ब्रिटिश शासकों से पहले भारत में कौन था

ब्रिटिश शासकों से पहले हिंदुस्तान/भारत में कौन था (Who was in India before the British)

1757 में अंग्रेजों के भारत पर कब्ज़ा करने से पहले मुगल साम्राज्य ने कई सालों तक यहाँ शासन किया था। भारत के कुछ हिस्सों में मराठों और सिखों का भी प्रभुत्व रहा था। साथ ही फ्रांसीसियों ने भी देश के कुछ तटीय क्षेत्रों पर राज़ किया था।

1640 में ब्रिटिश, ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से व्यापार शुरू करने और मुग़ल सम्राट जहांगीर के साथ बातचीत करने के उद्देश्य से भारत आए थे। राजा से अनुमति मिलने के बाद उन्होंने अहमदाबाद, आगरा और भरूच में फैक्ट्रियों की स्थापना की थी। बाद में समय गुज़रने के साथ उनकी महत्वाकांक्षाओं का रुख व्यापारिक गतिविधियों से बदल कर भारत पर शासन करने की ओर हो गया।

धीरे-धीरे उनकी उपस्थिति हिंदुस्तान में बढ़ने लगी और उन्होंने बंगाल, उड़ीसा, हुगली और कलकत्ता में भी कारखाने स्थापित किए। साथ ही फ्रेंच, पुर्तगाली और डच व्यापारी भी देश के विभिन्न हिस्सों में जाने लगे और अंत में 27 जुलाई 1757 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाईव के आदेशों पर बंगाल के नवाब "सिराज-उद-दौला" और उसके फ्रांसीसी सहयोगियों को प्लासी, जो मुर्शिदाबाद और कलकत्ता के बीच स्थित है, के युद्ध में हराया। इस जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरे बंगाल पर नियंत्रण हासिल कर लिया।

जहाँ रॉबर्ट क्लाइव ने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव रखी वहीँ बाद में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के शासनकाल के दौरान 1763 में वारेन हास्टिंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने बंगाल के तत्कालीन नवाब मीर कासिम की सेना को हराया। वर्ष 1774 में वॉरेन हास्टिंग्स को औपचारिक रूप से बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया था।

इस बीच मराठों और सिखों ने मुगलों की शक्ति को और कमजोर कर दिया जो देश में शक्ति का सिंहासन हासिल करने के लिए एक-दूसरे और मुगलों के खिलाफ लड़ रहे थे। इसी के साथ फ्रेंच अभियान भी भारत में शुरू हुआ था। फ्रांसीसियों ने 1673 तक पांडिचेरी, करिकल और यानम में भारत के तटीय क्षेत्रों में अपनी उपनिवेशों को स्थापित किया। ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसियों के बीच भारत पर शासन की कुर्सी हासिल करने के लिए आखिरकार 1744 में ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसी सेना के बीच युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध में ब्रिटिश शासकों द्वारा समर्थित ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना अधिक शक्तिशाली साबित हुई और उन्होंने फ्रेंच सेना को वंडिवाश की लड़ाई में बुरी तरह पराजित किया।

इस लड़ाई के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी देश में बेहतर नियंत्रण की स्थिति पर काबिज़ हो गई। हालांकि साल 1760 में मैसूर राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया जब हैदर अली ने राजा की मृत्यु के बाद मैसूर के सिंहासन पर कब्जा कर लिया था। हैदर अली ने दक्षिण भारतीय राज्यों को जीतकर अपने राज्य के प्रदेशों का विस्तार करना शुरू कर दिया। अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम अली से एक संधि की जिसके अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदर अली के खिलाफ युद्ध में निजाम को अपनी सेना में सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध किया था। इतना ही नहीं निजाम ने भी मराठों के साथ हाथ मिला लिया और हैदर अली को हराने के लिए एक संगठन बनाया। हालांकि वे अपने प्रयासों में असफल रहे और ब्रिटिश सैनिकों को इस युद्ध में भारी नुकसान पहुंचा।

आधिकारिक तौर पर भारत में कंपनी का शासन 1765 में शुरू हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी को बिहार और बंगाल में राजस्व एकत्र करने का अधिकार दिया गया था। 1773 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता में एक पूंजी की स्थापना की और पहले गवर्नर-जनरल वॉरेन हैस्टिंग को नियुक्त करने के बाद पूरे देश को सीधे तौर पर संचालित करना शुरू कर दिया।

ईस्ट इंडिया कंपनी देश में अपनी सेना और न्यायपालिका के साथ उस वक़्त से ही शासन कर रही थी जिस समय ब्रिटिश सरकार का यहाँ बहुत कम नियंत्रण था। बाद में वर्ष 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में एक प्रमुख हथियार विद्रोह मेरठ में शुरू हुआ जिसे सिपाही विद्रोह के रूप में जाना जाता है। यह जल्द ही पूरे देश में फ़ैल गया। अंततः विद्रोहियों ने दिल्ली पहुंचकर मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को पूरे देश का राजा घोषित कर दिया। हालांकि यह विद्रोह थोड़े समय के लिए था और इसे ईस्ट इंडिया कंपनी सेना द्वारा पूरी तरह से दबा दिया गया था।

सिपाही विद्रोह के बाद कंपनी का शासन 1858 तक चला जब आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को बर्मा निर्वासित किया गया था। इसके बाद भारत सरकार अधिनियम 1858 भारत में लागू हुआ और ब्रिटिश सरकार ने भारत में प्रत्यक्ष प्रशासन शुरू किया। इसने पूरे ब्रिटिश राज का मार्ग प्रशस्त किया जो कि भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश ताज़ के अधीन था। ब्रिटिश राज के तहत सभी प्रशासनिक शक्तियां रानी विक्टोरिया को स्थानांतरित कर दी गईं जिन्हें भारत की महारानी कहा जाता था।

ब्रिटिश ताज़ की स्थापना के ठीक पहले पूरे देश में शक्ति का संघर्ष

भारत में ब्रिटिश राज़ की स्थापना यूरोपीय शक्तियों के बीच व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता का नतीजा था जो उन्हें दुनिया भर में अपनी उपनिवेशों और व्यापारिक पदों की स्थापना के लिए अग्रसर करता था। 17वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य, जो भारत में केंद्रीय शासक शक्ति थी, ने कमज़ोरी के संकेत दिखाने शुरू कर दिए। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की वजह से इन सभी विदेशी शक्तियों के लिए अपनी कारोबारी महत्वाकांक्षाओं के साथ भारत में प्रवेश करने का वह बिलकुल उपयुक्त समय था।

इसके अलावा 18वीं शताब्दी के शुरुआती दिनों में मुगल साम्राज्य विघटित हुआ और पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद मराठा शक्तियां भी कमजोर हो गई जिसके फ़लस्वरूप भारत कई छोटे और अस्थिर राज्यों में विभाजित हो गया। स्थापित हुए नए राज्य अपेक्षाकृत कमज़ोर थे जिन पर शक्तिशाली शासकों के माध्यम से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने तेजी से कब्ज़ा कर लिया। हालांकि जल्द ही इन सभी साम्राज्यों ने एक दूसरे के खिलाफ लड़ना शुरू कर दिया। इन सभी राज्य में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने हस्तक्षेप शुरू कर दिया और जल्द ही वे खत्म हो गए तथा उनके राजवंश को ईस्ट इंडिया कंपनी ने अधिग्रहण कर लिया।

18वीं सदी के अंत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और फ़्रांसिसी पूरे देश में प्रभुत्व के लिए संघर्ष करते थे, कभी-कभी भारतीय शासकों द्वारा छुपकर और कभी-कभी सीधे सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सत्ता का तेजी से विस्तार भारत के अधिकतर हिस्सों में देखा गया जब लगभग पूरे देश में ब्रिटिश शासन का या तो प्रत्यक्ष नियंत्रण था या उनके कठपुतली बने कमज़ोर शासकों के माध्यम से था। असफल सिपाही विद्रोह के बाद अंततः ईस्ट इंडिया कंपनी की शक्ति को ब्रिटिश क्राउन शासन में स्थानांतरित कर दिया गया था और इस प्रकार भारत सीधे ब्रिटिश नियंत्रण के तहत आया था।

शेष सभी शासकों को अंग्रेजों द्वारा शक्तिहीन माना जाता था और उनके पास ब्रिटिश शासन के तहत रियासत बनाने की पेशकश को स्वीकार करने का कोई विकल्प नहीं था। ब्रिटिश राजशाही शासन औपचारिक रूप से भारत में स्थापित होने के बाद 600 से अधिक रियासतों को भारत में मान्यता प्राप्त हुई थी और देश को ब्रिटिश भारत का नाम मिला था।