राष्ट्रीय एकता

एकता का मतलब यह कतई नहीं है कि देश में किसी भी मुद्दे पर जनता के बीच कोई मतभेद नहीं है, बल्कि मतभेदों के बावजूद, देश हित में सभी लोग अगर एक जैसी सोच अपना लेते हैं तो हैं यह एकता कहलाता है। राष्ट्रीय एकता सभी नागरिकों में देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देता है और वे पहले खुद को भारत के नागरिक के रूप में मानते हैं और उसके बाद ही हिंदू, मुस्लिम या अन्य धार्मिक भावनाओं को मान्यता देते हैं।

विचारों और मान्यताओं में मतभेद के बावजूद, अगर एक देश के सभी लोग आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे की भावना से जुड़े होते हैं तो इसकी एकमात्र वजह राष्ट्रीय एकता ही है। राष्ट्रीय एकता एक ऐसी भावना है जो एक राष्ट्र के लोगों के बीच एकता या देशभक्ति को दर्शाता है। यह एक देश के नागरिकों के बीच एक आम पहचान को बढ़ावा देता है जिससे सभी नागरिक आपस में एकता का अनुभव करते हैं।

राष्ट्रीय एकता देश को मजबूत और संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, जातियों, पोशाकों, सभ्यताओं और संस्कृतियों के लोगों को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य राष्ट्रीय एकता की वजह से ही संभव हो पाता है और आपस में कई मतभेदों के बावजूद, सभी लोग एक दूसरे के साथ आपसी सद्भाव में रहते हैं।

भारत राष्ट्रीय एकता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। बहुत कम देशों में हमारे देश जैसी विविधता विविधता है। यहां विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग हैं, जिनकी जीवनशैली, संस्कृति, भाषाएं और रीति-रिवाज पूरी तरह से अलग हैं लेकिन फिर भी सभी लोग एक साथ रहते हैं क्योंकि सभी लोग राष्ट्रीय एकता के सूत्र से बंधे हैं।

राष्ट्रीय एकता बनाम पृथक्करण

एकता द्वारा देश में दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित होती है। यह एक संगठन या समाज की उत्कृष्टता के लिए आवश्यक है जिसके बिना किसी भी संगठन या समाज का कल्याण संभव नहीं है। एकता के बिना कोई भी समाज आदर्श समाज का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकता है। एकता जहां एक समाज या देश को एकजुट करती है वहीं पृथक्करण या विघटन समाज के लिए विनाशकारी है।

विघटनकारी शक्तियों द्वारा समाज विभाजित हो जाता है जबकि एकता भावनात्मक स्तर पर लोगों को जोड़ कर रखता है और समाज और देश को उपलब्धियों के शिखर पर ले जाता है, वहीं दूसरी ओर आपसी असामंजस्य समाज को विनाश की ओर ले जाता है। कई पतले धागे अगर एक साथ मिल जाएं तो वे एक जिद्दी और शक्तिशाली जानवर को भी बाँध सकते हैं लेकिन यदि वही धागे अलग-अलग हों तो वे पुआल बांधने में भी असमर्थ होते हैं। दूसरे शब्दों में अगर हम कहें तो 5 संगठित लोग 500 अव्यवस्थित या असंगठित लोगों से बेहतर होते हैं। किसी संगठन का हिस्सा बनना हमेशा अच्छा होता है क्योंकि संगठन प्रगति का एक प्रतीक है और इसी तरह जिस घर में एकता होती है वह हमेशा शांति और खुशियों से भरा-पूरा होता है। यहां तक कि अगर कोई व्यक्ति गरीब भी हो है, लेकिन यदि वह अपने परिवार या संगठन में एकजुट होकर रहता है तो वह कभी नाखुश नहीं हो सकता। लेकिन जिस घर में विघटनकारी स्थितियां बनी रहती है तो उस घर के लोग बुरी स्थिति में ही रहते हैं, चाहे उनके पास कितना भी धन जमा हो।

भारत : एकता की गहरी जड़ें

हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों का देश है और इसी वजह से पूरी दुनिया में इसकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद, भारतीय लोगों ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बरकरार रखने में कामयाबी हासिल की है।

भारत विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और समुदायों का संगम है और यह सभी धर्मों और संप्रदायों को समान दर्जा देता है। इसी वजह से विविधताओं के बावजूद, देश के नागरिकों में सदियों से एकता की भावना है। हमने हमेशा एक उदार दृष्टिकोण अपनाया है और हम सच्चाई और अहिंसा का सम्मान करते हैं।

भारत की बहुरंगीय और बहुस्तरीय लोकाचार उसकी जातीय, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता में निहित है। दुनिया में कोई भी अन्य देश इतने वृहत स्तर पर रचनात्मक, संस्कृतिक धार्मिक, जातिगत एवं भाषाओं एवं बोलियों की विविधता पेश नहीं करता। भारत एशिया में दूसरा एवं विश्व में सातवां सबसे बड़ा देश है और साथ ही, पूरी दुनिया में यह दूसरा सबसे बड़ी आबादी वाला देश है।

2500 ईसा पूर्व से एक संपन्न सभ्यता के रूप में भारत विभिन्न धर्मों, पंथों, आस्थाओं एवं मतावलंबियों के एक अद्भुत संगम का प्रतिनिधित्व करता है। दुनिया के सभी प्रमुख धर्म – हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, इस्लाम एवं उनके संप्रदायों सहित ईसाई धर्म - पूरी स्वतंत्रता के साथ भारत में पाए जाते हैं। भारत प्राचीन काल से ही स्थापित सर्व धर्म समभाव (सभी आस्था पद्धतियों के लिए समान सम्मान) के आदर्श का अनुकरण करता है। इसने न सिर्फ सभी धर्मों और मान्यताओं के प्रति सहिष्णुता की अनुमति दी है, बल्कि उन्हें अपने विचारों एवं दर्शन को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता भी प्रदान की है।

हिंदू धर्म सिर्फ एक धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करता है बल्कि यह कई पंथों एवं मान्यताओं का समन्वय है जो आगे कई जातियों, संप्रदायों और उप-संप्रदायों में विभाजित हैं।

इस प्रकार एक बहुलवादी समाज में अलग-अलग धर्मों एवं पंथों को भारत द्वारा प्रदत्त अनोखे अनुभव के साथ समृद्ध होने का अवसर प्राप्त होता है। इस वजह से यहां न केवल विभिन्न धर्मों और धर्मों के बारे में सीखने के महान केंद्रों का निर्माण हुआ है बल्कि विभिन्न किंवदंतियों, धार्मिक महापुरूषों, पवित्र मंदिरों और तीर्थयात्राओं के बारे में जानने के भी भरपूर अवसर यहां उपलब्ध हैं। वे केवल एक क्षेत्र या राज्य तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में फैले हुए हैं और पूरी दुनिया के लगभग सभी प्रमुख धर्मों के अनुयायियों के लिए तीर्थस्थल के रूप में भारत ने एक अनोखी उपलब्धि अर्जित की है।

राष्ट्रीय एकता का महत्व

एकता की ताकत द्वारा ही राष्ट्रों का निर्माण होता है। अपनी आबादी के प्रत्येक अनुभागों में एकता के बिना, कोई भी देश प्रगति नहीं कर सकता। एकता में महान शक्ति है, यहां तक कि एक मजबूत दुश्मन को भी एकता की ताकत द्वारा हराया जा सकता है।

विभाजित लोग एवं विखंडित समाज आसानी से बिखर जाते हैं। विघटनकारी परिस्थितियों में कभी उन्नति नहीं हो सकती बल्कि विघटन द्वारा केवल क्षय एवं अवनति ही होती है। वह समाज जो संगठित है और एकता के सूत्र में बंधा हुआ है उसे कभी भी पराजित नहीं किया जा सकता क्योंकि एकता अपने-आप में सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन जिस किसी समाज में बिखराव की स्थितियां हों तो वह आसानी से किसी भी हमले का शिकार हो जाता है। एक छोटा सा संगठित समाज एक बहुत बड़े विघटित समाज से बेहतर है। यदि हम एक आदर्श समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें एकता के रास्ते पर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय एकता की शुरूआत घर से ही होती है

राष्ट्रीय एकता पर चर्चा से पहले परिवार में एकता की आवश्यकता है। जब तक घरों में एकता नहीं होता, समाज, राष्ट्र और विश्व में एकता करना संभव नहीं है। केवल एकता द्वारा ही समाज को विकसित किया जा सकता है। एकता समाज में संगठन की भावना पैदा होती है जिससे स्थायी शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।

जब तक घरों एवं समाज में एकता मजबूत होता है, राष्ट्र भी मजबूत बना रहता है। इन परिस्थितियों में बाहरी शक्तियां, देश की अखंडता और संप्रभुता पर असर डालने में विफल रहती हैं। लेकिन जब भी राष्ट्रीय एकता कमजोर हो जाता है तो राष्ट्र को संकट की स्थिति का सामना करना पड़ता है। यदि हम अपने देश के इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तो हम पाते हैं कि जब भी हमारे देश में राष्ट्रीय एकता कमजोर हुआ है, हर बार बाहरी ताकतों ने उसका लाभ उठाया है और हमें उनके अधीन होना पड़ा है।

भारत में राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता

किसी भी देश के लिए राष्ट्रीय एकता आवश्यक है। भारत जैसे एक असीम असमानताओं से भरे देश में एकता लोगों को जोड़ने वाले कारक के रूप में काम करता है। पिछले कुछ वर्षों से, पाकिस्तान हिंदू-मुस्लिम मतभेद बढ़ाते हुए एवं कश्मीर में भारत विरोधी भावनाओं एवं उग्रवाद को उकसाते हुए राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। इन्हीं विभाजनकारी नीतियों द्वारा अंग्रेजों ने सैकड़ों वर्षों तक भारत पर शासन किया। लेकिन जब भारत के लोगों ने अपने सभी मतभेदों को भूल कर "भारतीयता" का प्रदर्शन किया, तो अंग्रेजों को भारत से वापस जाना पड़ा।

लोकतंत्र की स्थिरता, स्वतंत्रता की रक्षा एवं राष्ट्र के समग्र विकास के लिए राष्ट्रीय एकता और एकता निश्चित रूप से आवश्यक है। जब तक पूरा राष्ट्र एकता की भावना को अपनाने का प्रयास नहीं करता तब तक देश में कोई विकास या आर्थिक प्रगति नहीं होगी। इसलिए देश के हर नागरिक का यह कर्तव्य है वे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए हमें एक मजबूत राष्ट्र बनने की आवश्यकता है और इसलिए, हमें जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्म इत्यादि से संबंधित तुच्छ विचारों से दूर रहते हुए विघटनकारी शक्तियों का दमन करना चाहिए।

 

भारत में राष्ट्रीय एकता की राह में चुनौतियां

प्राचीन काल में, भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों को आसानी से आत्मसात कर लेती थी, लेकिन अब यह विशेषता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। नतीजतन, एक राज्य के निवासी कभी-कभी अन्य राज्यों के लोगों के रिवाज, परंपराओं और भाषाओं के लिए सहिष्णुता दिखाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। संस्कृति की संकीर्णता के साथ-साथ विघटनकारी ताकतों की इतनी वृद्धि हुई है कि देश में राष्ट्रीय एकता अब एक जटिल समस्या का रूप ले चुकी है।

इस समस्या को हल करने के लिए, हमें राष्ट्रीय एकता और एकता के रास्ते की सभी बाधाओं को दूर करना होगा। भारत में राष्ट्रीय एकता के लिए निम्नलिखित चुनौतियां हैं -

  1. जातिवाद - राष्ट्रीय एकता के मार्ग में जातिवाद एक बड़ी बाधा है। भारत में विभिन्न धर्मों और जातियों से संबंधित निवासियों में जबर्दस्त मतभेद पाए जाते हैं। यहां एक जाति या धर्म के अनुयायी खुद को अन्य धर्मों या जातियों में विश्वास करने वाले लोगों से श्रेष्ठ मानते हैं। ये प्रवृत्तियां कभी-कभी इतनी संकीर्ण हो जाती हैं और बदसूरत रूप अख्तियार कर लेती हैं कि लोग राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक व्यापक दृष्टिकोण को अपनाने में असमर्थ हो जाते हैं।
  2. सांप्रदायिकता - यह राष्ट्रीय एकता के रास्ते में एक बड़ी बाधा है। हमारे देश में विभिन्न धर्मों के अनुयायी हैं जैसे कि हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म आदि। आम तौर पर यहां सभी नागरिक एक-दूसरे के साथ सामंजस्य की भावना में रहते हैं, लेकिन कई बार निहित स्वार्थों की वजह से आपसी दुश्मनी और नफरत की भावना पैदा हो जाती है जिससे सांप्रदायिक संघर्ष शुरू हो जाते हैं। राष्ट्रीय एकता को बरकरार रखने के लिए हमें सांप्रदायिक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा।
  3. प्रांतीयवाद- प्रांतीयवाद भी भारत की राष्ट्रीय एकता के रास्ते में एक बड़ी बाधा है। एक ओर भाषा के आधार पर नए राज्यों के निर्माण के लिए संघर्ष की प्रवृत्ति बढ़ रही है तो दूसरी ओर प्रत्येक राज्य केंद्र में एक नियंत्रित हिस्सेदारी लेना चाहता है। देश के विभिन्न राज्यों में प्रांतीयवाद की संकीर्ण भावना राज्यों के बीच परस्पर दुश्मनी बढ़ा रही है।
  4. विभिन्न राजनीतिक दल- लोकतंत्र में, जनता की राय और राजनीतिक चेतना के निर्माण के लिए राजनीतिक दलों का होना आवश्यक है। यही वजह है कि आजादी के बाद हमारे देश में विभिन्न पार्टियां बनाई गईं। दुर्भाग्य से, ऐसी भी कई पार्टियां हैं जो जाति, धर्म, पंथ और क्षेत्र के आधार पर सार्वजनिक और राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर रहे हैं। एक तरह से वे राष्ट्रीय विघटन के काम में लगे हुए हैं।
  5. भाषाई अंतर- भारत जैसे एक विशाल देश में, एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा की आवश्यकता है जिसे सभी क्षेत्रों में बोला और समझा जा सके। लेकिन संकीर्ण क्षेत्रीय विचारों के कारण, हिंदी या किसी भी अन्य भाषा को अब तक देश के सभी लोगों द्वारा संवाद के माध्यम के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। भाषाई पहचान पर हो रही राजनीति भी लोगों को भाषा से संबंधित मतभेदों से ऊपर उठने की इजाजत नहीं दे रही है।
  6. आर्थिक असमानता- हमारे देश में बड़े पैमाने पर सामाजिक एवं आर्थिक विविधता का बोल-बाला है और देश में केवल मुट्ठी भर लोग ही समृद्ध हैं। देश में ज्यादातर लोग गरीब हैं और गरीबों के लिए आजीविका कमाना ही सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है जिसे हल करने में वे इतने व्यस्त रहते हैं कि वे राष्ट्रीय एकता के बारे में सोचने में पूरी तरह असमर्थ हैं। इस प्रकार आर्थिक असमानता और राष्ट्रीय एकता एवं एकता के रास्ते में एक बड़ी बाधा है।

निष्कर्ष:

भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जो वर्षों तक गुलामी का शिकार रहा है, यह आवश्यक है कि सांप्रदायिकता, जातिवाद और क्षेत्रीयवाद जैसे खतरों से बचने के लिए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना बेहद आवश्यक है। ये अलगाववादी प्रवृत्तियां राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती हैं और इससे रक्तपात, नरसंहार और दंगों आदि की स्थितियां उत्पन्न होती हैं।

बाहरी तत्वों के अलावा, बाहरी ताकतें भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं। जो लोग किसी देश की स्वतंत्रता एवं प्रगति से घृणा करते हैं वे हमेशा उस देश को विभाजित और विघटित करने का प्रयास करते हैं। ठीक इसी प्रकार कश्मीर में फल-फूल रहा उग्रवाद बाहरी ताकतों द्वारा प्रायोजित एवं समर्थित है। कश्मीर एवं उत्तर-पूर्व भारत में लंबे समय से जारी उथल-पुथल की स्थितियों ने इन क्षेत्रों के गुमराह युवकों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग कर दिया है।

जब इन विघटनकारी तत्वों की संख्या एवं इनकी शक्तियां अधिक हो जाती हैं तो वे पूर्ण रूप से अलगाव का प्रयास करते हैं। भारत एक विशाल भौगोलिक विविधता वाला देश है जहां कई धर्म, जाति, जनजाति और संप्रदाय के लोग रहते हैं। ये विविधताएं जो हमारी साझा संस्कृति का गौरव है, जब निहित स्वार्थों से विकृत हो जाते हैं, तो राष्ट्रीय एकता और एकता के लिए बाधा उत्पन्न करते हैं।

राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए, राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक सभी तत्वों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है जैसे कि भारतीय संविधान, हमारे राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रीय त्योहार, राष्ट्रीय गान और सामाजिक सामंजस्य इत्यादि। राष्ट्रीय आजादी और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि हम उन महान देशभक्तों की कहानियों को याद रखें जिन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता एवं संप्रभुता बनाए रखने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया है। महान देशभक्तों के आदर्शों एवं उनके द्वारा सुझाए गए मार्ग पर चलने से राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलता है।

Archana Singh

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