संत रविदास जयंती

प्रत्येक वर्ष माघ पुर्णिमा के दिन संत रविदास के भक्तों तथा अनुनायियों द्वारा बड़े ही धूम-धाम से संत रविदास जयंती का उत्सव मनाया जाता है। संत रविदास ऐसे महान संतो  में से थे, जिन्होंने समाज में फैली बुराइयों को दूर करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। संत रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा, रविवार के दिन संवत 1433 में काशी (वर्तमान का वाराणसी) में हुआ था।

अपने साधारण वाक्यों और दोहों से उन्होंने समाज को कई महत्वपूर्ण संदेश दिये। वह बहुत ही साधरण शब्दों में लोगो को बहुत ही गंभीर बाते समझा दिया करते थे। उनके इसी मधुर वाणी और ज्ञान भरे वचनों को सुनने के लिए उनके आस-पास लोगो का तांता लगा रहता था।

समाज में सुधार और लोगो को भाई-चारा तथा मानवता का संदेश देने के इन्हीं कारणों से आज भी लोगो द्वारा उन्हें याद किया जाता है और उनकी याद में उनकी जयंती को पूरे देश भर में काफी भव्यता के साथ मनाया जाता है।

संत रविदास जयंती 2019 (Sant Ravidas Jayanti 2019)

वर्ष 2019 में संत रविदास जयंती 19 फरवरी, मंगलवार के दिन मनाया गया।

संत रविदास जयंती के शुभ अवसर पर देश भर में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इसका सबसे भव्य आयोजन संत रविदास के जन्म स्थली वाराणसी में देखने को मिला, जहां सीर गोवर्धन में स्थित संत रविदास मंदिर को काफी भव्य रुप से सजाया गया।

उनके जन्म दिवस के दिन वाराणसी के सीर गोवर्धन स्थित संत रविदास मंदिर में काफी भीड़ देखने को मिलती है और उनके अनुयायी दूर-दूर से उनके इस पवित्र स्थान पर दर्शन के लिए आते हैं।

इस वर्ष यह आयोजन और भी खास था क्योंकि इस बार माघ पूर्णिमा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संत रविदास के दर्शन करने के लिए वाराणसी के सीर गोर्वधन स्थित मंदिर पहुंचे। इस दौरान लगभग 2000 अन्य रैदास भक्त भी इस पवित्र स्थान दर्शन के लिए आये थे।

संत रविदास का इतिहास (जीवन परिचय)

संत रविदास या फिर जिन्हें गुरु रविदास या रैदास के नाम से भी जाना जाता है, उनका जन्म सन् 1433 में माघ पूर्णिमा के दिन काशी (वर्तमान में वाराणसी) के सीर गोवर्धन क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता का नाम राघवदास था तथा उनकी माता का नाम घुरबिनिया था।

जैसा कि उस समय का रिवाज था उनकी शादी भी काफी कम उम्र में कर दी गयी थी और उनकी पत्नी का नाम लोना था। उनकी पत्नी से उन्हें एक बेटे तथा एक बेटी की प्राप्ति हुई। उनके बेटे का नाम विजयदास था और पुत्री का नाम रविदासिनी था।

उन्होंने अपने समय समाज में फैली तमाम बुराइयों को दूर करने का बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया था। संत रविदास बचपन से ही एक प्रतिभाशाली और मधुर वाणी वाले एक व्यक्ति थे। उनके पिता का जूते बनाने का व्यवसाय था और संत रविदास अपने पिता का इस कार्य में हांथ बटाने का कार्य किया करते थे। उन्हें साधु-संतों की सेवा करने और लोगो की सहायता करने में विशेष आनंद प्राप्त होता था।

जब भी वह किसी साधु या फकीर को नंगे पैर देखते तो कई बार उनसे बिना पैसे लिए ही उन्हें नये जूते-चप्पल दे देते थे। इस कारण से उन्हें कई बार अपने पिता के प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ता था, लेकिन संत रविदास कभी भी लोगो की सहायता करने से पीछे नही हटते थे।

उनके इन कार्यों से नाराज होकर उनके पिता ने उन्हें घर से भी निकाल दिया था, लेकिन उन्होंने हार नही मानी और अपनी स्वंय की कुटिया बनाकर जूते-चप्पल के मरम्मत कार्य करने लगे, कार्य के बाद वह अपने शेष समय को साधु-संतों के संगत में बिताना काफी पसंद करते थे। वह जातिगत भेदभाव और छुआछुत के घोर विरोधी थे, उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति एक ही ईश्वर की संतान है, इसलिए हममें कोई भेद नही हो सकता और हम सभी एक समान हैं।

 

कई सारी ऐतहासिक मान्यताओं के अनुसार एक बार रविदास और कबीरदास जी के मध्य ज्ञान गोष्ठी हुई थी। इसके बाद संत रविदास जी कबीरदास जी से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गये। उन्होंने लोगो को समाज में फैली तमाम तरह की बुराईयों से लड़ने की प्रेरणा दी और उन्हें बताया कि जातिगत रुप से किये जाने वाले यह भेदभाव और ईश्वर भक्ति के नाम पर किये जाने वाले तमाम तरह के आडंबर को निरर्थक बताया। उनका मानना था कि यदि व्यक्ति के मन में सच्ची श्रद्धा हो तो उसे मात्र समाज को दिखाने के लिए कोई कार्य करने की आवश्यकता नही है।

इस विषय में एक घटना काफी प्रसिद्ध है, एक बार त्योहार के अवसर पर उनके आस-पड़ोस के लोगो गंगा स्नान पर जा रहे थे। इसपर संत रैदास के शिष्यों ने उनसे भी गंगा स्नान के लिए चलने के लिए कहा, इसपर उन्होंने कहा कि गंगा स्नान के लिए जाने पर भी मेरा मन यही लगा रहेगा तो भला गंगा स्नान का पुण्य कहा प्राप्त होगा।

कोई कार्य पूरे मन से करने पर ही वह कार्य करना उचित है अन्यथा उसका कोई अर्थ नही है। यदि मन शुद्ध हो तो इस कठौते के जल में स्नान करने से भी गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। तभी से लोगो के बीच उनकी यह प्रसिद्ध कहावत प्रचलित हो गयी कि-

मन चंगा तो कठौती में गंगा।

उनके इन्हीं बातों को सुनने के लिए लोग सदैव उत्सुक रहा करते थे और उनके विरोधी भी उनकी व्यवहारिक बातों की तारीफ करने से खुद को नही रोक पाते थे। उनके इन्हीं महान कार्यों के कारण आज भी लोगो द्वारा याद किया जाता है और उनकी स्मृति में उनकी जयंती को इतने धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

रविदास जयंती क्यों मनाई जाती है?

काशी में जन्में संत रविदास या फिर जिन्हें लोग रैदास के नाम से भी पुकारते है ने अपने जीवन भर लोगो को भाई-चारे तथा प्रेम की शिक्षा देने का कार्य किया और लोगो द्वारा जाति, धर्म तथा ईश्वर के नाम पर की जाने वाली हिंसा को निरर्थक बताया। उन्होंने लोगो को बताया कि चाहे वह वेद-पुराण हो या कुराण सब एक ही सर्वशक्तिमान ईश्वर का गुणगान करते हैं। उनकी बातों का सुनने वालों पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता था क्योंकि उनकी बाते सच्चाई और तर्कों को बहुत ही साधरणता से समझाने का कार्य करती थी।

 

अपने कार्यों, वचनों और जीवन से संत रविदास ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि कोई मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर श्रेष्ठ नही होता है बल्कि की उसके विचार, परोपकार हेतु किये गये कार्य और सदव्यवहार उसे श्रेष्ठ और महान बनाते हैं। उनके इन विचारों ने उनके बाद के बहुत से समाज सुधारकों तथा पंथ निर्माताओं के लिए आधार स्तंभ का कार्य किया।

उनकी इन्ही मानवतावादी विचारों से प्रेरित होकर सिख धर्म के पाचवें गुरु अर्जुन सिंह देव जी ने गुरु ग्रंथ साहब में संत रविदास जी के 40 पदो को जोड़ा। यहीं कारण है कि आज भी समाज के सभी वर्गों द्वारा संत रविदास का इतना सम्मान किया जाता है और लोगो द्वारा उनके जयंती को इनने धूम-धाम तथा उत्साह के साथ मनाया जाता है।

रविदास जयंती कैसे मनाई जाती है?

संत रविदास जयंती को पूरे देश भर में काफी धूम-धाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन पूरे देश भर में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसका सबसे भव्य आयोजन माघ पूर्णिमा के दिन वाराणसी के सीर गोवर्धन में देखने को मिलता है। जहा उनके अनुयायियों जिन्हें ‘रैदसिया’ के नाम से भी जाना जाता है, उनके द्वारा लंगर तथा अन्य कई प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

इस दौरान वाराणसी स्थित इस संत रविदास मंदिर को काफी भव्य रुप से साजाया जाता है। झालरों तथा प्रकाश द्वारा यह पुरा मंदिर जगमगा उठता है और इस पूरे स्थान की भव्यता देखते बनती है।

इस दिन देशभर में संत रविदास को समर्पित आरती और किर्तन आयोजित किये जाते हैं। संत रविदास जयंती के दिन रैदसिया पंथ के अनुयायियों द्वारा उनका स्मरण करते हुए पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है। इस दिन कई गुरुद्वारों में ‘शबद कीर्तन’ और ‘नगर कीर्तन’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।

अपने मधुर वचनों और मानवतावादी शिक्षाओं के कारण संत रविदास हर धर्म के लोगो में काफी प्रसिद्ध हैं। यहीं कारण है कि उनकी जयंती को हर धर्म के लोग मिलकर मनाते हैं।

संत रविदास जी के प्रसिद्ध दोहे

वैसे तो संत रविदास के जी का हर एक वचन अनमोल है और लोगो के लिये ज्ञान का स्त्रोत है। लेकिन उनके द्वारा रचित कई ऐसे दोहे हैं जो समाज से कुरुतियों और आडंबरों को हटाने का सदेंश देते हैं। उनके इन्ही दोहों में से कुछ को नीचे प्रस्तुत किया गया है।

1.जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।

रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

2.रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।

तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

3.वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।

सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

4. मन चंगा तो कठौती में गंगा।।

5. कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।

तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।