महिला सशक्तिकरण

आपने बहुत सुना होगा महिला सशक्तीकरण के बारे में लेकिन असल में क्या है महिला सशक्तीकरण?

“मैं किसी भी समाज की तरक्की उस समाज की महिलाओ की तरक्की में देखता हुं“ – डॉ भीमराव अम्बेडकर

What is real women empowerment

हेलो दोस्तों, नमस्कार, मैं अर्चना सिंह पटेल, आप सभी का वीमेन प्लैनेट पर स्वागत है।

दोस्तों आपने बहुत सुना होगा महिला सशक्तीकरण के बारे में लेकिन असल में क्या है महिला सशक्तीकरण – आज हम ये जानेंगे! ये भी जानेंगे कि महिला सशक्तीकरण की जरुरत पड़ी ही क्यों, महिलाओं की ऐसी कंडीशन हुई कैसे, इतने सालों के प्रयास के बाद भी महिला सशक्तीकरण कहाँ तक पंहुचा है, इस स्पीड से महिलाओं को भविष्य में कब तक महिला सशक्तीकरण की जरुरत पड़ेगी, कौन कौन से फैक्टर्स है जिससे महिला सशक्तीकरण अपना टारगेट अचीव नहीं कर पाया है, कौन कौन से फैक्टर्स हैं जिससे रियल में फर्क पड़ेगा और महिलाएं एम्पॉवर होंगी, डाटा और फैक्ट्स क्या कहते है, लेजेंड्स क्या कहते है महिला सशक्तीकरण पर और अगर कुछ छूट जाये तो आप कमेंट करके जरूर बताएंगे ये मुझे पूरा विश्वास है। वादा करती हूँ इधर उधर घूमाकर फाल्तू की सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं दूंगी, आज मैं बात करूंगी रियल वीमने एम्पावरमेंट के बारे में जो मैंने समझा है और असलियत में क्या है कैसे है ये समझा है, दरअसल मैं बताउंगी क्या, मैं आपके सामने कुछ कोस्चन्स रखूंगी जिनका जबाब आप खुद देंगे, आप उन सवालों का जबाब देते देते खुद समझ जायेंगे की हमारे यहां महिलाएं कितनी इम्पॉवर्ड हैं, आपके सामने सवालों की बौछार करने से पहले हम कुछ इम्पोर्टेन्ट पॉइंट्स जानेंगे – वीमेन एम्पावरमेंट का मतलब है महिला सशक्तीकरण, न कि पुरुष असशक्तीकरण। ठीक है तो हमे कंफ्यूज बिलकुल नहीं होना है, मान लीजिये हमारे पास दो लाइन्स है एक छोटी लाइन w और दूसरी लम्बी लाइन m, अब अगर w लाइन को बड़ा करना है तो हमें w लाइन को खींचकर लम्बा करना होगा न कि m लाइन को मिटाकर छोटा करना ताकि w लाइन खुद ही बड़ा दिखने लगे। अगर हमने दूसरी वाली तरक़ीब अपनायी तो क्या होगा w लाइन तो उतनी की उतनी रह गयी न और m लाइन छोटी अलग से हो गयी। आज के दौर में वीमेन एम्पावरमेंट की कंडीशन ठीक इसी दो लाइन्स की तरह है दिखने में बड़ी होती दिख रही है खूब काम हो रहा है, स्कीम्स निकल रही है, कानून मजबूत हो रहे है वगैरह वगैरह लेकिन रियल में धरातल पर क्या सच्चाई है, मेरे साथ बने रहें, ये आपको मै नहीं बल्कि national family health survey 5 की रिपोर्ट के डाटा और फैक्ट्स बताएंगे।

महिला सशक्तीकरण

तो चलिए शुरू करते है, महिला सशक्तीकरण (महिला मीन्स फीमेल औरत, सशक्तीकरण मीन्स सभी शक्तियां राइट्स प्रदान करना, मतलब महिलाओं को पावर देना, उन्हें उनके हक़ अधिकार देना ताकि वो फिजिकली मेंटली सोशली फिनान्सिअली और इंटेलेक्टुअली स्वस्थ खुशहाल स्वतंत्र आत्मनिर्भर तनावरहित निडर महसूस कर सकें ताकि अपने भविष्य में वो अपने परिवार, अपने समाज, अपने देश के डेवलपमेंट में सपोर्ट कर सकें अपना पूरा योगदान दे सकें, धरती पर जीवन का जो सतत विकास है उसे बखूबी निभा सके, ठीक उसी तरह जैसे एक मैन यानि एक आदमी बचपन से महसूस करता है, अपना गोल डिसाइड करता है और भविष्य में पूरा करता है।) मेरा कहने का मतलब वो सारे हक़ अधिकार जो एक महिला को इंसान है ऐसा महसूस कराये।

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आईये अब जानते है कि महिला सशक्तीकरण की जरुरत पड़ी ही क्यों:

स्वामी विवेकानंद ने स्त्रियों के वर्तमान व भविष्य पर विचार करते हुए एक बार कहा था- “किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है वहाँ की महिलाओं के साथ होने वाला व्यवहार।”

उन्होंने कहा की “महिलाओं को अवसर दो दुनिया वो खुद बदल देंगी”

उन्होंने कहा कि “हैंड्स ऑफ, आपको उनके बारे में कुछ नहीं करना है. बस उन्हें अकेला छोड़ दो. उन्हें जो करना है वह खुद करेंगी. यही सबसे जरूरी बात है. ऐसा नहीं है कि पुरुष को स्त्री को सुधारने की जरूरत है. अगर वह यह सोच छोड़ दे तो महिलाएं वही करेंगी जो उनके लिए बेहतर है”

उनका ऐसा मानना था कि जैसे परिंदा एक पर से नहीं उड़ सकता ठीक वैसे ही समाज एक पहिये पर नहीं चल सकता, स्त्री और पुरुष दो पहिये समान है दोनों गतिशील रहेंगे तभी समाज और देश का विकास होगा।

देखा जाये तो महिलाएं देश की आधी आबादी है और अगर देश की आधी आबादी लूली लंगड़ी हो तो देश कैसे विकास कर सकता है, देश की आधी आबादी को मतलब महिलाओं को वर्षों से सामाजिक कुप्रथाओं में बांधकर, उन्हें उनके सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित रखकर, आत्मनिर्भरता से निर्भरता की ओर खींचकर उन्हें लूला लंगड़ा बना दिया गया है, भारत के कई हिस्सों के समाज में महिलाओं को उचित अधिकार प्राप्त नहीं है उन्हें पुरुषों से कमतर समझा जाता है इसलिए पतन की ओर अग्रसित समाज के उत्थान के लिए जरुरी है महिला का फिर से सशक्त होना। या उसे सशक्त बनाना।

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महिलाओं की ऐसी कंडीशन हुई कैसे कि महिला सशक्तिकरण की जरूरत पड़े

इसके अंतर्गत हम प्राचीन काल से आधुनिक काल तक महिलाओं की स्थिति के बार में जानेंगे – शायद पता लग जाये कि सशक्तिकरण की जरूरत पड़ी ही क्यों।

प्राचीन काल यानी ऋग्वैदिक या पूर्व वैदिक काल में भारतीय संस्कृति में महिलाएं सशक्त थी उन्हें पुरुषों के बराबर माना जाता था और लिंग आधारित भेदभाव भी नहीं थे, बल्कि उन्हें कार्यक्रमों में समाज द्वारा सम्मानित भी किया जाता था, रियलिटी में उन्हें जननी माना जाता था और धर्मग्रन्थों में नारी का दर्जा दिया जाता था। अपने बुनियादी अधिकारों का आनंद लेते हुए महिलाएं पूर्ण शिक्षा प्राप्त करती थी, और तो और ऋषि पत्नियाँ अपने पतियों के साथ आध्यात्मिक गतिविधियों में भाग लेती थी, स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही जीवन जीने को मिलता था।

भारतीय विदुषियां जैसे गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, सीता, द्रौपदी और अलापा की उपलब्धि इस समय महिलाओं के लिए आदर्श है। पुरुषों के समान अधिकार और समानता प्राप्त ये महिलाएँ कई क्षेत्रों में पुरुषों के साथ प्रतिस्पर्धी भी थीं उन पर कोई प्रतिबंध नहीं था, उन्हें धन और संपत्ति रखने का अधिकार था। अपने संतानों के मार्गदर्शन में उनकी सशक्त भूमिका थी।

तैत्तिरीय संहिता में महिला और पुरुष दोनों को गाड़ी के दो पहिया के रूप में माना जाता था। तैत्तिरीय शाखा कृष्ण यजुर्वेद की प्रमुख शाखा है जो दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित है। विष्णुपुराण के अनुसार इस शाखा के प्रवर्तक यक्ष के शिष्य तित्तिरि ऋषि थे।

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इतने सालों के प्रयास के बाद भी महिला सशक्तीकरण कहाँ तक पंहुचा है?

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इस स्पीड से महिलाओं को भविष्य में कब तक महिला सशक्तीकरण की जरुरत पड़ेगी

आजादी से पहले जब गिनी चुनी महिलाएं ही पढ़ाई कर पाती थीं, उस जमाने में गरीब तबके की महिलाओं का सशक्त होना क्या पढाई तक के लिए अवेयरनेस नहीं थी, उस समय एक वीरांगना उभरी थी जिनका नाम था सावित्री बाई फुले, महिला अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाली सावित्रीबाई फुले महिलाओं को सुशिक्षित बनाने के लिए 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश के पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी. देश की पहली महिला शिक्षक और समाज सेविका सावित्री बाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापिका थीं… 9 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह 13 साल के ज्योतिराव फुले से हुआ जो तीसरी कक्षा में पढ़ते थे, जब उनकी शादी हुई वो अनपढ़ थीं. वहीं, वो दौर था जब छोटी सावित्रीबाई ने पढ़ने का सपना देखा, जिस समय दलितों के साथ भेदभाव चरम पर था, पति की हेल्प से वो पढाई की और एक दिन सभी महिलाओं को पढाने का ठानी, पढ़ाना जारी रखने में उन्होंने असहनीय संघर्ष किया, कीचङ, इट पत्थर ढेले फेके जाते थे उनके ऊपर, लेकिन उन्हें पता था महिलाओं का जागृत होना पढ़ना कितना जरुरी है। आखिर उनकी मेहनत रंग लायी। उस समय भारत में पिछड़े समाज से स्कूल जाने वाली वो पहली लड़की थी और लड़कियों की शिक्षा की जननी बनी।

महिलाओं को सशक्त बनाने का यह दीर्घकालिक प्रयास फिर से 1940 के दशक में शुरू हुआ। महिला सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी और महत्वपूर्ण चरण महिलाओं का राजनीति और अर्थव्यवस्था में भूमिका होना है। फिर भारत सरकार द्वारा 2001 में महिलाओं के सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति पारित की गयी और इस वर्ष को महिलाओं के सशक्तीकरण (स्वशक्ति) वर्ष के रूप में घोषित किया गया, वैसे तो घटनाओं का कोई अंत नहीं है लेकिन उस समय  2006 में अपने ही ससुर द्वारा बलात्कार की शिकार एक मुस्लिम महिला इमराना की कहानी मीडिया में खूब प्रचारित हुई थी।

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कौन कौन से फैक्टर्स है जिससे महिला सशक्तीकरण अपना टारगेट अचीव नहीं कर पाया है

अभी भी शिक्षा के प्रति जागरूक न होना सीरियस न होना,

बेचारी बन कर रहना

अपने आप को कमजोर मान लेना की मै क्या ही कर सकती हूँ

अभी भी फिजिकल स्ट्रेंथ की तरफ ध्यान न जाना

खुद को मेंटली स्ट्रांग न बनाना

अगर कुछ बुरा हो जाये तो उसे पकड़ कर रखना, इग्नोर न करना

पुरुषों द्वारा दिनभर के घरेलू काम को काम न मानना क्योकि वो महिला द्वारा अपनी फैमिली के लिए एक निस्वार्थ अनपेड जॉब है, जिसमे कोई लिव नहीं होती मरते दम तक

घर की ही एक महिला (सास, जेठानी, ननद) द्वारा दूसरी महिला (नई बहु) को सपोर्ट न मिलना।

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कौन कौन से फैक्टर्स हैं जिससे रियल में फर्क पड़ेगा और महिलाएं एम्पॉवर होंगी

हर लड़की ये ठान ले कि मुझे अच्छे से शिक्षित होना है, और कोई स्किल वाली डिग्री लेनी है जिससे उस क्षेत्र में जॉब कर सकें या कुछ अपना काम शुरू कर सके।

हर लड़की ये ठान ले कि जब तक फाइनेंसियल स्ट्रांग न हो जाऊ तब तक शादी नहीं करूंगी, लेकिन हाँ अपने करियर की तरफ सीरियस होने के लिए, माँ बाप बेफकूफ बनाने के लिए नहीं।

महिलायें इमोशनल तो होती है ये बाई बर्थ होता है नेचुरल होता है लेकिन अगर हम प्रैक्टिस करें तो अपने इमोशंस को कण्ट्रोल करके इस्तेमाल कर सकते है जैसे जहाँ इमोशंस की जरूरत हो वहां इमोशनल हो जहाँ नहीं जरूरत है वहाँ कण्ट्रोल करना चाहिए, क्योकि बेवजह इमोशंस की कोई कद्र नहीं होती उल्टा हम ही और ज्यादा इमोशनल होते जाते है और दलदल में खींचते चले जाते है।

अपनी कंडीशंस की तरफ हम महिलाओं को डीपली अवेयर होना पड़ेगा और शिक्षा के प्रति सीरियस होना होगा, और बात यही खत्म नहीं होती अगर आप एक लेवल तक पहुंच चुकी है तो दूसरी महिलाओं को भी ऊपर खिचिये उन्हें जागरूक कीजिये सपोर्ट कीजिये।

बेचारी बनकर न रहें, कि मैं तो अबला हूँ मै क्या कर सकती हूँ उसने मुझे गलत बोला मेरे साथ गलत किया, सोचने समझने की क्षमता का विकास करें, न्यूज़ पेपर पढ़ें, अच्छे राइटर की बुक्स पढ़ें अपनी कंडीशंस के बारे में अपनों से डिसकस करें सलाह लें, अपनी गलती को गलती एक्सेप्ट करना सीखें दूसरों को ब्लेम न करें, गलती सुधारे, आपकी सपोर्ट के लिए बनाये गए कानून का गलत इस्तेमाल न करें, क्योकि आपकी वजह से कोई महिला जिसके साथ गलत हुआ है उस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। ये सब कुछ क्वालिटीज़ है जिन्हे अपने अंदर डेवेलोप करने से बहुत फायदा होगा और खुद से वादा करें जीवन भर फॉलो करेंगी और अपने नई पीढ़ी में ट्रांसफर करेंगी।

अगर किसी रिश्ते में कुछ अनबन हो जाए तो पकड़कर न रखें, स्किलफुल्ली सोल्व करें, गलती पर सॉरी बोले, और कभी कभी कंडीशन को इग्नोर भी करें, ऐटिट्यूड न पालें, बात बन जाती है।

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लेजेंड्स क्या कहते है महिला सशक्तीकरण पर

“स्त्री पुरुष की सहचरी है, समान मानसिक क्षमता से संपन्न है” – महात्मा गांधी

“आप किसी देश की स्थिति वहां की महिलाओं की स्थिति देखकर बता सकते हैं” – पं. जवाहर लाल नेहरू

“एक आदमी को पढ़ाओगे तो एक व्यक्ति शिक्षित होगा, लेकिन एक स्त्री को पढ़ाओगे तो पूरा परिवार शिक्षित होगा” – महात्मा गांधी

“हम प्राचीन भारत की नारियों को आदर्श मानकर ही नारी का उत्थान और सशक्तिकरण कर सकते हैं” – स्वामी विवेकानंद

“मैं किसी भी समाज की तरक्की उस समाज की महिलाओ की तरक्की में देखता हुं“ – डॉ भीमराव अम्बेडकर

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अर्चना सिंह

कई लोगो की प्रेरणा की स्रोत, अर्चना सिंह एक कुशल उद्यमी है। अर्चना सिंह 'व्हाइट प्लैनेट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड' आई. टी. कंपनी की डायरेक्टर है। एक सफल उद्ममी होने के साथ-साथ एक कुशल लेखक भी है, व इस क्षेत्र में कई वर्षो का अनुभव है। वे 'हिन्दी की दुनिया' और अन्य कई वेबसाइटों पर नियमित लिखती हैं। अपने प्रत्येक क्षण को सृजनात्मकता में लगाती है। इन्हें खाली बैठना पसंद नहीं। इनका कठोर परिश्रम एवं कार्य के प्रति लगन ही इनकी सफलता की कुंजी है।

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द्वारा प्रकाशित
अर्चना सिंह