महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर निबंध

भारत में महिलाओं के विरुद्ध होती हिंसा के विषय में हमने यहाँ अलग-अलग शब्द सीमा में छात्रों को कुछ निबंध उपलब्ध करवाए हैं। अक्सर छात्रों को इस विषय पर अपने स्कूल या कहीं किसी और प्रतियोगिता में निबंध तथा अनुच्छेद लिखने को कहा जाता है। छात्र अपनी पसंद के अनुसार जिस शब्द सीमा का निबंध चाहे चुन सकते है। सभी निबंध को छात्रों की जरुरत के हिसाब से लिखा गया है।

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा (वायलेंस अगेंस्ट वीमेन इन इंडिया एस्से)

You can find here some essays on Violence against Women in India in Hindi language for students in 100, 150, 200, 250, 300, and 400 words.

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर निबंध 1 (100 शब्द)

21वीं सदी के भारत में तकनीकी प्रगति और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा दोनों ही साथ-साथ चल रहे है। महिलाओं के विरुद्ध होती यह हिंसा अलग-अलग तरह की होती है तथा महिलाएं इस हिंसा का शिकार किसी भी जगह जैसे घर, सार्वजनिक स्थान या दफ्तर में हो सकती हैं। महिलाओं के प्रति होती यह हिंसा अब एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है और इसे अब और ज्यादा अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि महिलाएं हमारे देश की आधी जनसँख्या का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्राचीन काल से ही महिलाओं को मनोरंजन का साधन माना जाता था। घरेलू जिंदगी की बात हो या फिर किसी सार्वजानिक समारोह के आयोजन का किस्सा हो महिलाओं को हर जगह पुरुषों द्वारा अपमानित किया जाता था, उनका शोषण किया जाता था, यातनाएं दी जाती थीं।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर निबंध 2 (150 शब्द)

भारत में जब से सामाजिक जीवन की शुरुआत हुई है तब से कई सदियाँ आई और गई, समय ने लोगों की सोच और माहौल दोनों को बदला पर अभी भी महिलाओं पर होती हिंसा में किसी तरह की कमी नहीं आई है। समय महिलाओं पर होती हिंसा का सच्चा गवाह है। समय ने बेबस और लाचार महिलाओं को अलग अलग दुखों (लिंग भेदभाव, शारीरिक शोषण, दमन, छेड़छाड़, निरादर) से गुजरते हुए देखा है। यह वह भारतीय समाज है जहाँ महिलाओं को देवी समान पूजा जाता है जबकि महिलाएं खुद को बेसहारा और बेबस महसूस करती हैं। वेदों में नारी को माँ कहा गया है जिसका मतलब है जो जन्म देने के साथ-साथ लालन पोषण भी करती है। वहीँ माँ इस पुरुष-प्रधान सोच वाले समाज में खुद को दबा कुचला हुआ मानती है।

महिलाएं लगातार हिंसा का शिकार हो रही है। इस हिंसा के कई रूप होते है जैसे घरेलू हिंसा, सार्वजानिक स्थान पर हिंसा, शारीरिक हिंसा, मानसिक हिंसा इत्यादि। महिलाओं में हिंसा का डर इस कदर घर कर गया है की वे अपने पसंदीदा क्षेत्रों में खुलकर भागीदारी भी नहीं कर पा रहीं हैं। महिलाओं के प्रति होती इस क्रूरता ने उनके दिलों-दिमाग पर गहरा असर डाला है। ऐसा लगता है की अगर समाज से हिंसा को पूरी तरह मिटा भी दिया जाए तब भी शायद महिलाओं के ज़हन से हिंसा का नामो-निशान मिटा पाना मुश्किल होगा।

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर निबंध 3 (200 शब्द)

भारतीय समाज में हमेशा से ही पुरुषों का प्रभुत्व रहा है जहाँ महिलाओं को प्राचीन काल से ही अलग-अलग तरह की हिंसा का शिकार होना पड़ा है। एक तरफ दुनिया में तकनीकी क्षेत्र में लगातार प्रगति हो रही है, खुशहाली का स्तर बढ़ रहा है वहीँ महिलाओं से अप्राकृतिक यौन संबंध और दुर्व्यवहार में भी वृद्धि हुई है।

आजकल महिलाओं से बलात्कार और उनकी बर्बर हत्या करना एक आम घटना हो गई है। आज के भारतीय समाज में महिलाओं से मारपीट, उनका उत्पीड़न करना, राह चलते जबरदस्ती चेन अथवा दूसरे आभूषण खींच लेना तो जैसे रोज़ की दिनचर्या का हिस्सा बन गई है। दहेज़ के लिए हत्या कर देना, जिंदा जला देना, मारपीट करके घर से बाहर निकाल देना जैसी घटनाएँ समाज में हिंसा को बढ़ावा दे रही है। आज़ाद हिंदुस्तान में महिलाओं पर होते ये अत्याचार व्यापक स्तर पर फ़ैल चुके हैं। महिलाओं के विरुद्ध बढती हिंसा से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास पर भी बुरा असर पड़ रहा है।

हमारे समाज में बढ़ते दहेज़ प्रथा के चलन से यह साफ़ प्रमाणित होता है की महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को कभी भी खत्म नहीं किया जा सकता। यह एक पेचीदा समस्या बन चुकी है जो हिंसा के कई पहलुओं को समेटे हुई है। दहेज़ प्रथा ने समाज में नाबालिग लड़कियों के रुतबे तथा प्रतिष्ठा को कम किया है। ऐसा अक्सर देखा जाता है की अगर शादी के वक़्त ससुराल पक्ष के मन-मुताबिक दहेज़ न दिया गया तो नवोदित दुल्हन से ससुराल में रोज़ दुर्व्यवहार, मारपीट और बदसलूकी की जाती है। हर रोज़ हजारों लड़कियां इस सामाजिक राक्षस का शिकार बन रही है।


 

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर निबंध 4 (250 शब्द)

भारतीय समाज के पुरुष-प्रधान होने की वजह से महिलाओं को बहुत अत्याचारों का सामना करना पड़ा है। आमतौर पर महिलाओं को जिन समस्याओं से दो-चार होना पड़ा है उनमे प्रमुख है दहेज़-हत्या, यौन उत्पीड़न, महिलाओं से लूटपाट, नाबालिग लड़कियों से राह चलते छेड़-छाड़ इत्यादि। भारतीय दंड संहिता के अनुसार बलात्कार, अपहरण अथवा बहला फुसला के भगा ले जाना, शारीरिक या मानसिक शोषण, दहेज़ के लिए मार डालना, पत्नी से मारपीट, यौन उत्पीड़न आदि को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। महिला हिंसा से जुड़े केसों में लगातर वृद्धि हो रही है और अब तो ये बहुत तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं।

हिंसा से तात्पर्य है किसी को शारीरिक रूप से चोट या क्षति पहुँचाना। किसी को मौखिक रूप से अपशब्द कह कर मानसिक परेशानी देना भी हिंसा का ही प्रारूप है। इससे शारीरिक चोट तो नहीं लगती परन्तु दिलों-दिमाग पर गहरा आघात जरुर पहुँचता है। बलात्कार, हत्या, अपहरण आदि को आपराधिक हिंसा की श्रेणी में गिना जाता है तथा दफ़्तर या घर में दहेज़ के लिए मारना, यौन शोषण, पत्नी से मारपीट, बदसलूकी जैसी घटनाएँ घरेलू हिंसा का उदाहरण है। लड़कियों से छेड़-छाड़, पत्नी को भ्रूण-हत्या के लिए मज़बूर करना, विधवा महिला को सती-प्रथा के पालन करने के लिए दबाव डालना आदि सामाजिक हिंसा के अंतर्गत आती है। ये सभी घटनाएँ महिलाओं तथा समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित कर रहीं हैं।

महिलाओं के प्रति होती हिंसा में लगातार इज़ाफा हो रहा है और अब तो ये चिंताजनक विषय बन चुका है। महिला हिंसा से निपटना समाज सेवकों के लिए सिरदर्द के साथ-साथ उनके लिए एक बड़ी जिम्मेवारी भी है। हालाँकि महिलाओं को जरुरत है की वे खुद दूसरों पर निर्भर न रह कर अपनी जिम्मेदारी खुद ले तथा अपने अधिकारों, सुविधाओं के प्रति जागरूक हो।

 

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर निबंध 5 (300 शब्द)

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बहुत पुराना सामाजिक मुद्दा है जिसकी जड़ें अब सामजिक नियमों तथा आर्थिक निर्भरता के रूप में जम चुकी है। बर्बर सामूहिक बलात्कार, दफतर में यौन उत्पीड़न, तेजाब फेकनें जैसी घटनाओं के रूप में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उजागर होती रही है। इसका ताज़ा उदाहरण है राजधानी दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 निर्भया गैंग-रेप केस। 23 साल की लड़की से किये गए सामूहिक बलात्कार ने देश को झकझोर कर रख दिया था। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में भीड़ बदलाव की मांग करती हुई सड़कों पर उतर आई। ऐसी घटनाओं के रोज़ होने के कारण इससे महिलाओं के लिए सामाजिक मापदंड बदलना नामुमकिन सा लगता है। लोगों की शिक्षा स्तर बढ़ने के बावजूद भारतीय समाज के लिए ये समस्या गंभीर तथा जटिल बन गई है। महिलाओं के विरुद्ध होती हिंसा के पीछे मुख्य कारण है पुरुष प्रधान सोच, कमज़ोर कानून, राजनीतिक ढाँचे में पुरुषों का हावी होना तथा नाकाबिल न्यायिक व्यवस्था।

एक रिसर्च के अनुसार महिलाएं सबसे पहले हिंसा का शिकार अपनी प्रारंभिक अवस्था में अपने घर पर होती हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को उनके परिवारजन, पुरुष रिश्तेदारों, पड़ोसियों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है।

भारत में महिलाओं की स्थिति संस्कृति, रीती-रिवाज़, लोगों की परम्पराओं के कारण हर जगह भिन्न है। उत्तर-पूर्वी राज्यों तथा दक्षिण भारत के राज्यों में महिलाओं की अवस्था बाकि राज्यों के काफी अच्छी है। भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों के कारण भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 1000 लड़कों पर केवल 940 लड़कियां ही थी। इतनी कम लड़कियों की संख्या के पीछे भ्रूण-हत्या, बाल-अवस्था में लड़कियों की अनदेखी तथा जन्म से पहले लिंग-परीक्षण जैसे कारण हैं।

राष्ट्रीय अपराधिक रिकार्ड्स ब्यूरो के अनुसार महिलाएं अपने ससुराल में बिलकुल भी सुरक्षित नहीं हैं। महिलाओं के प्रति होती क्रूरता में एसिड फेंकना, बलात्कार, हॉनर किलिंग, अपरहण, दहेज़ के लिए क़त्ल करना, पति अथवा ससुराल वालों द्वारा पीटा जाना आदि शामिल है।


 

भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर निबंध 6 (400 शब्द)

भारत में महिलाएं हर तरह के सामाजिक, धार्मिक, प्रान्तिक परिवेश में हिंसा का शिकार हुई हैं। महिलाओं को भारतीय समाज के द्वारा दी गई हर तरह की क्रूरता को सहन करना पड़ता है चाहे वो घरेलू हो या फिर शारीरिक, सामाजिक, मानसिक, आर्थिक हो। भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को बड़े स्तर पर इतिहास के पन्नों में साफ़ देखा जा सकता है। वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति आज के मुकाबले बहुत सुखद थी पर उसके बाद, समय के बदलने के साथ-साथ महिलाओं के हालातों में भी काफी बदलाव आता चला गया। परिणामस्वरुप हिंसा में होते इज़ाफे के कारण महिलाओं ने अपने शिक्षा के साथ सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक समारोह में भागीदारी के अवसर भी खो दिए।

महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों के कारण उन्हें भरपेट भोजन नहीं दिया जाता था, उन्हें अपने मनपसंद कपड़े पहनने की अनुमति नहीं थी, जबरदस्ती उनका विवाह करवा दिया जाता था, उन्हें गुलाम बना के रखा जाने लगा, वैश्यावृति में धकेला गया। महिलाओं को सीमित तथा आज्ञाकारी बनाने के पीछे पुरुषों की ही सोच थी। पुरुष महिलाओं को एक वस्तु के रूप में देखते थे जिससे वे अपनी पसंद का काम करवा सके। भारतीय समाज में अक्सर ऐसा माना जाता है की हर महिला का पति उसके लिए भगवान समान है। उन्हें अपने पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखना चाहिए तथा हर चीज़ के लिए उन्हें अपने पति पर निर्भर रहना चाहिए। पुराने समय में विधवा महिलाओं के दोबारा विवाह पर पाबंदी थी तथा उन्हें सती प्रथा को मानने का दबाव डाला जाता था। महिलाओं को पीटना पुरुष अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे। महिलाओं के प्रति हिंसा में तेज़ी तब आई जब नाबालिग लड़कियों को मंदिर में दासी बना कर रखा जाने लगा। इसने धार्मिक जीवन की आड़ में वैश्यावृति को जन्म दिया।

मध्यकालीन युग में इस्लाम और हिन्दू धर्म के टकराव ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा दिया। नाबालिग लड़कियों का बहुत कम उम्र में विवाह कर दिया जाता था और उन्हें हर समय पर्दे में रहने की सख्त हिदायत दी जाती थी। इस कारण महिलाओं के लिए अपने पति तथा परिवार के अलावा बाहरी दुनिया से किसी भी तरह का संपर्क स्थापित करना नामुमकिन था। इसके साथ ही समाज में बहुविवाह प्रथा ने जन्म लिया जिससे महिलाओं को अपने पति का प्यार दूसरी महिलाओं से बांटना पड़ता था। नववधू की हत्या, कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ प्रथा महिलाओं पर होती बड़ी हिंसा का उदाहरण है। इसके अलावा महिलाओं को भरपेट खाना न मिलना, सही स्वास्थ्य सुविधा की कमी, शिक्षा के प्रयाप्त अवसर न होना, नाबालिग लड़कियों का यौन उत्पीड़न, दुल्हन को जिन्दा जला देना, पत्नी से मारपीट, परिवार में वृद्ध महिला की अनदेखी आदि समस्याएँ भी महिलाओं को सहनी पड़ती थी।

भारत में महिला हिंसा से जुड़े केसों में होती वृद्धि को कम करने के लिए 2015 में भारत सरकार जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन) बिल लाई। इसका उद्देश्य साल 2000 के इंडियन जुवेनाइल लॉ को बदलने का था क्योंकि इसी कानून के चलते निर्भया केस के जुवेनाइल आरोपी को सख्त सजा नहीं हो पाई। इस कानून के आने के बाद 16 से 18 साल के किशोर, जो गंभीर अपराधों में संलिप्त है, के लिए भारतीय कानून के अंतर्गत सख्त सज़ा का प्रावधान है।

 

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