सदाचरण पर निबंध

सदाचरण संस्कृत के सत् और आचरण से मिल कर बना है, जिसका अर्थ होता है सज्जनों जैसा आचरण या व्यवहार। एक व्यक्ति अज्ञानी होने के बाद भी सदाचारी हो सकता है। और कभी-कभी व्यक्ति प्रकांड विद्वान हो कर भी दुराचारी हो सकता है, जैसे रावण इतना ज्ञानी और शिव का सबसे बड़ा भक्त था, फिर भी माता सीता के अपहरण जैसा दुष्पाप किया, और दुराचारी कहलाया।

सदाचरण पर छोटे-बड़े निबंध (Short and Long Essay on Good Conduct in Hindi)

निबंध – 1 (300 शब्द)

परिचय

“अच्छे के साथ अच्छा बनें, बुरे के साथ बुरा नहीं। क्योकि हीरे को हीरे से तराशा जा सकता है पर कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं हो सकता।”

सदाचार अच्छे आचरण पर जोर देता है। सदाचारी होने के लिए चरित्र की पवित्रता का होना बहुत जरुरी होता है। शिष्टाचार और सदाचरण में थोड़ा फर्क होता है। सदाचार के अन्तर्गत शिष्टाचार आता है। शिष्टाचार हमारे बाहरी व्यक्तित्व का आइना होता है, जबकि सदाचार आत्मिक गुण होता है।

सदाचार का अर्थ

सदाचार का अर्थ है अच्छा नैतिक व्यवहार, व्यक्तिगत आचरण और चरित्र। दूसरे शब्दों में सदाचार, व्यवहार और कार्य करने का उचित और स्वीकृत तरीका है। सदाचार जीवन को सहज, आसान, सुखद और सार्थक बनाता है। मनुष्य भी एक जन्तु ही है, लेकिन यह सदाचरण ही है, जो उसे बाकी जन्तुओं से, अलग करता है।

सच्चरित्रता एक नैतिक गुण

सच्चरित्रता सदाचार का सबसे बड़ा गुण होता है। सदाचारी व्यक्ति का हर जगह गुणगान होता है। सच्चरित्र विशेषताएं ही मानव को सबसे अलग और श्रेष्ठ बनाती हैं। तर्क और नैतिक आचरण ही ऐसे गुण है, जो मनुष्यों को श्रेष्ठतम की श्रेणी में लाते हैं। तर्क और नैतिक निर्णय लेने की क्षमता जैसे असाधारण लक्षण केवल मनुष्यों में ही पाए जाते हैं।

समाज - एक स्रोत

सच्चरित्रता एक नैतिक गुण होता है। हम समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान, अनेक नैतिक मानदंडों और मानकों का अधिग्रहण कर सकते हैं। बच्चे समाज के अन्य सदस्यों के साथ बातचीत करते समय नैतिक मूल्यों का अनुकरण कर सीख सकते हैं। इसके अतिरिक्त रीति-रिवाज भी नैतिक आचरण का एक स्रोत है, जिसे समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान विकसित किया जा सकता है।

जन्मजात गुण

पियाजे, कोहलबर्ग आदि मनोवैज्ञानिकों के सिद्धांतों के अनुसार बच्चे नैतिक मानकों के साथ पैदा होते हैं और बड़े होने पर उन्हें विकसित करते हैं। ये वह नैतिक मूल्य होते हैं जो हमारे माता-पिता और परिवार से हमें विरासत में मिलते है।

निष्कर्ष

एक अच्छा आचरण या व्यवहार ही सदाचरण की श्रेणी में आता है। अच्छे आचरण से आप सबका मन मोह सकते हैं। शिष्टाचार, सदाचार से थोड़ा भिन्न होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि एक दुराचारी व्यक्ति भी शिष्ट आचरण कर सकता है, किन्तु एक सदाचारी मनुष्य कभी अशिष्ट नहीं हो सकता है और न ही दुराचार कर सकता है। प्रायः लोग इसे एक ही समझते हैं, और इसमें भेद नहीं कर पाते।

निबंध – 2 (400 शब्द)

परिचय

“इत्र से कपड़ों को महकाना कोई बड़ी बात नहीं,

मज़ा तो तब है जब आपके किरदार से खुशबू आये।”

अच्छे आचरण ही ऐसा हथियार है जिसके प्रयोग से हम इस दुनिया से जाने के बाद भी लोगों की यादों में हमेशा जीवित रहते है। मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है, और खाली हाथ ही चले जाना है। ये हमारे सत्कर्म और सदाचरण ही होते हैं जो हमें इस दुनिया में अमर करते हैं।

मानव जीवन में सदाचार का महत्व

मानव जीवन में सदाचार का बहुत महत्व होता है। इसमें सबसे प्रमुख, वाणी की मधुरता मायने रखती है। क्योंकि आप लाख दिल के अच्छे हों, लेकिन अगर आपकी भाषा अच्छी नहीं, तो सब किए-कराए पर पानी फिर जाता है। हमें कई बार लोगों की बहुत-सी बातें चुभती है, जिन्हें नज़रअन्दाज करना ही अच्छा माना जाता है।

संयम - सदाचार का गुण

अक्सर लोग हमारे साथ अच्छा आचरण नहीं करते। हमें शारीरिक और मानसिक यातना भी झेलनी पड़ सकती है, उस स्थिति में भी स्वयं पर संयम रखना सदाचरण कहलाता है।

सामाजिक नियम

हम मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अतः समाज के नियमों का पालन करना हमारा नैतिक एवं मौलिक कर्तव्य बनता है। हमने अक्सर बड़े-बुजुर्गों को ऐसा कहते सुना है कि, अगर समाज में रहना है तो सामाजिक नियमों को मानना ही पड़ता है।

सम्मान - संस्कार का अभिन्न अंग

सदाचरण हमें सबका सम्मान करना सिखाता है। इज्जत और सम्मान हर किसी को अच्छा लगता है। और यह हमारे संस्कार का अभिन्न हिस्सा भी है। बड़ों को ही नहीं वरन् छोटों को भी सम्मान देना चाहिए। क्योंकि अगर आप उनसें सम्मान की अपेक्षा रखते है तो आपको भी वही इज्जत उन्हें भी देनी होगी। सम्मान देने पर ही हमें भी सामने से सम्मान मिलता है। छोटों से तो विशेषकर अच्छे से बात करना चाहिए, क्योंकि वे बड़ो को देखकर ही अनुकरण करते है।

अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन की यात्रा बिना बाधा के निरंतर चलती रहे, तो उसके लिए हम जैसे व्यवहार की अपेक्षा स्वयं के लिए करते है, वैसा ही दूसरों के साथ भी करना चाहिए।

सनातन धर्म की सीख

सच बोलना चाहिए किन्तु अप्रिय सत्य नहीं, यही सनातन धर्म है। किसी को मन, वचन और कर्म से दुख नहीं पहुँचाना चाहिए। पुरुषों को पराई स्त्रियों को बुरी दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। उन्हें माता सरीखा आदर देना चाहिए। ये सभी सदाचरण की सूची में आता है।

निष्कर्ष

सदाचार से मनुष्य एक अच्छा इंसान बनता है। अपना पेट तो जानवर भी भर लेते हैं, किन्तु एक मनुष्य ही इस धरती पर ऐसा प्राणी होता है जो दूसरों के लिए जी सकता है। स्वयं से पहले दूसरों को वरीयता देना, सदाचरण के उल्लेखनीय गुणों में आता है। सदाचार को देवगुण कहा जाता है। कहते हैं कि एक सदाचारी पुरुष, शैतान को भी देवता बनाने की क्षमता रखता है।

निबंध – 3 (500 शब्द)

परिचय

“आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः”।।

“अर्थात पराई स्त्री को माता के समान और दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान मानना चाहिए।”

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि वही पुरुष सच्चरित्र होता है जो दूसरों की स्त्री को बुरी नज़र से न देखे। उसे पराई स्त्रियों को अपनी माता के समान आदर-सम्मान देना चाहिए। क्योंकि पराई औरतों पर बुरी नजर करने वालों का पतन निश्चित होता है। इसी तरह जो धन अपनी मेहनत से न कमाया गया हो, उसका भी हमारे लिए कोई मोल नहीं होना चाहिए। लेकिन आजकल इसका उल्टा ही होता है।

सदाचार ही जीवन है।

सदाचार अच्छे चरित्र और आचरण का अधिग्रहण और संवर्धन करता है। अच्छे शिष्टाचार को सीखने और आत्मसात करने के लिए बचपन सर्वश्रेष्ठ अवधि है। इन्हें खरीदा या स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। जीवन के प्रारंभिक वर्षों से ही सबको नैतिकता का ज्ञान दिया जाना चाहिए। बचपन से ही अच्छे आचरण, और व्यवहार को विकसित किया जाना चाहिए । यही कारण है कि सभी अच्छे स्कूलों में अच्छे आचरण सिखाने और सीखने पर इतना जोर दिया जाता है।

ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना - मनुष्य

मनुष्य सृष्टि का मुकुट और हर वस्तु का मापक है। भगवान ने उसे अपने बाद बनाया। मनुष्य तर्कसंगत, बुद्धिमान और सभ्य है। वह अकेले रोटी खाकर नहीं रहता। अच्छे आचार और व्यवहार जीवन में नया अध्याय और महत्व जोड़ते हैं। वह सामाजिक और नैतिक व्यवहार को सुखद और आकर्षक बनाने के लिए एक अच्छे स्नेहक की तरह काम करता है।

सदाचार - नैतिकता और अच्छे सामाजिक व्यवहार की नींव

एक अच्छे आचरण के माध्यम से हम अन्य लोगों के साथ सामाजिक सद्भाव, प्यार और दोस्ती को बढ़ावा दे सकते हैं। अच्छे शिष्टाचार हमें कई अनचाही और कड़वी स्थितियों से बचने में मदद करते हैं। सदाचार को नैतिकता और अच्छे सामाजिक व्यवहार की नींव के रूप में वर्णित किया जा सकता है।

सदाचार सफलता की कुंजी

सदाचार, सफलता की एक सुनिश्चित कुंजी है। यह एक मूल्यवान अस्त्र हैं। यह दोस्त बनाने, लोगों पर जीत हासिल करने और प्रशंसा पाने में मदद करता है। व्यापार और सेवा में सदाचार अति आवश्यक हैं। यदि कोई व्यवसायी असभ्य है तो वह व्यापार में लाभ खो सकता है।

इसी तरह एक डॉक्टर या वकील बत्तमीज और अशिष्ट नहीं हो सकते, अन्यथा वो अपने क्लाइंट गवां सकते हैं। एक बस-कंडक्टर, एक बुकिंग क्लर्क, रिसेप्शन काउंटर आदि जगहों पर बैठे आदमी का अच्छी तरह से व्यवहार करना अति आवश्यक है। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अच्छा व्यवहार नितांत आवश्यक होता है। तभी कारोबार समृध्द हो सकता है।

निष्कर्ष

दुराचार पशुता की निशानी होती है। चरित्रहीनता व्यक्ति को पतन के पथ पर ढकेलती है, और दुराचार का पथ प्रशस्त करती है। सदाचार का गुण एक दिन में नहीं पनप सकता। अतः बच्चों को जीवन के आरंभ से ही सदाचार की शिक्षा देना, शुरु कर देना चाहिए। बच्चों पर सर्वाधिक प्रभाव परिवार और माहौल का पड़ता है, जिसमें वो निवास करते है। वो कहते है न, चोर का बच्चा भी साधु के पास रहकर साधु बन सकता है, और साधु का बेटा चोर के साथ रहकर उसी के जैसा आचरण करने लगता है। साफ है, हम जैसे वातावरण में रहते हैं, वैसे ही बन जाते हैं।