पर्यावरण बचाओ पर निबंध

पर्यावरण का संबंध उन जीवित और गैर जीवित चीजो से है, जो कि  हमारे आस-पास मौजूद है, और जिनका होना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत वायु, जल, मिट्टी, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि आते है। हालांकि एक शहर, कस्बे या गांव में रहते हुए हम देखते है कि हमारे आस-पास का वातावरण और स्थान वास्तव में एक प्राकृतिक स्थान जैसे कि रेगिस्तान, जंगल, या फिर एक नदी आदि थे, जिन्हे हम मनुष्यों ने अपने उपयोग के लिए इमारतो, सड़को या कारखानो में तब्दील कर दिया है।

लेकिन महानगरो में रहने वाले लोग भी अपना भोजन, मछली, ईंधन और चारे आदि की आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्रो से ही प्राप्त करते है, जो कि  प्राकृतिक क्षेत्रो से निर्मित होते है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनो पर हमारी निर्भरता ने यह काफी जरुरी बना दिया है कि हम प्राकृति वातावरण के विनाश और दोहन के रोकथाम के लिए आवश्यक उपाय करें।

पर्यावरण बचाओ पर लम्बे तथा छोटे निबंध (Long and Short Essay on Save Environment in Hindi)

यहा पर पर्यावरण बचाओ पर विभिन्न लंबाई के निबंध दिये गए है, जिनका आप  अपनी परीक्षा के तैयारी या अन्य कार्यो में अपने आवश्यकता के अनुसार चयन कर सकते है। दिए गये निबंधो के सुविधा को ध्यान में रखते हुए काफी सरल भाषा में तैयार किए गये है, जिनका आप अपने सुविधानुसार उपयोग कर सकते है।

पर्यावरण बचाओ पर छोटा निबंध- 1 (200 शब्द)

एक भौगोलिक क्षेत्र या प्राकृतिक संसार जिसके अंतगर्त हवा और जल, पशु-पक्षी आदि आते है, जो कि मानवीय गतिविधियो द्वारा प्रभावित हो रहे हो उसे पर्यावरण कहते है। मानव जाति के शहरीकरण और औद्योगिकरण की घटना के कारण चिकित्सा, उद्योग और सामाजिक क्षेत्र में काफी तेज विकास हुआ है, जिससे की प्राकृतिक स्थान कंक्रीट के भवनो और सड़को में बदलते जा रहे है। हालांकि इन प्राकृतिक संसाधनो पर हमारी भोजन, पीने के पानी और कृषि की निर्भरता अभी भी बनी हुई है। प्रकृति के ऊपर हमारी निर्भरता इतने ज्यादे है कि अगर हमने इसके संसाधनो के रक्षा का प्रयास अभी से नही शुरु किया तो हमारा अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा।

इन प्राकृतिक संसाधनो को मुख्यतः दो श्रेणियों नवकरणीय और अनवकरणीय में बांटा जा सकता है। नवकरणीय प्राकृतिक संसाधन वह संसाधन है, जिनकी प्राकृतिक रुप से फिर से प्राप्ती की जा सकती हो, जैसे कि पानी, जंगल, फसले, इत्यादि। इसके विपरीत गैर-नवकरणीय संसाधन वह संसाधन है जिन्हे प्राकृतिक रुप से फिर से नही प्राप्त किया जा सकता जैसे कि तेल, खनिज आदि। इसके साथ ही यह एक संकट इसलिए भी बन गया है क्योंकि वर्तमान में इनका उपयोग भी बहुत तेजी के साथ किया जा रहा है।

इन सभी प्राकृतिक संसाधनो के तेजी से खत्म होने का मुख्य कारण तेजी से हो रही जनसंख्या वृद्धि और विशेष तथा कुलीन वर्गो में संसाधनो का बढ़ रहा उपभोग है। इसके वजह से मात्र वन्यजीवों और पेड़-पौधो की ही हानि नही हुई है, बल्कि की पूरे पर्यावरण पर संकट खड़ा हो गया है। इसलिए यह वह समय है जब हमें अपने प्राकृतिक संसाधनो का अंधाधुंध दुरुपयोग रोककर, इनका विकेकपूर्ण तरीके से उपयोग करने की आवश्यकता है। जिससे हम इन्हे अपने आने वाली पीढ़ीयो के लिए भी बचाकर रख सके और एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सके।


 

पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर निबंध – 2 (300 शब्द)

प्रस्तावना

हमारे पूरे परिवेश और जीव जगत जिसमें हवा, पानी और सूर्य का प्रकाश आदि भी शामिल है, इसके अलावा विकास और वृद्धि में अपना योगदान देने वाले जीवित जीव जैसे कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, मनुष्य आदि साथ मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते है।

पर्यावरण संरक्षण का महत्व

आज के औद्योगिक और शहरी क्षेत्र के पर्यावरण में पक्की सड़के, कई मंजिला कंक्रीट के इमारत और गगनचुंबी इमारते भी शामिल है। इनका मुख्य मकसद बढ़ती आबादी के लिए सुविधाएं तैयार करना तथा धनी और संभ्रांत वर्ग के जीवन को सुविधा और विलासतापूर्ण बानना है।

हालांकि, इस औद्योगिक और शहरी आंदोलन के बावजूद भी प्राकृतिक संसाधनो पर मनुष्य की निर्भरता पहले के ही भांति बनी हुई है। हमारे द्वारा श्वसन के लिए वायु का इस्तेमाल किया जाता है, पीने तथा अन्य दैनिक कार्यो के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है सिर्फ इतना ही नही जो भोजन हम खाते है वह भी कई प्रकार के पेड़-पौधो, पशु-पक्षीओं और सब्जियो, दूध, अंडो आदि से प्राप्त होता है। इन आवश्यकताओ को ध्यान में रखते हुए इन संसाधनो की सुरक्षा बहुत ही जरुरी हो गई है। इन संसाधनो को इस प्रकार से वर्गीकृत किया गया है।

 

  1. नवकरणीय संसाधनः जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है कि यह वह संसाधन है, जिन्हे प्राकृतिक रुप से पुनः प्राप्त किया जा सकता है, जैसे कि वर्षा और पेड़-पौधो की पुनः वृद्धि आदि। हालांकि यदि इसी प्रकार प्रकृति के पुनः आपूर्ति के पहले ही इनका से तेजी से इनका उपभोग होता रहा तो आने वाले समय में रबर, लकड़ी, ताजा पानी जैसे यह वस्तुएं पूर्ण रुप से समाप्त हो जायेंगी।
  2. गैर-नवकरणीय संसाधनः यह संसाधन लाँखो वर्षो पूर्व जमीन के अंदर निर्मित हुए है, इसलिए इनकी पुनः प्राप्ति संभव नही है। इनका सिर्फ एक बार ही उपयोग किया जा सकता है। इसके अंतर्गत जीवाश्म ईंधन जैसे कि कोयला और तेल आदि आते है, जिन्हे फिर से नवीकृत नही किया जा सकता है।

निष्कर्ष

इस समय सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हमें इन संसाधनो के दुरुपयोग को रोकना होगा और बहुत ही विवेकपूर्ण तरीके से इनका उपयोग करना होगा, क्योकि पृथ्वी द्वारा इनके इतने तेजी से हो रहे उपयोग को अब और नही बर्दाश्त किया जा सकता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति सिर्फ सतत विकास के द्वारा ही संभव है। इसके अलावा उद्योग ईकाईयों द्वारा तरल और ठोस सह-उत्पाद जो कि  कचरे के रुप में फेक दिए जाते है इनके भी नियंत्रण की आवश्यकता है, क्योंकि इनके कारण प्रदूषण बढ़ता है। जिससे की कैसंर और पेट तथा आंत से जुड़ी कई बीमारियां उत्पन्न होती हैं। यह तभी संभव है जब हम सरकार के ऊपर निर्भरता छोड़कर व्यक्तिगत रुप से इस समस्या के समाधान के लिए जरुरी कदम उठायें।


 

पर्यावरण को कैसे बचाएं तथा संरक्षित करें पर निबंध – 3 (400 शब्द)

प्रस्तावना

समय के शुरुआत से ही पर्यावरण ने हमारी वनस्पतिओं और प्राणी समूहो से संबंध स्थापित करने में मदद की है, जिससे की हमारा जीवन सुनिश्चित हुआ हैं। प्रकृति ने हमें कई सारे भेंट प्रदान किये है जैसे कि पानी, सूर्य का प्रकाश, वायु, जीव-जन्तु और जीवाश्म ईँधन आदि जिससे इन चीजो ने हमारे ग्रह को रहने योग्य बनाया है।

पर्यावरण का संरक्षण और बचाव कैसे सुनिश्चित करें

क्योंकि यह संसाधन काफी ज्यादे मात्रा उपलब्ध है, इसलिए बढ़ती जनसंख्या के कारण धनी और संभ्रांत वर्ग के विलासतापूर्ण इच्छाओं को पूरा करने के लिए इनका काफी ज्यादे मात्रा में तथा बहुत ही तेजी के साथ उपभोग किया जा रहा है। इसलिए हर प्रकार से इनका संरक्षण करना बहुत ही आवश्यक हो गया है। यहां कुछ रास्ते बताएं गये है जिनके द्वारा इन प्राकृतिक संसाधनो के अत्यधिक उपयोग पर काबू पाया जा सकता है और इन्हे संरक्षित किया जा सकता है।

 

  • खनिज और ऊर्जा संसाधनः विभिन्न प्रकार के खनिज तत्वो जिनसे कि उर्जा उत्पन्न कि जाती है इसके अंतर्गत कोयला, तेल और विभिन्न प्रकार के जीवाश्म ईंधन आते हैं। जिनका उपयोग मुख्यतः बिजली उत्पादन केंद्रो और वाहनो में किया जाता है, जो कि वायु प्रदूषण में अपना मुख्य योगदान देते है। इसके अलावा वायु जनित बिमारियों के रोकथाम के लिए नवकरणीय ऊर्जा के संसाधनो जैसे कि हवा और ज्वारीय ऊर्जा को बढ़वा देने की आवश्यकता है।
  • वन संसाधनः वनो द्वारा मृदा अपरदन को रोकने और सूखे के प्रभाव को कम करने के साथ ही जल स्तर को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण योगदान निभाया जाता है। इसके साथ ही इनके द्वारा वातावरण की परिस्थितियों को काबू में रखने के साथ ही जीवो के लिए कार्बन डाइआक्साइड के स्तर को भी नियंत्रित किया जाता है, जिससे की पृथ्वी पर जीवन का संतुलन बना रहता है। इसलिए यह काफी महत्वपूर्ण है कि हम वन संरक्षण और इसके विस्तार पर ध्यान दे, जो कि बिना लकड़ी के बने उत्पादो के खरीद को बढ़ावा देकर और राज्य सरकारो द्वारा वृक्षारोपण तथा वन संरक्षण को बढ़ावा देकर किया जा सकता है।
  • जल संसाधनः इसके साथ ही जलीय पारिस्थितिक तंत्र का भी लोगो द्वारा दैनिक कार्यो जैसे कि पीने के लिए, खाना बनाने के लिए, कपड़े धोने के लिए आदि के लिए उपयोग किया जाता है। वैसे तो वाष्पीकरण और वर्षा के द्वारा जल चक्र का संतुलन बना रहता है परन्तु मनुष्यों द्वारा ताजे पानी को बहुत ज्यादे मात्रा में इस्तेमाल और बर्बाद किया जा रहा है। इसके साथ ही यह काफी तेजी से प्रदूषित भी होते जा रहा है। इसलिए भविष्य में होने वाले पानी के संकट को देखते हुए इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने की आवश्यकता है। जिसके लिए हमे बड़ी परियोजनाओं के जगह पानी के छोटे-छोटे जलाशय निर्माण, ड्रिप सिचाई विधी को बढ़ावा देना, लीकेज को रोकना, नगरीय कचरे के पुनरावृत्ति और सफाई जैसे कार्यो को करने की आवश्यकता है।
  • खाद्य संसाधनः हरित क्रांति के दौरान कई सारे तकनीको द्वारा फसलो के उत्पादन को बढ़ाकर भूखमरी के समस्या पर काबू पाया गया था, लेकिन वास्तव में इससे मिट्टी के गुणवत्ता पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसलिए हमें खाद्य उत्पादन के लिए सतत उपायो को अपनाने की आवश्यकता है। जिसके अंतर्गत गैर-जैविक उर्वरकों और कीटनाशको के उपयोग के जगह अन्य विकल्पो को अपनाने तथा कम गुणवत्ता वाली मिट्टी में उपजने वाले फसलो को अपनाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार से हम कह सकते है सिर्फ एक व्यक्ति के रुप में लिए गये हमारे व्यक्तिगत फैसलो के साथ सतत विकास और सही प्रबंधन के द्वारा ही हम अपने इस बहूमुल्य पर्यावरण की रक्षा कर सकते है।


 

पर्यावरण बचाओ, पृथ्वी बचाओ पर निबंध – 4 (500 शब्द)

प्रस्तावना

“कीसी भी पीढ़ी का इस पृथ्वी पर एकाधिकार नही है, हम सभी यहा जीवन व्यय के लिए है - जिसकी कीमत भी हमें चुकानी होती है” मारग्रेट थेचर का यह कथन हमारा प्रकृति के साथ हमारे अस्थायी संबंधो को दर्शाता है। पृथ्वी के द्वारा हमारे जीवन को आसान बनाने और इस ग्रह को रहने लायक बनाने के लिए प्रदान किये गए तमाम तोहफे के जैसे कि हवा, सूर्य का प्रकाश, पानी, जीव-जन्तु और खनिज आदि के बावजूद भी, हम अपने स्वार्थ के लिए हम इन संसाधनो का दोहन करने से बाज नही आ रहे है।

पृथ्वी को बचाने के लिए पर्यावरण को बचाने की जरुरत

हमारे बढती आबादी स्तर के वर्तमान जरुरतो को पूरा करने के लिए हम बिना सोचे-समझे अंधाधुंध रुप से अपने प्राकृतिक संसाधनो का उपभोग करते जा रहे है। हम अपने भविष्य के पीढ़ी के लिए भी कोई चिंता नही कर रहे है। इस प्रकार से आज के समय में सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हमें अपने नवकरणीय और गैर नवकरणीय संसाधनो के संरक्षण के और अपनी इस पृथ्वी के सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।

पर्यावरण पर प्रदूषण के प्रभाव

  • वायु प्रदूषणः यातायात तंत्र के निर्माण और बड़े स्तर पर पेट्रोल तथा डीजल के उपयोग के कारण प्रदूषण के स्तर में काफी तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे कई तरह के अनचाहे और गैस वाले वायु में मौजूद हानिकारक कणो की मात्रा में भी काफी वृद्धि हुई है। इस बढ़े हुए कार्बन मोनो-आक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, सल्फर आक्साइड, हाइड्रोकार्बन और लेड की मात्रा से सूर्य की पराबैंगनी किरणो से हमारी रक्षा करने वाला हमारा ओजोन की परत खत्म होने लगी है। जिसके कारण तापमान में काफी वृद्धि दर्ज की गयी है, जिसे सामान्यतः ग्लोबल वार्मिंग के नाम से जाना जाता है।
  • जल प्रदूषणः मनुष्यों और पशुओं के अपशिष्ट, उद्योगो से निकलने वाले जल में घुलनशील गैरजैविक रसायन जैसे कि मर्करी और लेड तथा पानी में जैविक रसायनो के बहाव जैसे कि डिटर्जेंट और तेल जो कि  ताजे पानी के तालाबो और नदियों में मिल जाते है पानी को दूषित कर देते है और यह पानी हमारे पीने योग्य नही रह जाता है। इन्ही कारणों से जलीय जीवन भी काफी बुरे तरीके से प्रभावित हो गया है, इसके साथ ही फसलो के पैदावार में कमी और पीने का पानी मनुष्यों तथा जानवरों के लिए अब और सुरक्षित नही रह गया है।
  • भूमि प्रदूषणः ज्यादे मात्रा में उर्वरको और कीटनाशको जैसे कि डीडीटी के छिड़काव और फसलो की पैदावार बढ़ाने के लिए उस पानी का उपयोग जिसमें नमक की मात्रा अधिक हो, इस तरह के उपाय भूमि को बेकार कर देते है। इस तरह के प्रदूषण को भूमि प्रदूषण के नाम से जाना जाता है और इसी के कारण मृदा अपरदन में भी वृद्धि हुई है जिसके लिए निर्माण और वनोन्मूलन आदि जैसे कारण मुख्य रुप से जिम्मेदार है।
  • ध्वनि प्रदूषणः वाहनो से निकलने वाला शोर-शराबा, कारखानो और भारत में दिवाली के दौरान फोड़े जाने वाले पटाखो मुख्य रुप से ध्वनि प्रदूषण के जिम्मेदार है। यह जानवरो को गंभीर रुप से हानि पहुंचाता है क्योंकि वह खुद को इसके अनुरुप ढाल नही पाते है, जिससे उनके सुनने की क्षमता क्षीण पड़ जाती है।

निष्कर्ष

पर्यावरण संरक्षण मात्र सरकार का ही काम नही है, इसके लिए एक व्यक्ति के रुप में हमारा स्वंय का योगदान भी काफी आवश्यक है। जाने-अनजाने में हम प्रतिदिन प्रदूषण में अपना योगदान देते है। इसलिए प्रकृति के प्रदान किए गये भेंटो का उपयोग करने वाले एक उपभोक्ता के रुप में यह हमारा कर्तव्य है कि हम जल संरक्षण को बढ़ावा दे और वस्तुओं के पुनरुपयोग और पुनरावृत्ति में हिस्सा ले, बिजली और पानी जैसे संसाधनो की बर्बादी आदि कार्यो को बंद करें। इन सब छोटे-छोटे उपायो द्वारा हम अपने ग्रह के हालत में काफी प्रभावी बदलाव ला सकते है।


 

पर्यावरण बचाओं जीवन बचाओ पर निबंध – 5 (600 शब्द)

प्रस्तावना

प्राकृतिक पर्यावरण मानव जाति और दुसरे जीवो के लिए एक वरदान है। इन प्राकृतिक संसाधनो में हवा, ताजा पानी, सूर्य का प्रकाश, जीवाश्म ईंधन आदि आते है। यह जीवन के लिए इतने महत्वपूर्ण है कि इनके बिना जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है। लेकिन बढ़ती आबादी के बढ़ते लोभ के कारण, इन संसाधनो का बहुत ही ज्यादे मात्रा में दुरुपयोग हुआ है। यह आर्थिक विकास मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत गंभीर साबित हुआ है, जिनके विषय में नीचे चर्चा की गयी है।

पृथ्वी पर जीवन को बचाने के लिए पर्यावरण को बचाने के कारण

यहां प्राकृतिक संसाधनो के दुरुपयोग और हानि को रोकने के लिए और प्रदूषण द्वारा पृथ्वी के जीवो पर होने वाले निम्नलिखित प्रभावो पर चर्चा की गयी है। इसलिए पृथ्वी पर जीवन को बचाने के लिए यह काफी आवश्यक है कि हम पर्यावरण को बचाएं।

  • वायु प्रदूषणः यातायात के लिए पेट्रोल और डीजल के बढ़ते उपयोग से और उद्योगो द्वारा ऊर्जा उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन के बढ़ते दहन से वायु प्रदूषण में सबसे ज्यादे वृद्धि हुई है। जिसके कारणवश सल्फर आक्साइड, हाइड्रोकार्बन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन और कार्बन मोनो आक्साइड आदि के स्तर में भी वृद्धि हुई है। ये हानिकारक गैसे मानव स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव डालती हैं, जिससे क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर और अन्य कई प्रकार की श्वसन संबंधित बीमारियां उत्पन्न हो जाती है। इसके द्वारा ओजोन परत का भी क्षय होता जा रहा है, जिससे मनुष्य पहले की अपेक्षा पैराबैंगनी किरणो से अब उतना ज्यादे सुरक्षित नही रह गया है। इसके साथ ही इससे वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग में भी बढ़ोत्तरी हुई है, जिसके कारणवश मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हुई है।
  • जल प्रदूषणः उद्योगो से निकलने जल में घुलनशील आकार्बनिक रासायनो और मनुष्यों तथा पशुओं के अपशिष्टो के ताजे पानी में मिलने तथा सिचाईं के दौरान उर्वरको और कीटनाशको के पानी में मिलने के कारण जल प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। यह ना सिर्फ पीने के पानी की गुणवत्ता को खराब करता है, बल्कि की कैंसर तथा पेट और आंत संबंधित कई सारी बिमारीयो को भी जन्म देता है। इसके अलावा जलीय जीवन पर भी इसका नकरात्मक प्रभाव पड़ता है, जल प्रदूषण मछलिंयो को भी खाने योग्य नही रहने देता है।
  • भूमि प्रदूषणः रासायनिक उर्वरको और कीटनाशको के उपयोग से मिट्टी में मौजूद ना सिर्फ बुरे कीट बल्कि की अच्छे कीट भी मर जाते है। जिससे हमें कम पोषक वाले फसलो की प्राप्ति होती है। इसके अलावा भूमि प्रदूषण द्वारा रसायन से संक्रमित फसलो के सेवन से म्यूटेशन, कैंसर आदि जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती है। तेजी से हो रहे वनोन्मूलन और निर्माण के कारण बाढ़ के आवृति में भी वृद्धि हुई है। जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर मानव जीवन का विनाश होता जा रहा है।
  • ध्वनि प्रदूषणः कारखानों और वाहनों से उत्पन्न होने वाले अत्यधिक शोर-सराबे के कारण मनुष्य के सुनने की क्षमता पर असर पड़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप अस्थायी या स्थायी सुनने की शक्ति क्षीण पड़ जाती है। मनुष्य के उपर ध्वनि प्रदूषण का मानसिक, भावनात्मक और दिमागी स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे तनाव, चिंता और चिड़चिड़ाहट आदि जैसी समस्याएं उत्पन्न होती है, जिससे हमारे कार्य के प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

पर्यावरण को बचाने के उपाय

इतिहास के पन्नो को पलटने पे पता चलता है कि हमारे पूर्वज पर्यावरण संरक्षण को लेकर हमसे कही ज्यादे चिंतित थे। इसके लिए हम सुंदरलाल बहुगुणा को मिसाल के तौर पर देख सकते है, जिन्होने वन्य संसाधनो के सुरक्षा के लिए चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी। ठीक इसी प्रकार मेधा पाटेकर ने जनजातीय लोगो के लिए पर्यावरण सुरक्षा के प्रभावी प्रयास किए थे, जो कि  नर्मदा नदी पर बन रहे बांध से नकरात्मक रुप से प्रभावित हुए थे। आज के समय में एक युवा के रुप में यह हमारा दायित्व है कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए हम भी इसी तरह के प्रयास करे। कुछ छोटे-छोटे उपायो द्वारा हम प्रकृति को बचाने में अपना सहयोग दे सकते हैः

  • हमे 3 आर(3R) के धारणा को बढ़ावा देना चाहिए, जिसके अंतर्गत रेड्यूज़, रीसायकल रीयूज जैसे कार्य आते है। जिसमें हम गैर नवकरणीय ऊर्जा के स्त्रोतो के अधिक उपयोग को कम करके जैसे कि लोहा बनाने के लिए लोहे के कचरे का इस्तेमाल करना जैसे उपाय कर सकते है।
  • ऊर्जा बचाने वाले ट्यूब लाइट और बल्ब आदि उत्पादो का उपयोग करना।
  • पेपर और लकड़ी का कम उपयोग करना जितना ज्यादे हो सके ई-बुक और ई-पेपर का इस्तेमाल करना।
  • जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम से कम करना कही आने-जाने के लिए पैदल, कार पूल या सार्वजनिक परिवाहन जैसे उपायो का उपयोग करना।
  • प्लास्टिक बैग के जगह जूट या कपड़े के बैग का इस्तेमाल करना।
  • पुनरुपयोग की जा सकने वाली बैटरियों और सोलर पैनलो का उपयोग करना।
  • रसायनिक उर्वरको का उपयोग कम करना और गोबर से खाद बनाने के लिए कम्पोस्ट बिन की स्थापना करना।

निष्कर्ष

वैसे तो सरकार ने प्रकृति और वन्यजीव के सुरक्षा के लिए कई सारे कानून और योजनाएं स्थापित की गई है। लेकिन फिर भी व्यक्तिगत रुप से यह हमारा कर्तव्य है कि हरेक व्यक्ति पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे  और अपनी आने वाली पीढ़ीयो के भविष्य को सुरक्षित करे, क्योंकि वर्तमान में हमारे द्वारा ही इसका सबसे ज्यादे उपयोग किया जा रहा है। इसे लेस्टर ब्राउन के शब्दों में बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है, “हमने इस पृथ्वी को अपने पूर्वजो से प्राप्त नही किया है, बल्कि की अपने आने वाली पीढ़ीयों से छीन लिया है”।

 

 

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