चन्द्रशेखर आजाद

चन्द्रशेखर आजाद एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम जिसको सुनते ही ब्रिटिश अधिकारियों के रोंगेटे खड़े हो जाते। वे बिना किसी डर के अपने प्राण हथेली पर रखकर बेखौफ क्रान्तिकारी गतिविधियों को क्रियान्वित करते हुये घूमते थे। ऐसे भारत माँ के सपूत को कौन नहीं जानता। इतना महान व्यक्तित्व होते हुये भी वे बहुत सहज और सरल स्वभाव के थे। व्यक्तिगत रुप से वे कर्तव्यनिष्ठ, सीधे, सच्चे और ईमानदार व्यक्ति थे। उनमें बिल्कुल (लेस मात्र) भी घमंण्ड नहीं था और देश सेवा के लिये उन्होंने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

मुख्य तथ्यः–
पूरा नाम – पं. चन्द्रशेखर तिवारी
उपनाम या अन्य नाम – आजाद, पंड़ित जी, बलराज
जन्म – 23 जुलाई 1906
जन्म स्थान – गाँव भवरा, मध्य प्रदेश (आदिवासी गाँव)
माता-पिता – जगरानी देवी, पं. सीताराम तिवारी
मृत्यु – 27 फरवरी 1931
मृत्यु स्थान – अल्फ्रेड पार्क, इलाहबाद
मृत्यु का कारण – आत्महत्या (जीते जी अंग्रेजों की गिरफ्त में न आने की कसम को पूरा करने के लिये खुद को गोली मारी)।
उपलब्धियां – महान भारतीय क्रान्तिकारी, 1926 में काकोरी ट्रेन डकैती, लाला लाजपत राय की हत्या का बदला (1928), भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों के साथ हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ की स्थापना।

 

चन्द्रशेखर आजाद का जीवन परिचय (जीवनी)

चन्द्रशेखर आजाद (23 जुलाई 1906 – 27 फरवरी 1931)

महान क्रान्तिकारी विचारधारा के स्वामी चन्द्र शेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को एक आदिवासी गाँव भवरा में हुआ था। इनके पिता पं. सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी थी। भील बालकों के बीच पले-बढ़े होने के कारण आजाद बचपन में ही निशाना लगाने में कुशल हो गये थे। बचपन से ही आजाद कुशल निशानची और निर्भीक स्वभाव के थे।

आजाद के मन में देश प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी थी। 15 साल की आयु में ही ये असहयोग आन्दोलन के समय पहली और आखिरी बार गिरफ्तार हुये। इन्होंने जीते जी अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार न होने की कसम खायी थी और मरते दम तक इस कसम का निर्वहन किया। वह कहते थे “आजाद हूँ,आजाद ही रहूँगा।” वह अंग्रेजी शासन से घृणा करते थे और उनसे आजादी प्राप्त करने के लिये सशक्त क्रान्ति के मार्ग को पसंद करते थे।

भगत सिंह इनके सबसे प्रिय सहयोगियों में से एक थे। ये भगत से बहुत प्रेम करते थे और किसी भी हाल में उन्हें खोना नहीं चाहते थे। भगत सिंह असेंम्बली बम कांड के बाद गिरफ्तार किये गये और उन्हें उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ मृत्यु दण्ड की सजा सुनायी गयी। इस दण्ड को रुकवाने के लिये आजाद 27 फरवरी 1931 इलाहबाद पं. नेहरु जी से मिलने के लिये गये, इसी दौरान किसी गुप्तचर (मुख़बिर) की सूचना पर पुलिस ने इस महान क्रान्तिकारी को अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया और आत्मसमर्पण करने को कहा।

आजाद ने करीब 1 घंटे तक पुलिस सिपाहियों से मुठभेड़ का सामना किया और अपने तमंचे की आखिरी गोली खुद को मारकर आत्महत्या कर ली। इस तरह इस क्रान्ति के देवता ने 27 फरवरी 1931 में स्वतंत्रता संग्राम के हवन में स्वंय की पूर्ण आहुति दे दी।

जन्म और पारिवारिक स्थितिः–

सशक्त क्रान्ति में विश्वास रखने वाले चन्द्र शेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 में मध्य प्रदेश के भवरा गाँव (वर्तमान में अलीराजपुर) में हुआ था। इनके पिता पं. सीता राम तिवारी सनातन धर्म के कट्टर प्रेमी थे। इनके पिता का पैतृक गाँव कानपुर था किन्तु उनकी किशोरावस्था कानपुर के उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदर गाँव में व्यतीत हुई। तिवारी जी का परिवार ज्यादा सम्पन्न नहीं था।

कभी-कभी तो इन्हें कई-कई दिन तक भूखा रहना पड़ता था। उन्नाव जिले में भीषण अकाल पड़ने के कारण अपने किसी रिश्तेदार (हजारी लाल) की मदद से तिवारी जी पत्नी सहित अलीराजपुर आ गये और यहाँ से फिर भवरा गाँव में। पं. सीताराम की तीन शादियॉ हुई। इनका तीसरा विवाह जगरानी देवी से हुआ। आजाद इन्हीं की पाँचवी संतान थे। आजाद के जन्म से पूर्व इनकी माँ की तीन संतानों की मृत्यु हो गयी थी। इनके एक बड़े भाई सुखदेव भी थे।

प्रारम्भिक जीवनः–

आजाद का प्रराम्भिक जीवन चुनौती पूर्ण था। इनकी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पारिवारिक रुप से सम्पन्न न होने के कारण इन्हें दो-दो दिन तक भूखा रहना पड़ता था। चन्द्र शेखर बचपन में बहुत दुर्बल लेकिन बहुत सुन्दर थे। इनका बचपन भीलो के साथ व्यतीत हुआ। यही कारण है कि ये छोटी सी आयु में ही कुशल निशानची बन गये। आजाद बचपन से ही बहुत साहसी और निर्भीक थे। उनका पढ़ने लिखने में ज्यादा मन नहीं था। वे अपने साथियों के साथ जंगलों में निकल जाते और डाकू और पुलिस का खेल खेला करते थे।

आजाद अपनी माँ के बहुत लाड़ले थे। वही वे अपने पिता से बहुत डरते भी थे। एक बार आजाद ने बाग से कुछ फल चुराकर बेच दिये, जिस बाग की इनके पिता रखवाली करते थे। पं. सीताराम बहुत आदर्शवादी थे, जब उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने आजाद को जितना पीट सकते थे उतना पीटा और जब चन्द्रशेखर की माँ ने इन्हें बचाने की कोशिश की तो उन्हें भी धक्का देकर एक तरफ हटा दिया और चन्द्रशेखर को पीटते-पीटते अधमरा कर दिया। यही कारण था कि आजाद अपने पिता से बहुत अधिक कतराते थे।

 

प्रारम्भिक शिक्षाः–

चन्द्रशेखर की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही प्रारम्भ हुई। पढ़ाई में उनका कोई विशेष लगाव नहीं था। इनकी पढ़ाई का जिम्मा इनके पिता के करीबी मित्र पं. मनोहर लाल त्रिवेदी जी ने लिया। वह इन्हें और इनके भाई (सुखदेव) को अध्यापन का कार्य कराते थे और गलती करने पर बेंत का भी प्रयोग करते थे। चन्द्रशेखर के माता पिता उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहते थे किन्तु कक्षा चार तक आते आते इनका मन घर से भागकर जाने के लिये पक्का हो गया था। ये बस घर से भागने के अवसर तलाशते रहते थे।

इसी बीच मनोहरलाल जी ने इनकी तहसील में साधारण सी नौकरी लगवा दी ताकि इनका मन इधर उधर की बातों में से हट जाये और इससे घर की कुछ आर्थिक मदद भी हो जाये। किन्तु शेखर का मन नौकरी में नहीं लगता था। वे बस इस नौकरी को छोड़ने की तरकीबे सोचते रहते थे। उनके अंदर देश प्रेम की चिंगारी सुलग रहीं थी। यहीं चिंगारी धीरे-धीरे आग का रुप ले रहीं थी और वे बस घर से भागने की फिराक में रहते थे। एक दिन उचित अवसर मिलने पर आजाद घर से भाग गये।

चन्द्रशेखर का भाग कर बम्बई जानाः–

आजाद की मित्रता अलीराजपुर में एक मोती बेचने वाले से हुई, जिसने शेखर को बम्बई के बारे में रोचक कहानियाँ सुनाई और उन्हें बम्बई जाने के लिये प्रेरित किया। उसी की मदद से शेखर घर छोड़कर बम्बई भागने में सफल हो गये। किन्तु बम्बई में इनका साथ छूट गया और शेखर अकेले रह गये। इन्होंने कुछ दिन वही रहकर समुद्र तट पर जहाज रंगने का कार्य किया, और अपना जीवकोपार्जन किया। किन्तु शीघ्र ही ये वहाँ के जीवन से ऊब गये और बिना टिकट के बनारस की ट्रेन में बैठकर बनारस आ गये। कुछ विशेष जाँच न होने के कारण ये आसानी से बनारस पहुंच गये।

चन्द्रशेखर का बनारस में आगमनः–

बम्बई के उबाऊ जीवन को छोड़कर शेखर बनारस आ गये और पुनः अपनी शिक्षा प्रारम्भ की। यहाँ एक धर्माथ संस्था में प्रवेश लेकर संस्कृत पढ़ना शुरु कर दिया। यहाँ शेखर ने लघुकौमुदगी और अमरकोष का गहन अध्ययन किया। पढ़ाई के साथ ही आजाद में देश प्रेम की भी भावना जागृत हो रही थी। काशी में जहाँ कहीं भी संतसंग होता शेखर वहाँ जाते और वीर रस की कहानियों को बड़े प्रेम के साथ सुनते थे। इस दौरान वे पुस्तकालय में जाकर अखबार पढ़ते और राष्ट्रीय हलचलों की सूचना रखने लगे। बनारस में व्यवस्थित हो जाने पर चन्द्रशेखर ने अपने घर सूचना दी और परिवार वालों को निश्चिन्त रहने के लिये कहा। इस सूचना से इनके माता-पिता को कुछ संतोष हुआ।

इन्हीं दिनों असहयोग आन्दोलन अपने जोरों पर था, जगह – जगह धरने और प्रदर्शन हो रहे थे। चन्द्र शेखर के मन में जो देश प्रेम की चिंगारी बचपन से सुलग रहीं थी उसे हवा मिल गयी और उसने आग का रुप ले लिया। उन्होंने भी सन् 1921 में, 15-20 विद्यार्थियों को इकट्ठा करके उनके साथ एक जुलूस निकाला और बनारस की मुख्य गलियों में “वन्दे मातरम्” “भारत माता की जय”, “इंकलाब जिन्दाबाद”, “महात्मा गाँधी की जय” के नारों की जय जयकार करते हुये घूमें। इन सब की आयु 13 से 15 वर्ष के बीच थी। छोटे नन्हें मुन्नों का जुलूस बड़े उत्साह और उमंग के साथ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसका नेतृत्व स्वंय चन्द्रशेखर कर रहे थे।

जब पुलिस को इस बात की भनक लगी तो इस जुलूस को रोकने के लिये पुलिस की एक टुकड़ी आ गयी, जिसे देखकर कुछ बालक इधर उधर हो गये और नेता सहित एक दो साथी गिरफ्तार कर लिये गये। यही वह समय था जब चन्द्रशेखर पहली और आखिरी बार पुलिस की गिरफ्त में आये। बालक चन्द्रशेखर को कोर्ट में जज के सामने पेश किया गया, किन्तु अब भी उनमें भय का कोई नामों निशान नहीं था। उन्होंने पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट द्वारा पूछे गये सवालों के जबाव इस तरह से दियेः-

“तुम्हारा नाम क्या है?” – मजिस्ट्रेट ने पूछा।

बालक ने निर्भीकता के साथ रौबीली आवाज में कहा-

“आजाद।”

जज ने बालक को ऊपर से नीचे तक घूरा और दूसरा सवाल किया,

“तुम्हारे पिता का क्या नाम है”

बालक ने उसी मुद्रा में जबाव दिया-

“स्वतंत्र”

उनके इस जबाव से जज झल्ला गया और क्रोध में भरकर तीसरा सवाल किया-

“तुम्हारा घर कहाँ है”

बालक ने उसी साहस के साथ कहा-

“जेलखाना”

चन्द्रशेखर के इन जबाबों से जज बुरी तरह आग बबूला गया और आजादी के दिवाने इस छोटे से बालक को 20 कोड़े लगाने की कड़ी सजा सुनाई। सजा सुनकर शेखर जरा भी भयभीत नहीं हुये और उन्होंने भारत माता की जयकार लगाई।

कोड़े लगाने के लिये उन्हें जेल लाया गया और उन्हें बाँधा जाने लगा, तो इन्होंने बिना बाँधे कोड़े लगाने को कहा। इस समय वे केवल 15 वर्ष के थे। जब इन पर लगातार बेरहमी से कोड़ो से प्रहार किया जा रहा था तो वे स्थिर खड़े होकर हरेक कोड़े के पड़ने के बाद भारत माँ की जय और इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते रहे। इन्हें जितने कोड़े मारे गये इन्होंने इतने ही जोर से और साहस के साथ नारे लगाये।

आखिरी कोड़े पर वह बेहोश हो गये और फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उनका सारा शरीर कोड़ो की चोट से भरा था फिर भी बिना किसी दर्द की कराह के वह उठे और अपने घर की तरफ चल दिये। उनके इस साहस को देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने दाँतो तले अंगुली दबा ली।

इस घटना की खबर पूरे बनारस में आग की तरह फैल गयी, और इन्हें देखने के लिये लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। इसी घटना के बाद से ही इनका नाम ‘आजाद’ पड़ा, और इनके सम्मान की तैयारी की जाने लगी। डॉ. सम्पूर्णानन्द द्वारा सम्पादित पत्रिका “मर्यादा” में उनकी प्रशंसा में ‘वीर बालक आजाद’ के नाम से एक लेख भी प्रकाशित हुआ।

 

आजाद के सार्वजनिक अभिनन्दन की तैयारी की जाने लगी। अभिनन्दन सभा ठसाठस भरी थी। लोग उस वीर बालक को देखने के लिये बहुत ज्यादा लालायित हो रहे थे। आजाद सभा में भारत माता की जय, वन्दे मातरम् आदि नारे लगाते हुये आये, जिससे लोगो में और अधिक उत्साह का संचार हो गया और उन्होंने आजाद की जय के नारे लगाने शुरु कर दिये। आजाद जब सभा में आये तो वह इतने छोटे थे कि लोग उन्हें देख भी नहीं पा रहे थे। इसलिये उन्हें एक मेज पर खड़ा कर दिया गया, लोगों ने फूल मालाओं से उनका स्वागत किया। उनका सारा शरीर फूलों से ढ़क गया। इस समारोह नें उन्होंने जोशीला भाषण दिया। अगले दिन पत्र – पत्रिकाओं में उनके अभूतपूर्व साहस के बहुत से लेख छपे। पूरे बनारस में उनके साहस की चर्चा होने लगी और वे बनारस के लोगों के बहुत प्रिय हो गये थे।

शायद यही वह घटना होगी जिसके बाद आजाद ने जीते जी पुलिस के हाथों कभी न पकड़े जाने की कसम खायी होगी।

काशी विद्यापीठ में प्रवेश और क्रान्तिकारी संगठन से जुड़नाः–

आजाद ने आगे पढ़ने के लिये काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया। यहाँ सभी के मुँह से अपने साहस की प्रशंसा सुनी। जहाँ भी वे जाते उन्हें देखते ही वहाँ उपस्थित बच्चे,विद्यार्थी उनके जेल में साहस प्रदर्शन की चर्चा करते। सभी उन्हें बहुत सम्मान देते। यह सब आजाद के लिये एकदम नया और विशेष अनुभव था।

आजाद ने पढ़ने के लिये नाम तो लिखा लिया किन्तु इनका मन पढ़ाई में बिल्कुल भी न लगता था। अब तो उन्हें कैसे भी करके अंग्रेजों को अपने देश से बाहर भगाना था। वह अपने कोर्स की किताबें कम विप्लवी साहित्य अधिक पढ़ते थे। धीरे धीरे वह अपनी जैसी भावना रखने वालें अन्य विद्यार्थियों से सम्पर्क बनाने लगे।

असहयोग आन्दोलन चौरी-चौरा कांड के बाद गाँधी जी द्वारा वापस ले लिया गया था। किन्तु क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों में लगे हुये थे। आजाद का गाँधीवादी नीति में कम विश्वास था और जो भी थोड़ा बहुत था, वह भी उनके द्वारा असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के कारण नहीं रहा। वह पूर्ण रुप से सशक्त क्रान्ति के पक्षधर हो गये।

उसी समय अण्डमान से छूटकर आये शचीन्द्रनाथ सान्याल क्रान्तिकारी दल की स्थापना कर चुके थे, इसके बाद अनुशीलन समिति की स्थापना हुई जिसका नेतृत्व सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य कर रहे थे। इसी अनुशीलन समिति ने बनारस में ‘कल्याण आश्रम’ की स्थापना की। इन सारे संगठनों को मिलाकर एक संयुक्त दल का निर्माण किया क्योंकि इनके उद्देश्य एक ही थे। इस संयुक्त दल का नाम “हिन्दुस्तानी रिपब्लिकन ऐशोसियेशन” रखा गया।

बनारस में आन्दोलन का नेतृत्व शचीन्द्रनाथ, बख्शी, राजेन्द्र लाहिड़ी और रविन्द्रमोहन सरकार ने किया। इन्हीं लोगों ने आजाद को दल में शामिल किया। पहले तो आजाद एक साधारण सदस्य रहे और बाद में वह अपनी कार्यनिष्ठा और अपने अथक परिश्रम से सर्वाधिक प्रसिद्ध हुये। दल के नये सदस्यों को चुनने में उनकी सूझ-बूझ बहुत अच्छी थी। वह किसी भी नये सदस्य को दल में शामिल करने से पहले उसे अपने तय किये गये पैमानों पर अच्छे से परखते थे। उसकी भावनाओं की गहराई में जाते थे, तब जाकर वह किसी को दल का सदस्य बनाते थे।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन में नये सदस्यों को शामिल करके संगठन को मजबूत बनानाः–

संगठन में शामिल होने के साथ ही आजाद ने धीरे–धीरे घर-द्वार, माता-पिता, भूख-प्यास सब की चिन्ता छोड़ दी। वह बस पूरी तरह से संगठन को मजबूती देने के लिये सोचते रहते। उनका अब बस यहीं लक्ष्य था कि दल में उपयुक्त नवयुवकों को शामिल किया जाये। वे सदैव दल की योजनाओं को कार्यरुप में परिणित करने के लिये सोचते रहते।

दल को एक संगठन का रुप देने में आजाद ने अपनी योग्यता का बेजोड़ परिचय दिया। आजाद की इस क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने संसार से पूर्ण विरक्ति ले चुके स्वामी गोविन्द प्रसाद (रामकृष्ण खत्री) के हृदय में भी क्रान्ति की आग को न केवल फिर से जलाया बल्कि उन्हें संगठन में भी शामिल कर लिया।

रामकृष्ण खत्री को संगठन से जोड़नाः–

रामकृष्ण खत्री काँग्रेस के उग्र राष्ट्रवादी दल के नेता थे। किन्तु वे अब संसार से पूर्ण रुप से विरक्त होकर स्वामी का जीवन व्यतीत कर रहे थे। आजाद और संगठन के अन्य सदस्य उन्हें अपने दल में शामिल करके उनके विचारों से दल को नयी दिशा देना चाहते थे। किन्तु संसार से विरक्त हो चुके स्वामी जी को दल में शामिल करना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।

यह जिम्मा आजाद ने स्वंय लिया और अपने साथी उपेन्द्रनन्द ब्रह्मानन्द के साथ स्वामी जी के घर पहुँच गये। स्वामी जी उस समय बीमार थे। उनके मित्र ने चन्द्रशेखर का परिचय गाँधी जी के अनुयायी के रुप में कराया। उसी दिन से आजाद बीमार स्वामी जी की सेवा करने में लग गये। वे नियम से उनके पास तीन चार घण्टें बिताने लगे। आजाद की सेवा और देखरेख के परिणामस्वरुप स्वामी जी धीरे धीरे स्वस्थ्य होने लगे और दोनों की राजनीतिक मुद्दों पर बहस होने लगी।

चन्द्रशेखर अपनी इस बहस में गाँधी का पक्ष लेकर खत्री को उत्तेजित करते थे। खत्री गाँधी विरोधी थे वे गाँधी द्वारा असहयोग आन्दोलन के वापस लेने के खिलाफ थे, इसी बात पर वो आजाद से बहस करते किन्तु वे तो बस गाँधी के फैसले को सही बताकर उनका पक्ष लेते और स्वामी जी को और अधिक उकसाते। जब चन्द्रशेखर को इस बात का दृढ़ निश्चय हो गया कि खत्री आज भी उसी उग्र विचारधारा के समर्थक है और क्रान्तिकारी दल में शामिल होने के लिये उत्सुक है तो एक दिन जब वे उनसे मिलने के लिये आये तो उनके हाथ में पिस्टन थमा दी जिसे देखकर खत्री समझ गये कि वे किसी और से नहीं बल्कि इतने दिनों से आजाद से ही अपनी सेवा करा रहे थे। इसी तरह अपनी सूझ-बूझ से बहुत से नवयुवकों को अपने संगठन के साथ जोड़ा।

संगठन के सामने आर्थिक समस्या और उसका समाधानः–

आजाद ने अपने प्रयासों से इतना बड़ा संगठन तो खड़ा कर लिया किन्तु अब इनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी- संगठन के लिये धन एकत्र करने की। आर्थिक समस्या उत्पन्न होने का मुख्य कारण संगठन के सभी लोगों का व्यवसायी तथा नौकरीपेशा न होना था। संगठन में शामिल सभी सदस्य ऐसे थे जो अपना सब कुछ त्याग कर भारत माँ की सेवा करने के लिये तत्पर थे। ऐसे में आय का कोई निश्चित साधन नहीं था। कभी कभी किसी व्यक्ति या सामाजिक संस्था से थोड़ा बहुत धन चन्दे के रुप में मिल जाता था, पर यह संगठन के लिये पर्याप्त नहीं होता था। ऐसे में बिना धन के संगठन अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने में असफल हो रहा था। यदि किसी से प्रत्यक्ष रुप से संगठन के लिये चन्दा माँगा जाता तो इस से दल की गोपनीयता के भंग होने का भय था।

आजाद को अपने भूखे रहने की कोई चिन्ता नहीं थी क्योंकि वे ऐसी स्थितियों में पले बढ़े थे कि यदि उन्हें चार पाँच दिन तक भी भोजन ना मिले तो कोई फर्क नहीं पड़ता था, किन्तु संगठन का कार्य नहीं रुकना चाहिये। वे अपने से ज्यादा अपने साथियों की परवाह करते थे। दल के लिये धन संग्रह करने के लिये आजाद ने कई रुप बदले, अनेक प्रयत्न किये किन्तु कोई लाभ न हुआ। धन एकत्र करने के लिये कोई भी सदस्य जो राह बताता वे उसी पर चल देते पर कहीं कोई सफलता नहीं मिली।

दल की आर्थिक स्थिति के सम्बंध में सलाह करने के लिये एक बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, मन्मनाथ गुप्ता, शचीन्द्र नाथ बख्शी, अशफाक उल्ला खाँ और रामकृष्ण खत्री ने भाग लिया। सबकी सहमति से गाँव के धनी जमीदारों के घर पर ड़ाका डालने का कार्य शुरु किया गया।

इस निर्णय के बाद ड़कैती डालने के बहुत से प्रयास किये गये, जिस में से ज्यादातर असफल रहे और कुछ एक सफल भी रहें। किन्तु इन ड़कैतियों से भी बहुत कम धन एकत्र होता जो संगठन के लिये प्रयाप्त नहीं था। इन प्रयासो के विफल होने पर गाँव में ड़ाका ड़ाल कर धन एकत्र करने की योजना को रद्द कर दिया गया क्योंकि इससे दल की प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव अधिक पड़ रहा था और लाभ बहुत कम हो रहा था। अतः अब यह निश्चय किया गया कि अब केवल रेलों और बैंको में ड़ाके डाले जाये और सरकारी संपत्ति लूटी जाये।

काकोरी कांड (9 अगस्त 1925) –

क्रान्तिकारी दल के सभी सदस्य इस बात से सहमत हो गये कि सरकारी खजानो को ही लूटने में अधिक लाभ है। 1925 तक संगठन मजबूत भी हो गया था और इसके कार्यों में तेजी भी आ गयी थी। इसी बीच जुलाई के अन्त में सूचना मिली की जर्मनी से पिस्तौलों का जखीरा आ रहा है, जिसे कलकत्ता बन्दरगाह पर पहुँचने से पहले नगद रुपया देकर खरीदना है। इसके लिये धन की आवश्यकता थी जो केवल लूट के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता था। इसी कारण काकोरी कांड का सूत्रपात हुआ।

असफाकउल्ला खाँ ने इस योजना का विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि अभी संगठन इतना भी मजबूत नहीं हुआ है कि सीधे सरकार को चुनौती दे सके और सरकारी खजाने को लूटने की योजना सीधे तौर पर सरकार को चुनौती देना है। रेल लूटने की यह योजना संगठन के अस्तित्व को खतरे में डाल सकती है। किन्तु उनके विरोध के बाद भी यह प्रस्ताव बहुमत से पास हो गया।

ऐसे कार्यों को करने के लिये आजाद सबसे आगे रहते थे। उनके जोश, स्फूर्ति और निर्भीकता को देखकर रामप्रसाद बिस्मिल उन्हें को “क्विक सिलवर” अर्थात् “पारे” का खिताब दिया था। चाहे कोई भी कार्य कितना भी मुश्किल क्यों न हो वे सबसे आगे रहते थे। वे मजाक में कहा करते थे कि “मुझे बचपन में शेर का मांस खिलाया गया है।” हांलाकि यह सच नहीं था किन्तु उनमें वास्तव में शेर की तरह ही निर्भीकता और साहस था।

काकोरी कांड की योजना का प्रारुप और इसका क्रियान्वयनः–

सबसे पहले यह निश्चित किया गया कि गाड़ी को कहाँ लूटा जाये। योजना के प्रारम्भ में यह निर्णय लिया गया कि गाड़ी जब किसी स्टेशन पर खड़ी हो जाये तो खजाने के थैले लूटे जाये, किन्तु बाद में इस योजना पर पुनः विचार करने पर यह योजना उचित नहीं लगी और यह निर्णय लिया गया कि चलती गाड़ी की चैन खींच कर किसी सुनसान स्थान पर गाड़ी रोकी जाये और फिर खजाने को लूट लिया जाये।

इस योजना में मुख्य रुप से रामप्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ बख्शी, चन्द्र शेखर आजाद, अशफाक और राजेन्द्र लाहिड़ी शामिल थे। शचीन्द्र नाथ ने काकोरी नामक गाँव से तीन टिकट सेकेंड क्लास शाहजहाँपुर से लखनऊ की और जाने वाली 8 डाउन गाड़ी के लिये और राजेन्द्र व अशफाक के साथ सेकेंड क्लास के डब्बे में जाकर बैठ गये। बाकी के साथी तीसरी श्रेणी के ड़िब्बे में आकर बैठ गये।

गाड़ी जैसे ही सिग्नल के पास पहुँची बख्शी ने साथियों को इशारा किया और अशफाक व राजेन्द्र ने गाड़ी की चैन खींच दी। गाड़ी रुक गयी। गाड़ी रुकने पर गार्ड ने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि हमारा जेवरों का बक्सा स्टेशन पर ही रह गया और इतना कहकर वे गार्ड के करीब गये। उनका गार्ड के करीब जाने का उद्देश्य उसे अपने अधिकार में लेकर सरकारी खजाने तक पहुँचना था क्योंकि खजाना उसी के ड़िब्बे में था। उसे कब्जे में लेकर अशफाक ने तिजोरी तोड़ने का कार्य किया और मुख्य नेतृत्व बिस्मिल ने संभाला।

तिजोरी तोड़ कर वे सब रुपयों को थैले में भरकर आसपास के जंगलों में जाकर छुप गये। वहाँ से छुपते छुपाते वे सब लखनऊ पहुँचे। यह कांड़ ब्रिटिश शासन की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया और उन्होंने इन क्रान्तिकारियों को हर जगह ढूंढने का कार्य शुरु कर दिया किन्तु सफलता न मिली। हर गली हर स्टेशन पर आजाद को पकड़ने के लिये उनके बड़े बड़े पोस्टर लगवा दिये गये और इनके सभी साथी भी एक एक करके भेष बदलकर लखनऊ से निकल गये।

काकोरी कांड़ के बाद फरारी का जीवनः–

काकोरी कांड के बाद हरेक अखबार की सुर्खियों में इस घटना का वृतांत था। इस कारण संगठन के लोगों को इधर उधर हो जाना पड़ा। आजाद भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुये अपने साथियों से अपने गाँव भावरा जाने की बात कह कर बनारस चले गये। ये आदत आजाद में शुरु से ही थी वे कहीं और जाने की बात कहकर अक्सर उस स्थान पर नहीं जाते थे जहाँ जाने के लिये कहते, वे किसी अन्य स्थान पर चले जाते थे। यहीं कारण था कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाती थी। आजाद पुलिस को चकमा देकर फरार हो जाने में बहुत कुशल थे।

आजाद ने बनारस जाकर देखा तो वहाँ भी पुलिस का कड़ा पहरा लगा हुआ था, उन्होंने वहाँ रहना उचित नहीं समझा और झांसी आ गये। बख्शी भी दल की नीतियों के तहत यहाँ पहले से ही पहुँच चुके थे। आजाद भी छिपते छिपाते इनके पास पहुँच गये। वे झाँसी में एक अध्यापक रुद्र नारायण के यहाँ रुके। उन दिनों मास्टर जी का घर क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र था।

आजाद कुछ दिन वहाँ रहे। इसके बाद पुलिस के शक से बचने के लिये मास्टर रुद्रदत्त ने इनके लिये ओरछा के जंगल में तरार नदी के किनारे हनुमान मंदिर के पास एक झोपड़ी में ब्रह्मचारी के वेष में रहने की व्यवस्था कर दी। यह स्थान जंगली जानवरों से भरा हुआ था। किन्तु ये आराम से बिना किसी भय के उसी कुटिया में साधु के रुप में रहते।

कुछ दिन बाद रुद्रदत्त ने उन्हें एक मोटर ड्राईवर के सहायक के रुप में नियुक्त करा दिया। अब आजाद वही रहकर ड्राईविंग करना सीखने लगे और उन पर पुलिस भी संदेह नहीं कर पाती थी। इसी दौरान वो मोटर चलाना सीखे।

आजाद बेखौफ पुलिस की आँखो में धूल झोंक कर वेष बदलकर यहाँ से वहाँ घूमते थे। झाँसी मे जगह जगह चन्द्रशेखर को पकड़ने के लिये सी.आई.डी. की छापेमारी की जा रही थी किन्तु पुलिस उनको पकड़ने में सफल नहीं हो पा रहीं थी। इसी बीच में वे वहाँ से बचकर कानपुर आ गये।

आजाद का भगत सिंह से मिलनाः–

काकोरी कांड के बाद आजाद पुलिस से बचते हुये पहले झाँसी और फिर कानपुर गणेशशंकर विद्यार्थी के पास पहुँच गये। विद्यार्थी क्रान्तिकारियों के लिये अत्यधिक उदार थे। वे आजाद से मिलकर बहुत प्रसंन्न हुये। उन दिनों विद्यार्थी द्वारा सम्पादित लेख पत्र ‘प्रताप’ बहुत अच्छे स्तर पर प्रकाशित हो रहा था। इस पत्र प्रकाशन के द्वारा आसानी से ब्रिटिशों के विरुद्ध लेख प्रकाशित करके जन साधारण को राष्ट्र की वास्तविक अवस्था से परिचित कराया जाता था।

एक ओर विद्यार्थी जी का प्रताप और दूसरी ओर अपने देश पर मर मिटने के लिये तत्पर नौजवानों का दल अंग्रेज सरकार की आँखों का काँटा बने हुये थे। इसी बीच विद्यार्थी को लाहौर से भगत सिंह का पत्र मिला कि वे प्रताप में सहायक के रुप में कार्य करना चाहते है। इस पत्र का उत्तर अतिशीघ्र देते हुये उन्होंने भगत को कानपुर आने का निमंत्रण दे दिया। उनका इतनी शीघ्रता से भगत को आने का निमंत्रण देने का मुख्य उद्देश्य क्रान्ति की बेदी पर स्वंय को न्यौछावर करने के लिये तत्पर दो महान व्यक्तित्वों का मिलन कराना था।

भगत सिंह बहुत पहले से आजाद से मिलना चाहते थे। वे दोनों ही एक दूसरे की विचारधारा से परिचित थे और एक दूसरे से भेंट भी करना चाहते थे। भगत सिंह को पहले ही हिन्दुस्तानी प्रजातंत्र दल का पर्चा प्राप्त हो गया था और वे उनके उद्देश्यों से बहुत अधिक प्रवाहित होने के साथ ही आजाद से मिलने के लिये लालायित थे। भगत की इस इच्छा से गणेशशंकर पहले से ही परिचित थे, ऐसे में इस अवसर को अपने हाथ से कैसे जाने देते। उन्होंने शीघ्रातिशीघ्र कार्य संभालने का निमंत्रण दे दिया।

भगत सिंह इस निमंत्रण पर तुरंत कानपुर के लिये चल दिये। उनके इस निमंत्रण ने उन्हें आशा की नयी उमंग से भर दिया। उनके उत्साह को देखकर विद्यार्थी ने उन्हें गले से लगाया और भगत प्रताप के संपादन विभाग में बलवंत के नाम से काम करने लगे। यहीं उन्होंने भगत का परिचय आजाद से कराया उस समय की स्थिति को विद्यार्थी जी ने इस प्रकार वर्णित कियाः-“कैसा संयोग है कि दो दिवाने, जो एक दूसरे के साक्षात्कार और सहयोग के लिये आतुर-लालायित रहे है। एक दूसरे के समक्ष उपस्थित है।” कुछ ही समय में दोनों एक दूसरे से ऐसे घुल मिल गये जैसे वर्षों से परिचित हो। इस समय क्रान्तिकारी संगठन को आगे बढ़ाने के लिये दोनों को एक दूसरे की आवश्यकता थी।

काकोरी कांड (केस) के अभियुक्तों को जेल से भगाने की योजनाः–

बिखरे हुये क्रान्तिकारी दल को फिर से संयुक्त करने के लिये प्रयास किये जाने लगे। इसमें समस्या यह थी कि दल के प्रमुख नेता जेल में थे। इसलिये आजाद और भगत ने मिलकर काकोरी कांड के अभियुक्तों को जेल से भगाने की योजना बनायी। किन्तु यह योजना सफल नहीं हुई और काकोरी केस के अभियुक्तों पर लगभग 18 महीने केस चलाकर फाँसी की सजा सुना दी गयी। इन अभियुक्तों में रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खाँ शामिल थे। फाँसी की खबर से जनता में रोष फैल गया और जनता ने फाँसी की सजा रद्द करने की माँग की। इस पर फाँसी की तिथियाँ दो बार टाली भी गयी किन्तु फाँसी की सजा को नहीं टाला गया।

सबसे पहले 17 दिसम्बर 1927 को राजेन्द्र लाहिड़ी को गोंड़ा जेल में फाँसी दी गयी। इसके बाद 19 दिसम्बर को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर में, ठाकुर रोशन सिंह को इलाहबाद में और अशफाक उल्ला खाँ को फैजाबाद में फाँसी दे दी गयी। इस घटना से आजाद को बहुत धक्का लगा और अपनी योजनाओं पर नये सिरे से सोचना शुरु किया।

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन और साइमन कमीशन का विरोध प्रदर्शनः–

8 दिसम्बर 1928 को फिरोजशाह के खण्ड़रों में चन्द्रशेखर आजाद की अध्यक्षता में प्रमुख क्रान्तिकारियों की एक बैठक हुई। इस बैठक में सात सदस्यों की एक समिति बनायी गयी। इस समिति में – सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, फणीन्द्रनाथ घोष, शिववर्मा, कुन्दन लाल और विजय कुमार शामिल थे।

चन्द्रशेखर आजाद पूरे संगठन के अध्यक्ष थे, इसके साथ ही उन्हें विशेष रुप से सेना विभाग का नेता चुना गया। दल का नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के स्थान पर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी कर दिया गया। दल की ओर से कई जगह बम बनाने के कारखाने खोले गये और बम कारखाने के केन्द्र स्थापित किये गये। ये केन्द्र आगरा, लाहौर, सहारनपुर और कलकत्ता में स्थापित किये गये। इस सभा में यह भी निर्णय लिया गया कि दल में केवल उन्हीं मामलों को प्रमुखता दी जायेगी जो सार्वजनिक महत्व के होंगें क्योंकि इससे दल को जनता के बीच में लोकप्रिय बनाया जा सकेगा और दल के उद्देश्यों को स्पष्ट करने में सफलता मिल सकेगी।

इसी समय संयोग से भारत में साइमन कमीशन के आने का विरोध प्रदर्शन हो रहा था। जनता द्वारा साइमन कमीशन के विरोध में जगह आन्दोलन किये जा रहे थे। यह आजाद और उनके दल के लिये सुनहरा अवसर था। दल के प्रमुख नेताओं ने पंजाब केसरी लाला लाजपत राय को आन्दोलन का नेतृत्व करने के लिये मना लिया। 20 अक्टूबर 1928 को जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो इस कमीशन के विरोध में भारी जलूस निकाला गया।

इसके नेतृत्व की कमान लाला लाजपत राय के हाथों में थी और उनके चारों ओर दल के नौजवान मजबूत घेरा बना कर विरोध रैली को आगे बढ़ा रहे थे साथ ही किसी भी प्रकार के संकट से बचाने के लिये उनके ऊपर छाता लगाया हुआ था। इसी बीच पुलिस सुपरिटेन्डेंट स्टाक ने लाठी चार्ज का हुक्म दिया। तभी सांडर्स की लाठी के प्रहार से लाला जी की छतरी टूट गयी और उनके कंधे में चोट आयी। उनके चारों ओर अभी भी बड़े जोश के साथ उपस्थित नवयुवक जलूस को आगे बढ़ाने के लिये तत्पर थे। किन्तु लाला जी ने उन्हें आदेश दिया कि –“पुलिस की इस जालिमाना हरकत की मुखालफत में मुजाहिरे को मुअत्तल कर दिया जाये।” उनके इस कथन पर प्रदर्शन को स्थगित कर दिया गया।

शाम आयोजित सभा में लाला लाजपर राय ने भाषण दिया। इस भाषण में उन्होंने जनता को सम्बोधित करते हुये कहा – “जो सरकार जनता पर जालिमाना हमले करती है वह ज्यादा दिन तक कायम न रह सकेगी।... मैं आज चुनौती देता हूँ कि मेरे ऊपर किया गया लाठी का एक एक प्रहार ब्रिटिश सरकार के कफन की कील बनेगा।”

इस दुखद हमले के बाद राय ठीक न हो सके और 17 नवम्बर 1928 को उनकी मृत्यु हो गयी। पूरा भारत शोक में डूब गया। आजद के दल ने पंजाब केसरी की मृत्यु का बदला लेने का निर्णय लिया गया। दल ने यह निश्चय किया कि लाला लाजपत राय पर हमला करने वाले पुलिस अफसर को मार दिया जाये। इस कार्य के लिये आजाद, भगत, राजगुरु और जयगोपाल नियुक्त किये गये। इन चारों ने मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को ईंट का जबाब पत्थर से देते हुये सांडर्स को मौत के घाट ऊतार दिया।

पुलिस को चकमाः–

सांडर्स की हत्या के बाद पुलिस प्रशासन में हड़कंम मच गया। पंजाब पुलिस चारों तरफ पागलों की तरह हत्यारों को खोज रहीं थी। पूरे पंजाब में सी.आई.डी. का जाल बिछा था किन्तु इन चारों में से कोई भी हाथ नहीं आया। शाम होते ही दल के लोग छिपकर आपस में विचार विमर्श करने के लिये एकत्र हुये। उस समय दल के पास इतना भी धन नहीं था कि भोजन की समस्या भी हल हो सके। आजाद कहीं से दस रुपये की व्यवस्था करके लाये और सबको भोजन कराने के बाद आगे की योजना बनायी और सभी को अलग अलग जाने के लिये आदेश दिया गया।

सबसे बड़ी समस्या भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकाल कर भेजने की थी क्योंकि गोली चलाते समय इन्हें एक सिपाही ने देख लिया था। इसके लिये आजाद और सुखदेव ने योजना बनायी कि भगत को दुर्गा भाभी के साथ बाहर भेजा जाये। इनके भेष को बदलकर एक अंग्रेज साहब का रुप दे दिया और दुर्गा भाभी इनकी मेम बनकर साथ में गयी साथ ही राजगुरु इनके नौकर बनकर साथ हो लिये। इस तरह भगत को लाहौर से बाहर निकाले में सफलता पायी। जिस गाड़ी से ये तीनों सफर कर रहे थे उसी गाड़ी के दूसरे ड़िब्बे में आजाद भी एक महात्मा का भेष बनाये बैठे थे ताकि कोई भी गड़बड़ होने पर वे हालात को संभाल सके। इस तरह पुलिस बस खाक छानती रह गयी और ये महान देश भक्त उनकी नाक के नीचे से निकल गये।

असेम्बली में बम धमाकाः–

सांडर्स की हत्या के बाद यह दल जनता का प्रिय हो गया और इन्हें आसानी से चन्दे भी मिलने लगे। आर्थिक तंगी की समस्या दूर हो गयी असानी से दल के उद्देश्यों को पूरा किया जाने लगा। इसी क्रम में दल ने आगरा में बम बनाने का कारखाना खोला और यहाँ बम बनाने का कार्य किया जाने लगा। अब दल ने कुछ बड़ा करने का निश्चय किया जिससे कि एक साथ दो कार्यों को पूरा किया जा सके – पहला जनता उनके दल के उद्देश्यों से परिचित हो और दूसरा ब्रिटिश शासन को डरा कर भारत को आजाद कराना। इसके लिये भगत सिंह ने दल की बैठक में असम्बेली में बम फेंकने का निर्णय दिया। सभी इस बात पर सहमत हो गये। इस कार्य के लिये आजाद और भगत सिंह के नाम का प्रस्ताव रखा गया किन्तु इन दोनों का दल के भविष्य के लिये जीवित रहना आवश्यक था। अतः भगत और बटुकेश्वर दत्त का जाना तय किया गया।

आजाद चाहते थे कि बम फेंक कर भाग जाना चाहिये, वहीं भगत सिंह गिरफ्तार होकर जनता तक अपनी बात पहुँचाने के पक्ष में थे। क्योंकि उनका मानना था कि खाली बम फेंक कर और पर्चें उड़ाकर जनता तक अपने उद्देश्यों को नहीं पहुँचाया जा सकता। इसके लिये गिरफ्तार होकर अदालत में अपने उद्देश्यों को बताना अधिक उपयुक्त उपाय है। चन्द्रशेखर आजाद इस बात के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि बम फेंक कर फरार हो जाना चाहिये और गुप्त संपर्कों के माध्यम से क्रान्ति की आग को जन साधारण में फैलाना चाहिये। पर भगत ने इनकी बात नहीं मानी मजबूरी में दल को भी भगत की बात माननी पड़ी।

आजाद द्वारा इस बात पर जोर डालने का सबसे बड़ा कारण था कि उन्हें भगत से बहुत लगाव था और वे किसी भी कीमत पर उन्हें खो कर दल को कोई भी हानि नहीं पहुँचाना चाहते थे। किन्तु भगत के आगे उनकी एक ना चली और न चाहते हुये भी उन्हें अपनी सहमति देनी पड़ी। आजाद बहुत दुखी थे कि उनकी मनोदशा को उनके इन शब्दों से समझा जा सकता – “क्या सेनापति होने के नाते मेरा यहीं काम है कि नये साथी जमा करुँ, उनसे परिचय, स्नेह और घनिष्ठता बढ़ाऊ और फिर उन्हें मौत के हवाले कर मैं ज्यों का त्यों बैठा रहूं।”

असम्बली कांड के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुनायी गयी। इस फैसले से आजाद को बहुत दुख हुआ। उन्होंने भगत को जेल से भगाने के लिये बम्बई में संगठन खड़ा किया। वहाँ पृथ्वीराज से मिलकर उसे बम्बई में संगठन का नेतृत्व करने का दायित्व देकर स्वंय भगत सिंह और उनके साथियों को छुड़ाने का यत्न करने लगे। इसी प्रयास को सफल करने के लिये आजाद ने सुशीला दीदी (आजाद की सहयोगी) और दुर्गा भाभी को गाँधी के पास भेज चुके थे।

उन्होंने गाँधी को एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि गाँधीजी भगत सिंह और दत्त की फाँसी को मंसूख करा सके और चलने वाले मुकदमों को वापस ले सके तो आजाद भी अपनी पार्टी सहित अपने को गाँधी जी के हाथों में सौंप सकते है, फिर वे चाहे कुछ भी करें। आजाद पार्टी को भंग करने को तैयार हो गये थे। गाँधी से भी उन्हें कोई संतोषजनक जबाब नहीं मिला, जिससे दल को बड़ी निराशा हुई, फिर भी प्रयत्न जारी रखे गये।

साण्डर्स की हत्या के बाद फरारी जीवनः–

आजाद ने बहुत लम्बी फरारी का जीवन व्यतीत किया था। वे 26 सितम्बर, 1925 से फरार थे। 17 दिसम्बर 1928 को सांडर्स की हत्या के बाद से उनके लिये फाँसी का फन्दा भी तैयार था। किन्तु पुलिस उन्हें कैद नहीं कर पा रही थी। फरारी जीवन में सड़क पर चलते समय या ट्रेन में सफर करते समय ऐसे कार्यों की शख्त मना थी जिनसे उनकी किसी राजनैतिक रुचि के बारे में किसी को भी पता चले। गाड़ी में सफर करते समय क्रान्तिकारी साधारण किस्से कहानी में अपना समय व्यतीत करते थे या कोई उपन्यास लेकर उसे पढ़ने में व्यतीत करते। उनके फरारी जीवन का एक रोचक किस्सा इस प्रकार है – “आजाद, राजगुरु और भगवानदास माहौर जा रहे थे। समय काटने के लिये और संदेह से बचने के लिये आजाद ने भगवान दास से गाने को कहा। भगवानदास अच्छा गा लेते थे।

भगवानदास ने गाना शुरु किया और आजाद ने दाद देना। कुछ समय तक राजगुरु भी उनके साथ दाद देते रहे लेकिन जैसे ही गाड़ी ने बुन्देलखण्ड़ की सीमा में प्रवेश किया राजगुरु की निगाह पहाड़ियों पर बनी उन छोटी-छोटी माड़ियों पर गयी, वैसे ही राजगुरु ने इशारा करते हुये कहा, ‘पंड़ित जी (आजाद) यह स्थान गुरिल्ला लड़ाई के लिये कितना उपयुक्त है।’ आजाद ने जानबूझकर उनकी बातों को अनसुनी करते हुये अन्य बातों पर ध्यान दिया। मगर राजगुरु अपनी ही धुन में मगन थे, उन्होंने फिर कहा – शिवाजी ने जिस स्थान को चुना था वह भी कुछ इसी प्रकार का था। इस बार आजाद ने झल्लाकर कहा – तुम्हारे शिवाजी की ...। तब जाकर राजगुरु को समझ आया कि वे क्या कर रहे थे। झाँसी पहुँचने के बाद राजगुरु को प्रेम से संम्बोधित करते हुये कहा – साले आज तूने मुझसे शिवाजी को भी गाली दिला दी।”

चन्द्रशेखर को पकड़ने के लिये पुलिस ने ऐड़ी चोटी का जोर लगाये हुई थी। सरकार उन्हें पकड़ने के लिये हर संभव प्रयास कर रहीं थी। पुलिस हाथ धोकर उनके पीछे पड़ी थी, उन्हें पकड़ने के लिये तरह तरह के इनाम घोषित किये गये थे। पर आजाद को कैद करना कोई बच्चों का खेल नहीं उन्होंने जीते जी कैद ना होने की कसम जो खायी हुई थी। कानपुर, बनारस, झाँसी और दिल्ली में उन्हें पकड़ने के विशेष पुलिस प्रबंध किये जाते थे। उन्हें पहचानने वाले व्यक्ति इन स्थानों पर तैनात कर दिये जाते थे। फिर भी आजाद उनकी आँखों में धूल झोंक कर फरार हो जाते थे। कभी कभी तो वे पुलिस के बिल्कुल सामने से निकल जाते थे और पुलिस वालों को पता भी नहीं चलता था।

आजाद की खाशियत थी कि वे जिस तिथि को जाने के लिये कहते थे, उस दिन वे कहीं नही जाते थे। यही कारण था कि वे पुलिस का पकड़ में नहीं आते थे। दूसरा कारण यह था कि वे भेष बदलने में माहिर थे। वे जब भी यात्रा करते भेष बदलकर करते। जिस स्थान पर जाने को कहते उस स्थान पर न जाकर कहीं और जाते। तो कोई भी उनकी मुखबिरी नहीं कर पाता और वे फरार होने में सफल रहते। अपने फरारी जीवन में ही वे भगत सिंह से भी मिले। इन्हीं दिनों में वे अपने संगठन को मजबूती प्रदान करने के कार्य करते।

आजाद का व्यक्तित्वः–

आजाद महान व्यक्तित्व के धनी थे। वे अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे। उनके त्याग, व्यक्तित्व, लगन, प्रतिभा, सहजता, साहस और चरित्र से हरेक व्यक्ति प्रभावित था। वे अपने अनुशासन को मानने वाले व्यक्ति थे। पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि इनके संगठन का कोई भी व्यक्ति स्त्रियों का अपमान करें। वे स्वंय स्त्रियों का बहुत सम्मान करते थे। पार्टी में उनका आदेश था कि कोई व्यक्ति स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालेगा, यदि किसी ने ऐसा किया तो वह पहले उनकी गोली का शिकार बनेगा।

वह स्वभाव से कठोर भी थे और सहज भी। उनका रहन सहन बहुत सादा था। खाना बिल्कुल रुखा सूखा पसंद करते थे। खिचड़ी उनकी सबसे पसंदीदा भोजन थी। वह अपने ऊपर एक रुपया भी खर्च न करते थे। ना उन्हें अपने नाम की परवाह थी और न ही परिवार की। एक बार भगत सिंह ने बहुत आग्रह के साथ उनसे पूछा था कि – “पंड़ित जी, इतना तो बता दीजिये, अपका घर कहाँ है और वहाँ कौन – कौन है? ताकि भविष्य में हम उनकी आवश्यकता पड़ने पर सहायता कर सकें तभा देशवासियों को एक शहीद का ठीक से परिचय मिल सकें।” इतना सुनते ही आजाद गुस्से में बोले – “इतिहास में मुझे अपना नाम नहीं लिखवाना है और न ही परिवार वालो को किसी की सहायता चाहिये। अब कभीं यह बात मेरे सामने नहीं आनी चाहिये। मैं इस तरह नाम, यश और सहायता का भूखा नहीं हूँ।” आजाद के इसी व्यक्तित्व के कारण हर किसी का शीश उनके लिये श्रद्धा से झुक जाता है।

एक बार की बात है, आजाद दल के किसी कार्य के लिये रुपयों की व्यवस्था के लिये दल की मोटर कार थी, उसे बेचकर आर्थिक तंगी का समाधान करना था। आजाद के माता – पिता की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी, पर देश पर मर मिटने को तैयार आजाद को परिवार की चिन्ता के लिये समय ही कहाँ था। उनके माता-पिता की उस स्थिति का पता गणेशशंकर विद्यार्थी को लगा तो उन्होंने 200 रुपये आजाद को देकर कहा कि इसे अपने परिवार वालो को भिजवा देना।

किन्तु आजाद ने यह रुपये पार्टी के कामों में खर्च कर दिये। दुबारा मिलने पर विद्यार्थी जी ने रुपये भेजने के संबंध में पूछा तो आजाद ने हँस कर कहा – “उन बूढ़ा-बूढ़ी के लिये पिस्तौल की दो गोलियाँ काफी है। विद्यार्थी जी इस देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिन्हें एक समय भी रोटी नसीब नहीं होती। मेरे माता-पिता दो दिन में एक बार भोजन पा ही जाते है। वे भूखे रह सकते है, पर पैसे के लिये पार्टी के सदस्यों को भूखा नहीं मरने दूंगा। मेरे माता-पिता भूखे मर भी गये तो इस से देश का कोई नुकसान नहीं होगा, ऐसे कितने ही इसमें जीते मरते है।” इतना कहकर आजाद चले गये और विद्यार्थी जी केवल अचरज भरीं नजरों से उन्हें देखते ही रह गये।

ऐसे थे महान क्रान्तिकारी आजाद जो अपने ऊपर दल का एक रुपया भी खर्च नहीं करते थे। इस महान क्रान्तिकारी के मन में कभी भी किसी भी प्रकार का न लोभ ही था और न ही घमंड़। विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी अपना संयम नहीं खोया। कितनी भी विकट परिस्थिति क्यों न हो आजाद कभी भी दुर्व्यसन में नहीं पड़े। बम्बई में भी जहाज रंगने वाले मजदूरों के साथ कार्य करते हुये कभी भी माँस मदिरा का सेवन नहीं किया। अगर कोई उनसे कहा तो भी वे सहज स्वभाव से मना कर देते। आजाद कट्टर ब्राह्मण थे। वे गोश्त, शराब और सिगरेट जैसे दुर्व्यसनों से सदैव ही दूर रहते थे किन्तु कभी कभी पुलिस से बचने के लिये सिगरेट पीने का स्वांग अवश्य करते थे। हालांकि बाद में भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों के बहुत आग्रह पर कच्चा अंड़ा खाना शुरु कर दिया था किन्तु माँस उन्होंने कभी नहीं खाया। आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया और सदैव स्त्रियों का सम्मान किया। आजाद के कार्यों की ही तरह उनका व्यक्तित्व भी बहुत महान था।

दल का विघटन (4 सितम्बर 1930) –

असम्बेली बम कांड के बाद जगह जगह क्रान्तिकारियों की गिरफ्तारियाँ की जाने लगी। कुछ ने स्वंय ही समर्पण कर दिया कुछ पुलिस के मुखबिर बन गये, कुछ सरकारी गवाह बन गये और कुछ की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु हो गयी। इस तरह दल के कुछ सदस्यों द्वारा दल से गद्दारी के कारण आजाद को बहुत दुख हुआ। वे भगत की गिरफ्तारी से पहले ही दुखी थे और कुछ सदस्यों के विश्वास घात ने उन्हें बिल्कुल असाह्य कर दिया। इन सब घटनाओं के कारण आजाद ने दल के विघटन का निश्चय किया।

4 सितम्बर 1930 के दिन दोपहर को उन्होंने बचे हुये क्रान्तिकारियों को एकत्र करके सभा की और दल के विघटन का आदेश दिया। इस प्रकार दिल्ली की केन्द्रीय सभा को भंग कर दिया ताकि दलों को नये सिरे से पुनः संगठित किया जा सके और नये सिरे व नये आधार पर कार्य किया जा सके। साथ ही जो भी सदस्य थे उन्हें अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रुप से कार्य करने के लिये कहा गया और यह भी कहा कि जब भी उनकी आवश्यकता महसूस हो तो उनसे सहायता के लिये कह सकते है। आजाद ने इस फैसले के साथ ही क्षेत्र के सभी प्रमुखों को आवश्यक हथियार देकर वहाँ से चले गये।

आजाद के जीवन के अन्तिम वर्षः–

आजाद ने दल के विघटन के बाद प्रयाग (इलाहबाद) में अपना केन्द्र बना लिया और यहीं से अपनी योजनाओं का संचालन करते थे। आजाद इलाहबाद के कटरे मुहल्ले के लक्ष्मी दीदी के मकान में अपने गिने चुने साथियों के साथ रहते थे। लक्ष्मी दीदी के पति आजाद के सहयोगी थे और किसी क्रान्तिकारी घटना के समय शहीद हो गये थे। लक्ष्मी दीदी उनकी पत्नी थी, उन्होंने अपनी पत्नी को आजीवन दल के सदस्यों की सहायता करने के लिये कहा था और जब आजाद ने इलाहबाद रहने का निर्णय किया तो लक्ष्मी दीदी ने अपने घर के द्वार उनके लिये खोल दिये। अब उनका कार्य दल के नेता की सुरक्षा करना हो गया। वह भिखारिन के रुप में पुलिस, सी. आई. डी. के भेद ज्ञात करके आजाद को बताती साथ ही उनके और उनके साथियों के लिये खाना बनाकर खिलाती। वह जितनी सहायता कर सकती थी करती और आजाद को उनके साथियों सहित सुरक्षित रखने का पूरा प्रयास करती थी।

पं. जवाहर लाल नेहरु से मिलनाः–

आजाद के मन में भविष्य को लेकर बहुत सी अनिश्चिताऍ थी। गोलमेज सम्मेलन के दौरान यह निश्चय किया जाने लगा था कि कांग्रेस और अंग्रेजों के बीच में समझौता हो जायेगा। ऐसे में आजाद के मन में अनेक सवाल थे। उन्हीं सवालों के समाधान के लिये पहले वे मोतीलाल नेहरु से मिले किन्तु उनकी मृत्यु हो गयी और कोई समाधान नहीं निकला। इसके बाद वे जवाहर लाल नेहरु से मिलने के लिये गये। इस मुलाकात का वर्णन नेहरु ने अपनी आत्मकथा "मेरी कहानी" में किया है जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैः–

“आजाद मुझसे मिलने के लिये तैयार हुआ था कि हमारे जेल से छूट जाने से आमतौर पर आशाऍ बंधने लगी है कि सरकार और कांग्रेस में कुछ न कुछ समझौता होने वाला है। वह जानना चाहता था कि अगर कोई समझौता हो तो उसके दल के लोगों को भी कोई शांति मिलेगी या नहीं? क्या उसके साथ तब भी विद्रोहियों का सा बर्ताव किया जायेगा? जगह-जगह उनका पीछा इसी प्रकार किया जायेगा? उनके सिरों के लिये इनाम घोषित होते ही रहेंगे? फांसी का तख्ता हमेशा लटकता ही रहेगा या उनके लिये शांति के साथ काम-धंधे में लग जाने की सम्भावना होगी? उसने खुद कहा कि मेरा और मेरे साथायों का यह विश्वास हो चुका है कि आतंकवादी तरीके बिल्कुल बेकार है, उससे कोई लाभ नहीं है। हाँ वह यह भी मानने को तैयार नहीं था कि शांतिमय साधनों से ही हिन्दुस्तान को आजादी मिल जायेगी। उसने कहा कि आगे कभी सशस्त्र लड़ाई का मौका आ सकता है, मगर यह आतंकवाद न होगा।”

यह कोई नहीं जानता कि इस नेहरु के इस वकत्व्य में कितनी सच्चाई है, लेकिन एक बात बहुत स्पष्ट है कि आजाद अपने लिये नहीं बल्कि अपने दल के साथियों के संबंध में बात करने गये थे। वे गाँधी द्वारा गोलमेज सम्मेलन में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की सजा को उम्र कैद की सजा में बदलवाना चाहते थे क्योंकि वे जानते थे कि इस समय अंग्रेजी शासन की दशा बहुत कमजोर है और उसके सामने कांग्रेस की स्थिति मजबूत है साथ ही यदि गाँधी और नेहरु चाहे तो अंग्रेजों को इस बात का दबाब ड़ालकर राजी भी कर सकते है। वे इस मुद्दे पर बात करने के लिये पहले ही सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी को गाँधी से बात करने के लिये भेज चुके थे, पर उन्हें कोई संतोषजनक जबाव नहीं मिला तो, इसी सन्दर्भ में वे बात करने के लिये नेहरु से मिले। इस बात पर जवाहर लाल नेहरु से बहुत वहस भी हुई और आजाद गुस्से में वहाँ से चले आये।

शहादत (27 फरवरी 1931) –

27 फरवरी 1931 की सुबह नेहरु से मिलने के बाद आजाद बहुत गुस्से में बाहर निकले और अल्फ्रेड पार्क में अपने मित्र सुखदेव के साथ कुछ जरुरी मुद्दों पर बात करने के लिये गये। उसी समय किसी विश्वासघाती ने पुलिस का मुखबिर बन आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना दी। आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की खबर मिलते ही पुलिस इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह ने एस. पी. नॉट बाबर को सूचना दी और पुलिस फोर्स के साथ पार्क को घेर लिया। आजाद सुखदेव से बात कर रहे थे इसी बीच एक गोली आजाद की जांघ में लगी, आजाद जबाबी फायरिंग करते हुये पुलिस अफसर की कार टायर पंचर कर देते है।

आजाद अपने साथी सुखदेव को वहाँ से भगाकर खुद मोर्चा संभाल लेते है। इसी दौरान एक और गोली उनके दाँये फेंफड़े में लग जाती है। वे पूरी तरह से लहुलुहान पुलिस दल का सामना करते है। वे नॉट बाबर को लक्ष्य करके गोली चलाते है और उसकी गाड़ी का मोटर एक ही गोली से चूर कर देते है। उन्होंने किसी भी भारतीय सिपाही पर गोली नहीं चलायी। जब झाड़ी में छिपे एस. पी. विश्वेश्वराय ने उन्हें गाली देकर संबोधित किया। यह स्वाभिमानी आजाद को बर्दास्त नहीं हुआ और एक ही गोली में उसका गाली देने वाला जबड़ा तोड़ दिया।

इतना अच्छा शॉट जिसे देखकर सी. आई. डी. के आई. जी. के मुँह से भी तारीफ में शब्द निकल गये “वण्डरफुल.....वण्डरफुल शॉट!”। खून से लथपथ आजाद ने एक पेड़ का सहारा लेकर लगभग आधे घंटे तक अकेले पुलिस फोर्स से मोर्चा लिया। इतने गंभीर समय में भी आजाद को यह याद था कि वह कितनी गोली खर्च कर चुके है। उन्हें याद था कि उनके पास अब सिर्फ एक ही गोली बची है साथ ही जीते जी कैद न होने की अपनी कसम भी याद थी। खून से लथपथ आजाद ने अपनी कनपटी पर पिस्तौल रखी और स्वंय को इन सभी बंधनों से आजाद कर लिया। अपने इन शब्दों को खुद ही सार्थक कर गयेः-

“दुश्मनों की गोलियों का हम सामना करेंगें, आजाद हैं, आजाद हैं, आजाद ही रहेंगें।”

आजाद जीते जी अंग्रेजो की कैद में नहीं आये। वे आजाद थे और मरते दम तक आजाद ही रहें। पुलिस में उनका खौफ जीते जी था किन्तु वह उनके मरने के बाद भी कम न हुआ। जब उनका शरीर बेजान धरती पर लुढ़क गया तब भी बहुत देर तक कोई भी उनके पास आने का साहस न कर पाया। फिर एक अधिकारी ने उनके पैर में गोली मारकर देखा कि वास्तव मर गये है या जीवित है, कोई प्रतिक्रिया न आने पर पुलिस अधिकारी उनके शव के करीब गये।

धीरे धीरे यह खबर आग की तरह फैल गयी कि अल्फ्रेड पार्क में आजाद शहीद हो गये और पार्क के चारों ओर उस महान क्रान्तिकारी के पहले और आखिरी दर्शन करने के लिये भीड़ लग गयी। भीड़ पर भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। चारों तरफ शोर और कोलाहल बढ़ने लगा। पुलिस दंगा होने के भय से उनके पार्थिव शरीर को ट्रक में भर कर ले गयी और उसका पोस्टमार्टम करने के बाद किसी गुप्त स्थान पर अंतिम संस्कार कर दिया गया।

अगले दिन आजाद की अस्थियों को चुनकर युवकों ने एक बहुत बड़ा जलूस निकाला। शाम को सभा हुई आजाद की शहादत को सम्मानित करते हुये उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गयी। ब्रिटिश सरकार आजाद को मार कर भी मार न सकी। अपनी इस जीत पर भी वह हार गयी। आजाद जो अलख जगाने के लिये शहीद हो गये वह भारत के हर नवयुवक के मन में जल गयी स्वतंत्रता के लिये आन्दोलन और तेज हो गया और अन्त में आजाद का आजाद भारत का सपना 15 अगस्त 1947 को पूरा हुआ।

आजाद को श्रद्धांजलिः-

27 फरवरी को आजाद की मृत्यु के बाद देश के महान नेताओं ने आजाद को श्रद्धांजलि देते हुये कहा थाः ––

  • पं. मदनमोहन मालवीय – “पंड़ित जी की मृत्यु मेरी निजी क्षति है। मैं इससे कभी उबर नहीं सकता।”
  • मोहम्मद अली जिन्ना – “देश ने एक सच्चा सिपाही खोया है।”
  • महात्मा गाँधी – “चन्द्रशेखर की मृत्यु से मैं आहत हूँ। ऐसे व्यक्ति युग में एक ही बार जन्म लेते हैं। फिर भी हमें अहिंसक रुप से ही विरोध करना चाहिये।”
  • पं. जवाहरलाल नेहरु – “चन्द्रशेखर की शहादत से पूरे देश में आजादी के आंदोलन का नये रुप में शेखनाद होगा। आजाद की शहादत को हिन्दुस्तान हमेशा याद रखेगा।”

चन्द्रशेखर आजाद के नारे (कथन) –

  • “दुश्मनों की गोलियों का सामना हम करेंगें, आजाद है, आजाद ही रहेंगें।”
  • “एक प्लेन (वायुयान) जमीन पर सदैव सुरक्षित रहता है, किन्तु उसका निर्माण इसलिये नहीं हुआ बल्कि इसलिये हुआ है कि वह कुछ उद्देश्यपूर्ण खतरों को उठाकर जीवन की ऊँचाईयों को छूऐ।”
  • “जब संसार तुम्हें घुटनों पर ले आये तो याद रखो कि तुम प्रार्थना करने की सबसे अच्छी स्थिति में हो”
  • “जीवन के तीन साधारण नियम हैः- यदि जो आप चाहते हो उसका पीछा नहीं करोगे तो उसे कभी पा नहीं सकते; यदि कभी पूछोगें नहीं तो उत्तर सदैव ना रहेगा; यदि आप आगे के लिये कदम नहीं उठाओगे, तो आप सदैव उसी स्थान पर रहोगे। इसलिये उसे पाने के लिये आगे बढ़ो”
  • “जब गाँव के सभी लोग बारिश के लिये प्रार्थना करने का निश्चय करते है, उस प्रार्थना वाले दिन केवल एक व्यक्ति छाते के साथ आता है – यही विश्वास है”
  • “हर रात जब हम सोने के लिये बिस्तर पर जाते है, हम नहीं जानते कि हम कल सुबह उठेगें भी या नही फिर भी हम आने वाले कल की तैयारी करते है – इसे ही आशा कहते है”।
  • “जब आप बच्चे को हवा में उछालते हो तो वह बच्चा हँसता है क्योंकि वह जानता है कि आप उसे पकड़ लोगे – यही भरोसा है”
  • “यह मत देखों कि दूसरे तुम से बेहतर कर रहे है, प्रतिदिन अपने ही रिकार्ड को तोड़ो क्योंकि सफलता सिर्फ तुम और तुम्हारे बीच का संघर्ष है।”
  • “यदि आप अभी और कभी नाकाम नहीं हुये हो तो यह इस बात का संकेत है कि आप कुछ बहुत नया नहीं कर रहे हो।”