लड़की की शिक्षा पर भाषण/स्पीच

शिक्षा से संबंधित सामाजिक कारणें, विशेष रूप से लड़की/कन्या शिक्षा से संबंधित, के बारे में सबसे अधिक बात की जाती है। हर सरकार अपनी योजना में इसे प्राथमिकता देती है क्योंकि सभी सरकारें लड़कियों को शिक्षित करने के महत्व को समझते हैं। बच्चों को जागरूक बनाने के लिए स्कूल, सभाओं या विभिन्न कार्यों या सरकारी कार्यक्रमों में ऐसे भाषण दिए जाते हैं जिनके प्रेरक शब्द दूसरों को इस दिशा के लिए काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। तो अगर ऐसा कोई अवसर हो या केवल स्कूल की कोई प्रतियोगिता हो हमारे पास यहां आपके लिए सब कुछ है।

इस साइट पर हमने यहां लड़की/कन्या शिक्षा पर भाषणों के कुछ उदाहरण और इसके महत्व को बताया है  जो किसी भी अवसर पर आपकी सहायता कर सकते हैं। हमारे छोटे भाषणों का उपयोग स्कूल या कॉलेज स्तर पर किया जा सकता है और लंबे भाषणों का उपयोग बच्चों के अलावा अन्य वक्ताओं द्वारा किया जा सकता है। भाषा सरल उदाहरणों के साथ समझने में आसान है जो किसी से भी संबंधित हो सकती है। आप हमारे भाषणों से संदर्भ आकर्षित कर अपने दर्शकों के लिए अपने भाषण को दिलचस्प बना सकते हैं।

लड़की/कन्या की शिक्षा पर लंबे और छोटे भाषण (Long and Short Speech on Girl Education in Hindi)

लड़की/कन्या की शिक्षा पर भाषण - 1

आज यहां उपस्थित सभी लोगों को मेरी ओर से सुप्रभात - मैं ___________, कक्षा ___ या सदन ___________ का छात्र यहाँ पर आपको लड़की/कन्या शिक्षा के महत्व के बारे में संबोधित करने के लिए उपस्थित हूँ।

जो लड़कियां उन परिवारों से संबंध रखती हैं जहाँ यह सोचा जाता है कि लडकियाँ बोझ हैं वहां उनकी जिंदगी का उद्देश्य अपने पति और उनके परिवार के बोझ को कम करना है। यह एक ऐसी मानसिकता है जिसके अनुसार लड़कियों को मात्र वस्तु और नौकर के जैसे उन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए कहा जाता हैं, उन्हें ऐसे रूप में देखा जाता है। ज्यादातर लड़कियों की किस्मत कुछ ऐसी ही होती है।

जब हम लड़कियों के बारे में बात करते हैं तो वास्तव में हम आबादी के आधे हिस्से के बारे में बात करते हैं और उस आबादी के भी आधे लोग प्रतिभाशाली, शक्तिशाली, कुशल और ऊर्जा से भरे हुए हैं, हालांकि अप्रयुक्त हैं। हर दिशा में लड़कियां अपने साथी, जिन्हें हम लड़के कहते हैं, के बराबर हैं।

हम में से बहुत से लोगों ने मशहूर हस्ती वॉशिंगटन इरविंग का नाम नहीं सुना है लेकिन जो उन्होंने कहा है वह वास्तव में बहुत दिलचस्प है। वे कहते हैं, "सर्वश्रेष्ठ अकादमी माँ के चरणों में है"। क्या आप सभी इस तथ्य से सहमत है? मैं तो हूँ। सारे सबक चाहे वे स्कूल में मिले हो या खेल के मैदान में या मेरे हॉबी सेंटर में वे सभी नैतिकताओं और गुणों के साथ सुदृढ़ और लेपित हैं जो संपूर्ण रूप से सही है और मेरी आत्मा ने मुझे सही तरीके से सिखाया है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। किसने यह संभव बनाया? मेरी माँ ने।

माँ कौन है? चाहे वह मेरी हो या आपकी या किसी और की हो। वह अपने समय की लड़की है। अब कल्पना कीजिए कि यह लड़की स्वयं अशिक्षित हो। सोचिए कि वह कभी किसी भी स्कूल में नहीं गई, घर पर रहती थी, खाना बनाती थी, साफ़-सफ़ाई करती थी और यही वह है! तो क्या आप आज यहाँ होते जहां आप आज हैं? तो हां मैं श्री इरविंग के कथन के साथ पूरी तरह सहमत हूं। माँ के चरण सर्वश्रेष्ठ अकादमी है। इसलिए यदि आप चाहते हैं कि आने वाली शिक्षित पीढ़ी आपका अनुसरण करे तो सोचिए लड़कियों को शिक्षित करना कितना महत्वपूर्ण है।

क्यों एक माँ, एक लड़की एक अधिकारी, एक वकील, एक मंत्री, एक डॉक्टर यहां तक ​​कि सेना की अधिकारी बनती है। अगर किसी लड़की को खुद को साबित करने का मौका दिया जाए तो उसके पास खुद को साबित करने की शक्ति की कोई सीमा नहीं है।

किसी मजबूत इमारत का निर्माण उसकी मजबूत नींव पर निर्भर करता है। इसी तरह एक मजबूत राष्ट्र उसके सभी शिक्षित नागरिकों और जानकार लोगों पर निर्भर करता है। अगर हम अपने आधे से अधिक नागरिकों को उनके व्यक्तिगत विकास से दूर रखते हैं तो हमने पहले से ही एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ने की हमारी योजना को विफल करना शुरू कर दिया है। अगर कोई लड़की पूर्ण समय के लिए काम करे या थोड़ी देर के लिए घर का काम करे वह अपनी शिक्षा की मदद से पूर्ण क्षमताओं सहित अपने कार्य को पूरा करने में सक्षम हो सकती है।

एक शिक्षित लड़की निश्चित रूप से स्कूल जाने के महत्व को पहचानती है। उसे पता है कि जब हम स्कूल में जाते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति के अंदर और उसके आसपास के लोगों के लिए दयालुता, रचनात्मकता, नवाचार, विज्ञान, कला, संगीत, नृत्य, योग और इतनी अधिक चीजें होती हैं जो हम खुद में आत्मसात करते हैं। एक शिक्षित लड़की न केवल अपने मजबूत चरित्र के निर्माण की दिशा में बल्कि उसके चारों ओर मौजूद लोगों के लिए भी रचनात्मक रूप से योगदान दे सकती है। अगर उसकी माँ कभी स्कूल में नहीं गई तो वह अपनी मां को भी शिक्षित कर सकती है। इससे उसके छोटे भाई-बहन भी लाभ प्राप्त कर सकते हैं। गांवों में अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो लड़की को घर से बाहर पढ़ने के लिए भेजना ख़राब मानते हैं। उनके लिए प्राथमिक शिक्षा उनकी बेटी के जीवित रहने के लिए पर्याप्त है। लेकिन आज की दुनिया में जहां इंटरनेट और उसके लाभों की गिनती नहीं कर सकते हैं वहीँ शिक्षा हर किसी के एंड्रॉइड फोन में मौजूद है तो यह सिर्फ आपसे एक कदम दूर है।

हमने सरकारी कार्यक्रमों और टीवी द्वारा शिक्षकों को ज्ञान भारती चैनलों पर रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रमों द्वारा सभी कक्षाओं को सुंदर तरीके से तैयार किया है जिससे घर से बाहर लड़की को भेजने का यह बहाना झूठ का एक पुलिंदा जैसा लगता है। बिना एक भी पैसा खर्च किए बिना आप इस पर बहुत कुछ सीख सकते हैं। बच्चों को मुफ्त भोजन, मुफ्त किताबें, उनके कपड़ों के लिए पैसा और सभी चीजें जिनकी उन्हें जरूरत है, वो सब मिलती हैं।

तो आप किस चीज़ का इंतजार कर रहे हैं? - लड़कियों को शिक्षित करें और एक मजबूत राष्ट्र बनाएं।

मैं हेलेन राइस के शब्दों से अपना भाषण समाप्त करता हूं, "बच्चे की कक्षा है उसकी माँ का ह्रदय है"।

 

लड़की/कन्या की शिक्षा पर भाषण – 2

हेल्लो दोस्तों! मैं आपका इस विशेष सभा/समारोह में मुझे आमंत्रित करने और इस अवसर पर आप सबके सामने अपने विचार व्यक्त करने का मौका देने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं। मैं देख रहा हूँ कि मेरे श्रोताओं के बीच बहुत सारे युवा और मेरे जैसे कुछ अनुभवी लोग बैठे हैं।

शिक्षा वह राह है जो आपको अज्ञात स्थानों पर ले जाती है। अपनी कक्षा में आराम से बैठकर आपको यह पता चलेगा कि उत्तरी ध्रुव कैसा है और अगर आप समुद्र देखना चाहते हैं तो आपको कहां जाना चाहिए। शिक्षा मानव का निर्माण करती है।

हम सब आज यहां इसलिए इकट्ठे हुए हैं ताकि हमारे देश में लड़की और उसके भविष्य का जश्न मनाया जा सके। एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है जिसे हम सभी महसूस करते हैं वह है कि लड़कियों को स्कूल में भेजा जाना चाहिए। उन्हें उस स्तर की शिक्षा मिलनी चाहिए जिसके लिए हम अपने लड़कों को स्कूलों और व्यावसायिक संस्थानों में भेजते हैं। इस उद्देश्य को बढ़ावा देने और समर्थन करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं। आइए हम इसे साफ़ शब्दों में समझे जिसे हम एक समस्या के रूप में महसूस कर रहे हैं। क्यों आजादी के 70 साल बाद भी हम लड़की को शिक्षा देने की इस समस्या पर विजय नहीं पा सके हैं जिसे सरकार और शिक्षक की जिम्मेदारी समझा जाता है।

परंपरागत मूल्यों वाले रूढ़िवादी परिवारों से संबंधित लगभग 70% भारतीय गांवों में रहते हैं जहां लड़कियों को उनके घर से बाहर भेजना अभी भी बुराई मानी जाती है। लड़कियों पर बाहर ना जाने के लिए उनकी माताओं (कुछ मामलों में पिता भी) द्वारा लगाई गई बाधाएं सामाजिक रिवाजों का नतीजा है। परिवार के मुखिया या बड़े सोचते हैं कि यदि उनकी लड़कियां उनके घरों के आसपास के इलाकों से दूर चली गई तो उनका शुद्ध दिमाग प्रदूषित हो जाएगा और वे अपनी 'मूल शुद्ध धार्मिक मानसिकता' से दूर हो जाएँगी। यह परिवर्तन स्थायी होगा और वे विद्रोही हो जाएँगी।

लेकिन, लड़कियां दुनिया को उस तरह देखेंगी जिस तरह शिक्षा उन्हें दिखाएगी। एक पूरी नई दुनिया जो इतने सारे अवसरों से भरी है जो इंतज़ार कर रही है कि उसका फ़ायदा उठाया जाए! एक ऐसी दुनिया जो उन्हें अपनी शानदार अप्रयुक्त और उज्जवल रचनात्मकता का उपयोग करने में सक्षम बना सकती है।

लड़कियां मानवता का वह हिस्सा हैं जो समाज में सभी सकारात्मकता की वाहक हैं। लड़कियां वे हैं जिनकी उपस्थिति माहौल को स्वयं ही शिष्टता, सभ्यता और सुखदता से भर देती हैं। उनकी उपस्थिति पुरुषों के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को बाहर लाती है इस जगह की तुलना उस कमरे में करें जहां केवल लड़के रहते हैं। आपके दिमाग में क्या आया? क्या आप सभी उस चित्र को देख पा रहे हैं जिसे मैं देख रहा हूं? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि लड़के सक्षम नहीं है। लड़के वास्तव में कई कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा कर रहे हैं पर ऐसा वे अकेले नहीं कर रहे। उनके समकक्ष लड़कियां समान रूप से समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि आप उन्हें घर पर रखते हैं तो आप देश के आधे हिस्से को सीखने से दूर रख रहे हैं, एक उत्पादक भागीदार बनने से दूर रख रहे हैं, सभी उपलब्धियों से दूर रख रहे हैं, उन सभी चीजों से दूर रख रहे हैं जो अपनी शिक्षा पूरी प्राप्त करने में सक्षम हैं।

शिक्षा शब्द का उपयोग सिर्फ पुस्तकों और स्कूलों तक सीमित नहीं है। अगर हमारे चारों ओर नज़र डाली जाए तो हम पी वी सिंधु, भरतनाट्यम नर्तक गीता चंद्रन, अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला, पेप्सिको की मुख्य कार्यकारी अधिकारी इंदिरा नूयी, हाल की मिस वर्ल्ड – मानुषी छिल्लर को देखते हैं। हम हर क्षेत्र में लड़कियों और महिलाओं के योगदान को देख पा रहे हैं जहाँ भी वे काम कर रही हैं।

हमें सिर्फ इतना करना है कि उन्हें अपने घर से बाहर अपने पंखों को फैला कर आकाश में विस्तारित करने की अनुमति देनी है। हमें अपनी पुरानी सोच को दूर करने की जरूरत है। हमें यह विश्वास करने की आवश्यकता है कि हम उन पर निर्भर रह सकते हैं।

एक तथ्य यह है कि आजकल लड़कियां खुद को अपने घर पर रहकर भी शिक्षित कर सकती हैं। इसमें टेक्नोलॉजी की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। मैं उन भूमिकाओं को उजागर करना चाहूंगा जो हमारी सरकारें समय-समय पर निभा रही है। संचार अवसंरचना की मदद से आज हमारी सरकारें विभिन्न शैक्षणिक चैनल प्रदान करती हैं जो कि मुफ्त हैं और दूर क्षेत्रों के गांवों में उपलब्ध हैं। वे न केवल पैसा खर्च कर रहे हैं बल्कि शिक्षा की दुनिया के ऐसे जानकारीपूर्ण और शैक्षणिक कार्यक्रमों में विज्ञान, इतिहास, गणित, भौतिकी या शास्त्रीय संगीत या नृत्य पर भी समय लगा रहे हैं। अगर हम उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करते हैं तो वे आगे जरूर आएंगी और कुछ बनने की इच्छा रखेंगी।

आज उपस्थित सभी युवा और बुज़ुर्ग लोगों से मेरी अपील यह है कि आज घर जाकर सोचिए कि हममें से हर व्यक्ति कैसे अंतर उत्पन्न कर सकता है। अगली बार जब हम इन जगहों पर छुट्टी मनाने जाएँ, जहां आप दूर-दराज गांवों में जाते हैं, तो आप उनसे जुड़ सकते हैं। उनके बारे में स्कूलों और उनके बच्चों की वर्तमान स्थिति का पता लगा सकते हैं। हम वास्तव में कुछ जगह जा सकते हैं और उन्हें अपने बच्चों, विशेष रूप से लड़कियों को स्कूल में भेजने के महत्व को जानने के लिए सहायता कर सकते हैं। आखिरकार यह हमारा देश है। इन सभी प्रयत्नों में शामिल होना हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है। हमें एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए।

 

लड़की/कन्या की शिक्षा पर भाषण – 3

यहाँ उपस्थित आप सभी को मेरी ओर से सुप्रभात। मैं XYZ कक्षा ___ या सदन का छात्र ___________ इस विशेष दिन/अवसर पर आपका स्वागत करता हूँ। हम इंसान अन्य उन सभी प्रजातियों से बहुत भिन्न हैं जो हमें लगता है कि हमारी तरह बुद्धिमान हैं या वे हमसे कई वजहों से तेज या चालाक हैं लेकिन हमारे पास कुछ ऐसी खूबियाँ हैं जो अन्य प्रजातियों के पास नहीं हैं। हमारे पास अंगूठा है, इसकी संरचना ने हमारे लिए आविष्कार करने और उसे संभालना संभव बना दिया है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात है शिक्षा।

यह कहना सही है कि लड़की/कन्या शिक्षा का महत्व निस्संदेह महत्वपूर्ण मुद्दा है। लड़कों और लड़कियों के बारे में बराबरी से सोचना चाहिए ताकि कोई लिंग असमानता नहीं हो। यदि हम राष्ट्रीय विकास और प्रगति के बारे में बात करते हैं तो लड़कियों और लड़कों को समान रूप से देखना चाहिए। हम घर की चार दीवारों की सीमा में अपनी आधे हिस्से की उत्पादक आबादी को कैद कर भविष्य की दुनिया के बारे में सपना कैसे देख सकते हैं जहाँ हर क्षेत्र में टेक्नोलॉजी, रचनात्मकता, सुंदरता और उन्नति मौजूद होगी।

हम जानते हैं कि भारत में ज्यादातर लोग गांवों में रहते हैं पर ये गांव बदलते समय के साथ काफी बदल गए हैं। जिस तरह से लोगों की सोच आज़ादी के समय थी उस तरह से आज लोग रूढ़िवादी और पुरानी सोच के नहीं हैं। बहुत से परिवारों ने अपनी बेटियों को बेहतर सुविधाओं के लिए अन्य राज्यों में भेजा है। वहां वे न सिर्फ स्कूल की किताबों को पढ़ती हैं बल्कि थियेटर, नृत्य, पेंटिंग, संगीत, मूर्तिकला, विज्ञान, इतिहास, पत्रकारिता, दवा-विज्ञान, कंप्यूटर से संबंधित कई चीजों आदि को भी पढ़ती हैं।

लड़कियां बाहर जाकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करती हैं चाहे वह शिक्षा हो या खेल का मैदान हो। वे अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ता के आधार पर किसी भी अन्य लड़के की तरह, जो अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए केंद्रित है, उच्चतम पायदान तक पहुँचती हैं।

एक चीज जो किसी को अपना लक्ष्य प्राप्त करने से रोकती है वह है स्वयं का विश्वास लेकिन लड़कियों के मामले में उनके दृढ़ संकल्प के अलावा उन्हें सफ़लता हासिल करने के लिए परिवार के समर्थन की आवश्यकता होती है। उन्हें एक परिवार की आवश्यकता होती है जो उन्हें समझे और उन्हें अपने परिवार में किसी अन्य पुरुष समान की तरह विकसित होने में मदद करे। इसलिए उनके माता-पिता के हाथ में बहुत ज़िम्मेदारी होती है। मैकआर्थर फाउंडेशन के मुताबिक, "घर से स्कूल की दूरी/सुरक्षा चिंताएं विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों को स्कूल भेजने में एक महत्वपूर्ण बाधा है।"

बच्चों के लिए काम करने वाले संगठन कहते हैं, "लिंग के आधार पर सभी परिवार लड़कियों को स्कूल भेजने से रोकते हैं – उनका मानना है कि लड़की की कमाई से केवल उसके ससुराल को ही लाभ मिलेगा जिसकी वजह से लड़की के माता-पिता उसकी शिक्षा में निवेश करने में कम रूचि रखते हैं।"

(7वें अखिल भारतीय शिक्षा सर्वेक्षण 2002 के अनुसार) "50 प्रतिशत से अधिक लड़कियां स्कूल में दाखिला लेने में असफल रहती हैं और जो दाखिला लेती हैं वे 12 साल की उम्र से पहले स्कूल छोड़ देती हैं।"

बच्चे कलियों की तरह होते हैं। सही मात्रा में पानी और सही समय पर पर्याप्त धूप के कारण वे स्वस्थ रूप से फूलने वाले फूलों में विकसित होते हैं। बच्चों से मेरा मतलब दोनों लड़का और लड़की हैं। यदि हम अपनी सोच को बदल दे तो हम सभी उन समस्याओं, जैसे हमारी बेटियों की प्रति हमारा नजरिया, उन्हें शिक्षित करने और हमारे राष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्व, को दूर कर सकते हैं। वातावरण को अनुकूल बना कर हम मिलकर अंतर उत्पन्न कर सकते हैं।

लड़कियों को शिक्षित करना, निरक्षरता को खत्म करना

बच्चों को उजागर करें, राष्ट्र को उजागर करें


 

लड़की/कन्या की शिक्षा पर भाषण – 4

आज यहां इस विशेष दिन/अवसर पर उपस्थित सभी लोगों को मेरी ___ कक्षा ___ या सदन ___ का छात्र की ओर से सुप्रभात। मैंने भाषण के लिए विषय के रूप में लड़की/कन्या की शिक्षा का चयन किया है:

ज़रा एक बार इस दुनिया की कल्पना कीजिए। सब कुछ आधा - आधा फूल, आधा सूरज, आधी आपकी पसंदीदा फिल्म, आधा आपका चेहरा यहां तक ​​कि आधे आपके स्कूल। दुनिया कैसी दिखेगी? एक शब्द - अधूरा, इतना अपूर्ण!

तो हम कैसे अपने आधे बच्चों को स्कूल में भेज दें और आधे बच्चों को घर पर बैठा दें? या अपने आधे बच्चों को घर में रखें और आधे बच्चों को खेल के मैदान में भेज दें!! यह वह दोष है जब हम सोचते हैं कि लड़कों को स्कूल में भेज दें और लड़कियों को शिक्षा से वंचित कर घर पर रखें।

शिक्षा ऐसा एक उपकरण है जो आपको सक्षम बनाता है। यह व्यवहार और शिष्टाचार में परिष्करण द्वारा चिह्नित नैतिक और बौद्धिक प्रगति को निखारता है। सरल शब्दों में कहे तो शिक्षा मनुष्य को बनाती है। मुझे विश्वास है कि महिलाएं बहुत सारे मूल्यों के साथ पैदा हुई हैं। तो समाज में महिलाओं की उपस्थिति को बेहतर बनाने का प्रयास न सिर्फ अपने घर पर आराम करने बल्कि एक समुदाय के निर्माण में सक्रिय और समान भागीदार के रूप में एक आवश्यकता है। हम महिलाओं को स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हुए देखना चाहते हैं, उन्हें नर्स के रूप में देखना चाहते हैं, उन्हें कुक, ​​नैनी, देखभाल करने वालों के रूप में देखना चाहते हैं लेकिन उन्हें इससे बड़े किसी रूप में देखने के बारे में क्या - कारखाने के मालिकों, व्यापारियों, प्रबंधकों, अंतरिक्ष यात्री, मंत्रियों, अपने परिवारों के लिए इकलोते कमाने के रूप में।

यदि 75% आबादी जो गांवों में रहती है वे अपनी लड़कियों को स्कूलों में नहीं भेजेंगे तो वे इन लक्ष्यों को कैसे प्राप्त करेंगे? स्कूल में भेजने से कच्ची कली के रूप के हमारे सपने फूलों जितने खूबसूरत हो जाएंगे जो न सिर्फ दुनिया को सुशोभित करेंगे बल्कि समाज में खुशी, चमकीले रंग और शक्ति भी देंगे। भारत में यह उन लोगों की मानसिकता है जिन्हें बदलने की जरूरत है। हमें देश को विकासशील देश से विकसित बनाने के उद्देश्य से भारत को संशोधित करने पर ध्यान देना चाहिए। यहां तक ​​कि भगवान ने बच्चों के मस्तिष्क की संरचना, चीजों को पढ़ने और सीखने की क्षमता समान रूप से दे रखी है। शिक्षक जो हमें सिखाते हैं, जिन स्कूलों में हम जाते हैं, चाहे वे शहरों में हो या गांवों में हों, बच्चों में मतभेद या भेदभाव नहीं करते हैं। तो फिर लड़कियों को सीखने से कौन रोक रहा है? सबसे पहले हमें अपने दुश्मन की पहचान करनी चाहिए? आइए पहले अपने दुश्मन को समझें और फिर हम उसे जानेंगे कि उससे कैसे जीता जाए। राजा अशोक हमेशा से अपने दुश्मन की कमज़ोरी को पहचानने में माहिर थे। जॉन एफ केनेडी ने एक बार कहा था, "एक व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन प्रायः झूठ, लापरवाही, जिद्दीपन  और बेईमानी नहीं है पर मिथक, हठपन और अवास्तविकता" है।

पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई सिर्फ पाकिस्तान और एशिया में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का प्रसिद्ध चेहरा है। मलाला वो लड़की है जो बंदूक लिए लोगों के खिलाफ दृढ़ता से खड़ी थी। वह जो कुछ भी करना चाहती थी उसके लिए वह खड़े होना सही मानती थी - लिंग असमानता के बावजूद शिक्षा हर इंसान का जन्म सिद्ध अधिकार है। उन्होंने उसे गोली मार कर खत्म करने की कोशिश की लेकिन वह सिर्फ अपनी कहानी बताने के लिए नहीं बल्कि हमें उन लोगों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर तैयार होने के लिए जिंदा रही जो लड़कियों को पढ़ने से रोकना चाहते हैं, जो मानते हैं कि लड़कियों को सीमित रखना है और उन्हें अपने शौक पूरा करने की कोई स्वतंत्रता नहीं है।

मलाला अपने दुश्मन को पहले से ही जानती थी। वह जानती थी कि शिक्षित होने से उसे एक ही व्यक्ति रोक सकता है और वह एक व्यक्ति खुद वही थी। उसने दुनिया को खुद पर विश्वास करने की शक्ति और अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत को सिखाया है। तो यह हमारी लड़कियों को उन शक्तियों की भावना देने का सर्वोच्च महत्व है जो उनके भीतर है। यह उनका विश्वास है, उनकी विचारधारा है, उनकी पसंद है, पुस्तकों की अद्भुत दुनिया का अध्ययन करने और तलाशने का निर्णय है।

गांवों और छोटे शहरों में रहने वाले रूढ़िवादी और परंपरावादी परिवारों को भी शिक्षित करना महत्वपूर्ण है। उन्हें इस बारे में शिक्षित करना चाहिए कि उनकी लड़की को समान रूप लड़के की तरह शिक्षा का अधिकार है। अगर उनके गांव में कोई स्कूल है तो उसे स्कूल भेजिए। यदि नहीं तो आज की दुनिया, जहाँ चारों ओर तकनीक ही तकनीक है, उसमें अपनी लड़कियों को शिक्षा प्रदान करना बेहद आसान है और यदि वे चाहे तो शिक्षा प्राप्त करने और सीखने की कोई अवधि नहीं है! यह आपको युवा और मानसिक रूप से रचनात्मक रखता है। हमारी सरकार न केवल पूरे देश में प्रसारित चैनलों को चलाती है बल्कि वे एसओएल, इग्नू इत्यादि जैसे ओपन स्कूलों के माध्यम से भी शिक्षा प्रदान करते हैं ... ऊपर से सरकार सभी बच्चों को प्रेरित करने के लिए मुफ्त शिक्षा,  स्कूल की पोशाक,  मिड-डे मील जैसे प्रोत्साहन प्रदान करती है, जिससे बच्चे हर दिन स्कूल जाएँ। भारत में शिक्षा का समर्थन करने के लिए कई योजनाएं हैं। वास्तव में यदि कोई चाहे तो कौशल विकास केंद्रों में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, प्रोग्रामिंग, टाइपिंग, सिलाई आदि जैसे विभिन्न कौशल सीख सकता हैं। इसमें बहुत कम या ना के बराबर खर्चा आता है।

बहुत कुछ किया जा रहा है, और बहुत कुछ करने की जरूरत भी है। लड़की को शिक्षित करना बहुत ही आवश्यक  है, जो हमें एक बेहतर समुदाय और एक कुशल राष्ट्र बनाने में मदद करेगी। मिशेल ओबामा के शब्दों को देखे तो, "यदि कोई देश अपनी महिलाओं की क्षमता को कम करत है और अपनी जनसँख्या के आधे हिस्से की भागीदारी को अनदेखा करता है, तो उसकी प्रगति संभव नहीं है"।

धन्यवाद!