रक्षा बंधन

रक्षा बंधन हिंदु धर्म के सबसे पवित्र तथा प्रमुख पर्वों में से एक है। यह पर्व भातृभावना तथा सहयोग को समर्पित है। रक्षा बंधन का पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, इसलिए कई जगहों पर इसे श्रावणी या सलूनो नाम से भी जाना जाता है। आजकल के समय में यह पर्व मुख्यतः भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित है, लेकिन कई स्थानों पर ब्राम्हण अपने यजमान को भी राखी बांधते है।

इसके साथ ही कभी-कभी सार्वजनिक रुप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी राखी बांधी जाती है। वास्तव में रक्षा बंधन का यह पर्व मानवीय भावनाओं के विश्वास तथा शक्ति को प्रदर्शित करने वाला पर्व है। यहीं कारण है कि इस पर्व को लगभग विश्व भर के हिंदू समुदाय द्वारा इतने धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

रक्षा बंधन 2019 – (Raksha Bandhan 2019)

वर्ष 2019 में रक्षा बंधन का पर्व 15 अगस्त, गुरुवार को मनाया जायेगा।

रक्षा बंधन क्यों मनाते हैं? (Why Do We Celebrate Raksha Bandhan)

हिन्दू पंचांग के अनुसार हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन रक्षा बंधन का यह अनोखा पर्व मनाया जाता है। इस पवित्र पर्व पर बहनें अपनो भाइयों को राखी बांधते हुए उनके सकुशलता की कामना करती हैं और अपनी रक्षा का वचन मांगती हैं।

हालांकि इसके अलावा शिष्यों द्वारा अपने गुरु तथा ब्राम्हणों द्वारा अपने यजमनों को भी राखी बांधने की प्रथा रही है, लेकिन आज के समय में इसका प्रचलन काफी कम देखने को मिलता है। रक्षा बंधन के पर्व को मनाने को लेकर कई सारी मान्यताएं प्रचलित हैं। लेकिन वास्तव में रक्षा बंधन का यह पर्व मानवीय भावनाओं की शक्ति को प्रदर्शित करने के साथ ही वचनबद्धता की शक्ति को प्रदर्शित करने का कार्य करता है।

इंद्रदेव को बांधी गई थी राखी

रक्षा बंधन के पर्व को लेकर कई सारी पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं से ही रक्षा बंधन के वर्तमान पर्व रुप का निर्णाण हुआ है। भविष्य पुराण में एक वर्णित कथा के अनुसार-

एक बार देवताओं और असुरों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में असुरों का पलड़ा भारी था और देवताओं की पराजय निश्चित लग रही थी। इस बात से घबराकर देवराज इंद्र देवगुरु बृहस्पति के पास गये। तब देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें सुझाव दिया कि वह अपनी पत्नी इंद्राणी से रक्षासूत्र बंधवा कर युद्ध में जाये। अपने गुरु के सलाह के अनुसार इंद्र ने ऐसा ही किया और रक्षासूत्र की मंत्र शक्ति के कारण असुरों पर विजय प्राप्त की।

जब रानी कर्णावती ने भेजी हुमायूँ को राखी

राखी के संबंध में एक ऐतिहासिक कथा भी काफी प्रसिद्ध है। जिसके अनुसार, मेवाड़ रानी कर्णावती को अपने राज्य पर गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के हमले की पूर्व सूचना मिली। रानी कर्मावती के पास बहादुर शाह का मुकबला करने हेतु पर्याप्त सैन्य शक्ति नही थी अतः उन्होंने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी तथा अपने राज्य के रक्षा की प्रर्थना की।

हुमायूँ ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखते हुए रानी कर्णावती को अपनी बहन माना और उनकी रक्षा के लिए मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह के युद्ध करते हुए रानी कर्णावती तथा उनके राज्य की रक्षा की।

 

रक्षा बंधन कैसे मनाया जाता है – रिवाज एवं परंपरा (How Do We Celebrate Raksha Bandhan - Custom and Tradition of Raksha Bandhan Festival)

रक्षा बंधन के दिन बहनों द्वारा अपने भाईयों को रक्षा सूत्र बांध कर उनसे अपने रक्षा का वचन लिया जाता है, यह दिन सार्वजनिक अवकाश का दिन होता है। जिससे की भाईयों और बहनों को समय प्राप्त हो जाता है कि यदि वह दूर हों तो एक दूसरे से मिल सके और रक्षा बंधन का यह पर्व मना सके।

यदि भाई-बहन इस दिन एक दूसरे से नही मिल पाते, तो बहनों द्वारा अपने भाईयों को कुरियर या डाक द्वारा भी राखी भेजी जाती है। सामान्यतः सेना में कार्य करने वाले लोगो को उनकी बहनों द्वारा डाक या कुरियर द्वारा राखी अवश्य भेजी जाती है।

रक्षा बंधन के पर्व को मनाने का एक विशेष तरीका है, जिसके अनुसार हमें इस पर्व को मनाना चाहिये। सर्वप्रथम रक्षा बंधन के दिन सुबह भाई-बहन स्नान करके भगवान की पूजा करते हैं। इसके बाद बहन द्वारा एक थाल में रोरी, अक्षत, कुमकुम तथा दीप जलाया जाता है।

ततपश्चात बहनों द्वारा अपने भाईयों की आरती उतारी जाती है और उनके लंबे उम्र तथा समृद्धि की मंगलकामना करते हुए उन्हें राखी बांधी जाती है। इसके पश्चात भाइयों द्वारा अपने बहनों को उनकी रक्षा का वचन दिया जाता है तथा उन्हें उनकी पसंद के उपहार भेंट किये जाते है।

पहले के समय में रक्षा बंधन के पर्व पर पुरोहितों द्वारा अपने यजमानों को राखी बांध कर उनके कल्याण तथा उन्नति की मंगलकामना की जाती थी, हालांकि आज भी कई जहगों पर इस प्रथा का पालन किया जाता है। इस प्रथा में पुरोहित अपने यजमान को रक्षासूत्र बांधने के साथ ही एक विशेष मंत्र का उच्चारण भी करते थे। मंदिरों में रक्षा बंधवाने पर आज भी इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है। यह मंत्र कुछ इस प्रकार से है-

येन बद्धो बलिः राजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार से दानवों के राजा बलि को रक्षासूत्र में बांधा गया था। उसी प्रकार से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षे! तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। विद्वानों के अनुसार जब कोई ब्राम्हण या पुरोहित अपने यजमान को रक्षासूत्र बांधता तो इसके मंत्र के द्वारा वह कहता है कि “जिस रक्षासूत्र में दानवों के महापराक्रमी राजा बलि बांधे गये थे और धर्म में प्रयुक्त किये गये थे, उसी सूत्र में मैं तुम्हें बांध कर धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं और रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षा! तुम स्थिर रहना स्थिर रहना।”

रक्षा बंधन की आधुनिक परंपरा (Modern Tradition of Raksha Bandhan)

आज के समय में रक्षा बंधन के पर्व में पहले के अपेक्षा काफी परिवर्तन हो चुका है। पहले के समय में यह पर्व गुरु-शिष्य, पुरोहित तथा यजमान और संबंधियों द्वारा भी मनाया जाता था लेकिन आज के समय में रक्षा बंधंन यह का पर्व मुख्यतः भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित है। यह पर्व भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते को और भी मजबूत करने का कार्य करता है।

 

रक्षा बंधन का पर्व काफी मनोरंजक भी होता है इस भाईयों द्वारा अपने बहनों को कई सारे आकर्षक उपहार भी दिये जाते हैं। आज के समय में लड़कियों तथा स्त्रियों द्वारा सेना पर तैनात जवानों को भी सामूहिक कार्यक्रमों में राखी बांधी जाती है या फिर राखी को डाक से उन तक भेजा जाता है, ऐसा उनके द्वारा देश की सीमाओं पर हमारे रक्षा करने के लिए किया जाता है। इसके साथ वर्तमान में लोगो द्वारा वृक्षों तथा पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेने के लिए पेड़ों को भी राखी बांधी जाती है।

हालांकि कई सारे अच्छे परिवर्तनों के साथ ही रक्षा बंधन के पर्व में कई सारे नकरात्मक परिवर्तन भी हुए हैं। पहले के समय में रक्षासूत्र एक साधरण रेशम का धागा हुआ करता था लेकिन आज के समय में रक्षा बंधन के अवसर पर विभिन्न प्रकार के रक्षासूत्र बिकते हैं। इनमें से तो कई सारे रक्षासूत्र सोने और चांदी के भी बने होते हैं, जिनकी कीमत काफी ज्यादे होते है।

वास्तव में यह अपने धन-सपंदा को प्रदर्शन करने का एक जरिया बन गया है। हमें इस को समझना होगा, रक्षा का महत्व इसके बांधने वाले और इसे धारण करने वाले के भावनाओं और विश्वास से जुड़ा होता है नाकि इस बात से कि रक्षासूत्र किस चीज से बना हुआ है।

रक्षा बंधन का महत्व (Significance of Raksha Bandhan)

रक्षा बंधन का पर्व हमें इस बात का एहसास दिलाता है कि भावनाओं में कितनी शक्ति होती है। रक्षा सूत्र एक बहन द्वारा उसके भाई को बांधी गयी भावनाओं की वह शक्ति होती है। जोकि उसे इस बात का एहसास दिलाता है कि विकट परिस्थितियों में रक्षासूत्र रुपी यह धागा उसकी रक्षा करेगा, ठीक उसी प्रकार भाई द्वारा बहन को इस चीज का वचन दिया जाता है कि वह हर विपत्ति में उसकी रक्षा करने का प्रयास करेगा।

रक्षा बंधन वह पर्व है, जो हमें विश्वास और भावनाओं की शक्ति के महत्व को दिखलाता है। इस पर्व का यह महत्व हमें इससे जुड़ी ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं में भी देखने को मिलता है, चाहे फिर वह इंद्र से जुड़ी कथा हो या कर्णावती और हुमायूँ की दोनो ही रक्षा तथा इससे जुड़ी भावना की शक्ति को दिखलाने का कार्य करता है। यही कारण है कि रक्षा बंधन के इस पर्व को हिंदू संस्कृति में इतना महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है।

रक्षा बंधन का इतिहास (History of Raksha Bandhan)

रक्षा बंधन के पर्व का इतिहास काफी प्राचीन है। इस पर्व के उत्पत्ति को लेकर कई सारी मान्यताएं प्रचलित है। रक्षा बंधन के शुरुआत से जुड़ी कई सारी पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित है।

इंद्र देव के रक्षा बंधन की कथा

रक्षा बंधन से जुड़ी एक कथा भविष्योंत्तर पुराण में वर्णित है। जिसके अनुसार एक बार देवासुर संग्राम में देवों की पराजय होने लगी तब इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति से इसका उपाय पूछा। इसपर देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें मत्रंशक्ति से संपन्न रक्षासूत्र दिया और कहा कि इसे अपने पत्नी से कलाई पर बंधवा कर युद्ध के लिए जाओ, ऐसा करने से तुम्हारी विजय अवश्य होगी। उनकी बात मानकर इंद्र ने ऐसा ही किया और युद्ध से विजयी होकर लौटे।

जब राजा बलि को रक्षासूत्र में बांधा गया

रक्षा बंधन के उत्पत्ति से जुड़ी यह पौराणिक कथा सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। जिसके अनुसार, जब असुरों के राजा बलि ने सौ अश्वमेध यज्ञ करके स्वर्ग का राज्य छिनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की तो भगवान विष्णु वामनरुप धारण करके राजा बलि के द्वार पर पहुंचे।

जहां राजा बलि ने उनकी इच्छा पूछी तो वामनरुप में विष्णु ने कहा हे राजन! मुझे तीन पग धरती चाहिए। राजा बलि ने उनकी यह इच्छा मान ली तो वामनरुपी भगवान विष्णु ने विराट रुप धारण करके दो पगों में तीनों लोको को माप लिया।

जब भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीसरे पग के लिए स्थान पूछा, तो उन्होंने कहा कि हे प्रभु आप तीसरे पग को मेरे मस्तक पर रख दे। उनकी इस भक्ति और दान भाव से भगवान विष्णु बहुत ही प्रसन्न हुए तथा उन्होंने राजा बलि को पाताल का राजा बना दिया और उनसे वर मांगने को कहा। इस पर राजा बलि ने भगवान विष्णु को दिन-रात अपने सामने रहने का वचन ले लिया।

जब भगवान विष्णु काफी समय बितने के बाद भी बैकुंठ नही लौटे तो लक्ष्मी जी परेशान हो उठी और देवर्षि नारद से सहायता के लिए प्रर्थना की, तब देवर्षि नारद ने उन्हें भगवान विष्णु को पाताल लोक से मुक्त कराने का उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि को रक्षासूत्र में बांधकर अपना भाई बना लिया और जब राजा बलि ने उनसे कुछ मांगने को कहा तो वह भगवान विष्णु को राजा बलि के वचन से मुक्त कराकर वापस ले आयी।

ऐसा माना जाता है जब देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी तो उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। यही कारण है कि रक्षा बंधन के पर्व को बलेव के नाम से भी जाना जाता है।

महाभारत काल की रक्षा बंधन कथा

महाभारत में रक्षा बंधन के पर्व कई उल्लेख मिलते हैं। जब युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि, प्रभु मैं इन सभी बाधाओं और सकंटों को कैसे प्राप्त कर सकता हूं। तो भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी।

इसके साथ ही जब सुदर्शन चक्र से भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध किया था, तब उनकी तर्जनी में चोट आ गयी थी। तब द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली में पट्टी बांध दी थी। उनके इस कार्य से प्रभावित होकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को रक्षा का वचन दिया था। कहा जाता कि जिस दिन यह घटना घटित हुई थी वह श्रावण पूर्णिमा का ही दिन था।

सिकंदर से जुड़ी रक्षा बंधन की कथा

इतिहास में सिकंदर और पंजाब के प्रतापी राजा पुरुवास या जिन्हें प्रायः पोरस के नाम से जाना जाता है के बीच हुए युद्ध से तो सभी लोग भलीभांती परिचित है। रक्षा बंधन की एक कथा के अनुसार, सिकंदर को युद्ध में किसी प्रकार के प्राणघातक हमले से बचाने के लिए उसकी पत्नी ने राजा पोरस को अपना भाई बनाते हुए उन्हें राखी बांधी थी और उनसे अपने पति सिकंदर के प्राणों के रक्षा का वचन लिया था।