रामलीला

रामलीला का कार्यक्रम भारत में मनाये जाने वाले प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रमों में से एक है। यह एक प्रकार का नाटक मंचन होता है, जो हिंदू धर्म के प्रमुख आराध्यों में से एक प्रभु श्रीराम के जीवन पर आधारित होता है। इसका आरंभ दशहरे से कुछ दिन पहले होता है और इसका अंत दशहरे के दिन रावण दहन के साथ होता है।

भारत के साथ थाईलैंड और बाली जैसे अन्य देशों में भी काफी धूम-धाम के साथ रामलीला कार्यक्रम का मंचन किया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम के जीवन घटनाओं पर आधारित रामलीला के इस कार्यक्रम का इतिहास काफी प्राचीन है क्योंकि यह पर्व भारत में 11वीं शताब्दी से भी पहले से मनाया जा रहा है।

रामलीला 2019 (Ramlila Festival 2019)

वर्ष 2019 में भारत के अधिकतर क्षेत्रों में रामलीला का मंचन 29 सितंबर 2019 से शुरु होकर 8 अक्टूबर 2019 को समाप्त होगा।

रामलीला क्यों मनाई जाती है? (Why Do We Celebrate Ramlila)

महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ सबसे प्राचीन हिंदू ग्रंथों में से एक है। संस्कृत में लिखा गया यह ग्रंथ भगवान विष्णु के सातवें अवतार प्रभु श्री राम के ऊपर आधारित है। जिसमें उनके जीवन संघर्षों, मूल्यों, मानव कल्याण के लिए किये गये कार्यों का वर्णन किया गया है। रामायण के ही आधार पर रामलीला का मंचन किया जाता है, जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के जीवन का वर्णन देखने को मिलता है।

रामलीला मंचन के दौरान भगवान श्री राम के जीवन के विभिन्न चरणों तथा घटनाओं का मंचन किया जाता है। एक बड़े और प्रतिष्ठित राज्य का राजकुमार होने के बावजूद उन्होंने अपने पिता के वचन का पालन करते हुए, अपने जीवन के कई वर्ष जंगलों में बिताये।

उन्होंने सदैव धर्म के मार्ग पर चलते हुए लोगो को दया, मानवता और सच्चाई का संदेश दिया। अपने राक्षस शत्रुओं का संहार करने का पश्चात उन्होंने उनका विधिवत दाह संस्कार करवाया क्योंकि उनका मानना था कि हमारा कोई भी शत्रु जीवित रहने तक ही हमारा शत्रु होता है। मृत्यु के पश्चात हमारा उससे कोई बैर नही होता, स्वयं अपने परम शत्रु रावण का वध करने के बाद उन्होंने एक वर्ष तक उसके हत्या के लिए प्रायश्चित किया था।

इतने बड़े राज्य के राजकुमार और भावी राजा होने के बावजूद भी उन्होंने एक ही विवाह किया, वास्तव में उनका जीवन मानवता के लिए एक प्रेरणा है। यहीं कारण कि उनके जीवन के इन्हीं महान कार्यों का मंचन करने के लिए देश भर के विभिन्न स्थानों पर रामलीला के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

रामलीला कैसे मनाई जाती है – रिवाज एवं परंपरा (How Do We Celebrate Ramlila – Custom and Tradition of Ramlila)

वैसे तो रामलीला की कहानी महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामायण’ पर आधारित होती है लेकिन आज के समय में जिस रामलीला का मंचन किया जाता है उसकी पटकथा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ पर आधारित होता है। हालांकि भारत तथा दूसरे अन्य देशों में रामलीला के मंचन की विधा अलग-अलग होती है परंतु इनका कथा प्रभु श्रीराम के जीवन पर ही आधारित होती है।

देश के कई स्थानों पर नवरात्र के पहले दिन से रामलीला का मंचन शुरु हो जाता है और दशहरे के दिन रावण दहन के साथ इसका अंत होता है। हालांकि वाराणसी के रामनगर में मनाये जाने वाली रामलीला 31 दिनों तक चलती है। इसी तरह ग्वालियर और प्रयागराज जैसे शहरों में मूक रामलीला का भी मंचन किया जाता है। जिसमें पात्रों द्वारा कुछ बोला नही जाता है बल्कि सिर्फ अपने हाव-भाव द्वारा पूरे रामलीला कार्यक्रम का मंचन किया जाता है।

पूरे भारत में रामलीला का कार्यक्रम देखने के लिए भारी संख्या में लोग इकठ्ठा होते है। देश के सभी रामलीलाओं में रामायण के विभिन्न प्रात्र देखने को मिलते हैं। रामलीला में इन पात्रों का मंचन कर रहे लोगो द्वारा अपने पात्र के अनुरुप ऋंगार किया जाता है।

 

कई जगहों पर होने वाली रामलीलाओं में प्रभु श्री राम के जीवन का विस्तृत रुप से वर्णन किया जाता है, तो कही सक्षिंप्त रुप से मुख्यतः इसमें सीता स्वयंवर वनवास काल, निषाद द्वारा गंगा पार कराना, सीता हरण, अंगद का दूत रुप में लंका जाना, हनुमान जी द्वारा माता सीता को प्रभु श्रीराम का संदेश देना और लंका दहन करना, लक्ष्मण जी का मूर्छित होना और हनुमान जी द्वारा संजीवनी लाना, मेघनाथ वध, कुंभकर्ण वध, रावण वध जैसे घटनाओं को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है। दशहरा के दिन रावण, मेघनाथ तथा कुंभकर्ण के पुतलों के जलाने के साथ रामलीला के इस पूरे कार्यक्रम का अंत होता है।

रामलीला की आधुनिक परंपरा (Modern Tradition of Ramlila)

रामलीला के वर्तमान स्वरुप और इसके मनाये जाने में आज के समय में काफी परिवर्तन आया है। आज के समय में जब हर ओर उन्माद तथा कट्टरपंथ अपने चरम पर है, तो दशहरे के समय आयोजित होने वाला रामलीला का यह कार्यक्रम भी इससे अछूता नही रह पाया है।

आजादी से पहले लाहौर से लेकर कराचीं तक रामलीला कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था। जिमें हिंदुओं के संग मुसलमान भी बड़े ही उत्सुकता के साथ देखने जाते थे। स्वयं मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शासनकाल में उनके दरबार में भी उर्दू भाषा में अनुवादित रामायण सुनाई जाती थी।

इसके साथ ही दिल्ली में यमुना किनारे रामलीला का मंचन किया जाता था। इस कार्यक्रम के लिए हिंदू तथा मुस्लिम दोनो ही संयुक्त रुप से दान किया करते थे। लेकिन आज के समय में हालात काफी बदल गये हैं। आजकल लोगों में धार्मिक कट्टरता और उन्माद काफी बड़ चुका है। भारत के कई सारे क्षेत्रों में रामलीला मंचन के समय कई तरह की बुरी घटनाएं सुनने को मिलती है।

आज के समय में हर कोई अपने धर्म और संप्रदाय को श्रेष्ठ साबित करने में लगा हुआ है। यदि हम चाहें तो रामलीला में दिखाये जाने वाले प्रभु श्रीराम के जीवन मंचन से काफी कुछ सीख सकते हैं और यह सीखें सिर्फ हिंदु समाज ही नहि अपितु पूरे विश्व के लिए काफी कल्याणकारी साबित होंगी। हमें इस बात का अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए कि हम रामलीला को सद्भावना पूर्वक एक-दूसरे के साथ मनायें ताकि इसकी वास्तविक महत्ता बनी रहे।

रामलीला का महत्व (Significance of Ramlila)

रामलीला का अपना एक अलग ही महत्व है, वास्तव में यह कार्यक्रम हमें मानवता तथा जीवन मूल्यों का अनोखा संदेश देने का कार्य करता है। आज के समय लोगो में दिन-प्रतिदिन नैतिक मूल्यों का पतन देखने को मिल रहा है। यदि आज के समय में हमें सत्य और धर्म को बढ़ावा देना है तो हमें प्रभु श्री राम के पथ पर चलना होगा। उनके त्याग और धर्म के लिए किये गये कार्यों से सीख लेकर हम अपने जीवन को बेहतर बनाते हुए, समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते है।

 

यदि हम रामलीला में दिखाये जाने वाले सामान्य चीजों को भी अपने जीवन में अपना ले तो हम समाज में कई सारे बड़े बदलाव ला सकते। रामायण पर आधारित रामलीला में दिखाये जाने वाली छोटी-छोटी चीजें जैसे श्री राम द्वारा अपने पिता के वचन का पालन करने के लिए वन जाना, शबरी के जूठे बैर खाना, लोगो में किसी प्रकार का भेद ना करना, सत्य और धर्म के रक्षा के लिए अनेकों कष्ट सहना जैसी कई सारी महत्वपूर्ण बाते बतायी जाती हैं, जो हमें वचन पालन, भेदभाव को दूर करना तथा सत्य के मार्ग पर डटे रहना जैसे महत्वपूर्ण संदेश देता है।

वास्वव में यदि हम चाहे तो रामलीला मंचन के दौरान दी जानी वाली शिक्षाप्रद बातों से काफी कुछ सीख सकते हैं और यदि हम इन बातों में से थोड़ी भी चीजों को अपने जीवन में अपना ले तो यह समाज में काफी बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। यही कारण है कि रामलीला मंचन का कार्यक्रम हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण है।

रामलीला का इतिहास (History of Ramlila)

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन पर आधारित यह रामलीला लोक नाटक के इस कार्यक्रम का इतिहास काफी प्राचीन है, ऐसा माना जाता है कि रामलीला की शुरुआत उत्तर भारत में हुई थी और यहीं से इसका हर जगह प्रचार-प्रसार हुआ।

रामलीला को लेकर कई सारे ऐसे ऐतिहासिक प्रमाण मिले है, जिससे यह पता चलता है कि यह पर्व 11वीं शताब्दी से भी पूर्व से मनाया जा रहा है। हालांकि इसका पुराना प्रारुप महर्षि वाल्मिकी के महाकाव्य ‘रामायण’ पर आधारित था, लेकिन आज के समय में जिस रामलीला का मंचन होता है, वह रामलीला गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ पर आधारित होती है।

भारत में रामलीला के वर्तमान रुप को लेकर कई सारी मान्यताएं प्रचलित हैं विद्वानों का मानना है कि इसकी शुरुआत 16वीं सदी में वाराणासी में हुई थी। ऐसा माना जाता है कि उस समय के काशी नरेश ने गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को पूरा करने के बाद रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प किया था। जिसके पश्चात गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों द्वारा इसका वाराणसी में पहली बार मंचन किया गया था।

थाईलैंड की रामलीला

भारत के साथ-साथ दूसरे कई सारे देशों में भी रामलीला काफी प्रसिद्ध है। भारत के अलावा बाली, जावा, श्रीलंका, थाईलैंड जैसे देशों में भी रामलीला का मंचन किया जाता है। इन देशों में थाईलैंड की रामलीला काफी प्रसिद्ध है, थाईलैंड में रामलीला मंचन को रामकीर्ति के नाम से जाना जाता है। हालांकि यह रामलीला भारत में होने वाली रामलीलाओं से थोड़ी भिन्न हैं लेकिन फिर भी इसके किरदार रामायण के पात्रों पर ही आधारित हैं।

प्राचीन समय में भारत का दक्षिण एशियाई देशों पर काफी प्रभाव था। यहां के व्यापारी, ज्ञानी तथा उत्सुक लोग सदैव ही व्यापार तथा नयी जगहों की खोज के लिए दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में यात्रा किया करते थे। उनके ही कारण भारत की यह सांस्कृतिक विरासत कई सारी देशों में प्रचलित हुई। इतिहासकारों के अनुसार थाईलैंड में 13वीं सदी से ही रामायण का मंचन किया जा रहा है।