बेटी बचाओ पर भाषण

यहाँ हम बेटी बचाओ विषय पर छात्रों के लिए भाषणों की विभिन्न श्रृंखला प्रदान कर रहे हैं। सभी बेटी बचाओ भाषण सरल और साधारण वाक्यों का प्रयोग करके विशेषरुप से विद्यार्थियों के लिए उनकी जरुरत और आवश्यकता के अनुसार लिखे गए हैं। प्रिय अभिभावक, आप अपने बच्चों को स्कूल में किसी कार्यक्रम के आयोजन के दौरान भाषण बोलने की प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए इस तरह की साधारण और आसान समझने योग्य भाषण का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।

बेटी बचाओ पर भाषण

बेटी बचाओ पर भाषण 1

सबसे पहले, यहाँ उपस्थित सभी आदरणीय महानुभावों, अध्यापकों, अध्यापिकाओं और मेरे प्यारे सहपाठियों को मेरा नम्र सुप्रभात। इस विशेष अवसर पर, मैं बेटी बचाओ विषय पर भाषण देना चाहता/चाहती हूँ। भारतीय समाज में, प्राचीन काल से ही बेटी को एक शाप माना जाता रहा है। यदि हम अपने आप सोचें तो एक सवाल उठता हैं कि कैसे एक बेटी शाप हो सकती है? जवाब बहुत ही साफ और तथ्यों से भरा हुआ है, कि एक लड़की के बिना, एक लड़का इस संसार में कभी जन्म नहीं ले सकता। तो फिर लोग क्यों महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ बहुत सी हिंसा करते हैं? तब फिर वे क्यों एक बालिका को जन्म से पहले माँ के गर्भ में ही मार देना चाहते हैं? लोग क्यों लड़कियों का कार्यस्थलों, स्कूलों, सार्वजनिक स्थानों या घरों में बलात्कार और यौन शोषण करते हैं? लड़कियों पर क्यों तेजाब से हमला किया जाता है? और क्यों वह लड़की आदमी की बहुत सी क्रूरताओं का शिकार है?

बेटी बचाओ

यह बहुत स्पष्ट है कि, एक लड़की हमेशा समाज के लिए आशीर्वाद रही है और इस संसार में जीवन की निरंतरता का कारण है। हम बहुत से त्योहारों पर विभिन्न देवियों की पूजा करते हैं जबकि, अपने घरों में रह रही महिलाओं के लिए थोड़ी सी भी दया महसूस नहीं करते। वास्तव में, लड़कियाँ समाज का आधार स्तम्भ होती हैं। एक छोटी बच्ची, एक बहुत अच्छी बेटी, बहन, पत्नी, माँ, और भविष्य में और भी अच्छे रिश्तों का आधार बन सकती है। यदि हम उसे जन्म लेने से पहले ही मार देंगे या जन्म लेने के बाद उसकी देखभाल नहीं करेंगे तब हम कैसे भविष्य में एक बेटी, बहन, पत्नी या माँ को प्राप्त कर सकेंगे। क्या हम में से किसी ने कभी सोचा है कि क्या होगा यदि महिला गर्भवती होने, बच्चे पैदा करने या मातृत्व की सभी जिम्मेदारियों को निभाने से इंकार कर दे। क्या आदमी इस तरह की सभी जिम्मेदारियों को अकेला पूरा करने में सक्षम है। यदि नहीं; तो लड़कियाँ क्यों मारी जाती हैं?, क्यों उन्हें एक शाप की तरह समझा जाता है, क्यों वो अपने माता-पिता या समाज पर बोझ हैं? लड़कियों के बारे में बहुत से आश्चर्यजनक सत्य और तथ्य जानने के बाद भी लोगों की आँखें क्यों नहीं खुल रही हैं।

आजकल, महिलाएं घर के बाहर मैदानों में आदमी से कंधे से कंधे मिलाकर घर की सभी जिम्मेदारियों के साथ काम कर रही हैं। यह हमारे लिए बहुत शर्मनाक है कि आज भी लड़कियाँ बहुत सी हिंसा का शिकार हैं, जबकि तब उन्होंने अपने आपको इस आधुनिक युग में जीने के लिए ढाल लिया है। हमें समाज में पुरुष प्रधान प्रकृति को हटाते हुये कन्या बचाओ अभियान में सक्रियता से भाग लेना चाहिये। भारत में, पुरुष स्वंय को शासन करने वाला और महिलाओं से बेहतर मानते हैं, जो लड़कियों के खिलाफ सभी प्रकार की हिंसा को जन्म देता है। कन्या को बचाने के लिए माता-पिता की सोच बदलना ही पहली जरुरत है। उन्हें अपनी बेटियों के पोषण, शिक्षा, जीवन शैली, आदि की उपेक्षा रोकने की जरूरत है। उन्हें अपने बच्चों को एक समान मानना चाहिये चाहे वो बेटी हो या बेटा। यह माता-पिता की लड़की के लिए सकारात्मक सोच ही है जो भारत में पूरे समाज को बदल सकती है। उन्हें उन अपराधी डॉक्टरों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिये जो कुछ पैसे प्राप्त करने के लालच में बेटी को मां के गर्भ में जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं।

सभी नियमों और कानूनों को उन लोगों के (चाहे वे माता-पिता, डॉक्टरों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, आदि हों) खिलाफ सख्त और सक्रिय होना चाहिये जो लड़कियों के खिलाफ अपराध में शामिल हैं। केवल तभी, हम भारत में अच्छे भविष्य के बारे में सोच और उम्मीद कर सकते हैं। महिलाओं को भी मजबूत होना पड़ेगा और अपनी आवाज उठानी पड़ेगी। उन्हें महान भारतीय महिला नेताओं जैसे; सरोजनी नायड़ू, इंदिरा गाँधी, कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स आदि से सीख लेनी होगी। इस संसार में महिलाओं के बिना सब-कुछ अधूरा है जैसे; आदमी, घर और स्वंय एक संसार। इसलिए मेरा/मेरी आप सभी से नम्र निवेदन है कि कृपया आप सभी स्वंय को कन्या बचाओ अभियान में शामिल करें।

भारत के प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी ने कन्या बचाओ पर अपने भाषण में कहा था कि, “भारत का पीएम आपसे बेटियों के लिए भीख मांग रहा है”। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं” (अर्थात् छोटी बालिकाओं के जीवन को बचाकर उन्हें पढ़ाना) अभियान शुरु किया। यह अभियान उनके द्वारा समाज में कन्या भ्रूण हत्या के साथ ही महिला सशक्तिकरण के बारे में शिक्षा के माध्यम से जागरुकता फैलाने के लिए शुरु किया गया। ये कुछ वो तथ्य हैं, जो हमारे प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने अपने भाषण में कहे थे:

  • “देश का प्रधानमंत्री बेटियों का जीवन बचाने के लिए आपसे भीख मांग रहा है”।
  • “कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के पास में, प्रिंस नाम का लड़का एक कुएं में गिर गया, और पूरे राष्ट्र ने उसके बचाव कार्य को टीवी पर देखा। एक प्रिंस के लिए पूरे देश ने एकजुट होकर प्रार्थना की, लेकिन बहुत सी लड़कियों के मारे जाने पर हम कोई प्रतिक्रिया नहीं करते।”
  • “हम 21वीं सदी के नागरिक कहलाने योग्य नहीं है। यह इसलिए क्योंकि हम 18वीं शताब्दी के हैं – उस समय, और लड़की के जन्म के तुरन्त बाद ही उसे मार दिया जाता था। हम आज उससे भी बदतर हैं, हम तो लड़की को जन्म तक नहीं लेने देते और उसे जन्म से पहले ही मार देते हैं।”
  • “लड़कियां लड़कों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं। यदि हमें सबूत चाहिये तो परीक्षा परिणामों को देखो।”
  • “लोगों को पढ़ी-लिखी बहू चाहिये लेकिन एक बार ये तो सोचो कि बिना बेटियों को पढ़ाये, यह कैसे संभव है?”

धन्यवाद।

बेटी बचाओ पर भाषण 2

आदरणीय अध्यापक, मेरे प्यारे मित्रों और यहाँ उपस्थित अन्य सभी लोगों को सुप्रभात। मैं इस अवसर पर बेटी बचाओ विषय पर भाषण देना चाहता/चाहती हूँ। मैं अपने सभी कक्षा अध्यापकों का/की बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे यहाँ, आप सभी के सामने इस महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार रखने की अनुमति दी। बेटी बचाओ अभियान भारत सरकार द्वारा लोगों का ध्यान बेटियों को बचाने की ओर आकर्षित करने के लिए शुरु किया गया, सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण जागरुकता कार्यक्रम है। भारत में महिलाओं और बेटियों की स्थिति हम सभी के सामने बिल्कुल स्पष्ट है। अब यह और अधिक नहीं छुपा है कि कैसे लड़कियाँ हमारे देश से दिन प्रति दिन कम हो रहीं है। पुरुषों की तुलना में उनके अनुपातिक प्रतिशत में गिरावट आयी है जो कि बहुत गंभीर मुद्दा है। लड़कियों का गिरता हुआ अनुपात समाज के लिए खतरा है और इसने पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता को संदेह में ला दिया है। बेटी बचाओ के अभियान को बढ़ावा देने के लिए भारत के प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी ने एक अन्य अभियान बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ को शुरु किया है।

भारत प्रत्येक क्षेत्र में वृद्धि करता हुआ देश है। यह आर्थिक, शोध, तकनीकी और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में तेजी से बढ़ता देश है। यहाँ तक कि देश में इस तरह के विकास की प्रगति के बाद भी, लड़कियों के खिलाफ हिंसा आज भी व्यवहार में है। इसकी जड़े इतनी गहराई में हैं, जो समाज से पूरी तरह बाहर किये जाने में बाधा उत्पन्न कर रही है। लड़कियों के खिलाफ हिंसा बहुत ही खतरनाक सामाजिक बुराई है। कन्या भ्रूण हत्या का मुख्य कारण देश में तकनीकी सुधार जैसे; अल्ट्रासाउंड, लिंग परीक्षण, स्कैन परीक्षण और उल्ववेधन, आनुवंशिक असामान्यताओं का पता लगाना, आदि है। इस तरह की तकनीकी ने सभी अमीर, गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को भ्रूण के परीक्षण का रास्ता प्रदान किया है और लड़की होने की स्थिति में गर्भपात करा दिया जाता है।

सबसे पहले उल्वेधन (एम्निओसेंटेसिस) का प्रयोग (1974 में शुरु किया गया था) भ्रूण के विकास में असमानताओं का परीक्षण करने के लिए किया जाता था हालांकि, बाद में बच्चे के लिंग (1979 में अमृतसर, पंजाब में शुरु किया गया) का पता लगाने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाने लगा। जबकि, यह भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा निषिद्ध किया गया था, लेकिन यह निषिद्ध होने से पहले ही बहुत सी लड़कियों को जन्म से पहले नष्ट कर चुका था। जैसे ही इस परीक्षण के फायदे लीक हुये, लोगों ने इसे अपनी केवल लड़का पाने की चाह को पूरा करने और अजन्मी लड़कियों को गर्भपात के माध्यम से नष्ट करने के द्वारा प्रयोग करना शुरु कर दिया।

कन्या भ्रूण हत्या, भ्रूण हत्या, उचित पोषण की कमी आदि भारत में लड़कियों की संख्या में कमी होने का मुख्य मुद्दा है। यदि गलती से लड़की ने जन्म ले भी लिया तो उसे अपने माता-पिता, परिवार के अन्य सदस्यों और समाज द्वारा अन्य प्रकार के भेदभावों और उपेक्षा का सामना करना पड़ता था जैसे; बुनियादी पोषण, शिक्षा, जीवन स्तर, दहेज हत्या, दुल्हन को जलाना, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, बाल उत्पीड़न, आदि। हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ हो रही सभी प्रकार की हिंसा को व्यक्त करना दुखद है। भारत वो देश है जहां महिलाओं की पूजा की जाती है और उन्हें माता कहा जाता है, तो भी आज तक विभिन्न तरीकों से पुरुषों द्वारा शासित हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 7,50,000 कन्याओं के भ्रूण का वार्षिक गर्भपात कराया जाता है विशेषरुप से पंजाब और हरियाणा में। यदि कन्या गर्भपात की प्रथा कुछ साल और प्रचलन में रही, तो हम निश्चितरुप से माताओं के बिना दिन देखेंगे और इस तरह कोई जीवन नहीं होगा।

आमतौर पर हम भारतीय होने पर गर्व करते हैं लेकिन किस लिए, कन्या भ्रूण हत्या और लड़कियों के खिलाफ हिंसा करने के लिए। मेरा मानना है, हम तब गर्व से खुद को भारतीय कहने का अधिकार रखते हैं जबकि महिलाओं का सम्मान करें और बेटियों को बचायें। हमें अपने भारतीय होने की जिम्मेदारी को समझना चाहिये और बुरे अपराधों पर बेहतर रोक लगानी चाहिये।

धन्यवाद।

बेटी बचाओ पर भाषण 3

मेरे आदरणीय अध्यापक और मेरे प्यारे साथियों, नमस्ते। जैसा कि हम सभी इस महान अवसर को मनाने के लिए यहाँ एकत्र हुये हैं। मैं इस अवसर पर बेटी बचाओ विषय पर भाषण देना चाहता/चाहती हूँ। मैं इस विषय पर भाषण हमारे जीवन में बेटी के महत्व के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए देना चाहता/चाहती हूँ। भारतीय समाज में से बेटियों के खिलाफ क्रूर प्रथाओं को हटाने के लिए, भारतीय प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी, ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान शुरु किया। यह अभियान घरों और समाज में लड़कियों के जीवन को बचाने और उन्हें शिक्षित करने के लिए शुरु किया गया था। हमारे देश में लड़कियों के गिरते लिंग अनुपात ने भविष्य में हमारे सामने नयी चुनौती को रखा है। पृथ्वी पर जीवन की संभावना पुरुष और स्त्री दोनों के कारण है, हालांकि तब क्या होगा जब एक लिंग के अनुपात में निरंतर गिरावट आती रहे।

यह बहुत साफ है कि बिना बेटियों के कोई भविष्य नहीं है। भारतीय संघ मंत्री श्रीमति मेनका गाँधी ने, पानीपत में आयोजित एक कार्यशाला में ठीक ही कहा था कि, “कम संख्या में लड़कियों वाले, किसी भी समाज का सीमित और आक्रामक अंत होगा क्योंकि इस तरह के समाज में प्यार घट जाएगा।” बेटी बचाओ, बेटी पढाओं अभियान का मुख्य उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ समाज में हो रहे अत्याचारों को जड़ से खत्म करने के लिए बेटियों के जीवन की रक्षा करके उन्हें पढ़ाना है। लड़कियों को आम तौर पर अपनी सामान्य और बुनियादी सुविधाओं से उनके परिवार में लड़के की श्रेष्ठता के कारण वंचित किया जा रहा है (जैसे; उचित पोषण, शिक्षा, जीवन शैली, आदि)। भारतीय समाज में पोषण और शिक्षा के सन्दर्भ में बेटों को बेटियों की तुलना में अधिक महत्व दिया जाता है। उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध पूरे दिन घर के कामों को करने और पूरे परिवार को संतुष्ट करने का काम दिया जाता है। एक प्रसिद्ध उक्ति थी कि, “यदि आप अपनी बेटी को पढ़ाओगे, तो आप दो परिवारो को शिक्षित करोगें।” यह सही है क्योंकि एक बेटे को पढ़ाना केवल एक व्यक्ति को पढ़ाना है, वहीं एक बेटी को पढ़ाना पूरे परिवार को पढ़ाना है।

इसे एक सफल अभियान बनाने के लिए, सरकार ने ग्रामीणों को बेटियों को बचाने और शिक्षित करने के प्रयासों में शामिल होने के बाद विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहन देने का वादा किया है। यह कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, यौन शोषण, आदि समाजिक बुराइयों को स्थायी रूप से हटाने को सुनिश्चित करने के लिए है। भारत में कन्या भ्रूण हत्या लिंग चयनात्मक गर्भपात तकनीकियों के कारण प्रसार में हैं जो सीधे और स्पष्ट रुप में लड़कियों के अनुपात में गिरावट प्रदर्शित करता है। यह तकनीक एक बिगड़ती हुई समस्या के रुप में 2001 की राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों के प्रदर्शन के दौरान उभरी थी क्योंकि इसने कुछ भारतीय राज्यों में महिलाओं की संख्या में भारी कमी को दिखाया था। यह 2011 की जनगणना के आंकड़ों के परिणामों में भी जारी रहा विशेषरुप से भारत के समृद्धशाली क्षेत्रों में।

मध्य प्रदेश में कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती हुई दर (2001 में 1000 लड़कों की तुलना में 932 लड़कियाँ वहीं यह अनुपात 2011 में घटकर 1000 लड़कों की तुलना में 912 लड़कियाँ हो गया) जनसंख्या के आकड़ों में बहुत साफ है। बेटी बचाओ अभियान केवल तभी सफल हो सकता है जबकि इसका समर्थन प्रत्येक और सभी भारतीयों के द्वारा किया जाए।

धन्यवाद।


 

बेटी बचाओ पर भाषण 4

आदरणीय महानुभावों, शिक्षक एंव शिक्षिकाएं और मेरे प्यारे साथियों, सभी को सुप्रभात। आज यहाँ उपस्थित होने का कारण इस विशेष उत्सव के अवसर को मनाना है। इस अवसर पर, मैं अपने भाषण के माध्यम से बेटी बचाओ विषय को उठाना चाहता/चाहती हूँ। मुझे उम्मीद हैं कि आप सभी मेरा समर्थन करेंगे और इस भाषण के उद्देश्य को पूरा करने देंगे। जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि हमारे देश, भारत में बेटियों की स्थिति बहुत ही निम्न-स्तर की है। इस आधुनिक और तकनीकी संसार में, लोग बहुत चालाक हो गए हैं। वो परिवार में किसी भी नये सदस्य को जन्म देने से पहले लिंग परीक्षण के लिए जाते हैं। और आमतौर पर लड़की होने की स्थिति में वो गर्भपात कराने के विकल्प को चुनते हैं और बेटे होने की स्थिति में गर्भ को जारी रहने देते हैं। पहले समय में, क्रूर लोग बेटियों को जन्म के बाद मारते थे, हालांकि, आजकल वो अल्ट्रासाउंड के द्वारा लिंग चयनात्मक परीक्षण कराकर बेटी के भ्रूण को मां के गर्भ में ही मार देते हैं।

भारत में महिलाओं के खिलाफ गलत संस्कृति है कि लड़कियाँ केवल उपभोक्ता होती हैं वहीं बेटे रुपये देने वाले होते हैं। भारत में महिलाओं को प्राचीन काल से ही बहुत सी हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, एक बच्ची के जन्म लेने से पहले माँ के गर्भ में ही मार देना बहुत ही शर्मनाक है। पुराने लोग अपने बेटे की पत्नी से आशा करते थे कि वो बेटी को जन्म देने के स्थान पर एक बेटे को जन्म देगी। नये जोड़े पर अपने परिवार के सदस्यों और संबंधियों द्वारा बेटे को जन्म देने का दबाव डाला जाता है। इस तरह के मामलों में, उन्हें अपने सभी परिवार के सदस्यों को खुश करने के लिए गर्भावस्था के प्रारम्भिक दिनों में लिंग परीक्षण टेस्ट कराने जाना पड़ता है। हालांकि, गर्भ में ही लड़की की मौत केवल यह ही उनके खिलाफ इकलौता मुद्दा नहीं है। उन्हें संसार में जन्म लेने के बाद भी बहुत कुछ झेलना पड़ता है जैसे: दहेज हत्या, कुपोषण, अशिक्षा, दुल्हन को जलाना, यौन शोषण, बाल शोषण, निम्नस्तरीय जीवन, आदि। यदि वो गलती से जन्म भी ले लेती है, तो उसे दंड़ के रुप में बहुत कुछ सहना पड़ता है और यहाँ तक कि उनकी हत्या भी कर दी जाती हैं क्योंकि उसका भाई अपने दादा-दादी, माता-पिता और संबंधियों को पूरा ध्यान प्राप्त करता है। उसे सब कुछ समय समय पर नया मिलता रहता है जैसे - जूते, कपड़े, खिलौने, किताबें आदि वहीं लड़की को अपनी सारी इच्छाओं को मारना पड़ता है। उसे केवल अपने भाई को खुश देखकर खुश रहना सिखाया जाता है। उसे कभी-भी पोषण युक्त खाना और अच्छे स्कूल में बेहतर शिक्षा प्राप्त करने का कभी मौका नहीं मिलता।

लिंग परिक्षण और लिंग चयनात्मक तकनीकें भारत में अपराध घोषित करने के बाद भी लोगों के द्वारा आज भी प्रयोग में लायी जाती हैं। यह पूरे देश में भारी व्यवसाय का बड़ा स्रोत है। बेटियों को भी बेटों की तरह समाज में समानता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। देश में लड़कियों का घटता हुआ अनुपात हमें कुछ प्रभावी उपायों को अपनाकर इस समस्या को तोड़ने के लिए जगा रहा है। महिलाओं को उच्च और गुणवत्ता वाली शिक्षा और सशक्तिकरण की आवश्यकता है, ताकि वो अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें। उन्हें सबसे पहले अपने बच्चें के बारे में सोचने का अधिकार है (चाहे बेटी हो या बेटा) न की किसी और को। इस मुद्दे को समाज से हटाने में उन्हें शिक्षित करना और लड़कियों के साथ भविष्य के निर्माण में बहुत सहायक होगा।

धन्यवाद।

 

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