ग्यारहवीं शरीफ (Giaravahin Sharif Festival)

ग्यारहवीं शरीफ सुन्नी मुस्लिम संप्रदाय द्वारा मनाये जाने वाला एक प्रमुख पर्व है। जिसे इस्लाम के उपदेशक और एक महान संत अब्दुल क़ादिर जीलानी के याद में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि वह पैगंबर मोहम्मद के वंशज थे क्योंकि उनकी माँ इमाम हुसैन की वंसज थी, जोकि पैगंबर मोहम्मद के पोते थे। उन्हें इस्लाम को पुनर्जीवित करने वाले व्यक्ति के रुप में भी जाना जाता है क्योंकि अपने उदार व्यक्तित्व और सूफी विचारधारा द्वारा उन्होंने कई लोगो को प्रभावित किया।

इसके साथ ही अब्दुल कादिर सुफी इस्लाम के भी संस्थापक थे। उनका जन्म 17 मार्च 1078 ईस्वी को गीलान राज्य में हुआ था, जोकि आज के समय ईरान में स्थित है और उनके नाम में मौजूद जीलानी उनके जन्मस्थल को दर्शाता है। प्रतिवर्ष रमादान के पहले दिन को उनके जन्मदिन के रुप में मनाया जाता है और हर साल के रबी अल थानी के 11वें दिन को उनके पुण्य तिथि को ग्यारहवीं शरीफ के त्योहार के रुप में मनाया जाता है।

ग्यारहवीं शरीफ 2019 (Giaravahin Sharif 2019)

वर्ष 2019 में ग्यारहवीं शरीफ का पर्व 22 जनवरी, मंगलवार के दिन मनाया गया।

ग्यारहवीं शरीफ क्यों मनाया जाता है? (Why Do We Celebrate Giaravahin Sharif)

ग्यारहवीं शरीफ का पर्व महान इस्लामिक ज्ञानी और सूफी संत हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी के याद में मनाया जाता है। उनका राज्य उस समय के गीलान प्रांत में हुआ था, जोकि वर्तमान में ईरान में है। ऐसा माना जाता है कि हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी पैगंबर मोहम्मद साहब के रिश्तेदार थे। वह एक अच्छे विचारों वाले आदमी थे। अपने व्यक्तित्व तथा शिक्षाओं द्वारा उन्होंने कई लोगो को प्रभावित किया।

हर वर्ष को हिजरी कैलेंडेर के रबी अल थानी माह के 11वें दिन उनके पुण्यतिथि के अवसर पर उनके महान कार्यों को याद करते हुए, ग्यारहवीं शरीफ का यह त्योहार मनाया जाता है। वास्तव में एक प्रकार से यह उनके द्वारा समाज के भलाई और विकास के कार्यों के लिए, उन्हें दी जाने वाले एक श्रद्धांजलि होती है। जो इस बात को दर्शाती है कि भले ही हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी हमारे बीच ना हो लेकिन उनके शिक्षाओं को अपनाकर हम समाज के विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकते है।

ग्यारहवीं शरीफ कैसै मनाया जाता है - रिवाज एवं परंपरा (How Do We Celebrate Giaravahin Sharif – Custom and Tradition of Giaravahin Sharif)

सुन्नी मुस्लिमों द्वारा ग्यारहवीं शरीफ के त्योहार को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन बगदाद स्थित उनकी मजार पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते है।

इस दिन बगदाद में दर्शनार्थियों का एक मेला सा उमड़ पड़ता है और कई सारे श्रद्धालु तो मजार पर एक दिन पहले ही आ जाते है। ताकि वह सुबह की नमाज के दौरान वह वहां प्रर्थना कर सके। इस दिन भारत में कश्मीरी मुस्लिम समाज के लोग भारी संख्या में श्रीनगर स्थित अब्दुल क़ादिर जीलानी मस्जिद में प्रर्थना करने के लिए इकठ्ठा होते है।

इस दिन उलेमाओं और मौलवियों द्वारा लोगों को हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी के विचारों के बारे में बताया जाता है। इस दिन विभिन्न स्थलों पर उनके विषय और उनके द्वारा किये गये कार्यों के विषय में लोगो को बताने के लिए चर्चा कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

 

ग्यारहवीं शरीफ की आधुनिक परंपरा (Modern Tradition of Giaravahin Sharif)

पहले के अपेक्षा इस पर्व में कई सारे परिवर्तन आये है, आज के समय में यह पर्व काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है और पहले के अपेक्षा वर्तमान में यह पर्व एक वृहद स्तर पर पहुंच चुका है। इस दिन मस्जिदों में लोग नमाज अदा करने के लिए इकठ्ठा होते हैं।

जहां पर उन्हें हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी के जीवन तथा उनके शिक्षाओं के विषय में जानकारी दी जाती है, जिसमें लोगो को उनके जीवन के विभिन्न घटनाओं के विषय में भी बताया जाता है कि आखिर कैसे उन्होंने लोगो को सूफीवादी विचारधारा द्वारा मानवता का पाठ पढ़ाया और उन्हें सच्चाई तथा ईमानदारी का महत्व समझाया।

हमें इस बात पर जोर देना चाहिए कि उनकी यह शिक्षाएं अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे ताकि आज के समय में तेजी से बढ़ रहे इस धार्मिक कट्टरवाद पर रोक लगाया जा सके। यहीं कारण है कि हमें अपने जीवन में हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी के शिक्षाओं को आत्मसात करना होगा, तभी हम इस पर्व के असली अर्थ को सार्थक कर पायेंगे।

ग्यारहवीं शरीफ का महत्व (Significance of Giaravahin Sharif)

ग्यारहवीं शरीफ का पर्व एक काफी महत्वपूर्ण अवसर है, यह दिन ना सिर्फ हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी को श्रद्धांजलि के रुप में समर्पित है बल्कि के उनके द्वारा दी गयी शिक्षाओं को भी समर्पित है। हजरत जीलानी ना सिर्फ एक सूफी संत थे बल्कि कि वह एक शिक्षक, धर्म प्रचारक, उतकृष्ट वक्ता होने के साथ ही एक ईमानदार तथा अच्छे व्यक्ति भी थे। ज़ियारवाहिन शरीफ का यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि समस्याएं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो लेकिन अपने कार्यों के द्वारा हम उनसे आसानी से निजात पा सकते है।

अपने जीवन में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किये और लोगो को ईमानदारी और सच्चाई के शक्ति से परिचित कराया। उनके जीवन के ऐसे कई सारे किस्से है, जो हमें कई अहम सीख प्रदान करते है। यही कारण है कि यह दिन हमारे लिए इतना महत्व रखता है।

ग्यारहवीं शरीफ का इतिहास (History of Giaravahin Sharif)

यह पर्व प्रसिद्ध सूफी संत हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी को समर्पित है। जिनका जन्म इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार रमादान के पहले दिन सन् 470 हिजरी में हुआ था (ग्रोगोरियन कैलेंडर के अनुसार 17 मार्च सन् 1078 ईस्वी में) उनका जन्म उस समय के गीलान राज्य में हुआ था, जोकि वर्तमान में ईरान का हिस्सा है। उनके पिता का नाम शेख अबु सालेह मूसा था और उनकी माता का नाम सैय्यदा बीबी उम्मल कैर फातिमा था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हनबाली विद्यालय से प्राप्त की थी, जोकि सुन्नी इस्लामिक शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था।

 

हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी को ‘मुहियुद्दीन’ के नाम से भी पुकारा जाता था। जिसका अर्थ होता है ‘धर्म को पुनर्जीवित करने वाला’ क्योंकि अपने कार्यों द्वारा उन्होंने अधिक से अधिक लोगो तक इस्लामिक विचारों को पहुंचाया। उनके जीवन से जुड़ी कई सारी कथाएं प्रसिद्ध है।

अब्दुल क़ादिर जीलानी के जन्म की कथा

हजरत अब्दुल क़ादिर जीलानी के जीवन से जुड़ी हुई तमाम तरह की कहानियां प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि हजरत जीलानी की माँ ने उन्हें 60 वर्ष के उम्र में जन्म दिया था। जोकि किसी महिला द्वारा बच्चे को जन्म देने की एक सामान्य उम्र से कहीं ज्यादे है। ऐसा कहा जाता है कि जीलानी के जन्म के वक्त उनके छाती पर पैगंबर मोहम्मद के पैरों के निशान बने हुए थे। इसके साथ ही ऐसा माना जाता है उनके जन्म के वक्त गीलान में अन्य 1100 बच्चों ने जन्म लिया था  और यह सभी के सभी बच्चे आगे चलकर इस्लाम के प्रचारक और मौलवी बन गये।

उनके जीवन की एक और भी बहुत प्रसिद्ध कहानी है, जिसके अनुसार जन्म लेने के बाद नवजात हजरत अब्दुल कदर जीलानी ने रमादान के महीने में दूध पीने से इंकार कर दिया। जिसके बाद आने वाले वर्षों में जब लोग चांद देख पाने में असमर्थ होते थे। तब वह अपने व्रत का अंदाजा इस बात से लगाते थे कि जीलानी ने दूध पिया या नही, यहीं कारण है कि उन्हें उनके जन्म से एक विशेष बालक माना जाता था।

अब्दुल क़ादिर जीलानी और लुटेरों की कथा

यह कहानी हजरत जीलानी के सत्यनिष्ठा और ईमानदारी से जुड़ी हुई है। जब जीलानी 18 वर्ष के हुए तो वह अपने आगे की पढ़ाई के लिए बगदाद जाने के लिए तैयार हुए। उस वक्त उनकी माँ ने 40 सोने के सिक्कों को उनके कोट में डाल दिया और जाते वक्त उन्हें यह सलाह दी कि चाहे कुछ भी हो लेकिन वह अपने जीवन में कभी भी सत्य के मार्ग से विचलित ना हों। इस पर उन्होंने अपने माँ को सदैव सत्य के मार्ग पर चलने का वचन देकर बगदाद के लिए प्रस्थान किया।

बगदाद के रास्ते में उनका कारवां का कुछ लुटेरों से सामना हुआ। जिसमें एक लुटेरे ने हजरत जीलानी की तलाशी ली और कुछ ना मिलने पर उनसे पूछा कि – क्या तुम्हारे पास कुछ कीमती है। इस पर जीलानी ने कहा कि हाँ, जिसके बाद वह लुटेरा जीलानी को अपने सरदार के पास ले गया और अपने सरदार को पूरी घटना बतायी और इसके पश्चात लुटेरों के सरदार ने हजरत जीलानी की तलाशी ली और उनके जेब से उन चालीस सोने के सिक्कों को प्राप्त किया, जो उनकी माँ ने उन्हें बगदाद की यात्रा पर निकलने से पहले दिये थे।

उनकी इस ईमानदारी को देखकर लुटेरों का वह सरदार काफी प्रभावित हुआ और उनके सिक्कों को वापस करते हुए, उनसे कहाँ कि वास्तव में तुम एक सच्चे मुसलमान हो। इसके साथ ही अपने इस हरकत का पश्चाताप करते हुए, दूसरे यात्रियों का भी सामान उन्हें वापस लौटा दिया।