महात्मा गांधी पर निबंध

महात्मा गांधी, "बापू" या "राष्ट्रपिता" के रूप में भारत में बहुत प्रसिद्ध है। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी है। वें एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे और एक राष्ट्रवाद नेता की तरह ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का नेतृत्व किया था। महात्मा गांधी को सर्वप्रथम रविन्द्र नाथ टैगोर ने 1915 में ‘महात्मा’ कहकर संबोधित किया था। दक्षिण अफ्रीका में चलाये गये रंगभेद के विरोध में गांधी जी के ऐतिहासिक आंदोलन को देखते हुए उन्हें एक पत्र लिखा था और 'महात्मा' कहकर संबोधित किया था।

महात्मा गांधी पर छोटे तथा बड़े निबंध (Short and Long Essay on Mahatma Gandhi in Hindi)

निबंध – 1 (300 शब्द)

प्रस्तावना

कहते हैं, महात्मा गांधी जैसा महापुरुष सदियों में एक बार जन्म लेता है। गांधी जी को युगपुरुष की उपाधि से भी नवाजा जाता है। गांधी जी का जीवन एक अनुकरणीय जीवन माना जाता है। वो किसी को केवल उपदेश नहीं देते थे, बल्कि पहले स्वयं करके उदाहरण पेश करते थे। उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए जो हथियार चुना, वो सर्वथा कल्पनातीत है। जिसके आगे अंग्रेजों को भी घुटने टेकने पड़े। सत्य और अहिंसा जैसे दो अकल्पनीय शस्त्र चुनें जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। और इस तरह उन्हें अहिंसा के पुजारी के रुप में इतिहास में अमर कर दिया।

महात्मा गांधी

जीवन-परिचय

महात्मा गांधी का जीवन हमेशा से ही अलग रहा। इनका जन्म गुजरात (काठियावाड़ा) के पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 में हुआ था। इनका पुरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनके पिता करमचंद गांधी काठियावाड़ (अब गुजरात) रियासत के नामी दिवान थे। अत्यधिक धार्मिक विचारों की उनकी माता पुतलीबाई वैश्य समुदाय से सम्बध्द थी। मोहनदास पर उनका विशेष प्रभाव था। श्रद्धा, भक्ति और सेवा भावना उन्हें अपनी मां से विरासत में मिली।

प्रारंभ से ही बालक मोहन का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। इनकी आरंभिक शिक्षा तो पोरबंदर से ही सम्पन्न हुई। हाईस्कूल की शिक्षा के लिए उन्हें राजकोट भेज दिया गया। इसी बीच उनका विवाह मह़ज तेरह वर्ष की आयु में कस्तुरबा से हो गया। मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने 1887 में अहमदाबाद से दी। उसके बाद 1888 में वकालत की पढ़ाई करने लंदन चले गये।

उपसंहार

मोहनदास का अपनी माता पुतली बाई से बहुत गहरा लगाव था।  सन् 1897 में जब वो लंदन से वापस घर आए तो अपनी माता की मृत्यु का पता चला। जिस कारण वो एकदम ही टूट गये। अब उनका मन घर में नहीं लगता था। उन्होंने बॉम्बे से वकालत करने का मन बनाया। किन्तु कोई सफलता नही मिली।


 

निबंध – 2 (400 शब्द)

प्रस्तावना

देश की आजादी के अग्रदूत राष्ट्रपिता के नाम से सम्मानित महात्मा गांधी जी की जितनी महिमा की जाये वो कम है। वो केवल हमारे देश के लिए नहीं अपितु समस्त विश्व के लिए उदाहरण हैं। सत्य और अहिंसा की मूरत है। इनके जैसा युगपुरुष पुरी दुनिया में केवल एक बार ही जन्म लेता है। उनके द्वारा दिखाये रास्ते को पूरी दुनिया मानती और अनुकरण करती है।

 

शिक्षा-दीक्षा

बापू के नाम से विश्व प्रसिध्द महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। इनकी माता का नाम पुतलीबाई था। वो बहुत ही धार्मिक विचारों की महिला थी। करमचंद गांधी अपने समय के प्रसिध्द दीवान थे। उनका समाज में रुतबा हुआ करता था। मोहनदास अपने माता-पिता की अकेली संतान थे। जिस कारण उनका लालन-पालन बहुत अच्छे से हुआ।

मोहनदास बचपन में पढ़ाई में अच्छे नहीं थे। उन्हें गणित तो बिलकुल समझ में नहीं आती थी। धीरे-धीरे उन्होंने ये बात स्वीकार भी कर ली। किन्तु पिता के डर के कारण न चाहते हुए भी करना पढ़ना पड़ता था। वो बचपन में बेहद शर्मीले और शांत स्वभाव के थे। कोई बचपन में उनको देखकर ये अन्दाजा भी नहीं लगा सकता था कि ये आगे चलकर यह बालक इतिहास रचेगा।

प्राथमिक शिक्षा पोरबंदर से ही हुई। मोहनदास की आगे की पढ़ाई के लिए गांधी परिवार राजकोट शिफ्ट हो गया। जिससे बच्चे की शिक्षा बाधित न हो। राजकोट में भी पिता करमचंद को दिवान बना दिया गया। हाईस्कुल की परीक्षा राजकोट से उत्तीर्ण की। आगे की शिक्षा लेने अहमदाबाद चले गये। शिक्षा के क्षेत्र में वे एक औसत छात्र रहे। मैट्रिक के बाद, की परीक्षा उन्होंने भावनगर के शामलदास कॉलेज से बड़ी मुश्किल से पूरी की। उनका मन कभी पढ़ाई में नहीं लगा। परिवार से विछोह वो सह नहीं पाये, और बीच में ही पढ़ाई छोड़कर घर लौट आए। चूंकि इसके लिए उन्हे पिता के गुस्से का सामना करना पड़ा।

निष्कर्ष

4 सितंबर 1888, को लंदन रवाना हो गए। इस वक़्त गांधी जी अपने 19वें बसंत में कदम रखने ही वाले थे। गांधी जी ने इंग्लैंड के यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढ़ाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये दाखिला ले लिया। यह समय उनके लिए काफी समस्यामक रहा। क्योंकि भारत छोड़ते समय उनकी माँ ने वचन लिया था, कि वो लंदन में रहकर कभी मांस-मदिरा का सेवन नहीं करेंगे। इस कारण शाही राजधानी लंदन में गुजारा नहीं कर पा रहे थे। हालांकि गांधी जी ने अंग्रेजी रीति रिवाजों का लुत्भ भी उठाया।


 

निबंध – 3 (500 शब्द)

भूमिका

गांधी जी के जीवन का निर्णायक क्षण तभी से शुरु हो गया था जब वो पहली बार दक्षिण अफ्रीका गये। 1893 में जब उन्हें भारत में रहकर वकालत करने में कोई सफलता नहीं मिली तब उन्होने यहां से जाना ही उचित समझा। और एक भारतीय फर्म से नेटाल दक्षिण अफ्रीका में, जो उन दिनों ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था, एक वर्ष के करार पर वकालत करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

गांधी जी द्वारा लड़े गये आंदोलन

गांधी दक्षिण अफ्रीका में

दक्षिण अफ्रीका में गांधी को भारतीयों पर हो रहे भेदभाव और प्रताड़ना को भी झेलना पड़ा। इतना ही नहीं उन्हें चलती गाड़ी से धकेलकर बाहर केवल इसलिए फेंक दिया गया क्योंकि उन्होंने प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद तीसरी श्रेणी में जाकर बैठने से मना कर दिया और अपने साथ हो रहे अत्याचार का विरोध किया। साथ ही चालक की मार भी झेलनी पड़ी। यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। उन्होंने अपनी इस यात्रा में और भी कठिनाइयों का सामना किया। अफ्रीका में कई होटलों में उनका प्रवेश वर्जित कर दिया गया।

वर्ष 1914 में गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आये। इस समय तक गांधी एक राष्ट्रवादी नेता और संयोजक के रूप प्रसिध्द हो गये थे और वे उदारवादी कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के बुलावे पर भारत आये थे। और सबसे पहले देश की मौजूदा हालत को समझने के लिए सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक विषयों का गहनता से विश्लेषण किया।

चम्पारण और खेड़ा सत्याग्रह

चम्पारण (बिहार) और खेड़ा (गुजरात) के आंदोलनों ने पहली बार गाँधी से भारत का परिचय कराया। यह उनकी भारत में पहली राजनैतिक जीत थी। चंपारण में ब्रिटिश ज़मींदार किसानो से जबरन नील की खेती करवा रहे थे और बेहद कम दामों में उनसे ऐंठ रहे थे, जिस कारण किसानों की भूखों मरने की नौबत आ गयी थी।

खिलाफत आन्दोलन

खिलाफत आंदोलन से गांधी जी की साख कांग्रेस और मुसलमानों के बीच और भी पुख्ता हो गयी। प्रथम विश्व युध्द के दौरान ऑटोमन साम्राज्य ध्वस्त हो गया था। इस कारण खलीफा के गिरते प्रभाव का विरोध सारी दुनिया के मुसलमान खिलाफत आंदोलन में शरीक होकर कर रहे थे। भारतीय मुसलमानों का साथ देने के कारण उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए सम्मान और मैडल वापस लौटा दिए। जिसका मुसलमानों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

असहयोग आन्दोलन

गाँधी जी के अनुसार भारत में अंग्रेज इसीलिए टिक पाये, क्योंकि हमने उन्हें ऐसा करने दिया। अब तक वो भारत के सबसे लोकप्रिय नेता के रुप में स्थापित हो चुके थे। पूरा भारत उनका अनुसरण करने लगा था। अंग्रेजों के खिलाफ सत्य, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिरोध जैसे अस्त्रों का प्रयोग कर उन्होंने अहयोग आंदोलन का शंखनाद कर दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन के शुरु होते ही देश की आजादी का सूत्रपात होने लगा था। अब गांधी जी ने भी अहिंसा के स्थान पर ‘करो या मरो’ जैसा नारा दिया। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारा अब हर गली, नुक्कड़, चौराहों से लेकर हर घर तक पहुंच गया था। अब अंग्रेजी हुकुमत समझ गयी थी कि हमें और गुलाम रख पाना संभव नहीं और अन्ततः 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी शासन का अंत हुआ और नये आजाद भारत का अभ्युदय।

निष्कर्ष

गांधी जी का सपना आजाद भारत को देखने का पूरा हो गया था। उन्होंने देश की बागडोर पंडित जवाहर लाल नेहरु को सौंपी। देश उस समय कई टुकड़ो में बंटा हुआ था, जिसे संयुक्त करना देश के हित के लिए नितांत आवश्यक था। इतनी बड़ी जिम्मेदारी का वहन केवल एक ही इंसान कर सकता था – लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल।

 

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