क्या पोंगल एक धार्मिक त्योहार है पर निबंध

भारत धार्मिक और त्योहारों का देश है। यहां कई ऐसे त्योहार है जो पौराणिक मान्यताओं के आधार पर मनाएं जाते है। पौराणिक काल से ही लोग त्योहार के दिन को अपनी खुशी और अपनी परंपरा को दर्शाते आ रहें है। सभी अपने धर्म और अपनी मान्यताओं और परम्पराओं को आगे की पीढ़ियों को बताने के लिए और आगे चलकर इस परम्परा को निभाने का सन्देश त्योहार के रूप में दिया जाता है।

भारतीय परम्पराओं के अनुसार कई त्योहार भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार मनाये जाते है। इस प्रकार के त्योहारों का दिन तय होता है, पोंगल का त्योहार भी उनमें से एक है। इस निबंध में पोंगल के त्योहार पर विस्तार से चर्चा की गई हैं। उम्मीद है इससे आप सबको इस त्योहार के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त होगी।

क्या पोंगल एक धार्मिक त्योहार है पर दीर्घ निबंध (Long Essay on Is Pongal a Religious Festival in Hindi)

Long Essay – 1400 Words

परिचय

प्रचीन काल से ही भारत कृषि प्रधान देश रहा है। देश की अधिकांश जनता गावों में रहती है और वो अपनी खेती पर ही निर्भर रहते है। पोंगल का त्योहार मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय किसानों का प्रमुख त्योहार है। यह मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु और आंध्र-प्रदेश में मनाया जाता है। किसान फसल कटाई के बाद अपनी फसल का पहला अन्न भगवान को भेट के रूप में चढ़ाते हैं। फसलों से कई तरह के पकवान बनते हैं और भगवान को उसका भोग लगाते हैं।

पोंगल का अर्थ

पोंगल का अर्थ है परिपूर्ण। इसका मतलब है फसलों की कटाई के बाद किसानों के घर अन्न और खुशियों से भर जाते है। इसी दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाना आरम्भ करते है। यह प्रतिवर्ष मुख्य रूप से 14-15 जनवरी को मनाया जाता है। पारम्परिक रूप से पोंगल का त्यौहार चार दिन का मनाया जाता है।

उतर भारत में लोहड़ी और मकर संक्रांति की तरह ही पोंगल दक्षिण भारतीय किसानों का प्रमुख त्योहार है। पोंगल शब्द के एक मतलब है "उबाल"। इसका अर्थ है इस दिन किसान अन्न को अच्छी तरह उबाल कर या पका कर भगवान सूर्य को इसका भोग लगाते है। लोग विभिन्न तरह के पकवान भी भगवान को चढ़ाते है। खासतौर पर इस दिन भगवान सूर्य, इंद्र, प्रकृति और खेती में उपयोग आने वालें मवेशियों की पूजा की जाती है।

पोंगल की महत्त्व और विशेषता

पोंगल का त्योहार कोई धार्मिक उत्सव नहीं है। यह त्योहार मुख्य रूप से फसलों की अच्छी उपज के लिए मनाया जाता है। किसान फसलों की अच्छी उपज और आगामी फसलों की अच्छी पैदावार के लिए भगवान का धन्यवाद और उनसे प्रार्थना करते है।

पोंगल पर्व पर एक विशिष्ट प्रकार का भोजन जिसे हम पोंगल पकवान के नाम से भी जानते है, बनाया जाता है। चावल और गन्ने की अच्छी खेती होने पर मुख्य रूप से इस दिन नए चावल और गुड़ को दूध में मिलाकर अच्छी तरह उबाल कर पकाया जाता है। इसमें अनेक प्रकार के सूखे मेवे, काजू, इलायची इत्यादि मिलाकर पकाया जाता है और भगवान को इसका भोग लगाया जाता है। इसके साथ लोग अन्य प्रकार के पकवान भी बनाते है। इस पकवान को लोग सामूहिक रूप में मिलकर पकाते हुए देखा जा सकता है। यह पकवान खासतौर से मिट्टी के बर्तनों में मंदिरों या उसके आसपास के प्रांगण में महिलाओं द्वारा मिलकर पकाया जाता है। इसके उपरांत सारा परिवार मिलकर भगवान को इसका भोग लगाते है और फिर प्रसाद के रूप में इसका वितरण करते है।

पोंगल का इतिहास

पोंगल परंपरा की शुरुआत मुख्यतः 200 बी.सी. वर्ष पहले की गई थी। पोंगल का त्योहार भारतीय इतिहास के द्रविड़ युग के शासन काल में इसकी शुरुआत की गई थी। परंपरा के अनुसार अविवाहित लड़कियों ने देश में अच्छी खेती और उपज के लिए महीने भर उपवास कर दूध से बनी चीजों का भोग भगवान को अर्पित करती थी, इसके साथ ही नव दुर्गा की भी पूजा की गई थी। इस दौरान अविवाहित कन्याएं दूध या उससे बनी चीजों का सेवन नहीं करती है। ये सब प्रथा आज भी चली आ रही है। इस प्रथा का उल्लेख तिरूपवई और मणिकावचकर के तिरुवेम्बवाई में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है।

पौराणिक कथाएं

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने अपने वाहक नंदी को धरती पर जाकर मनुष्यों को स्वस्थ रहने का सन्देश देने को कहा था। बसवा नामक नंदी को भगवान शिव ने लोगों को रोजाना स्नान और तेल-मालिश करने का सन्देश देने को कहा था। पर नंदी ने गलती से रोजाना स्नान न करने और महीने में एक बार भोजन करने को कहा। तब शिव क्रोधित होकर नंदी को श्राप दिया की तुम बैल बन खेती में अथवा उपज बढ़ाने में किसानों की मदद करोगे। तब से यह प्रथा चली आ रही है।

मानाने के विभिन्न तरीके

पोंगल का त्योहार एक दिन का नहीं बल्कि चार दिन तक मनाया जाता है। प्रत्येक दिन का अपना अलग महत्त्व होता है।

  • पहला दिन (भोगी पोंगल)

यह त्योहार का पहला दिन होता है, इसे हम “भोगी पोंगल” के नाम से जानते है। त्यौहार के आगमन की खुशी में लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते है और घर के द्वार और अंदर चावल के आटे से “कोल्लम” नामक रंगोली बनाकर उसे संजाते है। सफाई में निकले पुरानी और बेकार चीजों को रात में जलाते है और साथ ही बच्चे छोटे-छोटे ढोल पीटते है। इसे तमिल में ‘भोगी कुट्टू’ कहते है, यह भोगी इंद्र देव को समर्पित होता है। इंद्र वर्षा के देवता है, इसलिए साल भर अच्छी वर्षा और उससे अच्छी पैदावार के लिए उनसे प्रार्थना की जाती है।

  • दूसरा दिन (सूर्य पोंगल)

त्योहार का दूसरा दिन सूर्य पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भगवान सूर्य को समर्पित होता है। इस दिन नए मिट्टी के बर्तनों में बाहर दूध में मीठा पकवान तैयार कर सूर्य देव को भोग लगाया जाता है। दूध को मिट्टी के नए बर्तनों में उबाल कर उसमें चावल और गुड़ इत्यादि डाल कर हल्दी का पौधा उसके मुंह पर बांध कर इसे पकाया जाता है। दक्षिण भारत में हल्दी को बहुत ही शुभ माना जाता है। पकवान बनाते समय महिलायें भगवान का गीत गाती है जिससे की भगवन प्रसन्न होते है और अपनी कृपा किसानों पर बनाए रखते है।

  • तीसरा दिन (मट्टू पोंगल)

मट्टू पोंगल त्यौहार का तीसरा अहम् दिन होता है। इस दिन लोग अपने घर के मवेशियों जैसे गाय, बैल इत्यादि का खेती और घर में खुशहाली लाने का आभार प्रकट करते है। इस दिन लोग घर के गाय-बैलों को नहलाकर, उन्हें तेल लगा, उन्हें फूलों की माला पहना कर उनकी पूजा की जाती है। फिर बाद में उन्हें फल और भोजन अच्छे से खिलाया जाता है, और उनका आभार और धन्यवाद प्रकट किया जाता है।

  • चौथा दिन (कन्नुम पोंगल)

कन्नुम पोंगल त्यौहार का चौथा और आखिरी दिन होता है। इस दिन घर के सभी सदस्य और मेहमान एक साथ मिलकर खाना खाते है। ये खाना हल्दी के पत्तों को साफ कर सभी को उन पत्तों पर परोसा जाता है। पकवानों में खासतौर पर मिठाई, चावल, गन्ना, सुपारी इत्यादि भोजन परोसा जाता है।

इस दिन सभी छोटे अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेते है और बड़े उन्हें प्यार और उपहार देते है। बहनें अपने भाइयों की तेल और चुना पत्थर से उनकी आरती करती है और उनके लम्बी उम्र की कामना करती है। भाई भी अपनी बहनों के प्यार के रूप में उपहार और आशीर्वाद देते है।

बचे हुए खाने को हल्दी के पत्तों पर रख उन्हें बाहर पंछियों के खाने के लिए रख दिया जाता है। इस कार्य को “कानू पिंडी” कहते है।

पोंगल त्योहार का आकर्षण

पोंगल का त्योहार दक्षिण भारत में बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस त्योहार का मुख्य आकर्षण पोंगल पकवान के अलावा बैलों की दौड़ और युवाओं से लड़ाई प्रमुख आकर्षण है। इसे “जल्लीकट्टू” के नाम से जाना जाता है। देश-विदेश से लोग इस प्रथा को देखने आते है।

इसके अलावा पोंगल की पूजा बहुत भिन्न और प्रसिद्ध है जो अपनी सादगी और उसको मनाने के तरीकों के लिए प्रसिद्ध है।

क्या पोंगल एक धार्मिक पर्व है?

कोई भी धार्मिक पर्व वह पर्व होता है जिसका सम्बन्ध धर्म और आत्याधमिकता से होता है। पर पोंगल पूरी तरह से फसलों का एक प्रसिद्द त्यौहार है। इस त्योहार के साथ ही दिन-रात में परिवर्तन के साथ मौसम में भी परिवर्तन होता है, इसलिए इसे मौसमी त्योहार के रूप में भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इत्यादि जगहों पर बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है।

कहा जाता है की पोंगल पर्व के पीछे कोई धार्मिक-पौराणिक कथाएं नहीं है इसलिए हम इसे किसी धर्म से नहीं जोड़ सकते है। यह पर्व किसानों द्वारा उगाई गई अच्छी फसल के लिए प्रकृति और भगवान को अपने अनाज का पहले निवाला खिलने और उनका आशीर्वाद और धन्यवाद प्रकट करने के लिए यह त्योहार मनाया जाता है। अतः इस पर्व को हम धार्मिक पर्व नहीं बल्कि मौसमी त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

निष्कर्ष

पोंगल का यह त्योहार किसानों की मेहनत और लगन को दर्शाता है। किसानों के द्वारा उगाये गए फसलों का प्रकृति और भगवान को इस त्यौहार के जरिये धन्यवाद प्रकट किया जाता है। भोजन की समस्या किसानों के द्वारा ही हल की जाती है इसलिए उन्हें अन्नदाता कहा जाता है और किसान इसका श्रेय भगवान को देते है। यह त्यौहार एकता, मेहनत और किसानों के जूझने की क्षमता को दर्शाता है। यह त्योहार संस्कृति और परंपरा के लिए भी जाना जाता है।