चन्द्रशेखर आजाद पर निबन्ध

भारतीय क्रांतिकारियों मे चन्द्रशेखर आजाद एक बहुत प्रसिद्ध नाम है, जिन्होंने अपनी मातृ भूमी की आजादी के लिए अपना सबकुछ बलिदान कर दिया। यहां निचे दिए गए निबन्ध मे हम चन्द्रशेखर आजाद के जीवन के संघर्ष और कई अन्य रोचक तथ्यों के बारे मे चर्चा करेंगे।

चन्द्रशेखर आजाद पर छोटे और बड़े निबन्ध (Short and Long Essays on Chandrashekhar Azad)

निबन्ध 1 (250 शब्द) - चन्द्रशेखर आजादः एक क्रान्तिकारी

परिचय

चन्द्रशेखर आजाद भारत मे जन्में एक बहादूर और क्रान्तिकारी व्यक्ति थे, जिन्हें उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए हमेशा याद किया जाता है। अपने साहसिक गतिविधियों के कारण वो भारतीय युवाओं मे एक हीरो के रुप मे जाने जाते है। अपने नाम के अनुरुप ही वो अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ की गई कई क्रांतिकारी गतिविधियों के बाद भी ब्रिटिश कभी उन्हें पकड़ नही सके।

उनके क्रांतिकारी गतिविधियों पर एक नजर

चन्द्रशेखर आजाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए) के साथ जूड़े थे, जिसको 1928 मे बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.एस.आर.ए.) के नाम से जाना जाने लगा। दोनों ही संगठनों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों मे हिस्सा लिया और उन गतिविधियों मे चन्द्रशेखर आजाद हमेशा ही आगे रहें। चन्द्रशेखर आजाद से जुड़ी कुछ महत्वपुर्ण गतिविधियों को नीचे प्रदर्शित किया गया है –

  • काकोरी ट्रेन डकैती

ट्रेन डकैती की यह घटना 9 अगस्त 1925 मे लखनऊ के नजदीक काकोरी मे चन्द्रशेखर आजाद और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए.) के अन्य साथियों द्वारा इस घटना को अंजाम दिया गया था। इस घटना का मुख्य उद्देश्य संघ की क्रांतिकारी गतिविधियों को वित्तपोषित करना था।

  • वायसराय की ट्रेन को उड़ाया

चन्द्रशेखर आजाद ने 23 दिसंबर 1926 मे वायसराय लार्ड इरविन को ले जाने वाली ट्रेन को बम धमाके मे उड़ाने मे भी शामिल थे। हांलाकि इस घटना मे ट्रेन पटरी से उतर गयी थी और वायसराय अचेत हो गया था।

  • सॉन्डर्स की हत्या

चन्द्रशेखर आजाद ने 17 दिसंबर 1928 को भगत सिहं और राजगूरु के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए, परिविक्षाधीन पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या में भी शामिल थे।

शहादत

जब पुलिस को चन्द्रशेखर आजाद की इलाहाबाद के आजाद पार्क मे छुपे होने की सूचना मिली तो वो उनसे अकेले ही भिड़ गए थे। उन्होने जबाबी कार्यवाही मे पुलिस पर गोलियां चलाई लेकिन अंतिम गोली से उन्होंने खुद को मार लिया, क्योंकि किसी भी हाल मे पुलिस के हाथ पकड़ा जाना उन्हे मंजूर नही था।

निष्कर्ष

वो अपने नाम के अनुसार ‘आजाद’ ही मर गये। उन्होने ब्रिटिश सरकार द्वारा अमानवीय तरीके से कब्जा और लोगों से अनुचित व्यवहार के लिए वो शख्त खिलाफ थे।

निबन्ध 2 (400 शब्द) – आजादः एक युवा क्रांतिकारी

परिचय

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई मे चन्द्रशेखर आजाद के नाम को किसी परिचय की आवश्यकता नही है। भारतीय क्रांतिकारियों की सुची मे यह एक जाना माना और सम्मानित नाम है। उनकी कम उम्र मे साहस और निडरता ने उन्हें भारत के युवाओं मे काफी लोकप्रिय बना दिया था।

आजाद – एक युवा क्रांतिकारी

बहुत कम उम्र मे ही आजाद ब्रिटिश विरोधी आन्दोलनों मे भाग लेने के लिए प्रेरित हुए। जब वह काशी विद्यापीठ वाराणसी मे पढ़ रहे थे तो वह केवल 15 साल के थे, तब उन्होने महात्मा गांधी द्वारा चलाए गये असहयोग आंदोलन मे सक्रिय रुप से भाग लिया था। वह असहयोग आंदोलन मे भाग लेने के लिए जेल मे जाने वाले सबसे कम उम्र के आंदोलनकारी थे।

केवल 15 वर्ष की उम्र मे, आजादी के आंदोलन मे हिस्सा लेने के लिए एक युवा के लिए बहुत कम उम्र है, लेकिन आजाद ने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए यह लड़ाई लड़ी। चौरी-चौरा की घटना के बाद जब महात्मा गांधी ने 1922 मे असहयोग आंदोलन को खत्म करने का फैसला किया तो इस फैसले से आजाद खुश नही थे।

एच.आर.ए. और एच.एस.आर.ए. को समर्थन

1922 मे गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को खत्म करने के बाद, आजाद राम प्रसाद विस्मिल के संपर्क मे आएं, जिन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों मे शामिल हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएसन (एच.आर.ए.) नामक संस्थान की स्थापना की थी।

चन्द्रशेखर आजाद को मोतीलाल नेहरु जैसे बहुत सारे दिग्गज नेताओं का समर्थन प्राप्त था जिन्होने नियमित रुप से एच.आर.ए. के समर्थन के लिए पैसे दिए थे। उन दिनों उन्हें कई कांग्रेस नेताओं का भी समर्थन मिला था, खासतौर से जब वह संयुक्त प्रांत मे, जो इन दिनों उत्तर प्रदेश मे झांसी के निकट है, एक बदली हुई पहचान पंडित हरिशंकर ब्रम्हचारी नाम के साथ जी रहे थे।

चन्द्रशेखर आजाद ने 6 साल के भीतर भगत सिहं, असफाकउल्ला खान, सुखदेव थापर और जगदीश चन्द्र चटर्जी के साथ मिल कर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.एस.आर.ए.) संस्थान का गठन किया था। 

काकोरी ट्रेन डकैती

9 अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन डकैती की घटना के षणयंत्र को काकोरी और लखनऊ के बीच अंजाम दिया गया था। रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान के साथ मिलकर एच.आर.ए. की गतिविधियों मे निधी देने और संगठन के लिए हथियार खरीदनें के इरादे से यह लुट की गयी थी।

सरकारी खजाने के लिए पैसा ले जाने वाली इस ट्रेन को बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, राजेन्द्र लहीरी और एच.आर.ए. के अन्य सदस्यों ने मिलकर ट्रेन को लूट लिया था। गार्ड के कोच मे मौजूद एक लाख रुपये को उन्होने लूट लिया था।

विश्वासघात और मौत

27 फरवरी 1931 को आजाद जब इलाहाबाद के आजाद पार्क मे छिपे थे। विरभद्र तिवारी नाम का एक पुराना साथी पुलिस का मुखबिर बन गया और आजाद के वहां होने की सुचना पुलिस को दे दिया। पुलिस के साथ भिड़ते हुए आजाद ने अपने कोल्ट पिस्टल से गोलीयां चलायी, लेकिन जब उसमे केवल एक गोली बची थी, तो उन्होने खुद को गोली मार ली।

निष्कर्ष

आजाद अपने साथियों से कहा करते थे कि वो कभी पकड़े नही जाएंगे और हमेशा आजाद ही रहेगें। वास्तव मे वह गिरफ्तार होने की स्थिति मे एक अतिरिक्त गोली अपने साथ रखते थे, ताकि वह खुद को मार सकें।

निबन्ध 3 (600 शब्द) – चन्द्रशेखर आजादः परिवार और क्रांतिकारी गतिविधि

परिचय

चन्द्रशेखर आजाद या केवल ‘आजाद’ के नाम से जाना जाने वाले ये एक भारतीय क्रांतिकारी थे जो कि अन्य क्रांतिकारियों जैसे सरदार भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और अन्य सभी के समकालीन थे। भारत से ब्रिटिश शासन को बाहर निकालने के लिए उन्होनें बहुत सी क्रांतिकारी गतिविधियों मे भाग लिया।

आजाद – द फ्री

एक छोटी लेकिन बहुत रोचक घटना है, जबकि उनके जन्म का नाम चन्द्रशेखर तिवारी था और उन्होने अपने नाम के आगे ‘आजाद’ नाम को जोड़ लिया और वो चन्द्रशेखर आजाद बन गये। 

केवल 15 वर्ष की आयु मे आजाद को असहयोग आंदोलन मे हिस्सा लेने के लिए उन्हें जेल मे ड़ाल दिया गया था। जब एक युवा लड़के को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और उनके बारें मे पुछा गया तो, उन्होने कहा कि मेरा नाम ‘आजाद’ है, उनके पिता का नाम ‘स्वतंत्रत’ (स्वतंत्रता) है और उनका निवास स्थान ‘जेल’ है।

इस घटना के बाद “आजाद” उनके नाम का शीर्षक बन गया और उनका नाम चन्द्रशेखर तिवारी से ‘चन्द्रशेखर आजाद’ नाम से लोकप्रिय हो गये।

परिवार और प्रभाव

आजाद के पूर्वज मूल रुप से बदरका गांव के रहने वाले थे जो कि कानपुर मे स्थित है, और इन दिनों उन्नाव जिले मे रायबरेली रोड़ पर स्थित है। उनका जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के बहरा गांव मे हुआ था। उनकी माता का नाम जगरानी देवी तिवारी था, जो कि सीताराम तिवारी की तीसरी पत्नी थी।

इनका परिवार पहले कानपुर के बदरका गांव मे रहता था लेकिन अपने पहले बच्चे सुखदेव (आजाद के बड़े भाई) के जन्म के बाद इनका परिवार अलीराजपुर चला गया।

चन्द्रशेखर आजाद की मां चाहती थी कि वो संस्कृत के विद्वान बने। इसी कारण उन्होने उन्हे बनारस जो कि वर्तमान समय मे वाराणसी के काशी विद्यापीठ मे भेजा दिया था। सन 1921 मे जब वे वाराणसी मे पढ़ रहे थे, उसी समय गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाया और युवाओं से बड़ी संख्या मे इसमें भाग लेने की अपील की।

आजाद इस आंदोलन से काफी प्रभावित थे और उन्होने पूरे जोश और उत्साह के साथ इसमे भाग लिया। सक्रिय रुप से इस आंदोलन मे भाग लेने के लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। जब गांधी जी ने 1922 में चौरी-चौरा घटना के मद्देनजर असहयोग आंदोलन की समाप्ति की घोषणा की तो चन्द्रशेखर आजाद खुश नही थे और वहां से उन्होने क्रांतिकारी दृष्टिकोण को अपनाने का फैसला किया।

क्रांतिकारी गतिविधियां

असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद चन्द्रशेखर आजाद राम प्रसाद विस्मिल के संपर्क मे आएं, जो कि हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए.) के संस्थापक थे, जो कि क्रांतिकारी गतिविधियों मे शामिल थे। आगे चलकर एच.आर.ए. हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.एस.आर.ए.) के नाम मे परिवर्तित हो गया।

चन्द्रशेखर आजाद ब्रिटिश शासन के कई नियमों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों मे शामिल थे। काकोरी ट्रेन डकैती जिसमें की ब्रिटिश सरकार के खजाने को ले जाया जा रहा था वो इस के मुख्य आरोपी थे। जो कि अंग्रेजो के द्वारा ले जा रहे धन को एच.आर.ए. की क्रांतिकारी गतिविधियों के फंडिंग के लिए लुट लिया गया था।

वह भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन को ले जा रही ट्रेन को बम्ब धमाके मे उड़ाने की कोशिश मे भी शामिल थे, लेकिन ट्रेन पटरी से उतर गयी और वायसराय घायल होकर अचेत हो गया था।

चन्द्रशेखर आजाद ने भगत सिहं और राजगुरु के साथ मिलकर लाहौर जो इन दिनों पाकिस्तान मे है एक परीविक्षाधिन पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या मे भी शामिल थे। पुलिस द्वारा की गई लाला लाजपत राय की हत्या की मौत का बदला लेने के लिए यह साजिश रची गयी थी।

मृत्यु और विरासत

27 फरवरी 1931 को उत्तर प्रदेश के इलहाबाद मे अल्फ्रेड पार्क मे आजाद का निधन हुआ। स्वतंत्रता के बाद इसका नाम बदल कर ‘आजाद पार्क’ कर दिया गया। एक दिन पार्क मे आजाद और उसके एक साथी सुखदेव राज पार्क मे छुपे थे। एक पुराने निपुण साथी ने गद्दारी की और उसने इसकी सूचना पुलिस को दे दी।

आजाद एक पेड़ के पिछे छिपकर पुलिस को अपनी कोल्ट पिस्तौल से जबाबी कार्यवाही करने लगे। उन्होने सुखदेव राज को वहां से भगा दिया। जब उनके पास केवल एक गोली बची, तो आजाद ने खुद को गोली मार ली और शहीद हो गये।

निष्कर्ष

अपने राष्ट्र को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिए उन्होने एक राष्ट्र सेवक की तरह जीवन को व्यतीत किया। बहुत कम ऐसे लोग थे जो चन्द्रशेखर आजाद की तरह साहसी और निडर हुए।