जवाहर लाल नेहरु निबंध

पंडित जवाहरलाल नेहरु एक महान नायक, कुशाग्र वकील, कुशल वक्ता के साथ-साथ उज्ज्वल भारत के पुरोधा थे। उनकी महिमा इसी बात से ज्ञात की जा सकती है कि उन्होने ही गणतंत्र भारत की नींव रखी। आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में यदा-कदा परीक्षाओं में पूछा जाता रहा है और आगे भी पूछा जायेगा। यहां हम इतिहास के पन्नों में अंकित युग-पुरुषों में से एक पंडित नेहरु का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास कर रहे हैं।

जवाहर लाल नेहरु पर छोटे तथा बड़े निबंध (Short and Long Essay on Jawaharlal Nehru in Hindi)

निबंध – 1 (300 शब्द)

प्रस्तावना

स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 14 नवंबर 1889, में  एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित मोती लाल नेहरु और माता का नाम स्वरुप रानी था। इनके पिता अपने समय के नामचीन वकील और सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। इनकी माता बेहद धार्मिक विचारों की महिला थी। जिसका प्रभाव उनके बेटे पर भी पड़ा। तीन भाई-बहनों में जवाहर अकेले बालक थे। बाकि दो उनकी बहनें थी। एक विजय लक्ष्मी पंडित, जो किसी परिचय की मोहताज नहीं। और दूसरी कृष्णा हुतेसिंग।

जवाहर लाल नेहरु

प्रभावशाली व्यक्तित्व

पंडित जवाहरलाल नेहरु प्रतिभावान वक्ता, सौम्य, सहृदयी चिंतक एवं दार्शनिक और ओजस्वी लेखक थे। अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी पंडित नेहरु ने महान कृतियों की रचना की। उनकी द्वारा लिखी पुस्तक ‘भारत एक खोज’(डिस्कवरी ऑफ इंडिया), ‘विश्व इतिहास की झलकियां’(ग्लिंप्सेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री), ‘पिता का पत्र पुत्री के नाम’(लेटर्स फ्रॉम अ फादर टु हिज़ डॉटर) आदि क्लासिक लिटरेचर की श्रेणी में आते हैं।

छठवीं-सातवीं दशक में लिखी गयी ये किताबें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उस वक़्त थी। उनकी लेखनी की यही तो खासियत थी। उनकी दूर-दृष्टि सोच ने उन्हें इतिहास के पन्नो में अमर कर दिया। उनके विचारों ने भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी। उनके प्रभाव से महात्मा गांधी भी अछूते नहीं रहे। शायद इन्हीं सब कारणों से वो महात्मा गांधी के सबसे करीब पहुंच गये थे। और बाद में यही उनके भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त किया।

उपसंहार

आधुनिक भारत का निर्माता कहे जाने वाले जवाहरलाल नेहरु ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी की अनेकों लड़ाईयां लड़ी। वे स्‍वतंत्रता संग्राम में प्रमुख योध्दा बन कर उभरे। उन्हें बच्चों से अपार स्नेह था। सभी बच्चे उन्हें ‘चाचा नेहरु’ कहकर बुलाते थे। इसीलिए हर साल उनके जन्म-दिवस को ‘बाल-दिवस’ के रुप में मनाते है।


 

निबंध – 2 (400 शब्द)

प्रस्तावना

स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु को समूचा विश्व एक धर्मनिरपेक्ष, मानवतावादी और श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ के रूप में जानता है। उन्होंने विश्व में समाजवाद का नया पर्याय रखा। उनके जीवन और व्यक्तित्व पर उनके पिता का गहरा प्रभाव पड़ा था। फिर भी उनकी आजादी को लेकर सोच पिता से सर्वथा अलग थी। उनके पिता पंडित मोती लाल नेहरु ब्रिटिश के अधीन डोमिनियन के पक्षधर थे, किन्तु जवाहरलाल नेहरु एक स्वतंत्र राष्ट्र चाहते थे। इसी मुद्दे पर दोनों पिता-पुत्र दो धूरियों में बंट गये थे। भारतीय इतिहास में एक समय ऐसा भी आया, जब वयोवृध्द मोती लाल नेहरु और युवा जवाहरलाल नेहरु के विचारों की अलग-अलग धाराएं बह रही थी।

 

प्रारंभिक जीवन

पंडित नेहरु का जन्म एक बड़े ही सम्भ्रांत परिवार में 14 नवंबर 1889 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था। घर के अकेले पुत्र होने के कारण इनका लालन-पालन बड़े ही लाड-प्यार से हुआ था। इनके पिता अपने टाइम के सम्पन्न वकीलों में से एक थे, साथ ही स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भागीदारी बढ़-चढ़कर होती थी। उनका समाज में बहुत ही इज्जत और रुतबा था। सभी उन्हें बड़ी सम्मान की दृष्टि से देखते थे। इन सबका का प्रभाव बालक जवाहर पर पड़ा।

पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद से ही हुई। चूंकि पंडित जवाहरलाल नेहरू अमीर घर से थे, इसलिए उनकी परवरिश राजकुमारों जैसी हुई। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें 1905, में इंग्लैण्ड भेज दिया गया। जहां से उन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई की। 1912, में अपनी शिक्षा पूरी कर वे स्वदेश लौट आए। 1916 में उनका विवाह कमला कौल से हो गया। कमला काश्मीर के ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती थी। कमला नेहरु ने पग-पग पर जवाहरलाल नेहरु का साथ दिया।

जवाहरलाल नेहरु पर महात्मा गांधी का बहुत प्रभाव पड़ा। 1919 में वे बापू के सम्पर्क में आए। देश की दुर्दशा देखकर जवाहरलाल नेहरु का मन द्रवित हो उठा। उन्होंने इंग्लैंड का जनजीवन देखा था। अब उनका मन वकालत में कहां लगने वाला था। देश की आजादी की लड़ाई में एक और योध्दा कूद पड़ा था। 1919 के जलियाँवाला नरसंहार देखकर वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने देश को अंग्रेजो के चंगुल से आजाद कराने की कसम खाई।

उपसंहार

नेहरू जी की “मेरी आत्मकथा” पुस्तक के विषय में भारत के प्रथम उपराष्टपति ‘डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन’ जी कहते थे कि, अगर उनके (जवाहरलाल नेहरु) बारे में जानना हो तो उनकी आत्मकथा पढ़ना चाहिए। उनकी पुस्तक में विश्व-शांति, धर्म-निरपेक्षता, आत्मकरुणा और नैतिक उत्तमता देखने को मिलती है। जोकि उनके जीवन और संघर्ष की कहानी दर्शाती है।


 

निबंध – 3 (500 शब्द)

प्रस्तावना

जवाहरलाल नेहरु किसी परिचय के मोहताज नहीं। उनका नरम स्वभाव, मध्यम मार्गी दृष्टिकोण, सौम्य चरित्र और देश के प्रति नवीन विचार और दूर-दर्शिता ने उन्हें सहसा ही भीड़ से अलग पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया।

स्वतंत्रता-सेनानी

हालांकि 1919 में ही नेहरु का आगमन देश की स्वाधीनता की लड़ाई में हो गया था, लेकिन असली अभ्योदय 1921 से माना जाता है। जब वे पहली बार जेल गये। धीरे-धीरे उनके विचारों से देश भिज्ञ हो रहा था। साइमन कमीशन के खिलाफ उन्होनें लखनऊ में प्रदर्शन किया और लाठियां भी खाई। एक राजकुमार की तरह जीने वाला इंसान देश के लिए कई बार जेल गया और जम़ीन पर सोकर रातें गुज़ारीं। वो जेल से ही अपनी बेटी इंदिरा को पत्र लिखा करते थे। किंतु उनके अपनी पुत्री से बात करने का तरीका एकदम भिन्न होता था।

1928 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। यहीं से कांग्रेस में नेहरु युग का प्रारंभ हुआ। ऐसा कहा जाता है, गांधी जी उनकी प्रतिभा के कायल थे। अब इसमें कितनी सच्चाई है, कहा नहीं जा सकता। किंतु गांधी जी के प्रिय होने का लाभ उन्हें सदैव मिला। उनसे भी ज्यादा काबिल और देशभक्त लोगों के होने के बावजूद उन्हें बार-बार मौका दिया गया।

जवाहरलाल नेहरु का राजनैतिक परिचय

सन् 1929, नेहरु जी की लाइफ का टर्निंग प्वाइंट था, जब वे दिसंबर माह में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन की बागडोर सम्भाल रहे थे। इस अधिवेशन में कांग्रेस के द्वारा ‘डोमिनियन’ की मांग उठायी गयी। जिसे अंग्रेजी सरकार ने ठुकरा दिया। फिर क्या था, अपनी मांग ठुकराये जाने पर पंडित नेहरु ने अर्धरात्रि में रावी नदी के तट पर 26 जनवरी 1930 को भारत को एक ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ घोषित कर दिया और अपना नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित करा दिया। उसी दिन को आधार मानकर 1950 में 26 जनवरी को देश में गणतंत्र प्रभावी कराने का दिन सुनिश्चित किया गया।

1930 के बाद से ही सभी को नेहरु में गांधी जी का उत्तराधिकारी दिखने लगा था। गांधी जी के 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन से लेकर 1942 के ‘क्विट इंडिया मूवमेंट’ तक सभी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और उल्लेखनीय भूमिका निभाई। और स्वतंत्र भारत की कमान उनके हाथों में सौंप दी गयी। और इस तरह आजाद देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

1950 में देश में गणतंत्र लागू करते ही देश की उन्नति में तन-मन से जुट गये। उन्हें नवीन भारत का आर्किटेक कहा जाता है। देश के विकास में पहला कदम़ उठाते हुए 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना लागू कर दी। 1964 तक बिना रुके उन्होंने देश की सेवा करते हुए अंतिम सांस ली।

उपसंहार

“मेरे विचार में, हम भारतवासियों के लिए- एक विदेशी भाषा को अपनी सरकारी भाषा के रूप में स्वीकारना सरासर अशोभनीय होगा। मैं आपको कह सकता हूँ कि बहुत बार जब हम लोग विदेशों में जाते हैं, और हमें अपने ही देशवासियों से अंग्रेज़ी में बातचीत करनी पड़ती है, तो मुझे कितना बुरा लगता है। लोगों को बहुत ताज्जुब होता है, और वे हमसे पूछते हैं कि हमारी कोई भाषा नहीं है? हमें विदेशी भाषा में क्यों बोलना पड़ता हैं?” ---- जवाहरलाल नेहरु

नेहरु जी के ऐसे विचार सुनकर सारी जनता में क्रांति की लहर दौड़ गयी।