ग्लोबल वार्मिंग निबंध

ग्लोबल वार्मिंग पूरे विश्व में एक मुख्य वायुमण्लीय मुद्दा है। सूरज की रोशनी को लगातार ग्रहण करते हुए हमारी पृथ्वी दिनों-दिन गर्म होती जा रही है जिससे वातावरण में कॉर्बनडाई ऑक्साइड का स्तर बढ़ रहा है। इसके लगातार बढ़ते दुष्प्रभावों से इंसानों के लिये बड़ी समस्याएं हो रही है। जिसके लिये बड़े स्तर पर सामाजिक जागरुकता की जरुरत है। इस समस्या से निपटने के लिये लोगों को इसका अर्थ, कारण और प्रभाव पता होना चाहिये जिससे जल्द से जल्द इसके समाधान तक पहुँचा जा सके।

ग्लोबल वार्मिंग पर छोटे तथा बड़े निबंध (Short and Long Essay on Global Warming in Hindi)

निबंध 1 (250 शब्द)

धरती के तापमान में लगातार बढ़ते स्तर को ग्लोबल वार्मिंग कहते है। वर्तमान में ये पूरे विश्व के समक्ष बड़ी समस्या के रुप में उभर रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि धरती के वातावरण के गर्म होने का मुख्य कारण का ग्रीनहाउस गैसों के स्तर में वृद्धि है। अगर इसे नजरअंदाज किया गया और इससे निजात पाने के लिये पूरे विश्व के देशों द्वारा तुरंत कोई कदम नहीं उठाया गया तो वो दिन दूर नहीं जब धरती अपने अंत की ओर अग्रसर हो जाएगी।

दिनों-दिन बढ़ते इसके खतरनाक प्रभाव से संपूर्ण विश्व के लिये खतरा उत्पन्न हो रहा है। इससे समुद्र जल स्तर में वृद्धि, बाढ़, तूफान, चक्रवात, मौसम के स्वरुपों में परिवर्तन, संक्रामक बीमारीयाँ, खाद्य कमी, मौतें आदि आने वाले समय में दिखाई देंगी। इससे निजात पाने का एक ही तरीका है व्यक्तिगत स्तर पर जन-जागरुकता। लोगों को इसका अर्थ, कारण, और प्रभाव की समझ होनी चाहिये जिससे इसको जड़ से मिटाया जा सके और धरती पर जीवन की संभावानाएँ सदा के लिये मुमकिन हो।

लोगों को उनकी बुरी आदतों जैसे तेल, कोयला और गैस के अत्यधिक इस्तेमाल, पेड़ों की कटाई(क्योंकि ये कार्बनडाई ऑक्साइड को सोखने का मुख्य स्रोत है) को रोक कर, कम बिजली का इस्तेमाल कर आदि से CO2 को फैलने से रोकना चाहिए। पूरी दुनिया के लोगों में थोड़े से बदलाव से, एक दिन हम लोग इसके प्रभावों को घटाकर वातावरण में हुए नकारात्मक परिवतर्नों को रोक सकते है।


 

निबंध 2 (300 शब्द)

पर्यावरण में कॉर्बनडाई ऑक्साइड के बढ़ते स्तर के कारण धरती के सतह का तापमान लगातार बढ़ना ग्लोबल वार्मिंग है। ये विश्व समुदाय के लिये एक बड़ा और गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। जरुरत है कि विश्व समाज के सभी देश इसके समाधान के लिये सकारात्मक कदम उठाये। नियमित बढ़ते धरती के तापमान से कई सारे खतरों का जन्म होगा जो इस ग्रह पर जीवन के अस्तित्व को कठिन बना देगा। ये धरती के आबोहवा में नियमित और स्थायी परिवर्तन को बढ़ा देगा और इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगेगा।

 

धरती पर CO2 के बढ़ने से इंसानी जीवन पर इसका बड़ा प्रभाव देखने को मिलेगा इससे लगातार गर्म हवाएँ, अचानक से आया तूफान, अप्रत्याशित चक्रवात, ओजोन परत में क्षरण, बाढ़, भारी बरसात, सूखा, खाद्य पदार्थों की कमी, महामारी, और मौंते आदि में बढ़ौतरी होगी। ऐसा शोध में पाया गया है कि CO2 के अधिक उत्सर्जन का कारण जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग, खाद का इस्त्माल, पेड़ों की कटाई, फ्रिज और एसी से निकलने वाली गैस, अत्यधिक बिजली के इस्तेमाल आदि है। ये ध्यान देने योग्य है कि अगर इसको नहीं रोका गया तो 2020 तक ग्लोबल वार्मिंग से धरती पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि CO2 का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है।

धरती पर ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव बढ़ने का कारण CO2 के स्तर में बढ़ना है, सभी ग्रीनहाउस गैस (जलवाष्प, CO2, मीथेन, आदि) गर्म किरणों की पात को सोखता है जिसके बाद सभी दिशाओं में दुबारा से विकीकरण होता है और धरती पर वापस आकर तापमान में वृद्धि करता है जो हमें ग्लोबल वार्मिंग के रुप में दिखाई देता है।

ग्लोबल वार्मिंग के जीवन से संबंधित दुष्प्रभावों को रोकने के लिये, हमें CO2 और ग्रीनहाउस गैसों के प्रभावों को बढ़ाने वाले सभी कारकों को हमेशा के लिये त्यागना पड़ेगा जिससे हमारी पृथ्वी का तापमान गर्म न हो। हमें पेड़ों की कटाई नहीं करनी चाहिए, बिजली का सही इस्तेमाल करना चाहिए, लकड़ी को नहीं जलाना चाहिए आदि।


 

निबंध 3 (400 शब्द)

ग्लोबल वार्मिंग के रुप में आज हम लोग एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे है जिसका हमें स्थायी समाधान निकालने की जरुरत है। असल में, धरती के सतह के तापमान में लगातार और स्थायी वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग है। इसके प्रभाव को खत्म करने के लिये पूरे विश्व को व्यापक तौर पर चर्चा करने की जरुरत है। इससे दशकों से धरती की आबोहवा और जैव-विविधता प्रभावित हो रहा है।

धरती पर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने का मुख्य कारण CO2 और मिथेन जैसे ग्रीनहाउस गैस है, जिसका सीधा प्रभाव समुद्र जल स्तर में वृद्धि, ग्लेशियरों का पिघलना, अप्रत्याशित वायुमंडलीय परिवर्तन जो धरती पर जीवन की संभावानाओं को प्रदर्शित करता है। आँकड़ों के अनुसार, 20वीं सदी के मध्य से ही धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है और इसका मुख्य कारण लोगों के जीवन शैली में बदलाव से है।

1983,1987,1988,1989 और 1991 बीती सदी का सबसे का गर्म साल रहा। इसके लगातार बढ़ने से धरती पर बाढ़, सूखा, चक्रवात, भूस्खलन, सुनामी, महामारी आदि जैसे प्रकोप जीवन के लिये खतरा पैदा हो कर रहें हैं जो प्रकृति के असंतुलन को दिखाती है।

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जल का वाष्पीकरण वातावरण में हो जाता है, जिसकी वजह से ग्रीनहाउस गैस बनता है और जिसके कारण फिर से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ता है। दूसरी क्रियांएँ जैसे जीवाश्म ईंधनों को जलाना, खादों का इस्तेमाल, CFCs जैसे गैसों में वृद्धि, ट्रौपोसफेरिक ओजोन और नाईट्रस ऑक्साइड भी ग्लोबल वार्मिंग के लिये जिम्मेदार है। इसके बढ़ने का मौलिक कारण तकनीकी उन्नति, जनसंख्या विस्फोट, औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई, और शहरीकरण आदि है।

अत्यधिक वन-कटाई से हम प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे है साथ ही तकनीकी उन्नति जैसे ग्लोबल कार्बन साईकिल ओजोन परत में छेद कर रहे है और इससे अल्ट्रावॉयलेट किरणों को धरती पर आसानी से आने का मौका मिल रहा है जो ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ौतरी का कारण बन रही है। हवा से कॉर्बनडाई ऑक्साइड को हटाने के लिये पेड़-पौधे सर्वश्रेठ विकल्प है अत: वनों की कटाई को रोकना होगा तथा ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को खत्म करने के लिये पेड़ों को लगाने के लिये लोगों को प्रोत्साहित करना होगा जिससे हमे इसके खतरे को कम करने में हमें बड़े स्तर की सफलता मिल सकती है। पूरे विश्व में जनसंख्या विस्फोट को भी रोकने की आवश्कता है क्योंकि इससे धरती पर विनाशकारी तकनीकों का इस्तेमाल कम होगा।

 

निबंध 4 (600 शब्द)

ग्लोबल वार्मिंग क्या है ?
महासागर, बर्फ की चोटी सहित पूरा पर्यावरण और धरती की सतह का नियमित गर्म होने की प्रक्रिया को ग्लोबल वार्मिंग कहते है। पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक तौर पर वातावरणीय तापमान में वृद्धि देखी गई है। पर्यावरणीय सुरक्षा एजेंसी के अनुसार, पिछले शताब्दी में 1.4 डिग्री फॉरेनहाईट (0.8 डिग्री सेल्सियस) के लगभग धरती के औसत तापमान में वृद्धि हुई है। ऐसा भी आकलन किया गया है कि अगली शताब्दी तक 2 से 11.5 डिग्री F की वृद्धि हो सकती है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण:

जनसंख्या विस्फोट, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा के इस्तेमाल की वजह से 20वीं सदी में ग्रीनहाउस गैसों को बढ़ते देखा गया है। पिछले कुछ वर्षों में कॉर्बनडाई ऑक्साइड(CO2) और सलफरडाई ऑक्साइड (SO2) 10 गुना से बढ़ा है। ऑक्सीकरण चक्रण और प्रकाश संश्लेषण सहित प्राकृतिक और औद्योगिक प्रक्रियाओं के अनुसार कॉर्बनडाई ऑक्साइड का निकलना बदलता रहता है। कार्बनिक समानों के सड़न से वातावरण में मिथेन नाम का ग्रीनहाउस गैस भी निकलता है। दूसरे ग्रीनहाउस गैस है - नाइट्रोजन का ऑक्साइड, हैलो कार्बन्स, CFCs क्लोरिन और ब्रोमाईन कम्पाउंड आदि। ये सभी वातावरण में एक साथ मिल जाते है और वातावरण के रेडियोएक्टिव संतुलन को बिगाड़ते है। उनके पास गर्म विकीकरण को सोखने की क्षमता होती है जिससे धरती की सतह गर्म होने लगती है।

अंर्टाटिका में ओजोन परत में कमी आना भी ग्लोबल वार्मिंग का एक कारण है। CFCs गैस के बढ़ने से ओजोन परत में कमी आ रही है। ये ग्लोबल वार्मिंग का मानव जनित कारण है। CFCc गैस का इस्तेमाल कई जगहों पर औद्योगिक तरल सफाई में एरोसॉल प्रणोदक की तरह और फ्रिज में होता है, जिसके नियमित बढ़ने से ओजोन परत में कमी आती है।

ओजोन परत का काम धरती को नुकसान दायक किरणों से बचाना है। जबकि, धरती के सतह की ग्लोबल वार्मिंग बढ़ना इस बात का संकेत है कि ओजोन परत में क्षरण हो रहा है। हानिकारक अल्ट्रा वॉइलेट सूरज की किरणें जीवमंडल में प्रवेश कर जाती है और ग्रीनहाउस गैसों के द्वारा उसे सोख लिया जाता है जिससे अंतत: ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ौतरी होती है। अगर आँकड़ों पर नजर डाले तो ऐसा आकलन किया गया है कि अंर्टाटिका (25 मिलियन किलोमीटर) की छेद का दोगुना ओजोन परत में छेद है। सर्दी और गर्मी में ओजोन क्षरण का कोई खास चलन नहीं है।

वातावरण में एरोसॉल की मौजूदगी भी धरती की सतह के तापमान को बढ़ाती है। वातावरणीय ऐरोसॉल में फैलने की क्षमता है तथा वो सूरज की किरणों को और अधोरक्त किरणों को सोख सकती है। ये बादलों के लक्षण और माइक्रोफिजीकल बदलाव कर सकते है। वातावरण में इसकी मात्रा इंसानों की वजह से बढ़ी है। कृषि से गर्द पैदा होता है, जैव-ईंधन के जलने से कार्बनिक छोटी बूँदे और काले कण उत्पन्न होते है, और विनिर्माण प्रक्रियाओं में बहुत सारे विभिन्न पदार्थों के जलाए जाने से औद्योंगिक प्रक्रियाओं के द्वारा ऐरोसॉल पैदा होता है। परिवहन के माध्यम से भी अलग-अलग प्रदूषक निकलते है जो वातावरण में रसायनों से रिएक्ट करके एरोसॉल का निर्माण करते है।

ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव:

अमेरिका के भूगर्भीय सर्वेक्षणों के अनुसार, मोंटाना ग्लेशियर राष्ट्रीय पार्क में 150 ग्लेशियर हुआ करते थे लेकिन इसके प्रभाव की वजह से अब सिर्फ 25 ही बचे हैं। बड़े जलवायु परिवर्तन से तूफान अब और खतरनाक और शक्तिशाली होता जा रहा है। तापमान अंतर से ऊर्जा लेकर प्राकृतिक तूफान बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो जा रहे है। 1895 के बाद से साल 2012 को सबसे गर्म साल के रुप में दर्ज किया गया है और साल 2003 के साथ 2013 को 1880 के बाद से सबसे गर्म साल के रुप में दर्ज किया गया।

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बहुत सारे जलवायु परिवर्तन हुए है जैसे गर्मी के मौसम में बढ़ौतरी, ठंडी के मौसम में कमी,तापमान में वृद्धि, वायु-चक्रण के रुप में बदलाव, जेट स्ट्रीम, बिन मौसम बरसात, बर्फ की चोटियों का पिघलना, ओजोन परत में क्षरण, भयंकर तूफान, चक्रवात, बाढ़, सूखा आदि।

निष्कर्ष

सरकारी एजेँसियों, व्यापारिक नेतृत्व, निजी क्षेत्रों और एनजीओ आदि के द्वारा, कई सारे जागरुकता अभियान और कार्यक्रम चलाये और लागू किये जा रहे है। ग्लोबल वार्मिंग के द्वारा कुछ ऐसे नुकसान है जिनकी भरपाई असंभव है(बर्फ की चोटियों का पिघलना)। हमें इसके प्रभाव को घटाने के लिये अपना बेहतर प्रयास करना चाहिए। बिजली की ऊर्जा के बजाये सौर, वायु और जियोथर्मल से उत्पन्न ऊर्जा का इस्तेमाल करना चाहिये। तेल जलाने और कोयले के इस्तेमाल, परिवहन के साधनों, और बिजली के सामानों के स्तर को घटाने से ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को घटाया जा सकता है।

 

 

सम्बंधित जानकारी:

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