भुखमरी

हाल ही में एक समाचार रिपोर्ट और सूत्रों के अनुसार, एक अठारह वर्षीय लड़के की रामगढ़ जिले गोला ब्लॉक में भुखमरी से मौत हो गई। मृतक के माता- पिता की भी वर्ष 2003 में समान भाग्य से (मतलब भुखमरी से) मृत्यु हुई थी। यहाँ तक कि एक दशक के बाद, ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि, भुखमरी अभी भी भारत में अपने अस्तित्व का दावा कर रही है, जो देश खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर राष्ट्र होने में गर्व करता है। एक आर्थिक रूप से प्रगतिशील भारत में, भुखमरी इस प्रगतिशील राष्ट्र के लिये एक कलंक की तरह है। ये राष्ट्र पर एक धब्बे के अलावा, स्पष्ट है कि देश, भोजन, जो जीवन निर्वाह के लिये बहुत आवश्यक है, की उपलब्धता के मामले में अमीर और गरीबों के बीच असमानताओं का मुकाबला करने में असमर्थ है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता भारत अमीरों और गरीबों के बीच बहुत सी असमानताओं को रखता है। इस सन्दर्भ में भुखमरी इन सब में बात करने के लिये अधिक प्रासंगिक विषय बन जाता है।

भुखमरी क्या है और इसकी अवधारणाएं

भुखमरी वो स्थिति है जिसमें कैलोरी ऊर्जा कम ग्रहण की जाती है और ये कुपोषण का गंभीर रुप है जो इसकी देखभाल न करने पर मृत्यु का रुप ले लेती है। ऐतिहासिक रुप से, भुखमरी भारत के अलावा विभिन्न मानव संस्कृतियों में स्थिर है। एक देश में भुखमरी कई कारणों से उत्पन्न होती है जैसे: युद्ध, अकाल, अमीर और गरीब के बीच असमानता आदि। क्वाशियोरकोर (बच्चों में पोषण की कमी के कारण होने वाला रोग) और सूखा रोग की तरह कुपोषण की स्थिति भी भुखमरी के गंभीर कारणों से विकसित हो सकती है।

आमतौर पर, क्वाशियोरकोर और सूखे रोग की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब लोगों द्वारा खाया जाने वाला भोजन पोषण (प्रोटीन्स, विटामिन्स, मिनरल्स, कार्बोहाइड्रेट, वसा आदि) से भरपूर न हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मृत्यु के दस शीर्ष रोगों में आयरन (लौहतत्व), विटामिन ए और जिंक की कमी शामिल है।

भुखमरी विकासशील दुनिया के कुछ देशों में प्रचलित एक महामारी है। उन स्थानों पर, जहाँ अत्यधिक गरीबी है वहाँ भुखमरी एक अनैच्छिक स्थिति बन जाती है।

विश्व भूख पर सांख्यिकीय तथ्य

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के 2013 के अनुमानों के अनुसार, दुनिया में 7.1 अरब लोगों में से 870,00,000 (870 मिलियन) लोग, 2010-2012 में स्थायी कुपोषण से पीड़ित है और लगभग ऐसे सभी लोग विकासशील देशों में रहते है। इस अवधि में अफ्रीका में, 175-239 मिलियन भुखमरी से पीड़ित लोगों की संख्या में वृद्धि हुई। लैटिन अमेरिका के कैरेबियन में कुपोषण की दर में कमी आई है। इसके अलावा, 2013 में जारी किये गये ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भारत में कुछ 210 मिलियन लोग वर्ल्ड्स हंगर के अन्तर्गत आते हैं।

अन्य सर्वेक्षण के अनुसार, कुपोषण के सन्दर्भ में भारतीय प्रवृत्तियाँ प्रदर्शित करती हैं कि प्रति व्यक्ति पोषक तत्वों की खपत गिर रही है। आँकड़े इस सन्दर्भ में बहुत शर्मनाक है कि भुखमरी का उन्मूलन करने के उपायों के लिए चिंतन करने में सक्षम होने के बजाय, हम अपनी आर्थिक उत्पादकता में गौरवान्वित हो रहे है। दीर्घकाल में एक देश की आर्थिक प्रगति कोई मायने नहीं रखती जब तक कि ये अपने नागरिकों के जीवन के रखरखाव के लिए आवश्यक बुनियादी खाद्य को सुनिश्चित नहीं करता है।

भारत में भुखमरी के कारण

वर्तमान में, उत्तर बंगाल क्षेत्र, झारखंड क्षेत्र और मध्य प्रदेश भुखमरी से बुरी तरह प्रभावित क्षेत्र हैं। भारत के बारे में भूख से मरने वाली घटनाओं का एक इतिहास इस प्रकार है। 1943 में, बंगाल में लाखों लोगों की मृत्यु भूख के कारण हुई, जनवरी 1943 में बंगाल के अकाल के दौरान मरने वालो की संख्या 3-4 लाख थी। इसका उल्लेख करना बहुत आवश्यक है कि, 1943 में भारत में खाद्य उपलब्धता में कोई कमी नहीं थी क्योंकि ये 70,000 टन चावल ब्रिटिशों के प्रयोग के लिये निर्यात करता था। ऑस्ट्रेलिया से गेहूं का लदान भारतीय तट पर उतारने के लिये प्रावधान पारित कर दिया गया था, लेकिन इसे भूख से मर रहे राष्ट्र को खिलाने के लिए बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया था।

भारत में भुखमरी से लड़ने में एक प्रमुख बाधा सरकारी योजनाओं के उचित कार्यान्वयन की कमी है जो सभी को भोजन अपलब्ध कराने की दिशा में निर्देशित की जाती है। योजनाओं का क्रिर्यान्वयन ठीक प्रकार से हो रहा है या नहीं इसको सुनिश्चित करने के लिये या तो स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार है या फिर सरकार के अधिकारियों के बीच एक उदासीनता है। 2010 में, झारखंड़ के पूर्वी राज्य में सरकार ने खाद्य वितरण का कार्यक्रम चलाया लेकिन ये कार्यक्रम स्थानीय राशन डीलर द्वारा अनाज का वितरण बंद कर देने के कारण रोक दिया गया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति गरीबों में भी सबसे गरीब है और इस प्रकार अधिकतम जोखिम पर है।

 

भारत के सन्दर्भ में ये कहना आवश्यककता रहित हो जाता है कि खाद्य वितरण प्रणाली दोषपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दशकों में मिड-डे मील स्कीम, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य की देखभाल के लिये योजनाओं के प्रावधान की तरफ कदम उठाने के लिए सरकार के निर्देशन के लिये आदेश जारी किया है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक जो गरीबों और जरुरतमंदों की पहचान, शिकायत निवारक तंत्र और बच्चों के हकों के लिये अपने उपायों के संबंध में वादों को दिखाने के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है। लेकिन ये बिल भी पूरी तरह से बुराई मुक्त नहीं है। लाभार्थियों की पहचान के सन्दर्भ में स्पष्ट तंत्र के अन्तर्गत परिभाषित नहीं किया गया है।

गरीबी के संकेतकों को विशिष्ट बनाने की जरूरत है। वो वर्णन में अस्पष्ट हैं। विधेयक कहते है कि राज्य गरीबों की सूची प्रदान करेगा लेकिन राज्यों के पास शायद इस प्रकार के कोई आँकड़े नहीं है। वो सभी समितियाँ जो गरीबी के उपायों की देखरेख के लिये बनायी गयी है, उन सभी ने गरीबी रेखा से नीचे की आबादी के लिए अलग अलग संख्या निर्धारित की है। जहाँ तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संबंध है, ये सर्वविदित वास्तविकता है कि लगभग 51% प्रदत्त खाद्य भ्रष्टाचार के कारण उपलब्ध नहीं हो पाता और जिसे खुले बाजार में ऊँची कीमतों पर बेचा जाता है।

सूखा या बाढ़ के अवसर पर खाद्य उत्पादन और सब्सिडी बिल में निहित मूल्य वृद्धि जो कई जरुरतमंद लोगों को सब्सिडी के लिये पात्रता के दायरे से बाहर करता है आदि के सन्दर्भ में कोई स्पष्टता नहीं है। हमें वितरण प्रणाली से लीकेज को कम करने और इसे पारदर्शी बनाने की जरूरत है।

भुखमरी: भोजन के अलावा अन्य पहलुओं पर जोर देने वाली एक अवधारणा

भुखमरी से होने वाली मौतें भोजन की प्राप्ति से परे है। वो उन सरकारी संस्थानों के फेल होने का परिणाम है जो जरुरतमंदों और गरीबो की मदद के लिये स्थापित किये गये है। निरक्षता भी इन लोगों को एक उच्च जोखिम में डालती है जो खाद्य आपूर्ति के ज्ञान की कमी की वजह से सूख जाता है। इसके अलावा, चिकित्सा उपचार उनके दृष्टिकोण से एक औसत स्तर से नीचे हैं जो फिर से भुखमरी की वजह से होने वाली मौतों को रोकने में असमर्थ होते है। सरकारी अस्पताल दूर-दूर स्थित होते हैं और निजी अस्पताल महंगे होते हैं।

इस प्रकार, समय की मांग है कि लोगों की भूख के उन्मूलन के लिये और भुखमरी से होने वाली घटनाओं को बीते समय की बात बनाने के लिये सरकार की वर्तमान और भविष्य की योजनाओं को एक मिशन के साथ लागू किया जाना चाहिये। और उस प्रयोजन के लिए, प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा, सामान्य रूप से गैर-सरकारी संगठनों और लोगों को करुणा और भाईचारे की भावना के साथ प्रयास करना होगा।