जाति प्रथा

जाति प्रथा हिन्दूत्व में व्यवहारिकता से जुड़ा तथ्य है। इसकी उत्पत्ति, मूल्यांकन, और अस्तित्व भारत के लिये समान्य है। जाति प्रथा बहुत हद तक जातिवाद की पश्चिमी अवधारणा जैसी है जहां लोगों के साथ भेदभाव उनके शरीर के रंग के कारण होता है; इसी तरह, जाति प्रथा में, भेदभाव जन्म के आधार पर किया जाता है जैसे: व्यक्ति का सामाजिक स्तर उसका/उसकी जाति के आधार पर परिभाषित किया जाता है जिसमें उसका जन्म होता है। दूसरे शब्दों में, जाति के आधार पर, व्यक्ति के जन्म के समय ही निश्चित होता है कि वो समाज के उच्च या निम्न स्तर से संबंधित है।

ये बहुत शर्म की बात है कि, अब 21वीं शताब्दी में भी और इस आयु और समय में जबकि मानव समाज ने वैज्ञानिक तौर पर इतनी तरक्की की है कि लोग मंगल ग्रह पर भी जमीन खरीदने की योजना बना रहे हैं, भारतीय समाज तब भी जाति प्रथा जैसी प्राचीन व्यवस्था में विश्वास रखता है।

यहां बहुत से सामाजिक आन्दोलनों और उल्लेखनीय समाज सुधारकों ने अपना सारा जीवन इस एकमात्र जन्म पर आधारित भेदभाव का उन्मूलन करने के लिये लगा दिया। हांलाकि, ये जमीनी तौर पर नहीं हुआ है। भारतीय संविधान ने भी सामाजिक रुप से पिछड़े लोगों के अधिकरों को सुनिश्चित करने के लिये बहुत से प्रावधानों को किया और इसके सन्दर्भ में कानून भी है लेकिन इसके सन्दर्भ में अभी और भी बहुत कुछ होना चाहिये।

इस लेख में, हम जाति प्रथा के विभिन्न आयामों जैसे: जाति का अर्थ, वर्ण व्यवस्था, इसके बुरे प्रभाव, संवैधानिक सुरक्षा तंत्र और वर्तमान विवरण को समझने और खोजने का प्रयास करेंगें।

Caste System

जाति का अर्थ

जाति प्रथा जिसे वर्ण और जाति के रुप में भी जाना जाता है जिसे जन्म के आधार पर पहचान के रुप में समझा जा सकता है। ये वो पदवी है जो किसी को भी उसके बिना पूछे दे दी जाती है। ये विरासत में मिली व्यवस्था है; इस प्रकार, एक बच्चा जन्म के साथ ही अपने पिता की जाति को ग्रहण करता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, मुख्य रुप से चार प्रकार के वर्णों की व्यवस्था है जो हिन्दू समाज को, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र में बांटती है।

जाति प्रथा (जातिवाद) क्या है

जाति या वर्ण प्रथा पूरी तरह से भारतीय तथ्य है और विशेषरुप से प्रथा हिन्दूओं द्वारा, बहुत समय के साथ, यहाँ तक कि जब से भारत को माना जाता है, अन्य धर्मों जैसे इस्लाम, सिख, ईसाई आदि को धारण की हुयी व्यवस्था है।

जैसे कि पहले ही व्याख्या की जा चुकी है कि ये बहुत हद तक पश्चिम की जाति अवधारणा की तरह ही है, इसकी यूरोपीय द्वीप की वर्ग व्यवस्था के साथ भी तुलना की जा सकती है। वर्ग व्यवस्था भी भेदभाव की व्यवस्था की तरह ही है। वर्ग व्यवस्था भी बहुत से विभिन्न तथ्यों जैसे: धन, शक्ति, प्रतिष्ठा, जन्म वंशावली और व्यवसाय पर भी आधारित है। सामान्यतः, वर्ग विरासत नहीं है जबकि जाति है। लेकिन जाति व्यवस्था के समान ही, वर्ग व्यवस्था भी सामाजिक समूहों में समाज में उनके स्तर के आधार को लेकर विभिन्नताओं को लिये हुये है।

वर्ण व्यवस्था, वर्ग व्यवस्था का ही अनोखा रुप है जिसमें समाज का क्रम जन्म के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था केवल भारतीय उपमहाद्वीपों मे ही अस्तित्व में है। वर्ग व्यवस्था की तरह, वर्ण व्यवस्था किसी एक व्यक्ति को एक जाति से दूसरी जाति में जाने की अनुमति नहीं देती। अलग जाति के लोगों के बीच एक दूसरे के साथ भोजन करने और शादी करने पर कड़ा प्रतिबंद्ध है। जाति व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता सजातियता है जैसे: अपनी जाति में ही शादी करना। ये बहुत सामान्य, दृढ़ और बहुत अच्छे से परिभाषित व्यवस्था है।

यही कारण है कि वर्ण या जाति बहुत करीबी वर्ग माने जाते हैं। ये संतुष्टि के लिये बहुत करीबी व्यवस्था है जिसमें लगभग सभी बच्चों का अन्त समाज के उसी वर्ग में होता जिससे उनके पिता संबंधित थे।

भारत में जाति व्यवस्था की उत्पत्ति

भारत में जाति व्यवस्था अस्तित्व में कब आयी इसकी कोई भी तिथि निश्चित नहीं है। किन्तु मनुस्मृति के अनुसार, भारत में जाति प्रथा के अन्तर्गत, प्रारम्भ में, लोगों के लिये उनके व्यवसाय के आधार पर आवश्यक कोड वर्णित किये जाते थे। इस प्रकार, ये उनके व्यवसाय पर आधारित होती है। लेकिन, आमतौर पर, लोगों के व्यवसाय विरासत बन गये और जाति व्यवस्था भी व्यवसाय से जन्म में और फिर विरासत के रुप में बदल गयी। अब एक व्यक्ति की जाति उसके जन्म के आधार पर और स्थिर सामाजिक स्थिति हो जाती है।

जहां तक कि जाति की उत्पत्ति के संबंध में माना जाता है, ऋग्वेद के अनुसार, धर्म के सिद्धान्त की व्याख्या की जाती है जोकि हिन्दूओं के सबसे पवित्र ग्रन्थों में से एक है के अनुसार, विभिन्न प्रकार के वर्णों का निर्माण प्रारम्भिक पुरुष (सबसे पहला व्यक्ति) के विभिन्न अंगों से हुआ है, ब्राह्मण का निर्माण उसके मस्तिष्क से हुआ, क्षत्रिय का निर्माण उसके हाथों से हुआ, वैश्य का निर्माण उसकी जांघों से हुआ और शुद्र का निर्माण उसके पैरों से हुआ। कुछ सिद्धान्तों का ये भी विश्वास है कि प्रारम्भिक पुरुष कोई और नहीं बल्कि स्वंय भगवान ब्रह्मा थे। इसलिये उनके अनुसार, विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा से हुई है।

 

जाति प्रथा में जाति का वर्गीकरण

जातियों का वर्गीकरण उनके व्यवसायों के अनुसार किया जाता है। धन, शक्ति और विशेषाधिकारों के कारण, दो उच्च वर्ग ब्राह्मण और क्षत्रियों ने अपनी स्थिति को पूरी तरह से सुनिश्चित करने और एकाधिकार जमाने के लिये दूसरे धर्मों का प्रयोग करना शुरु कर दिया। इतिहास भी हमें यही बताता है कि समाज में सर्वोच्च स्थिति पर केवल दो ऊपरी जातियों का ही आधिपत्य था।

यहां तक कि परिस्थितियां अभी भी समान है। ये ऊपरी दो श्रेणियां निम्न जाति से बहुत श्रेष्ठ मानी जाती है। इस श्रेष्ठता को स्वीकृति या वैधता विभिन्न धार्मिक लेखों द्वारा प्रदान की गयी थी, इसलिये कोई भी इस पर प्रश्न नहीं करता है। इस तरह के लोग अपनी शक्ति की स्थिति, शक्ति और रुढ़िवादी परंपराओं के द्वारा स्थिर बनाना चाहते हैं।

यहां तक कि सामज के शुरुआतीकरण से माना जाता है, ब्राह्मण, आमतौर पर पुजारी या विद्वान, सबसे ऊपर होते हैं। दूसरा वर्ग क्षत्रिय, शासन करने वाला और सैनिकों को शामिल करता है। सामान्यतः, क्षत्रिय ब्राह्मणों से जुड़े होते थे क्योंकि, वो उनके द्वारा अपना शासन चलाते थे। एक क्षत्रिय शारीरिक और मानसिक मजबूती का प्रतीक होता है।

विरासत के अनुसार अगला वैश्य या व्यापारी वर्ग होता है। ये वैश्यों का कर्तव्य होता था कि वो समुदाय की समृद्धि को कृषि, पशुपालन, व्यापार और उद्योगों के माध्यम से सुनिश्चित करें। वैश्यों को तुलनात्मक रुप से कमजोर माना जाता था। और उन्हें शासकों के द्वारा शोषित किया जाता था। शासित वर्ग की विलासी जीवन शैली और युद्ध आदि वैश्यों की कीमतों के आधार पर ही निर्धारित किये जाते थे।

इसके बाद, शूद्र आते थे, चारों वर्णों में सबसे नीचे का स्तर। वो मजदूर, गरीब किसान और नौकर होते थे। शूद्रों को माना जाता था कि उनके पास कोई विशेष योग्यता नहीं है और केवल ऊपरी तीनों वर्गों की एक दास के रुप में सेवा करने के योग्य हैं। शूद्रों को कोई अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे और किसी भी तरह के धार्मिक क्रियाकलापों या हवन करने, वेदों को पढ़ने या याद करने या मंत्रों का उच्चाचरण करने की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि उन्हें मंदिर में प्रवेश करने और धार्मिक परंपराओं को निभाने की भी आजादी नहीं थी।

ये भेदभाव की प्रथा तथाकथित शूद्रों के साथ हमारे समाज में आज भी बहुत बड़े स्तर पर की जाती है।

इन चार वर्णों के अलावा जो एक अन्य वर्ग जो सभी से नीचे माना जाता था, वो थे ‘अस्पृश्य’, बाहरी जाति, क्योंकि वो कहे गये वर्णों का भाग नहीं माने जाते थे। इन अस्पृश्यों को कुछ इस तरह के कार्यो को करना पड़ता था जो अस्वच्छ और प्रदूषित होते थे जैसे: शौचालयों और मरे हुये पशुओं की खाल को साफ करना। ये सबसे ज्यादा भेदभाव और शोषित करने वाला कार्य है, ये सभी चारों वर्ण इनसे दूरी बनाकर रखते हैं। और यदि इन अछूत जाति वालों की छाया भी किसी पर पड़ जाये तो ये पाप माना जाता था।

 

जाति व्यवस्था की बुराईयाँ और संवैधानिक प्रावधान

समाज का जाति के आधार पर शुरुआतीकरण तथाकथित निम्नजाति, विशेषरुप से जिन्हें शूद्रों और अछूतों के रुप में वर्णत किया गया है, उनके साथ विभिन्न प्रकार के शोषण किये जाते हैं।

इस व्यवस्था की शुरुआत में, शूद्रों और अछूतों से तथाकथित ऊपरी जाति के लोगों द्वारा दासों की तरह वर्ताव किया जाता था। उन्हें केवल घृणित कार्यों और सभी निम्न स्तर के कार्यों को कराया जाता था लेकिन उन्हें कोई भी शक्ति और विशेषाधिकार नहीं मिले हुये थे। सभी तरह के विशेषाधिकार ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिये थे। धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक सभी प्रकार की नेतृत्व वाली स्थितियों पर केवल तथाकथित उच्च जाति के लोगों द्वारा ली जाने वाली माना जाता था, उनका सामाजिक या राजनीतिक प्रभाव हमेशा निम्न था।

हालांकि, बहुत से समाज सुधारक जैसे: राजा राम मोहन राय जिन्होंने अपना सारा जीवन निम्नस्तर के लोगों के उद्धारीकरण के लिये लगा दिया, और जाति प्रथा के उन्मूलन के लिये बहुत से सुधार आन्दोलन चलाये। लेकिन ये हमारे सामाजिक परिवेश में इतनी गहराई में बस चुकी है कि इसे जमीनीरुप में बदलना बहुत नामुमकिन है।

इस प्रकार, भारत ने आजादी प्राप्त की और संविधान का निर्माण किया, हमारे संविधान के जनकों का विचार था कि संविधान के लेख में इस तरह के प्रावधान जोडे जायें जो जाति प्रथा की इन बुराईयों को कम कर सके और सामाजिक क्षेत्र में इसके बारे में जागरुकता ला सके। हमारे संविधान का मुख्य उद्देश्य था।

संवैधानिक प्रावधान

सबसे पहले संविधान की प्रस्तावना में भारत के लिये धारणा है कि भारत ऐसा राष्ट्र है जहां सामाजिक-आर्थिक न्याय हो; जहां अवसरों और स्तर में समानता हो और जहां वैयक्तिक गरिमा सुनिश्चित हो।

संविधान समानता की गारंटी देता है (अनुच्छेद 14); साथ ही राज्यों में भी इस बात को सुनिश्चित करता है कि किसी के भी साथ जाति के आधार पर भेदभाव न हो (अनुच्छेद 15 (1))।

छूआछूत का उन्मूलन कर दिया गया है और इसका किसी भी रुप में व्यवहार में प्रयोग में लाना निषिद्ध है (अनुच्छेद 17)। संविधान ये निर्देश देता है कि कोई भी नागरिक, केवल जाति या धर्म के आधार पर किसी भी अयोग्यता या निषेद्धता का विषय न बनाया जाये (अनुच्छेद 15(2))।

ये राज्यों को शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण देने के लिये भी शक्तियाँ देता है (अनुच्छेद 15(4) और (5)); और ए.सी. के पक्ष में नियुक्तियों में (अनुच्छेद 16(4), 16(4A), 16(4B) और अनुच्छेद 335)। अनुच्छेद 330 में अनुसूचित जाति के लिये भी लोक सभा, अनुच्छेद 332 के अन्तर्गत राज्य विधान सभाओं और अनुच्छेद 243D और 340T के अन्तर्गत स्थानीय स्वनिकायों में सीटें आरक्षण के द्वारा प्रदान की जाती हैं।

इसके अलावा, सामाजिक अन्याय और शोषण के सभी रुपों से भी संविधान सुरक्षा की गारंटी देता है (अनुच्छेद 46)।

जाति भेदभाव को प्रतिबंधित करने के लिये अनुच्छेद

संविधान के निर्देशों को पूरा करने के लिये और तथाकथित निम्न जाति के खिलाफ शोषण और भेदभाव की व्यवस्था को रोकने के लिये और भी बहुत से अनुच्छेद संसद ने पारित किये थे। उनमें से कुछ विधान निम्नलिखित हैं:

  • अस्पृश्यता (दंड़ात्मक) अनुच्छेद, 1955, को नागरिक अधिकारों की सुरक्षा अधिनियम, में 1976 में बदल दिया था।
  • अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ क्रूरता को रोकने और निर्देशित करने के लिये अनुच्छेद 1989 बनाया गया।
  • हाल में ही, सरकार ने लोक सभा में मैन्युअल सफाई कर्मचारी और उनका पुनर्वास के रुप में रोजगार प्रावधान के नाम से लोक सभा में 2013 में पारित किया था जिसका लक्ष्य मैन्युअल सफाई कर्मचारियों को रोजगार का प्रावधान कराना था। ये बिल कर्मचारियों के पुनर्वास और उन्हें वैकल्पिक रोजगार प्रदान करने के लिये था।

ये दूसरा सामाजिक कल्याण वैधानिकीकरण है जिसका उद्देश्य मैन्युअल कर्मचारियों या वाल्मिकी जाति या भंगियों को सामाजिक तंत्र में बहुत सी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करना था।

निष्कर्ष

भारत में जाति प्रथा सामाजिक-आर्थिक और धार्मिक जीवन में बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है कि इसके पीछे भगवान द्वारा दिया गया प्रमाण पत्र शामिल है। और इस व्यवस्था के खिलाफ या विपरीत कुछ भी कार्य पाप या भगवान का अपमान माना जाता है।

पर वास्तविकता में ये लोगों को भगवान द्वारा दिया गया गुण नहीं है जिसका अनुकरण किया जाये। इसका सदियों से हमारी समाजिक व्यवस्था पर बहुत शोषक और भेदभाव वाला प्रभाव पड़ा है। एक उप-उत्पाद के रुप में जाति प्रथा ने समाज में अस्पृश्यता या छूआछूत जैसी कई अन्य बुराईयों को जन्म दिया है।

ये प्रणाली अभी भी अच्छी तरह से स्थापित और पवित्र प्रथागत नियम के रुप में जारी है और लगभग सभी के द्वारा उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के कारण बेपरवाह होकर इसका पीछा किया जा रहा है। यद्यपि युवा पीढ़ी ने इस तरह के सामाजिक मानदंड़ों को छोड़ दिया है लेकिन हमारे सामाजिक और धार्मिक विश्वासों में ये आज भी अच्छी तरह से स्थापित है। यदि भारत इस जाति पर आधारित भेदभाव का उन्मूलन करने में असफल है तो 21वीं शताब्दी में भी भारत पूरी तरह से सच्चा आधुनिक देश नहीं बन सका है।

इस बुराई का समाज से पूरी तरह से उन्मूलन करने और हटाने में सबसे बड़ी समस्या इसके लिये आम सामाजिक स्वीकृति है। और जब तक इस में कोई बदलाव नहीं होता, तब तक कोई उम्मीद नहीं है। क्योंकि कानून केवल शोषण से सुरक्षा प्रदान कर सकता है लेकिन ये तथाकथित ऊंची जाति वालों के व्यवहार में बदलाव नहीं ला सकता। केवल युवा और आधुनिक पीढ़ी से ही शायद बदलाव की एक उम्मीद है कि वो ही सही अर्थों में हमारे देश में सामाजिक न्याय ला सकेंगें।