के रुप में पहचान का अभाव है; जो पुरुषों को अपने इसी व्यवहार को जारी रखने के लिये और पत्नी को बिना कारण के छोड़ने के लिये बाध्य करता है।

 

वैवाहिक बलात्कार और कानून

वैवाहिक बलात्कार की बीमारी से निपटने में सबसे बड़ी निराशा, भारत में इसका कानून की नजर में अपराध न होना है। न तो भारतीय कानून दंड सहिंता, 1860, और न ही घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 में कोई विशेष वैधानिकीकरण कानून इसे एक अपराध के रुप में कोई इसे मान्यता नहीं देता है।

यद्यपि वैवाहिक बलात्कार एक औरत के लिए सबसे शर्मनाक और अपमानजनक अनुभव में से एक है, लेकिन इसे हमारी विधायिका में विवाहित महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिये पहले से अस्तित्व में कानूनी अधिनियमों में संशोधन करके या एक विशेष कानून के रुप में नहीं जोड़ा है।

भारतीय दंड संहिता और वैवाहिक बलात्कार

आई.पी.सी. की धारा 375 बलात्कार को परिभाषित करती है। ये उन गतिविधियों की सूची बनाती है जिससे किसी अपराधिक गतिविधि को बलात्कार माना जाता है। ये उन शर्तों को भी प्रदान करती है जिन गतिविधियों को बलात्कार के दायरे में रखकर परिभाषित किया जाता है।

प्रावधानों में से एक, (धारा 375 का छठा भाग) में ये प्रवाधान किया गया है कि 18 साल से कम आयु वाली लड़की के साथ, उसकी सहमति या असहमति के बिना, एक आदमी के द्वारा संभोग करना बलात्कार है। लेकिन, इसी भाग में, ये प्रावधान भी है कि (धारा 375 के साथ अपवाद के रुप में संलग्न), पति के द्वारा अपनी ही पत्नी के साथ संभोग और यदि पत्नी की आयु 15 साल से कम न हो, तो इसे बलात्कार नहीं माना जाता है। इस प्रकार, यदि एक लड़की शादीशुदा है और उसका पति उसके साथ जबरदस्ती संभोग करे तो ये बलात्कार नहीं होगा यहाँ तक कि चाहे वो 18 साल से कम की क्यों न हो, बस 15 साल से कम आयु की नहीं होनी चाहिये।

यहाँ ये आलोचनात्मक और दोहरे मानकों वाला कानून जाहिर होता है, एक विवाहित लड़की के लिये, जिसकी आयु 15 से अधिक हो उसके पति की यौन विकृति के खिलाफ कोई उपाय नहीं है। ये प्रावधान विवाहित महिलाओं के खिलाफ बहुत बड़े अन्याय को बताता है क्योंकि ये विकृत पतियों को उनके गलत कार्यों को बनाए रखने में मदद करता है। और ये पत्नियों को कोई उपाय प्रदान नहीं करता यदि वो 15 साल से अधिक आयु की है।

इसके अलावा, पत्नी की आयु 15 साल से कम होने के मामले पर संभोग को बलात्कार इसलिये नहीं माना जाता क्योंकि कानून इसे वैवाहिक बलात्कार मानता है बल्कि इसलिये माना जाता है क्योंकि ये मामला पत्नी की आयु से जुड़ा हुआ है।

इस प्रकार, आई.पी.सी. वैवाहिक बलात्कार को किसी भी तरह से पहचान नहीं देता। यहाँ तक कि सबसे अधिक चर्चित अपराधिक कानून संशोधन, अपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013, में भी वैवाहिक बलात्कार के सन्दर्भ में कोई प्रावधान नहीं बनाया गया है।

इससे अलावा, धारा 376-ब में प्रावधान है कि एक आदमी के द्वारा न्यायिक पृथककरण के दौरान अपनी पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना संभोग करने पर लगभग 2 साल से अधिक जेल की सजा और आर्थिक दंड के साथ ये एक दंडनीय अपराध है। लेकिन यहाँ भी ये प्रावधान वर्णित अपराध को बलात्कार के रुप में नहीं मानता। और इस मामले में विवाहित जोड़ा न्यायिक अलगाव के फरमान के तहत अलग-अलग रह सकते हैं। इस प्रकार, यहाँ भी वैवाहिक बलात्कार को परिभाषित नहीं किया गया है।

शायद हम यदि व्यापक विचारधारा को अपनाये, वैवाहिक बलात्कार पर क्रूरता के एक रुप में धारा 498-अ में विचार किया जा सकता है, क्योंकि क्रूरता किसी भी तरह की शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की हानियों की ओर संकेत करती है। यदि आलोचना के रुप में कहा जाये तो ये प्रावधान से बहुत दूर है और ये क्रूरता के रुप में ली जाती है न कि वैवाहिक बलात्कार के रुप में।

 

निष्कर्ष

कानून का मानना है कि शादी में, पत्नी अपने पति को यौन संबंधों सहित, सभी प्रकार के वैवाहिक दायित्वों की पूर्ति के लिये सहमति प्रदान है जिसे वो बाद में वापस नहीं ले सकती। इस तरह के पुराने नियम अभी भी विद्यमान है और वैवाहिक बलात्कार को अपराध के रुप में पहचान देने के रास्ते में मुख्य बाधा है।

बिना किसी विशेष कानूनी प्रावधान को लाये बिना इस वैवाहिक बलात्कार की विकृति को रोकना लगभग असंभव है। इस नैतिक अपराध की पीड़िता कहीं नहीं जा सकती। शायद अंतिम उपाय केवल न्यायपालिका है। हमारे देश की न्यायपालिका को निश्चित कार्य स्वतंत्रता है जिसे ये वैवाहिक बलात्कार को गंभीर नैतिक और नीति संबंधी अपराध के रुप में कड़े दंड के योग्य पहचान दे सकती है। और कुछ मामलों में न्यायपालिका न्यायिक रचनात्मकता के माध्यम से ही निर्णय कर रही है; उदाहरण के लिए:

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डा कामिनी लाउ, हाल के मामलों में से एक में, देखा गया: ‘भारत में वैवाहिक बलात्कार की गैर-मान्यता, समानता के आधार पर निर्धारित एक राष्ट्र, कानून में कुल दोहरे मानक और ढोंग है जो महिला की परतंत्रता और अधिपत्य का केन्द्र है।’ “हमें भारत में अभी भी समानता के एक प्रमुख घटक के रूप में वैवाहिक यौन बलात्कार को रोकने के लिये महिलाओं के अधिकारों को पहचानने की आवश्यकता है” और जोर देकर कहा कि, “महिलाओं को अपने शरीर पर पूरा अधिकार है, वैवाहिक बलात्कार की पहचान और घिनौने यौन कार्य और इसके खिलाफ आवाज उठाना, ये आदमी और औरत के बीच पर्याप्त समानता को प्राप्त करने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है।” “वैवाहिक बलात्कार नैतिकता और स्वतंत्रता के लिए अपमानजनक है और किसी भी तरह की यौन प्रतिकूलता को उजागर, संबोधन और दंडित करने की आवश्यकता है।”

लेकिन कानून के विशेष प्रावधान के अभाव में, न्यायपालिका स्वंय बाध्य है और खुद के निजी विचार से, आदमी के द्वारा अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती संभोग को वैवाहिक बलात्कार के रुप में नहीं मान सकते।

इसलिये ये आवश्यक है कि हमारे देश की विधायिका और भारत के कानून आयोग को भी वर्तमान समय की नयी और परिवर्तित वास्तविकता के लिये जागें और असहाय विवाहित महिलाओं को जो अपने घरों में बिना किसी मदद की उम्मीद में चुपचाप पीड़ित होती रहती है, के लिये अधिक आवश्यक कानूनी सुरक्षा प्रदान करे। इसके अलावा, सामान्य रूप से समाज और विशेष रूप से हर घर में भी पुरुषों द्वारा अपनी पत्नी के खिलाफ इस प्रकार के व्यवहार को अस्वीकार करते हुये इसकी निंदा शुरु करनी चाहिये इस तरह से अपराधी पति को उसके आपराधिक कृत्य के लिये किसी भी तरह की मंजूरी न मिल सके।

कानून के साथ-साथ समाज के इस तरह के सकारात्मक कार्य विवाहित महिला को सुरक्षा की भावना देंगे और उन्हें वैवाहिक बलात्कार के मामले में शिकायत निवारक तंत्र प्रदान करेंगे।

यदि हमारे देश की महिलाएं अपने शरीर के ऊपर ही कोई अधिकार नहीं रखती और यहाँ तक कि जब शादी में संभोग का सवाल आता है तो उनके पास अपना विकल्प रखने का कोई उपाय ही नहीं रहेगा तो हमारे देश के संविधान में निहित समानता के अधिकार की अवधारणा एक मृत पत्र के रूप में रहेगी।