भगवान बुध्द पर निबंध

भगवान बुध्द ईश्वर के अवतार माने जाते हैं। उनका जन्म दुनिया के कल्याण के लिए हुआ था। वो अत्यंत भावुक और संवेदनशील थे। वो किसी का दर्द नहीं देख पाते थे। इसलिए उनके पिता उन्हें संसार के सारे विलासिताओं में लगा कर रखते थे, फिर भी उनका मन सांसारिक मोह-माया में कहां लगने वाला था।

भगवान बुध्द पर छोटे-बड़े निबंध (Short and Long Essay on Lord Buddha in Hindi)

भगवान बुद्ध का जीवन - निबंध 1 (300 शब्द)

परिचय

“एशिया का प्रकाश” (लाइट ऑफ एशिया) के नाम से विख्यात गौतम बुद्ध का जन्म ही दीन-दुखियों के कल्याण के लिए हुआ था। बुद्ध (जिसे सिद्धार्थ गौतम के नाम से भी जाना जाता है), एक महान ज्ञानी, ध्यानी और आध्यात्मिक शिक्षक और गुरु थे, जो प्राचीन भारत (5वीं से 4वीं शताब्दी ई.पू.) में रहते थे। बौद्ध धर्म का विश्व भर में स्थापना और प्रचार-प्रसार उनके और उनके अनुयायियों के अथक प्रयासों से हुआ।

जन्म एवं जन्म स्थान

ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म छठी शताब्दी 563 ईसा पूर्व में नेपाली तराई के लुम्बिनी में हुआ था। बुद्ध बनने से पहले, उन्हें सिद्धार्थ कहा जाता था। उनके पिता का नाम शुद्दोधन था, जो कपिलवस्तु राज्य के शासक थे। उनकी माता का नाम माया देवी था, जो सिद्धार्थ के जन्म के तुरंत बाद मर गईं। उनका पालन-पोषण बड़े ही लाड-प्यार से उनकी विमाता गौतमी ने किया। जब गौतम का जन्म हुआ, तब एक भविष्यवाणी हुई थी, जिसमें कहा गया था कि "यह बच्चा एक महान राजा या महान शिक्षक या संत होगा।"

बाल्यकाल से ही अनोखे

वो बचपन से ही बाकी बच्चों से काफी अलग थे। वे दुनिया के सभी ऐसो-आराम के साथ एक सुंदर महल में रहते थे। लेकिन उनके पिता परेशान थे, क्योंकि गौतम अन्य राजकुमारों की तरह व्यवहार नहीं करते थे। उनका मन सांसारिक भोग-विलास से कोसो दूर रहता था। उनके शिक्षक आश्चर्यचकित होते थे, क्योंकि वह बिना पढ़ाए ही बहुत कुछ जानते थे।

अत्यंत दयालु सिद्धार्थ

वे शिकार करना पसंद नहीं करते थे। हालांकि वह हथियारों का उपयोग करने में बहुत माहिर और विशेषज्ञ थे। वे बहुत दयालु थे। एक बार उन्होंने एक हंस की जान बचाई जिसे उनके चचेरे भाई देवब्रत ने अपने बाणो से मार गिराया था। वह अपना समय अकेले चिंतन करने में व्यतीत किया करते थे। कभी-कभी, वह एक पेड़ के नीचे ध्यान में बैठ जाते थे। वह जीवन और मृत्यु के सवालों पर विचार करते रहते थे।

भगवान बुद्ध का विवाह एवं घर त्याग

भगवान बुद्ध का ध्यान हटाने के लिए उनके पिता ने उनका विवाह अत्यंत रुपवती राजकुमारी यशोधरा से कर दिया था। लेकिन पिता का लाखो प्रयास भी, उनके दिमाग को बदल नहीं सका। जल्द ही, उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ। वो इससे भी खुश नहीं हुए। तब उन्होंने दुनिया को छोड़ने का फैसला किया। एक अंधेरी रात, अपनी पत्नी और बेटे को अकेला सोता छोड़कर, गौतम ने अपना घर त्याग दिया और जंगल में चले गए।

निष्कर्ष

घर को छोड़ते ही वे दुनिया के सभी संबंधों से मुक्त हो गये। उस दिन से वह भिखारी की तरह रहने लगे। वह कई सवालों के जवाब जानना चाहते थे। वे वृद्धावस्था, बीमार शरीर और गरीबी को देखकर परेशान थे। ऐसी बातों ने उन्हें जीवन के सुखों से विचलित कर दिया था।

सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कैसे बने - निबंध 2 (400 शब्द)

परिचय

छठी शताब्दी से पहले, भारत में धर्म और वेदों की शिक्षाओं को भूला दिया गया था। हर जगह अराजकता ही अराजकता फैली थी। कपटी पुजारियों ने धर्म को व्यापार बना दिया था। धर्म के नाम पर लोगों ने क्रूर पुजारियों के नक्शेकदम पर चलते हुए निरर्थक कर्मकांड किए। उन्होंने निर्दोष गूंगे जानवरों को मार डाला और विभिन्न बलिदान किए। उस समय देश को बुध्द जैसे धर्म-सुधारक की ही आवश्यकता थी। ऐसे समय में, जब हर जगह क्रूरता, पतन और अधर्म था, लोगों को बचाने और समानता, एकता और लौकिक प्रेम के संदेश को हर जगह प्रचारित करने के लिए सुधारक बुध्द का जन्म किसी अवतार से कम न था।

अत्यंत संवेदनशील

वह एक बहुत ही संवेदनशील युवक थे, जिसका दूसरों के कल्याण कार्य में बहुत मन लगता था। उनके पिता ने उन्हें महल के शानदार जीवन में उलझाये रखने की पूरी कोशिश की। वह नहीं चाहते थे कि युवा सिद्धार्थ बाहर जाएं और दुनिया का दुख देखें। लेकिन इतिहास हमें बताता है कि युवा सिद्धार्थ अपने सारथी, चन्ना के साथ तीन अवसरों पर बाहर गए थे और जीवन का कटु सत्य देखा।

जीवन की सत्यता से साक्षात्कार

सिद्धार्थ को एक बूढ़े आदमी, एक बीमार आदमी और एक शव के रूप में इस जीवन का दुख-दर्द दिखा। वह ऐसे सभी दुखों से मानवता को मुक्ति दिलाने के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। उन्होंने लंबे समय तक इस समस्या पर ध्यान केंद्रित किया। अंत में एक उपदेशक के मुंह से कुछ शब्द सुना, जिसने उन्हें दुनिया को त्यागने के लिए प्रोत्साहित किया, उन्होंने ध्यान लगाने लिए महल छोड़ने और जंगल में जाने का फैसला किया। एक दिन वे अपनी प्यारी पत्नी यशोधरा और बेटे राहुल को आधी रात में सोता हुआ छोड़ गये। उस समय उनकी आयु केवल 29 वर्ष थी।

सत्य और परम ज्ञान की खोज

गौतम सत्य और परम ज्ञान पाना चाहते थे। वह जंगल में अपने पाँच विद्यार्थियों के साथ गए। लेकिन उन्हें शांति नहीं मिली। यहां तक कि उन्होंने शांति पाने के लिए अपने शरीर पर अत्याचार किया। लेकिन यह भी व्यर्थ था। दूसरी ओर वे बहुत कमजोर और अस्वस्थ हो गये थे, जिसे ठीक होने में 3 महीने लग गए।

सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कैसे बने?

उन्होंने सत्य और ज्ञान की अपनी खोज को नहीं रोका। एक दिन वह ध्यान करने के लिए बोधि वृक्ष के नीचे बैठ गये। उन्होंने वहां ध्यान लगाया। यह वह क्षण था, जब उन्हें आत्मज्ञान मिला। उन्होंने जीवन और मृत्यु के मर्म को समझा। अब उन्होंने इस ज्ञान को दुनिया के साथ साझा करने का फैसला किया। अब उन्हें बुद्ध के रूप में जाना जाने लगा।

निष्कर्ष

उन्होंने दुनिया को सत्य और अहिंसा की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को यह भी बताया कि मनुष्य की इच्छाएँ उसकी सभी परेशानियों का मूल कारण हैं। इसलिए व्यक्ति को उन्हें दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने लोगों को शांतिपूर्ण, संतुष्ट और अच्छा जीवन जीने की सलाह दी। आज, उनके द्वारा प्रतिपादित धर्म, बौद्ध धर्म है, जिसके दुनिया भर में लाखों अनुयायी हैं।

Essay on Lord Buddha

सिद्धार्थ का जीवन की सत्यता से सामना - निबंध 3 (500 शब्द)

परिचय

गौतम बुद्ध दुनिया के महान धार्मिक गुरुओं में से एक थे। उन्होंने सत्य, शांति, मानवता और समानता का संदेश दिया। उनकी शिक्षाएं और बातें बौद्ध धर्म का आधार बनी। यह दुनिया के प्रमुख धर्मों में से एक हैं, जिसका अनुसरण मंगोलिया, थाईलैंड, श्रीलंका, जापान, चीन और बर्मा आदि जैसे देशों में किया जाता है।

सिद्धार्थ बचपन से चिंतनशील

सिद्धार्थ बालपन से ही चिंतनशील थे। वह अपने पिता की इच्छाओं के खिलाफ ध्यान और आध्यात्मिक खोज की ओर प्रवृत्त थे। उनके पिता को डर था कि सिद्धार्थ घर छोड़ सकते हैं, और इसलिए, उन्हें हर समय महल के अंदर रखकर दुनिया की कठोर वास्तविकताओं से बचाने की कोशिश की।

जीवन की सत्यता से सामना

बौद्ध परंपराओं में उल्लेख है कि जब सिद्धार्थ ने एक बूढ़े व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति और एक मृत शरीर का सामना किया, तो उन्होंने महसूस किया कि सांसारिक जुनून और सुख कितने कम समय तक रहते हैं। इसके तुरंत बाद उन्होंने अपने परिवार और राज्य को छोड़ दिया और शांति और सच्चाई की तलाश में जंगल में चले गए। वह ज्ञान प्राप्त करने के लिए जगह-जगह भटकते रहे। उन्होंने कई विद्वानों और संतों से मुलाकात की लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए। उनका गृह-त्याग, इतिहास में ‘महाभिनिष्क्रमण’ के नाम से प्रसिध्द है।

बोधगया में बने बुध्द

अंत में उन्होंने महान शारीरिक कष्ट सहन करते हुए कठिन ध्यान शुरू किया। छह साल तक भटकने और ध्यान लगाने के बाद सिद्धार्थ को ज्ञान की प्राप्ति हुई जब वह गंगा किनारे बसे बिहार शहर के ‘गया’ में एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान में बैठे थे। तब से ‘गया’ को ‘बोधगया’ के नाम से जाना जाने लगा। क्योंकि वही पर भगवान बुद्ध को ज्ञान का बोध हुआ था।

सिद्धार्थ अब पैंतीस साल की उम्र में बुद्ध या प्रबुद्ध में बदल गये। पिपल वृक्ष, जिसके नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, बोधिवृक्ष के रूप में जाना जाने लगा।

सारनाथ में प्रथम उपदेश - धर्मचक्र प्रवर्तन

बुद्ध ने जो चाहा वह प्राप्त किया। उन्होंने वाराणसी के पास सारनाथ में अपने पहले उपदेश का प्रचार किया, जिसे धर्मचक्र-प्रवर्तन की संज्ञा दी गयी। उन्होंने सिखाया कि दुनिया दुखों से भरी है और लोग अपनी इच्छा के कारण पीड़ित हैं। इसलिए आठवीं पथ का अनुसरण करके इच्छाओं पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। इन आठ रास्तों में से पहला तीन शारीरिक नियंत्रण सुनिश्चित करेगा, दूसरा दो मानसिक नियंत्रण सुनिश्चित करेगा, और अंतिम तीन बौद्धिक विकास सुनिश्चित करेंगे।

बुद्ध की शिक्षा और बौध्द धर्म

बुद्ध ने सिखाया कि प्रत्येक जीव का अंतिम लक्ष्य 'निर्वाण' की प्राप्ति है। ‘निर्वाण’ न तो प्रार्थना से और न ही बलिदान से प्राप्त किया जा सकता है। इसे सही तरह के रहन-सहन और सोच से हासिल किया जा सकता है। बुद्ध भगवान की बात नहीं करते थे और उनकी शिक्षाएँ एक धर्म से अधिक एक दर्शन और नैतिकता की प्रणाली का निर्माण करती हैं। बौद्ध धर्म कर्म के कानून की पुष्टि करता है जिसके द्वारा जीवन में किसी व्यक्ति की क्रिया भविष्य के अवतारों में उसकी स्थिति निर्धारित करती है।

निष्कर्ष

बौद्ध धर्म की पहचान अहिंसा के सिद्धांतों से की जाती है। त्रिपिटिका बुद्ध की शिक्षाओं, दार्शनिक प्रवचनों और धार्मिक टिप्पणियों का एक संग्रह है। बुद्ध ने 483 ई.पू. में कुशीनगर (यू.पी.) में अपना निर्वाण प्राप्त किया। जिसे ‘महापरिनिर्वाण’ कहते हैं।