कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न

भारत का संविधान महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिये समान अधिकार प्रदान करता है। महिलाओं को कार्य करने के लिये किसी भी क्षेत्र या व्यवसाय को चुनने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन व्यवहार में महिलाओं के साथ घर और घर के बाहर दोनों जगह भेदभाव होता है।

भेदभाव, अधिकतर, महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न और हिंसा का रुप ले लेता है। इसके अलावा, ये उत्पीड़न मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार का हो सकता है। बार-बार शारीरिक उत्पीड़न यौन उत्पीड़न या यौन हिंसा का रुप ले लेता है। सामान्य स्थलों पर यौन उत्पीड़न और कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न बहुत कड़वी वास्तविकता है जिसका कार्यशील लड़कियों और महिलाओं द्वारा दिन प्रति दिन सामना किया जाता है।

यद्यपि आर्थिक उदारीकरण ने पढ़ी-लिखी महिलाओं के लिये और इसके समान ही महिलाओं को घर से निकलकर अपनी पसंद की बहुत सी नौकरी के अवसर और विकल्प प्रदान किये हैं। और वर्तमान में, महिलाएं पहले से कहीं अधिक कैरियर उन्मुख है।

समाज में उपर्युक्त परिवर्तन इस अर्थ में सकारात्मक बदलाव लाया है कि कामकाजी महिलाएं आर्थिक रुप से स्वतंत्र और मुक्त महसूस करती है। लेकिन साथ ही इसने महिलाओं की असुरक्षा को बढ़ा दिया है जैसे कार्यस्थल पर यौन शोषण।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न क्या है

सरल शब्दों में, इसे कार्यस्थल पर महिला सहयोगियों के खिलाफ पुरुष सहयोगियों की ओर से अवांछित प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से यौन सम्पर्क, टिप्पणी या आचरण के रुप में समझा जा सकता है।

इस प्रकार, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न शारीरिक के साथ ही मानसिक पहलुओं को भी शामिल करता है। यद्यपि ये परिभाषित करना कठिन है कि कार्यस्थल पर यौन हिंसा गठित करने वाले तत्व क्या है, लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान बनाम विशाखा केस 1997 में इसे इस प्रकार परिभाषित किया है:

“कोई भी अस्वीकृत यौन निर्धारित व्यवहार (प्रत्यक्ष या दबाब में) शारीरिक सम्पर्क या प्रस्ताव, यौन अनुग्रह के लिये मांग या प्रार्थना, अश्लील टिप्पणी, अश्लील साहित्य या यौन प्रकृति के अन्य अप्रिय शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक आचरण को शामिल किया जाता है।”

इस प्रकार, उपर्युक्त परिभाषा ने ये बहुत स्पष्ट कर दिया कि पुरुष द्वारा एक महिला कर्मचारी के खिलाफ किसी भी प्रकार का अप्रिय यौन अश्लीलता वाला व्यवहार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की तरह की समझा जायेगा।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के कारण

कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के बहुत सारे कारण है; कुछ कारण आम तौर पर एक पूरे के रूप में समाज में प्रचलित है लेकिन कुछ विशेष रुप से कार्यस्थल पर किये जाते हैं। उनमें से कुछ की नीचे व्याख्या की जा रही है:

पितृसत्तात्मक संरचना:

महिलाओं के खिलाफ सभी तरह के उत्पीड़न या हिंसा के पीछे का सामान्य कारण हमारे समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक संरचना है जहां एक पुरुष सदैव अपने आप को जीवन के हरेक पहलू में महिलाओं से अधिक स्वंय को सर्वशक्तिमान समझता है। ये श्रेष्ठता अपने आप में महिलाओं और कार्यशील महिलाओं के खिलाफ विभिन्न प्रकार के जटिल भेदभावों को व्यवहार में प्रकट करती है।

 

इस प्रकार, एक पुरुष कर्मचारी ये कभी नहीं चाहता कि उसके साथ कोई महिला सहयोगी बराबरी के साथ काम करे या वो कार्यालय में उससे ऊँचे स्तर पर पहुँचे, और उसे असहज बनाने, नीचा दिखाने के लिये उसका उत्पीड़न करते है, पुरुष सहयोगी द्वारा विभिन्न प्रकार की तकनीकों का प्रयोग किया जाता है और उनमें से कुछ प्रमुख यौन अभद्रता की तकनीक है जैसे: अभद्र टिप्पणी, अप्रिय व्यवहार, गंदी फोटो या विडियो या ऐसा ही कोई अभद्रता पूर्ण व्यवहार आदि।

यौन विकृति:

इसके अलावा, कुछ निश्चित लोगों की विकृत यौन मानसिक प्रवृति भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के प्रमुख कारणों में से एक है। सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में अधिक से अधिक महिला कर्मचारियों को भर्ती किया जा रहा है, वहीं से कुछ इस तरह के यौन विकृत व्यवहार में लिप्त पुरुषों की पहुंच को आसान बना दिया है।

कार्यस्थल पर ईर्ष्या:

कार्यस्थल पर ईर्ष्या भी महिलाओं के खिलाफ इस तरह के अपराधों का कारण है, एक पुरुष कर्मचारी अपने नियोक्ता द्वारा अपनी महिला सहयोगी को सफलता, प्रमोशन या प्रोत्साहन प्राप्त करते हुये नहीं देखना चाहता। और ईर्ष्या के कारण, वो उसे विकृत यौन व्यवहार से उत्पीड़ित करता है। ये भी पुरुष की कथित श्रेष्ठता के साथ जुड़ा हुआ है कि महिलाएं कभी भी पुरुषों से बेहतर नहीं हो सकती।

अवमानना और अपमान की भावना:

इन कारणों के अलावा, पुरुषों के बीच में महिलाओं के लिये एक सामान्य अवमानना और अपमान की भावना भी एक प्रमुख कारण है जहां महिलाएं केवल पुरुषों द्वारा अपनी यौन इच्छाओं को पूरा करने का माध्यम होती है। हम अपने घरों में महिलाओं का सम्मान करते हैं लेकिन समाज में अन्य महिलाओं के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिये।

कार्यस्थल पर महिलाएं अलग नहीं होती है, पुरुष सहयोगी उन्हें केवल खेलने का एक माध्यम समझते हैं, अभद्र टिप्पणी और जोक्स, अश्लील हरकत, यौन प्रकृति की गपशप आदि कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ किये जाने वाले कार्य है। यद्यपि हमारे समाज में हम महिलाओं का सम्मान और पूजा करने का दावा करते है लेकिन वास्तविकता में महिलाओं के खिलाफ किये जाने वाले विभिन्न प्रकार के अपराध दिखाते हैं कि हमारे दावे सिर्फ एक झूठ से अलग कुछ नहीं है।

पुरुष श्रेष्ठता:

इस प्रकार, कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के कई और विभिन्न कारण है लेकिन उन सब कारणों में से सबसे महत्वपूर्ण कारण आमतौर पर पुरुषों में पुरुषों के श्रेष्ठ होने की भावना का गहराई तक होना है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था की सामाजिक स्थितियाँ अगली पीढियों में इस तरह की भावनाओं को प्रेषित करती है जो कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों को जन्म देती है।

 

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए कानूनी प्रावधान

कानून की किताबों में, 2013 तक, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, एक विशेष अपराध की तरह नहीं था। यहां तक कि, भारतीय दंड संहिता, 1860 कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के मामले को एक अलग अपराध के रुप में सुलझाने के लिये कोई अलग धारा नहीं थी। केवल यौन उत्पीड़न को परिभाषित किया गया था और आई.पी.सी. की धारा 354 के अन्तर्गत इसे दंडनीय अपराध बनाया गया था। इस प्रकार, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में आज तक इसी धारा के अन्तर्गत फैसला लिया जाता है।

विशाखा दिशा-निर्देश

1997 में, राजस्थान बनाम विशाखा केस के समय, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने, आईपीसी के इस दोष और बचाव के रास्तों को पहचाना और एक ऐतिहासिक निर्णय दिया जहां कुछ निश्चित दिशा निर्देश दिये गये थे जिन्हें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के संगठनों को महिला कर्मचारियों को सुरक्षा देने और यौन उत्पीड़न से बचाने के लिये अनुसरण करने का आदेश दिया था।

ये दिशा निर्देश नियोक्ता के लिये अपनी महिला कर्मचारियों को यौन उत्पीड़न से रक्षा करने के लिये अनिवार्य किये गए, इस प्रकार के केस की किसी भी शिकायत पर उचित कार्यवाही को अनिवार्य बनाया जाये, इस बात का निर्देश दिया गया कि प्रत्येक संगठन के पास इस तरह के दुर्व्यवहार पर कार्यवाही करने के लिये शिकायत समिति हो जिसकी अध्यक्षता एक महिला करे, यौन उत्पीड़न को निषेध करने वाले नियमों को अधिसूचित और प्रसारित किया जाये, कहे गये नियमों के उल्लंघन के मामलों में अर्थदंड भी लगाया जाये, नियोक्ताओं को तीसरे पक्ष द्वारा उत्पीड़न से उनकी महिलाओं के कर्मचारियों की रक्षा करने के लिए निर्देशित किया गया।

केवल यही दिशा निर्देश, पिछले 19 सालों, से कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न को निषेध करने के सन्दर्भ में किये गये प्रावधान है, और केवल वर्ष 2013 में, भारत की संसद ने महिलाओं के साथ इस प्रकार के उत्पीड़न के लिये एक विशेष अधिनियम लागू किया जिसे कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) का नाम दिया।

कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013

ये अधिनियम, 9 दिसम्बर, 2013, में प्रभाव में आया था। जैसा कि इसका नाम ही इसके उद्देश्य रोकथाम, निषेध और निवारण को स्पष्ट करता है और उल्लंघन के मामले में, पीड़ित को निवारण प्रदान करने के लिये भी ये कार्य करता है।

ये अधिनियम विशाखा केस में दिये गये लगभग सभी दिशा-निर्देशों को धारण करता है और ये बहुत से अन्य प्रावधानों को भी निहित करता है जैसे: शिकायत समितियों को सबूत जुटाने में सिविल कोर्ट वाली शक्तियाँ प्रदान की है; यदि नियोक्ता अधिनियम के प्रावधानों को पूरा करने में असफल होता है तो उसे 50,000 रुपये से अधिक अर्थदंड भरना पड़ेगा, ये अधिनियम अपने क्षेत्र में गैर-संगठित क्षेत्रों जैसे ठेके के व्यवसाय में दैनिक मजदूरी वाले श्रमिक या घरों में काम करने वाली नौकरानियाँ या आयाएं आदि को भी शामिल करता है।

इस प्रकार, ये अधिनियम कार्यशील महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न के खतरे का मुकाबला करने के लिये युक्ति है। ये विशाखा फैसले में दिये गये दिशा निर्देशों को सुव्यवस्थित करता है और इसके प्रावधानों का पालन करने के लिये नियोक्ताओं पर एक सांविधिक दायित्व अनिवार्य कर देता है।

हांलाकि, इस अधिनियम में कुछ कमियां भी है जैसे कि ये यौन उत्पीड़न को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता बस केवल नागरिक दोष माना जाता है जो सबसे मुख्य कमी है, जब पीड़ित इस कृत्य को अपराध के रुप में दर्ज करने की इच्छा रखती है तब ही केवल इसे एक अपराध के रुप में शिकायत दर्ज की जाती है, इसके साथ ही पीड़ित पर अपने वरिष्ठ पुरुष कर्मचारी द्वारा शिकायत वापस लेने के लिये दबाव डालने की भी संभावनाएं अधिक रहती है।

इस प्रकार, अधिनियम को एक सही कदम कहा जा सकता है लेकिन ये पूरी तरह से दोषरहित नहीं है और इसमें अभी भी सुधार की आवश्यकता है। यहां तक कि अब, पीड़ित को भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत पूरी तरह से न्याय पाने के लिये अपराधिक उपायों को तलाशना पड़ता है। और फिर, अपराधिक शिकायत धारा 354 के अन्तर्गत दर्ज की जाती है जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की विशेष धारा नहीं बल्कि एक सामान्य प्रावधान है।

इसलिये, कानून के अनुसार निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों को महिला कर्मचारियों की कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के लिये कानूनी अनिवार्यता के अन्तर्गत लिया गया है लेकिन समस्या इसके लागू करने और इसकी जटिलताओं में है। ये अभी अपने शुरुआती दिनों में है और अधिकांश संगठन, कुछ बड़े संगठनों को छोड़कर, प्रावधान के साथ जुड़े हुये नहीं है, यहां तक कि वो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के लिये बनाये गये कानून क्या है और इसके लिये क्या अर्थदंड है और क्या इसका निवारक तंत्र है, इन सब नियमों और कानूनों को सार्वजनिक करने वाले नियमों को सूत्रबद्ध भी नहीं करता। यहां तक कि वहां आन्तरिक शिकायत समिति भी नहीं है।

हाल ही का उदाहरण, तहलका पत्रिका के मुख्य संपादक पर इस तरह के दुर्व्यवहार में शामिल होने का शक किया गया था और इस खबर के प्रकाश में आने के बाद पता चला कि इसके कार्यालय में विशाखा दिशा-निर्देशन के तहत कोई भी शिकायत या कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत के लिये समिति नहीं थी।

इस प्रकार, केवल आने वाला समय ही बता सकता है कि अभी हाल ही में पारित हुआ अधिनियम, कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, उस अपराध को जो केवल महिलाओं के साथ किया जाता है, उसे रोकने और निषेध करने में सफल हो पायेगा या नहीं।

निष्कर्ष

ये कहा जा सकता है कि यद्यपि हमारे पास कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए विशेष प्रावधान है इसके अलावा भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से दिये गये ऐतिहासिक दिशा निर्देश भी है लेकिन इस बुराई को तब तक नियंत्रित नहीं किया जा सकता जब तक कि पुरुषों की सोच को नहीं बदला जा सकता। जब तक कि पुरुषों के द्वारा महिलाओं की बुनियादी मानवता को सम्मान नहीं दिया जायेगा, कोई भी कानून प्रभावी नहीं हो सकेगा। ये महत्वपूर्ण है कि संविधान द्वारा सभी को दिया गया समानता का अधिकार केवल शब्दों में या बातों में ही नहीं कहा जाना चाहिये बल्कि उसे व्यवहार में लाने की भी जरुरत है।